इम्तियाज़ धारकर की कविताएँ
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इम्तियाज़ धारकर की कविताएँ
अनुवाद : शिवम तोमर
सूचियाँ बनाना
चीज़ों को व्यवस्थित करने का
सबसे अच्छा तरीक़ा है
उनकी एक सूची बनाना
इसका नतीजा यह होता है कि
हर चीज़ को एक नाम
और एक तय स्थान मिल जाता है
लेकिन जब मैं कोई सूची बनाना शुरू करती हूँ
तो लगता है कि चीज़ें तो बेहिसाब हैं
ब्लैक-होल से लेकर
सामान्य सेफ्टी-पिन तक
और फिर, पूरा इतिहास भी तो है
सिर्फ़ इस वज़ह से कि वह पहले घट चुका है
इसका मतलब यह नहीं कि वह कहीं चला गया है
वह लोगों की पीठ पर लदा हुआ है
कोनों और दरारों में अटका हुआ है
और उसे गिना जाना ज़रूरी है
भविष्य भी यहीं खड़ा है
लेकिन मुझे स्वीकारना होगा
कि अब बड़े-बड़े मुद्दे
मुझे पहले जितना आकर्षित नहीं करते
जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ती हूँ,
मेरी सूची घरेलू बनती जाती है
कपड़े धोने और किराने के सामान की
एक अंतहीन सूची
यही वे चीज़ें हैं
जो मेरे दिमाग़ में भरी रहती हैं
ख़ैर, एक औरत का ब्लाउज फटा हुआ है,
और वह एक सेफ्टी-पिन के सहारे ही
जुड़ा हुआ है।
वे कहेंगे : ‘वह ज़रूर किसी और देश से होगी’
मुझे समझ नहीं आता कि
वे किताबें क्यों जलाते हैं
चित्र क्यों फाड़ते हैं
अपने ही ईश्वर की नग्नता नहीं देख पाते
जब वे फ़िल्मों पर प्रतिबंध लगाते हैं
और नाटकों को रोकने के लिए
थिएटर की सीटें चीर देते हैं
मैं पूछती हूँ क्यों
वे बस मुस्कुराते हैं
और कहते हैं,
'वह ज़रूर किसी और देश से होगी’
जब फ़ोन पर बात करती हूँ
कोमल इकहरे स्वरों की जगह
कठोर व्यंजनों में
वे तुरंत पहचान लेते हैं
अपनी संतुष्टि के लिए
मेरे अस्तित्व की व्याख्या करते हुए
कुड़कुड़ाते हैं :
'वह ज़रूर किसी और देश से होगी'
जब मेरे होंठ नीचे की बजाय ऊपर उठते हैं
जब मैं मेज़पोश पहनकर शहर में घूमती हूँ
जब उन्हें संदेह होता है कि
मैं अश्वेत या समलैंगिक हूँ
वे चौंकते भी नहीं
बस होंठ भींचकर कहते हैं
'वह ज़रूर किसी और देश से होगी'
जब ज़ैतून खाकर गुठलियाँ थूक देती हूँ
जब ओपेरा के दुखद पलों में उबासी लेती हूँ
जब बॉम्बे की तरह ही अंगूरों के बाग़ों में पेशाब करती हूँ
वे मुँह फेर लेते हैं,
और चेहरा ढँककर हँसते हुए
निराशा में सिर हिलाते हुए कहते हैं
'वह और क्या ही करेगी'
'वह ज़रूर किसी और देश से होगी'
शायद कहीं एक ऐसा देश हो
जहाँ हम जैसे 'सनकी' लोग रहते हों
जहाँ हम इन खूसट-बूढ़ों और बेवकूफ़ों के प्रति
निष्ठावान न हों,
ये लोग जो बदमाश और ठग हैं
जिन्हें वर्दी यह अधिकार देती है कि वे
झंडा लहराएँ, छाती फुलाएँ,
हमारी गर्दन पर पैर रखें
और अपने ही द्वारा तय किए गए
नियमों को जब चाहें तोड़ दें
पर जहाँ हम खड़े हैं
वहाँ यह देश एक देश नहीं लगता
देश के नाम पर बस दरारें हैं
जो उनकी पीठ पीछे
सीमांतों में सिमटी बढ़ती चली जाती हैं
बस मैं यहीं रहती हूँ
और ख़ुशी से कहती हूँ
'मैंने कभी तुम्हारे रीति-रिवाज नहीं सीखे
न मुझे तुम्हारी भाषा आती है
न ही तुम्हारे तौर-तरीके
मैं सच में किसी और देश से हूँ’
बॉम्बे, एक याद
मैं तुम्हें नाज़ कैफे ले जाती,
अगर वह बंद न हो गया होता
वहाँ मिलते हैं सबसे ख़ूबसूरत नज़ारे
और सबसे ख़राब खाना
वहाँ की प्लास्टिक कुर्सियों पर बैठे
पसीने में नहाते हुए
बासी बियर और क्रीम सोडा पीते
धूल-धूसरित पेड़ों के ऊपर से
मरीन ड्राइव पर रेंगती गाड़ियों को देखते,
जो समंदर के किनारे से गुजरकर
एरोस सिनेमा और 'टॉक ऑफ द टाउन' तक जाती हैं
दूर स्टॉक एक्सचेंज की इमारत,
ताजमहल होटल, ससून डॉक और गेटवे को निहारते हुए
टेबल पर चाय के पुराने चिपचिपे दागों के बीच,
हम घुटने से घुटना सटाए
हाथों में हाथ लिए बैठते
अपने पेय का आनंद लेते हुए
