शुन्तारो तानीकावा की कविताएँ
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शुन्तारो तानीकावा की कविताएँ
अंग्रेजी से अनुवाद : श्रीविलास सिंह
आत्म परिचय
मैं एक बूढ़ा आदमी हूँ, ठिगना और गंजा
पिछली आधी सदी से
मैंने बिताया है अपना जीवन शब्दों से जूझते हुए :
संज्ञा, क्रिया, विभक्ति, प्रश्नवाचक चिन्ह
किंतु अब मैं प्राथमिकता देता हूँ मौन को।
मैं नापसंद नहीं करता यांत्रिक औज़ारों को
यद्यपि मुझे प्रेम है वृक्षों से, झाड़ियों सहित
मुझे याद नहीं रहते उनके नाम
मैं कुछ कुछ निरपेक्ष-सा हूँ अतीत की तिथियों के प्रति
मुझे वितृष्णा है तथाकथित सत्ता की शक्ति से
मैं हूँ भेंगा, दृष्टि-बैषम्य और दूर-दृष्टि की समस्या से ग्रस्त
मेरे घर में नहीं कोई बौद्ध वेदिका अथवा शिंटो पूजागृह
मेरे पास है एक विशाल पत्र-पेटिका जो सीधे जुड़ी है मेरे कक्ष से
नींद मेरे लिए है एक तरह का आनंद
यदि मैं देखता हूँ स्वप्न, वे मुझे रहते नहीं स्मरण जब जागता हूँ मैं
उपरोक्त सभी हैं तथ्य, किंतु
एक बार जब मैं उन्हें अभिव्यक्त करता हूँ शब्दों में, जैसे कर रहा हूँ अब,
न जाने क्यों वे लगते नहीं हैं सच
मेरे दो आत्मनिर्भर बच्चे हैं और चार प्रपौत्र, मैं नहीं पालता कुत्ते या बिल्ली
गर्मियों में रहता हूँ मैं अधिकांशतः टी शर्ट में
मुझे क़ीमत चुकानी पड़ सकती है उन शब्दों के लिए जो मैं लिखता हूँ।
नदी
मिट्टी के रंग का पानी हिचकिचाता है, बहता है
मुझे भान होता है यह है एक नदी
निराकार, भूतल के नीचे के निवासियों का वंशज
जल जा रहा है समुद्र की ओर, इतना मैं जानता हूँ
पर मुझे नहीं पता कब और किस प्रकार यह आया ऊपर
जैसे ही ट्रेन पार करती है नदी को, मेरी बग़ल में बैठी एक युवा स्त्री लेती है जम्हाई
कुछ रिस सा रहा है उसके मुँह की रहस्यमय गहराइयों से
मुझे भान होता है एकाएक मेरा मस्तिष्क है मेरी देह से भी कमअक्ल
असुविधाजनक महसूस करता हूँ मैं, जो देह हूँ, सवारी करता हुआ ट्रेन की,
बना हुआ हूँ ज़्यादातर पानी से
मैं, जो मस्तिष्क हूँ, भर देता हूँ स्वयं को शब्दों से
किसी समय सुदूर अतीत में, कहीं किसी सुदूर स्थान पर
शब्द थे कम भारी-भरकम, किंतु
निम्नतर संसार से उनका बंधन संभवतः था अधिक सुदृढ़
शेष है जल इस ग्रह पर
रूपांतरित होता समुद्र, बादल, वर्षा और बर्फ़ में
चिपटे हुए हैं शब्द भी इस ग्रह से
रूपांतरित होते भाषणों, कविताओं, समझौतों और संधियों में
चिपटा हुआ हूँ मैं भी इस ग्रह से।
“मैं” से मिलने को
राजमार्ग से मुड़ कर प्रांतीय सड़क पर
बाएँ मुड़ो पुनः एक गाँव की ओर और अंतिम छोर पर पँहुचो
“मैं” रहता है वहीं
यह “मैं” है जो मैं स्वयं नहीं हूँ।
यह है एक साधारण मकान
एक कुत्ता भौंकता है मुझ पर
कुछ सब्ज़ियाँ बोई गयी हैं लॉन में
चूँकि मैं हमेशा बैठता हूँ मकान के बाहरी हिस्से में
मुझे पेश किया गया चाय का एक कप
नहीं किया गया कोई अभिवादन
मुझे जन्म दिया गया था मेरी माँ द्वारा
“मैं” को जन्म दिया है मेरे शब्दों ने
कौन है सच्चा ‘मैं’?
