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दुन्या मिखाइल की कविताएँ

  • 11 hours ago
  • 5 min read


दुन्या मिखाइल की कविताएँ
अनुवाद : देवेश पथ सारिया

आईसीयू में बुदबुदाहटें


— वह कॉफी शॉप में था जब बेहोश हुआ।

— नहीं, उसे पहले कभी हार्टअटैक नहीं आया था।

— एक जीवन है जिसमें उसे लौटना है।

— वह इस तरह बिना एक भी शब्द कहे नहीं जा सकता।

— उसे फोटोग्राफी और कॉफी की गंध पसंद है।

— जब यह मशीन आवाज़ करती है उसका मतलब क्या होता है?

— तुमने देखा उस आख़िरी तस्वीर को जो उसने भेजी थी?

— उसे इंजेक्शन से डर लगता है।

— वह मिशीगन जाने की सोच रहा था।

— वह मशीन के ज़रिए सांस ले रहा है।

— यदि वह आँखें खोल ले तो कोई उम्मीद है।

— लेकिन जब वह बोली तो उसने अपना हाथ हल्का सा हिलाया।

— उसका वॉइस मेल भर चुका है।



प्लास्टिक मृत्यु


बचपन में हम

बग़दाद में

प्लास्टिक के हथियारों से

मौत का खेल खेलते थे


हम पड़े रहते थे फ़र्श पर

लाश की तरह अविचल

एक-दो मिनट के लिए

फिर हँस पड़ता हममें से कोई

और उजागर हो जाती

हमारी प्लास्टिक मृत्यु

हम एक-दूसरे को यूँ थामते

जैसे मरणासन्न व्यक्ति जीवन को

और फिर खेलने लगते अगला खेल


कितने साल गुज़र गए

और निर्वासन में

धूमिल होता जा रहा

हमारे बचपन का बग़दाद


बहुत दूर से

हम देखते हैं

बच्चों को जो दिखते हैं

ठीक वैसे, जैसे हम दिखते थे

वे भी मारते हैं

एक-दूसरे को

पड़े रहते हैं फर्श पर अविचल


पर हँसता नहीं

उनमें से कोई

जीवित नहीं रहता

उठकर खड़ा नहीं हो जाता।



मैं शुक्रगुज़ार हूँ…


मैं शुक्रगुज़ार हूँ उन सबकी जिनसे मैं प्यार नहीं करती

वे मेरा दिल नहीं दुखाते

मुझे उनको लंबे-लंबे ख़त नहीं लिखने पड़ते

वे मुझे सपनों में आकर तंग नहीं करते

मैं बदहवास-सी उनका इंतज़ार नहीं करती

मैं पत्रिकाओं में उनका राशिफल नहीं पढ़ती

मैं उनके फ़ोन नंबर डायल नहीं करती

मैं उनकी बहुत शुक्रगुजार हूँ

वे मेरी ज़िंदगी को उलट-पुलट कर नहीं रख देते।



टैबलेट्स 


(1)

हम 

कुछ इस तरह भूले हैं

मृतकों के चेहरे

मानो सिर्फ़ एक बार हुआ था उनका दीदार

घूमते हुए दरवाज़ों के पार।


(2)

वह स्त्री

जिसके गीतों का

न आग़ाज़ था न अंत

वह जिसकी आवाज़

खो गई सितारों और चंद्रमाओं में

कहाँ है वह?

कहाँ है वह?


(3)

कछुए की तरह

पीठ पर उठाए अपना घर

मैं फिरती हूं दरबदर।


(4)

जब वे लौटेंगे

उनके पाँवों में नहीं आएंगे

जूते 

जो रखे हैं

दरवाज़े के पास। 


(5)

सपने दो तरह के होते हैं:

लंबवत और क्षैतिज

मुझे बताओ कि कैसी है

तुम्हारे सपनों की आकृति

और मैं तुम्हें बताऊंगी

कहाँ से आए हो तुम।


(6)

दीवार पर लगा शीशा

नहीं दिखाता अब 

उन लोगों के चेहरे 

जो गुज़रते थे 

उसके सामने से।


(7)

मृत व्यक्ति

चाॅंद जैसी हरकत करते हैं

धरती को पीछे छोड़

निकल जाते हैं दूर।


(8)

ओह, नन्ही चींटियो

कैसे तो तुम आगे बढ़ती जाती हो

पीछे मुड़कर एक बार नहीं देखतीं

काश, पाॅंच ही मिनट को मिले होते मुझे उधार

तुम्हारे जैसे पैर।


(9)

हम सारे 

पत्तियाॅं हैं पतझड़ की

झड़ जाने को तैयार।


(10)

मकड़ी 

अपने ही बाहर

बनाती है एक घर

और उसे निर्वासन नहीं कहती।


(11)

कोई कबूतर नहीं हूँ मैं 

जिसे मालूम हो 

घर की राह।


(12)

बड़ी आसानी से

उन्होंने हमारे उपजाऊ साल इकट्ठे किए

एक भूखी भेड़ को खिलाने के लिए।


(13)

बेशक़

तुम्हें नहीं नज़र आएगा

'मुहब्बत' नाम का लफ़्ज़

मैंने पानी पर लिखा था उसे।


(14)

पूनम का चाॅंद

सिफ़र सा दिखता है

जीवन, अंततः एक गोला है


(15)

दादा ने घर छोड़ा

हाथों में थामे एक सूटकेस

पिता ने घर छोड़ा, ख़ाली हाथ

पुत्र ने घर छोड़ा, बिना हाथ।


(16)

मत पूछो

कि कितने घर बनाए गए

पूछो कि कितने बाशिंदे

बचे रह गए घरों में।


(17)

