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टि्वंकल तोमर सिंह की कविताएँ

  • May 23
  • 4 min read


बेरोज़गार


लंबी बेरोज़गारी में दिन काटता लड़का

तन से स्वस्थ दिखता लड़का

मन के अंदर जालों की भूलभुलैया में

सहमा सा रहता है

दिन रात जालों की गिनती करके 

कितना बड़ा गणितज्ञ बन पाएगा भला?


कभी जो श्रम का उजास था उसके भीतर

अब ठहरा हुआ सा धुंधलका है

जो उसे दर्पण में अपनी ही छवि

ठीक से देखने नहीं देता

हर परिचय से कन्नी काटता लड़का

ख़ुद से थोड़ा-थोड़ा अपरिचित हुआ जाता है


खिड़की से झाँककर नीचे देखता है,

तमाशा ख़त्म कर पैसे गिनने में लगा है मदारी

सुस्ता रहा है बन्दर, पीठ खुजला रही है बंदरिया,

सोचता है,

आँख, कान, नाक, हाथ, पैर, नाखून

सब तो दिए बराबर

एक पूँछ और दे देता विधाता

कट तो जाता जीवन आसानी से।



सिगरेट काग़ज़ है और किताब भी


तुम्हारी उँगलियों में

सिगरेट की वह जलती हुई छोटी-सी छड़ी

एक हारे हुए योद्धा का शस्त्र लगती है

जो अपने अंदर की चिंगारियों को दफ़ना रहा है कहीं

धीरे-धीरे ख़ुद को राख में बदलता हुआ


मैंने कई बार देखा है

धुएँ के पीछे छुपता तुम्हारा चेहरा

जैसे तुम किसी पराजय को

आदत कहकर पी जाना चाहते हो


तुम्हारी साँसों में उतरती एक कड़वी गर्मी

मानो भीतर का सर्द शून्य भरने का उपक्रम हो

हर मौन कश के पीछे हौले से तुम

भस्म से अस्तित्व को ढक लेते हो

रेगिस्तान में रहते हो और सूरज तले छुपते हो?


उंगलियाँ थाम रहीं हैं राख

जबकि वे थाम सकती हैं एक किताब

जिसके पन्नों में प्रकट में कोई आग नहीं

पर एक पूरी दुनिया जल सकती है

उससे उठी लपटों से


मैं तुम्हें बचाना नहीं चाहती, न ही सुधारना

बस इतना कि तुम्हारी उँगलियों में धुएँ की महक नहीं

नए काग़ज़, काली स्याही की गंध हो

और वे उँगलियाँ मैं रोज़ लगाऊं

अपने माथे पर


तीस-चालीस सिगरेट में राख का स्याह अंधेरा है

तीन-चार पृष्ठों में दौड़ती कोई ज्वलंत कविता

कुछ काग़ज़ स्वतः बुझने वाले होते हैं

और कुछ कागज ऐसे होते हैं

जो चिंगारियों को 

भड़का देते हैं 

और और और! 



अभाव एक ख़ामोश षडयंत्र है


तुमने देखा होगा

जिसके पास रोटी कम है

वह सपनों को अधिक चबाता है

और जिसके पास काम नहीं

वह समय को ही जला कर

धुआँ इकट्ठा करता है


दरअसल

अभाव एक खामोश षड्यंत्र है

जो आदमी को भीतर से खोखला करता है

और फिर उसी खोखलेपन में

एक लत उगा देता है

जैसे वीरान खेत में उग आती है

कोई ज़िद्दी, ज़हरीली घास


ये बचाव के हथियार हैं

जिनसे आदमी

अपने ही भीतर के अँधेरे से लड़ता है;