मैं इस मुद्दे से थक और ऊब गया हूँ, किंतु
चूँकि “मैं” एकाएक करने लगा है क्रंदन
गले में अटक गयी है मेरी चाय
जराजीर्ण माँ की सूखी छातियां
जो हैं अंतिम छोर मेरे जन्मस्थान का,
कहता है “मैं” बुरी तरह सिसकता हुआ
पर जब मैं देखता हूँ दिन के समय, चाँद है मौन
यह मेरे मष्तिष्क में धीरे धीरे होने लगता है स्थिर
कि आरम्भ और अंत जाते हैं इससे भी दूर तक
दिन हो चुका है समाप्त
सुनते हुए मेढकों की आवाज़ हम सो जाते हैं अगल-बग़ल बिछे हुए गद्दों पर
“मैं” और मैं दोनों हैं अब
<ब्रह्माण्ड की जगमगाती धूल >
अलविदा
मेरे प्रिय यकृत, अब समय है कहने का- अलविदा
अब समय है बिछड़ने का मेरे प्रिय गुर्दों और प्लीहा से भी
मैं हूँ अब मरने वाला
पर कोई नहीं है मेरे पास
इसलिए मैं कहूँगा अलविदा तुम सब को
तुम ने किया काम मेरे लिए काफ़ी समय तक
अब तुम होने जा रहे हो स्वतंत्र
तुम जाओ जहाँ भी जी चाहे तुम्हारा
मैं भी हो जाऊँगा स्वतंत्र एक बार होकर तुम से अलग
मैं हो जाऊँगा केवल मेरी आत्मा, नग्न
मेरे प्रिय हृदय, मैंने तुम्हें दिया कष्ट और बढ़ाई धड़कनें
मेरे प्रिय मस्तिष्क, मैंने मजबूर किया तुम्हें सोचने को तुच्छ चीज़ों के बारे में
मेरी प्रिय आँखों, कान, मुँह और शिश्न तुमने किया काम मेरे लिए मेहनत से
कृपया सोचो न बुरा मेरे बारे में
मैं जो भी था, था तुम्हारे कारण, तुम सबको धन्यवाद
यह सब कहने के पश्चात्, मेरा भविष्य उज्ज्वल है तुम्हारे बिना
अब मैं महसूस करूँगा स्वतंत्र स्वयं से
मुझे नहीं होगी कोई हिचकिचाहट स्वयं को खोने में
मिल जाने में धूल में, खो जाने में आकाश में
बन जाने में हिस्सा उन सबका बिना शब्दों के।
मैं हूँ मैं, स्वयं
मैं जानता हूँ मैं हूँ कौन
मैं हूँ यहाँ अभी
किंतु मैं जा चुका हो सकता हूँ क्षण भर में
यदि मैं न भी रहूँ यहाँ, मैं हूँ मैं, स्वयं
लेकिन सच में मुझे नहीं है रहना ज़रूरी—मैं
मैं एक पौधा हूँ कम से कम कुछ थोड़ा-सा
मैं हो सकता हूँ एक मछली कमोबेश
मैं एक खनिज भी हूँ मद्धिम चमक के साथ
यद्यपि मैं नहीं जानता इसका नाम
और निश्चय ही मैं हूँ लगभग तुम
क्योंकि मैं नहीं हो सकता गायब भुला दिए जाने के पश्चात्
मैं हूँ एक ताल, एक राग में
मैं हूँ एक मजबूत लहर और एक कण
आ चुकने के बाद, यदि मैं हो सकता हूँ इतना अहंमन्य
तुम्हारे हृदय की धड़कनों पर सवार
प्रकाश वर्षों के अंतराल से
मैं जानता हूँ मैं हूँ कौन
इसलिए मैं जानता हूँ कौन हो तुम
भले ही मैं नहीं जानता तुम्हारा नाम
भले ही वह नहीं हैं जनगणना के अभिलेख में
मैं हूँ अहंकार-सा तुम में
