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नाज़िम हिकमत की कविताएँ

  • 6 days ago
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Updated: 4 days ago



नाज़िम हिकमत की कविताएँ 
अंग्रेज़ी से अनुवाद : श्रीविलास सिंह 


कला के सम्बन्ध में 


कभी-कभी मैं भी कहता हूँ

आह अपने ह्रदय की

रक्तिम मनकों की भाँति एक-एक कर 

रूबी से निर्मित माला में गुंथे हुए 

स्वर्णिम तार से!


किंतु मेरी 

कविता की प्रतिभा 

हवा में उड़ जाती है 

इस्पात से बने पंखों पर 

मेरे सस्पेंशन पुलों के 

आई बीम्स की भांति !


मैं बहाना नहीं करता–

गुलाब से बुलबुल का विलाप कर्णप्रिय नहीं है…

किंतु भाषा जो सचमुच बात करती है मुझसे, वह है,

ताँबे पर, लोहे पर, लकड़ी, हड्डी और तारों पर

बजाए गए बीथोवेन के सॉनेट… 


तुम चौकड़ी भर रहे हो सकते हो  

धूल के एक बादल में!

मैं, मैं नहीं बेचूंगा 

शुद्धतम प्रजाति के 

अरबी घोड़े के लिए 

अपने लौह अश्व की प्रति घंटा गति का छठा हिस्सा भी 

जो दौड़ता है लोहे की पटरी पर!


कभी-कभी मेरी आँख पकड़ में आ जाती है 

बड़ी-सी मूर्ख मक्खी की भाँति,

मेरे कक्ष के कोनों में लगे मकड़ी के शानदार जालों द्वारा, 

किन्तु मैं वास्तव में देखता हूँ 

सतहत्तर मंज़िल के 

मजबूत कंक्रीट के पहाड़ों की ओर 

जिन्हे सृजित किया है मेरे नीली कमीज़ वाले कामगारों ने!


क्या मुझे मिलना था पुरुष सौंदर्य से 

‘युवा एडोनिस, बाइब्लोस के देवता से’

पुल पर, मैं संभवतः कभी भी ध्यान न देता;

किन्तु मेरे बस में नहीं था न देखना 

मेरे दार्शनिक की शीशे जैसी आँखों में 

अथवा मेरे अग्निशामक के चौकोर चेहरे को 

जो लाल है पसीने से भीगे सूरज जैसा!


यद्यपि मैं पी सकता हूँ 

थर्ड क्लास सिगरेटें जो भरी गयी थीं

बिजली की मेरी वर्कबेंचों पर

मैं नहीं लपेट सकता हूँ काग़ज़ में तम्बाकू को–

सबसे अच्छे वाले को भी नहीं– हाथ से 

और न पी ही सकता हूँ !

मैं नहीं–

मैं नहीं बेचूँगा 

चमड़े की टोपी और जैकेट पहनी अपनी पत्नी को

हव्वा की नग्नता के बदले!


शायद मेरे पास ‘काव्यात्मक आत्मा’ न हो

पर मैं क्या कर सकता हूँ 

जब मैं अपने स्वयं के बच्चों को अधिक प्रेम करता हूँ 

‘प्रकृति माँ’ के बच्चों की तुलना में!



आशावाद


बच्चो, हम देखेंगे ख़ूबसूरत दिन

हम देखेंगे चमकीले दिन

हम अपनी स्पीडबोट्स ले जाएंगे खुले समुद्र में बच्चों।

हम उन्हें ले जाएंगे चमकीले नीले समुद्र में...

कल्पना करो पूरी गति से जाने की…

मोटर चलती हुई

मोटर गरजती हुई

ओ बच्चो, कौन कह सकता है

कि कितना आश्चर्यजनक होता है चुंबन लेना 

जब तुम्हारी गति पहुँच रही होती है सौ मील...

 

तुम्हारे लिए, आज का सच 

फुलवारियाँ हैं–शुक्रवार के लिए, रविवार के लिए

केवल शुक्रवार के लिए

केवल रविवार के लिए

 

आज के लिए

हम प्रशंसा करते हैं प्रकाशित गलियों में स्थित दुकानों की

मानो सुना रहे हों कोई परिकथा

वे शीशे की दीवारों वाली दुकानें

इकहत्तर मंज़िल ऊँची।

 

सच है जब हम रोते हैं उत्तर के लिए

काली किताब खुल जाती है हमारे लिए

जेल में,

चमड़े की बेल्ट्स बांध लेती है हमारे हाथों को–

टूटी हुई हड्डियाँ

रक्त।

 

सच है अभी हमारी टेबल पर मांस है 

पर हफ़्ते में केवल एक दिन

और हमारे बच्चे काम से घर लौटते हैं

पीले पड़ चुके कंकालों की भाँति।

 

सच है अब.....

