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हर्षित वर्मा की कविताएँ

  • Jun 2
  • 8 min read


तुमसे मिलने की ललक


किसी दिन तुम स्टेशन से एक ट्रेन पकड़ो 

जो दिल्ली के किसी भी स्टेशन पर आती हो

किसी दिन तुम आ जाओ वैसे ही जैसे 

तकनीकी माध्यम से आती हो

मुझे तुमसे मिलना है, तुम्हारी याद आती है

इन दिनों व्यस्तता हमारी बातें खा जाती है

ऐसे मिलो किसी दिन जैसे दफ़्तर का कोई काम हो

ऐसे आओ किसी दिन जैसे कोई ढलती शाम हो

ऐसे बात करो किसी दिन कि फ़ोन बग़ल में सो जाए 

ऐसे बात करो किसी दिन कि सुबह से शाम हो जाए 

मुझे बताओ अराजकता क्या है 

हाथों में जादू क्यों है

क़ब्र से लौटकर पूनल कहाँ गया 

मेरी उँगलियां बेकाबू क्यों हैं

उस पंजाबी गीत का मतलब क्या है

तुम्हारा शहर कैसा है

पीले पड़ गए पत्तों का क्या हुआ

पीले पत्तों वाला शजर कैसा है

तुम्हारे शहर के लोग कैसे हैं

तुम्हारे आसमान का रंग क्या है

सब चाहेंगे तुम ये करो तुम वो 

तुम बताओ तुम्हारा मन क्या है 

कौन सी घटना तुमको याद आती है

कौन सी बात सबसे ज़्यादा हँसाती है

बचपन का घर कैसा था बचपन कैसा था

छत से जब शहर देखा होगा तो वो मंज़र कैसा था

बिंदी लगाना कब शुरू किया

बीती किताब कौन सी थी 

जो तुमने कही थी मिलकर बताने को

वो बात कौन सी थी 

किसी दिन यहाँ आ जाओ, और जगह भी तो जाती हो

किसी दिन तुम स्टेशन से एक ट्रेन पकड़ो 

जो दिल्ली के किसी भी स्टेशन पर आती हो।



माँ के पास


फिल्म दीवार में शशि कपूर ने बड़े गर्व से कहा था :

‘मेरे पास माँ है’

मै सोचता हूँ कि मेरे पास तो माँ है

लेकिन माँ के पास क्या है?

माँ की दुनिया कितनी सिमटी हुई है 

और माँ का आंचल उतना ही विस्तारित है

माँ के पास है उसका प्रेमी कुकर 

जो सुबह-शाम याद से सीटी मारकर माँ को छेड़ता है

उन्होंने पिता को अपने सीने से चिपकाकर रखा हुआ है मंगलसूत्र के रूप में 

जबकि पिता को लगता है उन्होंने माँ को बांध दिया है मंगलसूत्र में 

माँ के पास एक लाल रंग है 

जो उसके माथे से होता हुआ उसकी माँग में विराजमान है

जैसे शिव की जटाओं में रहता है चाँद 

माँ के पास है राग से भरपूर खनखन करके 

रोज़ नई धुन छेड़ती चूड़ियां

उसके पास संगीत है बड़े संगीतज्ञों से ज़्यादा 

माँ के पास हैं चार बिछुए, उसके पास है गौरैया उसके पास है तुलसी, उसके पास है कला

रात के भात को सुबह का नाश्ता बनाने की कला

दो हाथों से घर संभालने की कला

कम रुपयों में ज़्यादा ख़र्च निकालने की कला

माँ के पास है ममता, वात्सल्य की थाप है माँ के पास

माँ के पास सब है जो दिखता नहीं

जो नहीं है वो भी है माँ के पास 

अलावा इसके माँ के पास है एक शिकायत

कि माँ के पास नहीं है माँ।



जो हमने छोड़ दिया


सुबह-सुबह सहनशील आँखों के वश से बाहर होती असहनीय नींद

दरवाज़े पर हॉर्न देती स्कूल बस से आती तुम्हारे बालों की ख़ुशबू 

मेरे बस्ते में टिफिन और अपनी कमर में पल्ला ठूंसती माँ 

बटुए के गिने हुए पैसों को फिर से गिनते हुए पिता

याद रखने वाले यही पल थे जो भुला दिए गए।


बरसात में घर के कोनों से आती सीलन की बू

पापा के स्कूटर का धीरे-धीरे टपकता पेट्रोल 

एक माशूका का आधा इस्तेमाल किया हुआ इत्र

स्कूल टिफिन से आती अचार की ख़ुशबू 

नाक का स्वास्थ्य इन्हीं से था, अब नाक पैसा सूंघती है।


वैष्णो देवी की यात्रा में चलती किशोर दा के गानों की धुन

माँ की ही तरह सुबह-सुबह हमें डाँटती कुकर की सीटी

खेत की फ़सल को झुमाती हुई गुज़रती रेल का हॉर्न 

पिता के मुँह से निकला मुहावरा—

‘पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे समझदार’

