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अंजलि नैलवाल की कविताएँ
मैं गाँव सोचकर सबसे पहले
लोगों को नहीं सोच पाती
मैं नहीं समझ पाती कि मैं लोगों से हूँ
या पत्थरों-पहाड़ो से,
गाँव लोगों से है या बस अपने होने से।


गीता मलिक की कविताएँ
तुम किसी पहाड़ी संगीत की तरह लग रहे हो
नहीं हैं आस-पास कोई वाद्ययंत्र
तुम्हारी हँसी मेमने-सा निश्छल राग है


दीप्ति कुशवाह की कविताएँ
ऋतुएँ आती रहेंगी
जंगलों के कंधों को छू कर
घास के रंग उलटती-पलटतीं
पहाड़ों के रंग बदलती हुईं


इम्तियाज़ धारकर की कविताएँ
सभी हत्यारे ऐसे मुखौटे पहने हुए हैं
जिन पर भगवान का चेहरा बना है


दुन्या मिखाइल की कविताएँ
लालटेनें रात की सच्ची मुरीद हैं
उनमें सितारों से ज़्यादा सब्र है
वे जलती रहती हैं सुबह तक।


टि्वंकल तोमर सिंह की कविताएँ
जिसके पास रोटी कम है
वह सपनों को अधिक चबाता है
और जिसके पास काम नहीं
वह समय को ही जला कर
धुआँ इकट्ठा करता है


मोमिना रज़ा की कविताएँ
हमारे बीच एक ज़बान पैदा हुई थी,
ख़ामोशी और तड़प से
मगर मैं इसे अकेली ही बोलती हूँ


पल्लवी विनोद की कविता
ईश्वर के कपड़ों में इत्र लगाकर
वे बताते हैं : लोबान जलाओ
उसकी ख़ुशबू से नकारात्मकता भाग जाएगी




नेहा नरूका की कविताएँ
आज़ादी बड़ी मुश्किल शै है इतनी मुश्किल कि जीवन का रस भोगते हुए वह कभी नहीं मिल सकती उसके लिए लड़ना पड़ता है
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