महसूस करता प्रसन्न भीग कर वर्षा में
महसूस करता आरामदायक तारों भरी रात्रि में
खिलखिलाता भौंडे मज़ाक़ों पर
मैं हूँ मैं
“मैं मैं हूँ” की पुनरुक्ति से परे
चिथड़े
सूर्योदय से पूर्व
कविता
आयी मुझ तक
लुटी हुई
शब्दों के
चिथड़ों में
नहीं है कुछ मेरे पास
उसे देने को
मैं बस
साभार स्वीकार करता हूँ उसके उपहार
उधड़ी हुई सिलाई
देती है अवसर मुझे उसके नग्न अस्तित्व के
क्षणिक दर्शन का
फिर भी एक बार पुनः
मैं मरम्मत करता हूँ
उसके चिथड़ों की।
मैं बैठता हूँ
एक अपराह्न जब आकाश में छाए हैं हल्के बादल
मैं बैठा हूँ एक सोफ़े पर
जैसे हो जड़ीभूत शांति
हैं बहुत से काम जो करने चाहिए मुझे
पर मैं कुछ नहीं करता
बस बैठा हूँ मंत्रमुग्ध
वे जो हैं सुन्दर, हैं सुन्दर
वे भी जो हैं कुरूप
लगते हैं किसी तरह सुन्दर
बस इस जगह होना ही है
आश्चर्यजनक
मैं हो जाता हूँ कुछ और, स्वयं से भिन्न
मैं खड़ा होता हूँ
पीने को एक घूँट जल
जल भी है आश्चर्यजनक।
और तब
जब आ गई है ग्रीष्म
फिर से
विलाप करते हैं झींगुर
फुलझड़ियां हैं
जम चुकी
मेरी स्मृतियों में
एक सुदूर देश है
धुंधला, किंतु
बह्मांड है बिलकुल मेरे सामने
क्या है ईश्वरीय कृपा—
एक मनुष्य
मर सकता है
पीछे छोड़ कर
बस एक संयोग :
और तब।
बिलकुल जिस तरह है यह
एक प्यारा मृत दोस्त है
दुःख का कारण
यात्रा के एक बैग के समक्ष
अपनी आत्माओं की व्यर्थ खोज में
हम रह जाते हैं पीछे
बादाम मिश्रित टोफू के
मीठे व्यंजन के सामने बैठे हुए
थम चुकी है बरसात
आकाश कर दिया गया है हल्का,
हल्के बादलों के पीछे स्थित सूर्य द्वारा
स्टॉक्स की कीमतें ऊँची नीची हो रही हैं शहर में
हर चीज़ आगे बढ़ जाती है
बिलकुल जिस तरह है यह सब
जाता हुआ स्मृतियों की ओर।
रात्रि
रात्रि—
कहीं से आती है
ध्वनि उबलते हुए पानी की
विष का
एक अंश मात्र है
औषधि
एक व्यक्ति
अपमानित करता है दूसरे को
बिना जाने
बिना शब्दों के
उसका हृदय
भटकता है
एक अन्य की ओर
अँधरे में
टार्च के मंद प्रकाश की ओर।
गीत
कोई
गा रहा है
मेरे बारे में
बादलों की एक धुन में
सामंजस्य में
वृक्षों की
किसी दिन यह गायन
ताल मेरे हृदय का
थम जाएगा
लेकिन गीत रहेगा जारी
उत्सव मनाता
तुम्हारे बारे में
पानी का गीत
रहेगा प्रवाहमान
नदी के तल में
रात्रि का विराम
प्रतिध्वनित होगा
खंडहरों में।
खिलखिलाहट
“मैंने एक मछली को जन्म दिया”
कहती है स्त्री
“मैंने स्वतंत्र कर दिया उसे समुद्र में तुरंत ही”
हँसती हुई मुँह दबाए
मैं हूँ शहर के मध्य की
लोग परेशान हैं दूसरे लोगों से
क्या करेंगे हम अब?
क्या हम जाएंगे देखने
अपने मृत दोस्तों को?