ध्यान से सुनने वाली यही ध्वनियाँ थीं

जिन्हें हमने अनसुना कर दिया।



अमर जगह


यही वह जगह थी जहानं तितली के पंखों-सी सुनहरी धूप निकलती थी

यहीं सूरज तुम्हारे आंचल में दुबक जाता था 

अँधेरे में जुगनू रास्ता भटक जाते थे

यही वह जगह थी जहाँ एक बच्चे ने भूख की शिकायत की 

तब उसे नन्ही कविताओं की गोलियाँ चटाई गईं

यही वह जगह थी जहाँ बच्चे में उन्माद पैदा हुआ 

यहीं सीढ़ी पर बैठे-बैठे हमने हमारे बीच घास को उगते देखा 

यहीं कहीं दूर से एक तान छिड़ती थी तुम्हारे पाँव थिरक उठते थे

पेट भर जाने पर यहीं इसी गैलरी में उद्दंड दोपहरी आवारागर्दी करती थी

यहीं तुम्हारे आँसुओं से ज़मीन गीली हुई थी 

और घास के रूप में एक दफ़ा भविष्य उपजा था

यहीं से मैने रेंगते हुए विदा ली थी

यहीं मेरे हिस्से के आँसू तुम्हारी आँख से रिसते रहे

यहीं तुम्हारे हिस्से की धूल मेरे पाँव से चिपक गई 

यहीं मै वापस लौट आया हूँ

जैसे लौट-लौट कर आती थी तुम्हारी याद 

तुम यहीं हो अब भी जैसे दरख़्त नहीं बदलते अपनी जगह

इस जगह का होना हमारा होना है

यह जगह अमर है हम दो फूल हैं।



दुछत्ती 


गुसलखाने और उसकी छत के बीच एक दुछत्ती थी

जैसे दिल और दिमाग़ के बीच मन होता है

दुछत्ती वह जगह थी जहाँ वह सब रखा जाता था 

जिसका रोज़मर्रा में उपयोग नहीं होता

मन की भी रोज़-रोज़ कौन ही सुनता है

सबसे सुंदर और लापरवाह थी ओस की वह बूँद जो आपकी इजाज़त के बग़ैर 

आपकी उँगली के पोरों पर नमी छोड़ जाती थी

सबसे भाग्यशाली थी वह दूब घास 

जिसे ओस की बूँद ने ठहरने के लिए चुना था

जो दुछत्ती के ठीक कोने पर उग आई थी

जो मुँह उठाकर खुला आकाश देखती 

और बदलते रंगों का हाल दुछत्ती को बताती थी

उसी दुछत्ती में पापा का पुराना टोपी वाला हेलमेट

माँ के दहेज़ के कुछ टूट गए बर्तन, सूखे उपले 

और मेरी टूटी हुए साइकिल थी

कई बार शाम में छत पर बैठे हुए 

जब हम सब आपस में बात करते 

तो मेरे मन में ख़्याल आता कि मेरी साइकिल कैसी होगी

चूँकि मैं छोटा था, दुछत्ती पर नहीं जा सकता था केवल कल्पना कर सकता था उसके अंदर की दुनिया की

मेरी कल्पना में मेरी साइकिल 

पापा के हेलमेट से पापा की शिकायत करती थी

कहती थी कि रिम ही तो टूटा था और ज़्यादा से ज़्यादा पहिया मुड़ा था

तो इसके लिए क्या मुझे यहाँ 

इन टूटे बर्तनों और सूखे उपलों के साथ पटक देंगे? 