नहीं, मैं तुमसे उकता नहीं गई हूॅं

चाॅंद भी तो हर रोज़ आता है।


(18)

उसने अपने दर्द का चित्र उकेरा :

एक रंगीन पत्थर 

समुंदर के गर्भ में बैठ गया

मछलियाॅं उसकी बग़ल से गुजर जाती हैं

उसे छू नहीं पातीं।


(19)

वह सुरक्षित थी

अपनी माॅं के पेट में।


(20)

लालटेनें रात की सच्ची मुरीद हैं

उनमें सितारों से ज़्यादा सब्र है

वे जलती रहती हैं सुबह तक।


(21)

मृतकों के अंतिम शब्द हैं

सामूहिक क़ब्रों के ऊपर खिले

रंग-बिरंगे फूल।


(22)

जो अंक अभी तुम्हें दिखते हैं

अगला पासा फेंकते ही बदल जाएंगे

ज़िंदगी अपने सारे चेहरे

एक बार में नहीं दिखाएगी ‌।


(23)

वह प्यारा-सा क्षण बीत गया

मैंने एक घंटा बिताया

उस एक क्षण के बारे में सोचते हुए।


(24)

हमारे कबीले के कुछ लोग जंग में मरे

कुछ लोग मरे अपनी ही मौत

उनमें से कोई ख़ुशी से नहीं मरा।


(25)

चौराहे पर खड़ी पर वह औरत

तांबे की बनी है

और वह बिकाऊ नहीं है।


(26)

अपने छोटे-छोटे पैरों पर

तितली लेकर आती है पराग

और जाती है उड़

फूल उसके साथ उड़ नहीं सकता

इसलिए उसकी पंखुड़ियां फड़फड़ाती हैं

जड़ें गीली हो जाती हैं।


(27)

मैं पैदा हुई

मैं कविताएँ लिखती हूॅं

मैं मर जाऊंगी।



आँसू


मैं एक दुकान में काम करती हूँ

यहाँ बेचे जाते हैं आँसू

अलग-अलग आकृति और आकार की बोतलों में


बड़ी भीड़ रहती है यहाँ

रुमालों के लिए कोई फ़ुर्सत नहीं


सबसे आगे क़तार में है वह औरत

जो हर रोज़ आती है

रंगहीन इन बूँदों को ख़रीदने

अपने लिए या किसी और के लिए?


अगला है एक अन्य ग्राहक

एक बार सोचा था उसने

कि वह इस मुल्क को कभी नहीं छोड़ेगा

भले पर्वत अपनी जगह से उखड़ जाएँ

तब भी नहीं


फिर आता है एक बच्चा

अपनी दादी के साथ

वे बाढ़ से बच निकले हैं—

हालांकि वाक़ई में ऐसा नहीं है


क़तार में सबसे अंत में खड़ी औरत

अपनी बोतल वापस करना चाहती है

उसका कहना है कि

उसने उसे खोला ही नहीं

उसने सोचा कि

उसे ज़रूरत होगी आँसुओं की

जब उसके दोस्त उसे छोड़ गए थे

लेकिन वह चक्कर लगाती रही

पार्किंग के दो ठिकानों के


सूरज जा चुका है

दुनिया के दूसरे हिस्से में

अब घर जाने का वक़्त है

हम सबके आँसू सूख चुके हैं।



चाँद पर तुम्हारे क़दमों के निशान


मैं जब भी क़दम रखती हूँ चाँद पर

हर चीज़ मुझसे कहती है कि तुम भी थे वहाँ

गुरुत्वाकर्षण में कमी से

हल्का महसूस होता हुआ मेरा वज़न

तेज़ दौड़ती हुई मेरी धड़कन

रोज़-रोज़ की माथापच्ची से विमुक्त मेरा मन

किसी भी तरह की याद से रिक्त

अपनी जगह से खिसकी हुई-सी पृथ्वी

और तुम्हारे क़दमों के ये निशान

सब तुम्हारा आभास दिलाया करते हैं।



एक दूसरे समय से एक गीत


मेरे साथ बचा रह गया

किसी दूसरे समय का एक गीत

अब जहाँ भी मैं जाती हूँ

वह मेरा पीछा करता है

वह मेरे पीछे दौड़कर आता है

मैं काग़ज़ के एक टुकड़े की तरह

गुड़मुड़ कर उसे फेंक देती हूँ


लेकिन जब भी मुझे याद आती है

अपने मृत दोस्तों में से किसी की

मैं खोलती हूँ उस गुड़मुड़ काग़ज़ को

उसकी सलवटों को सहलाती हूँ।



पुष्प 


जब मेरे दिमाग़ में

चक्कर काट रहे होते हैं विचार

मैं शाखाओं की तरह

अपने हाथ लहराती हूँ

धरती में जमा देती हूँ अपने पांव

झुक जाती हूँ

इंतज़ार करती हूँ

डाली से तोड़ लिए जाने का

या सुगंध बिखेरती हूँ


पर पुष्प, पुष्प ही होता है

मैं पुष्प नहीं हूँ।


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दुन्या मिखाइल इराक़ में पैदा हुई संसार प्रसिद्द कवयित्री हैं। वह लंबे समय से अमेरिका में रह रही हैं। अब वह अमेरिकी नागरिक भी हैं। उनके कविता-संकलन चर्चित रहे हैं और उन्हें कुछ प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले हैं। हिंदी सहित संसार की कई भाषाओं में उनकी कविताओं का अनुवाद समय-समय पर होता रहा है।


देवेश पथ सारिया द्वारा गोल चक्कर के लिए किए गए अन्य अनुवाद देखिए : देवेश पथ सारिया




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