यहाँ मैं हूँ, कुछ न समझता
कुछ न जानता
मैं खोल लेता हूँ एक
जेबी पेपरबैक अभी के लिए, किंतु
जो कुछ भी आता है
मेरे मस्तिष्क में वह यह है कि
यह एक ख़ूबसूरत दिन है।
शय्या
एक स्त्री सोई है
संभवतः दूसरी भी
पीड़ा में, पलट कर एक छोटी लड़की जैसे
उनकी ढकी हुई छातियों के पीछे कहीं गहरे
हैं उनके धड़कते ह्रदय
समय देखो
जीवन रख देता है सुगन्धि
मध्य में
गुनगुनी चादरों के
शय्या
देखती हुई प्रेम के स्वप्न
निर्मित करती है विपदा।
एक दिन
कौए चीख रहे
काँव
काँव
सुबह-सुबह हुई
मृत्यु के समाचार पर
मैं मुक्त महसूस करता हूँ
एक मित्र है
गर्भवती
गुप्त रूप से
मैं फेंकता हूँ
रोटी के टुकड़े
कुचले हुए लेमनचूस और
मैं आश्चर्यचकित होता हूँ
अपने बारे में
इस अपराह्न।
धूल
स्मृतियाँ हैं
गहन
साँझ की कालिमा में
एक बूढ़े होते मस्तिष्क के लिए
अफसोस भी है
प्रकाश का तीव्र स्रोत
बीज
तमाम फूलों के
जो अब नहीं खिलते
मैं अब भी बोता रहता हूँ उन्हें
ताकि गा सके
धूल।
कवि की समाधि हेतु मृत्यु-लेख
“मैं अनंत मौन, प्रदान करूँगा शब्द तुम्हें”
-जूल्स सुपरविले
जब मैंने जन्म लिया
मैं था नामहीन
जल के एक अणु की भाँति
किंतु तुरंत ही मुझे पोषित किया गया स्वरों से एक मुँह से दूसरे मुँह में
व्यंजन टपके मेरे कानों में
मैं पुकारा गया और
खींच लिया गया ब्रह्माण्ड से
हिलते हुए वातावरण को
नक़्क़ाशी की मैंने मिट्टी की पट्टियों पर
लिखा बाँस पर
अभिलेखित किया रेत पर
शब्द है प्याज की परतें
यदि मैं छीलता ही रहूँ
मुझे नहीं मिलेगा ब्रह्माण्ड
मैं पसंद करता भूल जाना शब्दों को
होना एक वृक्ष गाता हुआ हवा में
मैं पसंद करता एक बादल होना लाखों वर्ष पूर्व का
मैं पसंद करता होना एक व्हेल का गीत
अब मैं जा रहा हूँ वापस होने को नामहीन
जब धूल होगी मेरी आँखों पर, मेरे कानों पर और मेरे मुँह पर
और मुझे रास्ता दिखा रहे होंगे सितारे मेरी उँगली पकड़ कर।
तकाको यू. लेंटो के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित
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कवि शुन्तारो तानीकावा का जन्म टोक्यो में हुआ था और वे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वर्षों के जापान के महत्वपूर्ण कवि हैं। उन्होंने एक बार युद्ध के बाद के जापानी बुद्धिजीवियों को और रचनात्मक संस्कृति को अंधकारमय और अस्तित्ववादी कहा था जब कवि कविता के पारंपरिक सिद्धांतों से दूर जा रहे थे। उनके शब्दों में “यह समय हमारे लिए एक प्रकार के शून्य का समय था।”
तानीकावा की कविताएँ एक प्रकार के पराभौतिक और दार्शनिक अनुभव को दर्शाती हैं। वे साधारण और सरल शब्दों में गहन विचारों और भावनात्मक सत्यों का निरूपण करते हैं। उनकी पहली पुस्तक Two Billion Light Years of Solitude (1952) थी। यह एक बेस्ट सेलर थी और अब भी जापान में कविता की सबसे प्रसिद्घ पुस्तकों में एक है। उनकी कविताओं के साठ से अधिक संग्रह प्रकाशित हुए हैं और वे जापान के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में एक हैं।
तानीकावा बड़ों के साथ ही बच्चों के लिए भी लिखते हैं । उन्होंने अनुवाद भी किये हैं जिनमें बच्चों के लिए साहित्य भी सम्मिलित है। उनकी कविताएँ चाइनीज, कोरियन, मंगोलियन और बहुत सी यूरोपीय भाषाओं में अनूदित हुई हैं। उन्हें विभिन्न पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं जिनमें Yomiuri Prize, Asahi Prize, और Zhongkun International Poetry Award भी सम्मिलित हैं।
गोल चक्कर पर प्रकाशित शुन्तारो तानीकावा का अन्य लेखन देखिए : शुन्तारो तानीकावा
श्रीविलास सिंह वरिष्ठ कवि, गद्यकार एवं अनुवादक हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : श्रीविलास सिंह
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