लेकिन मेरा विश्वास करो

हम देखेंगे ख़ूबसूरत दिन

बच्चो, हम देखेंगे चमकीले दिन

हम ले जाएंगे अपनी स्पीडबोट्स खुले समुद्र में बच्चो

हम उन्हें ले जाएंगे चमकीले नीले समुद्र में...।



शायद


शायद मैं,

बहुत पहले उस दिन

लटकते हुए पुल के अंत में

अपनी परछाई बनाऊंगा डामर पर

शायद मैं,

बहुत समय बाद,

उस दिन जब भूरी ब्रेड का एक टुकड़ा 

मेरी क्लीन शेव्ड ठुड्डी पर

अभी भी होगा जीवित

 

और मैं

उस दिन के बहुत समय बाद

मैं जीवित रहूँगा 

शहर के चौराहे पर दीवार से लगा, झुका हुआ

बजाऊँगा वायलिन, छुट्टी के दिन शाम को

मेरी ही तरह के उन बूढ़े लोगों के लिए 

जो बच गए थे आख़िरी संघर्ष में

हमारे चारों ओर होगा 

आश्चर्यजनक रात्रि में प्रकाशित फुटपाथ

और नये गीत गाते हुए

नये लोगों के क़दमों की आहट।



यदि आज रात नहीं


यदि आज रात नहीं

तो कल रात

मैं जेल जाऊंगा...

एक पत्ती भी नहीं हिल रही मेरे भीतर

गहरी नींद की भाँति

मेरा मस्तिष्क है शांत

आराम की स्थिति में।

 

मेरा मस्तिष्क है शांत

आराम की स्थिति में

क्योंकि मैं देख रहा हूँ नीले आकाश को

नवजात शिशु की भाँति

कल मैं गया शहर के चौराहे तक

और बोला : 

­“आओ हम न मारें 

अपने ही भाइयों को

आओ हम न मरें

उनके लिए!”



दीवार 


वह दीवार, वह दीवार 

ऊँची उठ रही जैसे 

बाल्कन पर्वत श्रेणी में एक और बाल्कन


वह दीवार, वह दीवार… 

वे गोली मार रहे हैं हमारे लोगों को 

उस दीवार के सामने!

उस दीवार के साथ की 

एक, एक फुट ज़मीन का है 

अपना दीर्घ महाकाव्य

उस दीवार जितना ही लंबा। 

वे नोच रहे हैं उन लोगों के पुरुष अंग 

जो मरते हैं उस दीवार के सामने 

बनाने को यौवन का सीरम 

अरबपतियों के मरियल, सिफलिसग्रस्त कंकालों के लिए। 

अरबपति लोग  

रंडियों की देह में दफ़न 

सुन रहे हैं रेडियो पर संगीत कार्यक्रम की भाँति 

मृत्यु दंड के आदेश 

दिए जाते हुए उस दीवार के सामने 

गोलियों की आवाज़ों के साथ!