पर हर वार के साथ

वह थोड़ा और घायल होता जाता है


तुम उसे दोष मत दो

जो रात-रात भर जागता है

या बेवजह हँसता है

या बेवजह सिसकता है

वह दरअसल

अपने अभाव को ढकने की कोशिश में

हर क्षण और उधड़ता जाता है।



मज़बूत स्त्रियाँ


मज़बूत स्त्रियाँ

किसी एक क्षण बेहद कमज़ोर थीं

अपने को दोयम समझती थीं

इतना कि भरे चौराहे पर भी

यदि उन्हें कोई एक थप्पड़ लगा देता तो

प्रतिरोध दूर की बात है

गाल पर हथेली धरे, आँखों में आँसू भरे

वेदना को गले में विष की तरह धारण किए

सोचतीं- क्या गलत किया था मैंने?


मज़बूत स्त्रियाँ

किसी एक क्षण प्रत्युत्पन्नमति से ख़ाली थीं

इतना कि श्लील प्रशंसाओं से लिपटी हुई

भोग की कामना को परख नहीं सकती थीं

हर स्तुति को न निगलना जानती थीं

न बेरुखी से ठुकराना

रूप की प्रशंसा, वाणी की प्रशंसा, गुण की प्रशंसा

सब उनके किसी न किसी अंग पर चस्पा रही

कई-कई वर्ष लगे उन्हें 

इस प्रशंसा के पीछे मिले गोंद को धोकर साफ़ करने में


मज़बूत स्त्रियाँ

किसी एक क्षण भाषा पर भरोसा कर बैठीं थीं

जहाँ प्रेम और अधिकार और नियंत्रण 

एक ही वाक्य में बिना टकराए खड़े थे

वे देर से समझीं

कि शब्दों का भी एक बाज़ार होता है

जहाँ अर्थ, तौलने वाले की नीयत से तय होते हैं


मज़बूत स्त्रियाँ

किसी एक क्षण अपने ही पक्ष में

गवाही नहीं दे सकीं

इतनी दब्बू कि न्याय की पूरी प्रक्रिया में

उनकी चुप्पी उनके ख़िलाफ़ सबूत की तरह दर्ज होती रही


मज़बूत स्त्रियाँ

धीरे-धीरे सीखती हैं

कि हर बार टूटने पर, बिखरने पर

जुड़ने की इच्छा तीव्रतर होती गई

और फिर

वे सीमा खींचती हैं

किसी उद्घोष के बिना

किसी नारे के बिना

बस अपने व्यवहार में

कई छोटे छोटे परिवर्तन करके

छोटे छोटे कंकड़ों से खड़ा करती हैं

एक अभेद्य किला अपने इर्द गिर्द

जो उन्हें सुरक्षित ही नहीं रखता

उसकी ओट से वे निःसंकोच

अपनी रक्षा में चला सकती हैं

वे शब्दभेदी बाण।



वसीयतनामा 2020

(कोविडकाल की स्मृति में)


मंज़र ऐसे देखे इन आँखों ने

कि साँस सैकड़ों बार रुकी

रुकी...थमी...अटकी....फिर चली

मृत्यु एक कसाई थी

और हम बाड़े में बंद फड़फड़ाते पंछी

बारी एक की आती थी

मरते सब थे दहशत से


मैंने साँस रोककर

कुछ साँसे बचाई हैं

अपने हिस्से की 

ऑक्सीजन कुछ कम खाई है

ये ऑक्सीजन 

रेडिएशन से मरने वाली 

या फिर प्रदूषण से हाँफने वाली

किसी निरीह चिड़िया को मिले 

उसे कुछ क्षण साँसे

साफ़ हवा और मिले

वसीयत में इससे अधिक क्या लिखूँ

मृत्यु न मालूम किस पल आ जाए !


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टि्वंकल तोमर सिंह युवा‌‌ कवयित्री-कहानीकार हैं।‌ इनकी रचनाएँ‌ वागर्थ, कथादेश, पाखी, वर्तमान साहित्य, कृति बहुमत, ककसाड़, परिंदे, अन्विति आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। ईमेल : twinkletomarsingh@gmail.com

 



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