बदले में हेलमेट अपने सर पर पड़ी दरार दिखाता था

कोने में भीड़ लगाए उपले दोनों की बातों पर उपहास करते थे

टूटे बर्तन टूटी-फूटी आवाज़ में कुछ कहने को होते थे 

तो कोई उपला उन पर अपनी दबिश बना लेता था

घर का माहौल भी लगभग ऐसा ही था

मेरी पापा से शिकायत थी कि मेरा पढ़ाई में मन नहीं था 

और ज़्यादा से ज़्यादा मैने पढ़ाई छोड़ दी थी 

तो इसके लिए क्या आप मुझ पर अपने सपने लाद देंगे 

और बदले में पापा मुझे अपनी असफलता के कारण 

देहात में काम करने की कहानियाँ सुनाते थे, ज़िम्मेदारियों की भीड़ हमारा उपहास करती 

और मम्मी अपनी लड़खड़ाती आवाज़ में कुछ कहने को होतीं 

तो उन्हें कोई न कोई काम याद आ जाता

कुछ याद नहीं आता था तो कुकर सीटी दे देता 

या कपड़े धुलने की ज़िद लिए चौकी पर आ बैठते थे

इस सब के बावजूद दुछत्ती में 

साइकिल हेलमेट उपले बर्तन सब साथ रहते थे 

ठीक वैसे ही जैसे हम सब साथ रहते थे 

घर में एक दुछत्ती थी और दुछत्ती में एक घर था।



विस्तार और संक्षेप 


इतना सुख था कि सुख का स्वाद चला गया था

इतना दुख आया कि सुख का स्वाद लौट आया

इतना बड़ा था आसमान कि दो हाथों में नहीं सिमटता था

इतने छोटे थे हम कि कहीं ना कहीं टकराते रहते थे

झरना इतनी बार गिरता था कि अंततः 

उसने तुम्हारे गीले बालों का रूप ले लिया

लोग इतनी बार उठते गिरते कोशिश करते थे 

कि वे घास बन गए थे

धूप आती-जाती रहती तो लगता कि तुम पलकें झपक रही हो

आदमी इतना चुप था उसके बोलने में भी चुप्पी का अहसास था

अंततः वह इतना बोला कि उसकी चुप्पी में भी आवाज़ सुनाई देती थी

मृत्यु तय थी, इसके लिए हमने जीना शुरू किया

जीने की दिशा मालूम नहीं थी इसीलिए हम तिल-तिल कर मरने लगे

जो कुछ भी बहुत ज़्यादा था, अपने थोड़े में समा जाता था

यह दुनिया भी किसी किताब की बहुत ज़्यादा फैली हुई दुनिया होगी 

जो अब बहुत छोटी दुनिया में समा गई है।



मुखवास


मुँह से निकले शब्दों में भले ही बदबू आए

आने वाली वाली साँसें ताज़ा रहें

इसके लिए हम मुखवास खाने लगे

घर में यह बनेगा और यह नहीं बनेगा की लड़ाई होती 

और हम खाने के बाद सौंफ चबाते 

ताकि नापसंद खाने की बू बाहर ना आए

क्लास में सिगरेट की बदबू से सिगरेट का 

हमारे साथ संबंध स्थापित ना हो 

इसके लिए हम ज़ुबान पर इलायची रखकर कॉलेज गए

अपनी ज़ुबान के स्वाद के लालच में प्याज़ खाई 

और दांतों को ब्रश से घिसकर जाने किस बात की सज़ा दी

सज़ा तो ख़ैर हमे भी न जाने किस बात की मिलती थी

दफ़्तर में बड़े बाबू मुखवास के नाम पर किशमिश चबाते 

और भर भरके हमें गलियां देते

मुखवास के नाम पर लोग 

अलग-अलग चीज़ों, भावनाओं और उपाधियों को खा गए

जैसे व्यस्तता दोस्तों की बातें खा गई

सरकारी बैंक का खजांची पड़ोस के काका की पेंशन

सरकार हमारी नौकरी और नौकरी हमें खा गई

वह भी बिना डकार लिए।



ऊब का जन्म


किसी सज्जन व्यक्ति ने कहा था : 

‘ऊब से रचनात्मकता का जन्म होता है’