एक लामबंदी हो रही है दीवार के सामने

एक लामबंदी अधिक विस्तृत 

और अधिक शापित 

1914 के मुकाबले… 


ठीक वैसे ही जैसे अँधेरा 

सूरज की रोशनी में भागता है 

छिप जाने को बिल में 

साम्राज्यवादी भाग रहे हैं 

इस लामबंदी के लिए… 

ब्रिटिश युद्धक पोतों का लीग ऑफ़ नेशंस 

बारूद से महकते दस्तानों वाले राजनयिक 

सड़े हुए मानव मांस के उत्पादक

साम्राज्यवादी सेनानायक

सेकण्ड इंटरनेशनल

दार्शनिक 

जो उर्वर बनाता और खोदता है मिट्टी 

‘धर्म’ की

एकत्र करने को उसके विषाक्त फूल,

और लिखता है अपनी रचनाएँ नोटों पर,

और अनार के प्रेम में अनुरक्त कवि 

केमिस्ट जो बेचता है मृत्यु की किरणें 

सभी हैं लामबंद 

लामबंद 

उस दीवार के झंडे तले। 


वह दीवार

वह दीवार, वह दीवार

वे गोली मार रहे हैं हमारे लोगों को 

उस दीवार के सामने…।



पाँच पंक्तियां


जीत लेने में झूठ को

आत्मा में, गलियों मे, किताबों में

माँओं की लोरियों में

और समाचारों में जिन्हें पढ़ता है वक्ता,

समझना, मेरे प्रिय, कितना महान आनंद है इसमें

समझने में कि क्या बीत चुका और क्या आने को है आगे।



मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ


मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ

नमक के साथ रोटी खाने की भाँति

रात में तेज़ बुख़ार से उठ कर

पानी पीने की भाँति, नल से मुँह लगा कर

डाकिए से लेकर किसी भारी पैकेट को खोलने की तरह

बिना जाने कि क्या है उसमें खड़खड़ाता हुआ, 

प्रसन्न, संदेहग्रस्त,

मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ

पहली बार किसी हवाई जहाज़ में उड़ते हुए समुद्र के ऊपर से

जैसे कुछ करवटें लेता है मेरे भीतर

जब धीरे से घिरता है अँधेरा इस्तांबुल में,

मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ

ईश्वर को धन्यवाद देने की भाँति कि हम जीवित हैं।



मैं सोचता हूँ तुम्हारे बारे में


मैं सोचता हूँ तुम्हारे बारे में

और मैं महसूस करता हूँ अपनी माँ की गंध

मेरी माँ, जो है सबसे सुंदर।


तुम हो मेरे भीतर उत्सव में शराब के दौर की भाँति

तुम रहती हो मेरे चारों ओर

उड़ रहा है तुम्हारा आँचल और तुम्हारे केश

क्षण मात्र में तुम्हारे सुंदर मुखड़े को पाने और खो देने के बीच।


क्या है कारण,

क्यों करता हूँ मैं याद तुम्हें अपने हृदय के घावों की तरह

क्या कारण है कि मैं सुनता हूँ तुम्हारा स्वर जब कि तुम हो इतनी दूर

और मैं अवश, उठ जाता हूँ उत्तेजनावश।


मैं झुकता हूँ घुटनों पर और देखता हूँ तुम्हारे हाथ

मैं चाहता हूँ छूना तुम्हारे हाथ

पर छू नहीं पाता मैं

तुम हो शीशे की एक दीवार के पीछे।


प्रियतम, मैं एक भौचक्का दर्शक मात्र हूँ इस नाटक का

जो मैं खेलता हूँ अपनी गोधूलि में।



पत्नी के नाम पत्र 

11. 11. 1933

बुरसा जेल


मेरी एक और एकमात्र!

तुमने लिखा था पिछले पत्र में :

“मेरा सिर भारी है,

और मेरा हृदय स्तंभित!”

तुमने लिखा था :

“अगर उन्होंने तुम्हें फाँसी पर लटका दिया,

यदि मैंने खो दिया तुम्हें,

मैं मर जाऊँगी !”

तुम जियोगी, मेरी प्रिये  

मेरी यादें गुम हो जाएँगी हवा में काले धुएँ की भाँति। 

निश्चय ही तुम जियोगी, लाल केशों वाली मेरी हृदय सम्राज्ञी :

बीसवीं शताब्दी में 

दुःख रहता है 

अधिकतम एक वर्ष तक। 


मृत्यु-

रस्सी से लटकती एक देह। 

मेरा ह्रदय 

नहीं कर सकता स्वीकार ऐसी मृत्यु। 

किंतु  

तुम शर्त लगा सकती हो 

यदि किसी घुमंतू जल्लाद का काले बालों से भरा

मकड़ों जैसा हाथ पहनाता है 

एक फंदा मेरी गर्दन में,

वे ढूढेंगे व्यर्थ ही भय 

नाज़िम की नीली आँखों में!

मेरी अंतिम गोधूलि में 


मैं

देखूँगा अपने मित्रों को और तुम्हें 

और मैं चला जाऊँगा 

अपनी क़ब्र में 


मेरी संगिनी 

सुहृद,

स्वर्णिम,

मधु से मधुर आँखों वाली- मेरी मधुमक्खी !

मैंने क्यों लिखा तुम्हें कि 

वे फाँसी देना चाहते हैं मुझे?

अभी तो ठीक से शुरू नहीं हुई है सुनवाई भी

और वे नहीं काट लेते किसी का सिर यूँ ही 

किसी शलजम की भाँति। 


देखो, भूल जाओ यह सब। 

अगर हों तुम्हारे पास कुछ पैसे  

तो तुम ख़रीद लो फलालैन के कुछ अंतर्वस्त्र मेरे लिए 

मेरा साइटिका फिर से देने लगा है तकलीफ़।

और मत भूलना कि 

एक क़ैदी की पत्नी को 

हमेशा ही सोचनी चाहिए अच्छी बातें।


गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :



नाज़िम हिकमत (15 जनवरी 1902 - 3 जून 1963) तुर्की के महान कवि, नाटककार और उपन्यासकार थे। उन्हें बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण तुर्क कवियों में से एक माना जाता है। उनका जन्म सलोनिका (वर्तमान थेसालोनिकी, ग्रीस) में हुआ जो उस समय ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। उन्होंने पारंपरिक तुर्की कविता की बजाय आधुनिक मुक्त छंद को तुर्की साहित्य में स्थापित किया। उनकी कविताएँ मानवता, स्वतंत्रता, प्रेम, युद्ध-विरोध और साम्यवाद से प्रेरित थीं। वे मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा के कट्टर समर्थक थे। अपनी कम्युनिस्ट गतिविधियों के कारण वे तुर्की में 17 वर्ष जेल में रहे। 1951 में उन्हें तुर्की की नागरिकता छोड़नी पड़ी। बाद में सोवियत संघ में निर्वासित जीवन बिताया और 1963 में मॉस्को में उनका निधन हुआ।


श्रीविलास सिंह वरिष्ठ कवि, गद्यकार एवं अनुवादक हैं। ये सभी कविताएँ उनके द्वारा अनूदित नाज़िम हिकमत की कविताओं के अनुवाद की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘जब खुलेंगे लौह द्वार’ में संकलित हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : श्रीविलास सिंह

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