तुम शरारत से मेरे होंठों को छू लेते
हम नाज़ कैफे में तब तक बैठे रहते
जब तक सूरज अरब सागर में न समा जाता
मैं तुम्हें बॉम्बे ले जाती,
अगर इसका नाम समंदर में न खो गया होता
अगर वह अब भी वहीं होता
और तुम अब भी यहीं होते
तो मैं तुम्हें उस जगह ले जाती
जिसे बॉम्बे कहते थे,
मैं तुम्हें नाज़ कैफे ले जाती।
मुख्य दरवाज़ा
मैं जहाँ भी रही,
वहाँ जब सुबह मुख्य दरवाज़े से बाहर निकलती
तब लगता कि जैसे किसी पराए देश में
क़दम रखा हो।
दो भाषाएँ थीं
एक घर के भीतर की
दूसरी घर के बाहर की।
खान-पान, पहनावा और आचरण
बाहर निकलते ही सब बदल जाता।
मेरे हाथ, जो घर में उँगलियाँ होते थे,
बाहर निकलते ही काँटे-छुरियाँ बन जाते।
मैं इसे ‘अनुकूलन’ कहती हूँ
जब मेरी ज़ुबान बड़ी सहजता से
एक व्याकरण के कपड़े उतार
दूसरे व्याकरण का लबादा ओढ़ लेती है।
पर सच्चाई यह है कि
मुझे इस रोज़मर्रा के विस्थापन की लत लग गई है
हर रोज़, एक अलग समय मंडल की ओर भागना
हर रोज़, बदले हुए मौसमों की ओर जाना
और वहाँ पहुँचते ही एक नया व्यक्ति हो जाना
ऐसा मत सोचना कि मैंने ध्यान नहीं दिया–
मुझे मालूम है कि तुम भी इसी सफ़र पर हो।
उस कैब-ड्राइवर के लिए जो भूखा-सा लग रहा था
वह बहुत जवान लग रहा था, उसके हाथ
जैसे दो हड्डियाँ स्टीयरिंग को घुमा रही हों।
नाश्ते में उसने क्या खाया होगा?
और शिफ्ट ख़त्म होने के बाद वह क्या खाएगा?
क्या उसकी माँ उसके लिए
पंजाबी समोसे बनाती होगी,
या बंगाली सरसों वाली मछली,
या फिर केरल की भात?
क्या उसे मेरी तरह उत्तर के आम पसंद हैं,
या दक्षिण के ज़्यादा मीठे आम?
इससे पहले कि मैं ख़ुद को रोक पाती,
मेरे मुँह से निकल ही गया :
"आप कहाँ से हैं... मेरा मतलब है,
आपके लोग..."
मेरे कहे शब्द उसकी गर्दन पर झरते हैं,
रीयर-व्यू शीशे में झलकते हैं,
और उसकी आँखों में उतर जाते हैं।
वह एक पल के लिए पलटकर देखता है
उसका चेहरा एक पासपोर्ट जैसा लगता है
उसकी पीठ किसी झंडे जैसी
वह जवाब देता है, ‘बार्न्सले’
मैं किराया चुकाती हूँ और गाड़ी से उतर जाती हूँ।
उद्धारकर्ता
यह कहना मुश्किल है कि कौन किस तरफ़ है।
सभी हत्यारे ऐसे मुखौटे पहने हुए हैं
जिन पर भगवान का चेहरा बना है।
धर्म के रक्षक बड़ी श्रद्धा से
मुद्रा, गिरते हुए रुपये, गिरते शेयर बाज़ार,
टैक्सी ड्राइवरों की हड़ताल,
और इस बात पर विचार कर रहे हैं कि
क्या हमारा उद्धारकर्ता
एक कंप्यूटर चिप के रूप में वापस आएगा।
प्याज की क़ीमत बढ़ गई है :
मेज़ के चारों ओर बैठे लोगों ने तय कर लिया है
कि अब युद्ध लड़ना उचित होगा।
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इम्तियाज़ धारकर समकालीन अंग्रेज़ी कविता की महत्त्वपूर्ण कवयित्री हैं। उनका जन्म 31 जनवरी, 1954 को लाहौर में हुआ था और बचपन ग्लासगो में बीता। वह उन कवयित्रियों में से हैं जो अपनी कविताओं में सांस्कृतिक पहचान, विस्थापन और अनुभवों को गहराई से अभिव्यक्त करती हैं। उनकी कविताएँ पितृसत्तात्मक संरचनाओं पर सवाल उठाती हैं और धार्मिक तथा सामाजिक बंधनों को चुनौती देती हैं। 'Purdah' और 'I Speak for the Devil' जैसे उनके काव्य संग्रह इसके महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। मुंबई, लंदन और ग्लासगो के बीच अपना जीवन बिताते हुए, उनकी कविताएँ बहु-सांस्कृतिक अनुभवों का एक जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत करती हैं। यहाँ उनकी कुछ चर्चित कविताओं के अनुवाद प्रस्तुत हैं।
शिवम तोमर युवा कवि-लेखक एवं अनुवादक हैं। वह द्विभाषी वेब पत्रिका पोयम्स इंडिया के संस्थापक-संपादक हैं। ईमेल : shivamspoetry@gmail.com । गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : शिवम तोमर ।
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