पल्लवी विनोद की कविता
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कुछ तंद्राएँ कभी नहीं टूटती हैं
(1) प्रेम
प्रेम इतना ख़ूबसूरत शब्द रहा
कि इसकी आड़ में चलते रहे जाने कितने व्यापार
कथाओं की तरह इसका अनुष्ठान सरल था
दो जोड़ी आँखें, मीठी बातें
और जीवन भर के साथ की योजना
परिनल की बेटी की अंजुरी में
यही छिड़का था अनिमल ने
(आप नाम पर मत जाइए ये बवाल करते हैं)
और उसने मान लिया पिता के साहब का बेटा
उसके सारे ख़्वाब पूरे करेगा
वास्तव में प्रेम के साथ ही जन्म लेती इच्छाओं में
एक स्वप्न महल भी होता है
सुख-सार से भरा
कथा पूर्ण हुई
एक भभका उठा है, जले हुए स्वप्न का
मानवीय संवेदनाओं के साथ भद्दे मज़ाक़ करता प्रेम
अब दूसरी परिस्थितियों और नामों के साथ
किसी दरवाज़े पर खड़ा है..।
(2) विश्वास
इससे ज़्यादा सामाजिक शब्द
शब्दकोष में नहीं था
बाज़ार में प्रवंचनाओं की सूची निकल चुकी थी
जैसे कोई तेल आपके हृदय को
युवा करने की गारंटी देता है
ठीक उसी तरह वे भी कह रहे थे
हम आपको ही बदल देंगे
यहाँ भी स्वप्न रंग-बिरंगी पोशाक पहन कर आया था
‘डिज़ायनर’ भी पढ़ सकते हैं आप
आपकी ज़िन्दगी बदलने वाली थी
बस मध्यमा को स्याही की दरकार थी
सोशल मीडिया की याद में दिखी तस्वीर देख
व्लादिर और भीता कुनमुना रहे हैं
(नाम में क्या रखा है जनाब!)
उँगलियों का काला रंग भविष्य पर फ़ैल रहा है
ऊँट करवट बदल रहा है…।
(3) स्वप्न
स्वप्न मख़मली हुए जा रहे हैं
अंदर से गरम बाहर से नरम सलीके
जिनकी बदौलत हम बैलगाड़ियों से
हवाई जहाज़ का सफ़र तय कर चुके हैं
अरे ठीक है!
स्लीपर से हवाई जहाज़ तक तो किए ही हैं
आँखों को दिखते दृश्य बदल गए
सामने की सीट पर चेहरा नहीं पीठ है
आख़िरकार बादलों के ऊपर ही तो था स्वर्ग
वहाँ बैठ क़ाबिद और रामोसीत देखते हैं नीचे
(आप फिर नाम को पहचानने की कोशिश कर रहे हैं)
पर कुछ नहीं दिखता
सड़क, इमारतें, नदी, समंदर
सब हैं
एक मनुष्य को छोड़…।
(4) ईश्वर
ईश्वर सबसे ज़रूरी चीज़ की तरह
हर दुकान में बिक रहा है
नहीं यहाँ सिर्फ़ एक ईश्वर की बात नहीं है
धर्म गुरुओं ने कुछ तो फूँक दिया है हमारे कान में
अब कान को वही सुनाई देता है
ईश्वर के कपड़ों में इत्र लगाकर
वे बताते हैं : लोबान जलाओ
उसकी ख़ुशबू से नकारात्मकता भाग जाएगी
चालर ने पोम से कहा :
(हाँ ये भी नाम ही हैं)
चिताओं की बढ़ती संख्या से जो हैरान नहीं हुए
उन्हें हमारी आस्था से परेशानी है
सारे ग्रंथों में लग रहे हैं श्रेष्ठता के दीमक
पेस्ट कंट्रोल वालों के ख़िलाफ़ जारी हो रहे हैं फ़तवे
बंशी बजाता कृष्ण जान रहा है
फिर से चक्रव्यूह रच रहा है कोई…।
(5) जीवन
असल में असली मुद्दा यही था
आजकल पंडालों में बहुत थिरकता है
ख़ूब ख़ुश दिखता है
कभी ख़ुद को पीट कर
ग़म ए माह बिताता है
फ़िलवक़्त सो रहा है
जब जागता है
सोशल मीडिया पर स्टेटस अपडेट कर देता है
वरना दवाई खाकर सोया ही रहता है
असल में ‘जीवन’ अवसाद में है
इतना कि उसे कविता जगाती तो है
ठीक नहीं कर पाती है
आपका बात करना वह सुनता तो है
समझ नहीं पाता
उसके सीने में अजीब-सा ख़ालीपन उगता है
जिसकी शाखाएँ दिमाग़ तक पहुँच गई हैं
और जड़ों ने पैर की शक्ति खींच ली है
पेट में बनते हैं भँवर
कोई वैद्य कोई हक़ीम
मर्ज़ पकड़ नहीं पाता
पर मैं जानती हूँ
अवसाद के इलाज में खड़ी परेशानियों के नाम
मैंने पहले ही लिख दिए हैं
अच्छा! फिर से बता देती हूँ
प्रेम, स्वप्न,विश्वास और ईश्वर
इनके नकारात्मक विवरण लिखने के बाद भी
मुझे लगता है
जीवन को यही बचा पाएँगे
इस पंक्ति को लिखने के लिए मैंने फिर से
इन्हीं चार शब्दों का सहारा लिया है
आप समझ सकते हैं मैंने क्यों कहा
कि कुछ तन्द्राएँ कभी नहीं टूटती हैं।
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पल्लवी विनोद कविता और गद्य लेखन, दोनों क्षेत्रों में सक्रिय हैं। दीपक अरोड़ा स्मृति पुरस्कार योजना के अंतर्गत उनका कविता संग्रह ‘परिधि से बाहर (2025)’ प्रकाशित हुआ है।
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