उन सज्जन का नाम याद नहीं रहा हालांकि वह भी अब नहीं रहे

रह गया तो उनका कहा यह वाक्य जो आज भी जीवंत है 

पौधे एक जगह खड़े-खड़े ऊब गए होंगे 

तब उन्होंने रचा मधुकामिनी, मोगरा, चम्पा, 

चमेली, बोगनवेलिया, अपराजिता, रजनीगंधा 

जैसे अनेक प्रकार के फूलों को

ईश्वर, असुरों से लड़ते-लड़ते ऊब गया होगा 

तब उसने रचा मनुष्य को

मनुष्य और फूल गिरते-गिरते ऊब गए होंगे 

तब वे आपस में मिले होंगे

‘मिलना’ ऊब से जन्मी रचनात्मकता है।



शतरंज 


भोरे-भोरे ही मोहरें बिछ जाती हैं

ज़िंदगी की शतरंज पर

कितना कुछ दाँव पर लग जाता है

दहलीज़ पार करते ही

लड़ाई छिड़ी रहती है ख़ुआब और ज़िम्मेदारियों के दरमियाँ 

एक-एक कर दोनों ही मर जाते हैं शाम ढलने तक

एक और चीज़ जो दाँव पर लगी थी 

ज़्यादा दुःख उसे हारने का हुआ

वही छोटे से कदमों वाला अल्हड़-सा प्यार

अल्हड़ है लेकिन राजा है

सबसे आख़िर में उसको मात मिलती है

रात की स्याही फैलने तक मर जाता है वह भी

दिन भर दिमाग में खच-पच मची रहती है

एक प्यादा सपनों का आगे क़दम रखता है

कि दूर बैठा ज़िम्मेदारियों का हाथी घूरकर देखने लगता है

कुछ ऊँट से दोस्त आड़ी-टेढ़ी चाल चलकर

ज़रा दबदबा बनाते हैं उस हाथी पर 

तब कहीं सांस भरता हूँ और रखकर कलेजे पर हाथ

दो प्यादों को आमने-सामने खड़ा कर देता हूँ

शायद कोई फ़ैसला हो सपनो और ज़िम्मेदारियों में 

शायद यह खेल यहीं ड्रॉ हो जाए।



ख़त का जन्म 


आख़िरी बार ख़त कब पढ़ा था

याद नहीं

लिखा कब था, यह तो क़तई याद नहीं

ख़त लिखने का यह सिलसिला

कब शुरू हुआ होगा

कहाँ बैठकर किस ने 

काग़ज़ पर उतारा होगा अपने मन को

किसने लिखा होगा पहला ख़त 

किन, किन परिस्थितियों में लिखा गया होगा 

क्या, क्या होगा उन ख़तों में समाया हुआ

दो प्रेमियों की उदासी भरा नरम ख़त 

या मोहब्बत की चाशनी में लपालप 

क़िताब में रखकर चुपके से दिए गए ख़त 

लंबी नौकरी के बाद छोटे अवकाश का ख़त 

त्योहार पर घर लौटने का खुशियों भरा ख़त 

सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही से रास्ता भटके हुए ख़त 

लिखे हुए मगर भेज पाने की हिम्मत से हारे हुए ख़त 

‘सावन की पहली बारिश है तुम नहीं हो’

की मीठी याद भरे इंतज़ार वाले ख़त 

‘बाबा का रिटायरमेंट है बुआ को बुला लो’

सगे रिश्तेदारों को ख़ुशियों में सम्मिलित करने वाले ख़त 

‘बेटा अफ़सर बन गया है’

जैसी रौबदार लाइनों भरा पिता का उनके दोस्त को रोबीला ख़त 

पीले रंग का छोटा सा एक रुपए की महंगी टिकट लगा हुआ ख़त 

दोस्तो! इन ख़तों की तादात बहुत लंबी है 

ज़िंदगी में बहुत-सी कहानियाँ हैं

उन कहानियों में बहुत सी परिस्थितियाँ हैं

परिस्थितियों में बहुत से भाव हैं

उन्हीं भावों से लिपटे

एक लंबा अवकाश लिए हुए 

कई ख़त पड़े थे 

एक पुराने कैनवास के झोले में 

मकान शिफ्ट करते हुए 

यही एक अच्छी घटना हुई है

यादें ताज़ा करते हैं

आओ यार पुराने ख़त पढ़ते हैं।


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हर्षित वर्मा (जन्म 1997, बिजनौर) की कविताएँ पहली बार किसी पत्रिका में प्रकाशित हो रही हैं। इस प्रस्तुति की कुछ कविताओं में वह बहुत प्रभावित करते हैं, विशेष तौर पर पहली कविता में। उनसे उम्मीदें रखी जा सकती हैं।  ईमेल : vermaharshit9045@gmail.com


2 Comments


Guest
Jun 02

उम्दा...अदभुत कविताएं...

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Guest
Jun 02

Bahut badhiya

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