अंजलि नैलवाल की कविताएँ
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मुनस्यारी
जब आकाश छूते पहाड़
नज़रों में समा नहीं पाते,
जब गर्दन दर्द करने लगती है
गाड़ी की खिड़की से
पूरे पहाड़ को देखते हुए,
जब पहाड़ आपके भीतर
सिहरन पैदा करने लगते हैं
बस अपने होने मात्र से,
जब विशाल झरने सब आवाज़ों
को समा लेते हैं अपने में
उसके छींटे भिगा देते हैं आपको भीतर तक,
जब पंचाचुली की चोटियाँ
बस दो हाथ की दूरी पर प्रतीत होती हैं
तब यह कह पाना दुष्कर हो जाता है
कि मैंने पहाड़ देखे हैं।
जब भयंकर पहाड़ों पर बनी सड़कों से गुज़रते हैं
जब अति दुर्गमता में जीवन दिखाई देता है
मकान दिखते हैं, लोग दिखते हैं,
खेत दिखते हैं, बच्चे बूढ़े दिखते हैं
तब यह कह पाना दुष्कर हो जाता है
कि मैंने प्रेम देखा है।
प्रेम तो पहाड़ करते हैं उन लोगों से
जिनको वे अपनी छाती चीरकर
रास्ते देते हैं,
जिनको वे नुकीलेपन में भी
सुंदर मैदान देते हैं
घर बसाने के लिए।
जिनको वे हवा, पानी और
जी भरने वाली
सुंदरता देते हैं
और देखते हैं उन्हें यह सब छोड़कर जाते
किसी बड़े मैदान की तरफ,
लेकिन तब भी
खड़े रहते हैं अटल।
पहाड़ भी जिनके प्रेयस होते हैं
वे देखते हैं पहाड़ों को दूर-दूर जाते हुए,
बड़ा मैदान बनते हुए।
नदियों के प्रेमियों को
इतना विरह नहीं होता होगा शायद।
नदियां तो सदा से आती रहीं हैं
डिब्बों में बंद होकर
घर तक।
पहाड़ टूटते रहे हैं प्रेम में
कभी और बड़े रास्तों के लिए,
कभी किसी धातु के लिए,
कभी किसी का सौन्दर्य प्रसाधन बनने के लिए,
कभी रेत के लिए
ताकि बड़े मैदान में लोगों का घर बन सके।
वे बिखरते रहते हैं
छोटे होते रहते हैं
मिट्टी होते रहते हैं,
घर तक आ पाते हैं
तस्वीरों में।
वे जा पाते हैं अपने प्रेमियों के साथ
बस स्मृतियों में
उनकी आँखों की अलमारी में ।
वे पहाड़ देख आने चाहिए
जिनकी अभी बारी नहीं आई है,
जो अभी भी खड़े हैं
तस्वीर में खिंचे जाने के लिए।
जो अभी भी किसी के प्रेमी हैं
किसी के प्रेम में हैं।
गाँव
मैं गाँव सोचती हूँ
मुझे घर दिखाई देता है
घर के सामने का पहाड़ दिखाई देता है
पत्थर की खोई,
आँगन के पत्थर दिखाई देते है।
माल्टे के पेड़ दिखाई देते है
खेत दिखाई देते हैं
लोग दिखते हैं सबसे आख़िर में।
मैं गाँव सोचकर सबसे पहले
लोगों को नहीं सोच पाती
मैं नहीं समझ पाती कि मैं लोगों से हूँ
या पत्थरों-पहाड़ो से,
गाँव लोगों से है या बस अपने होने से।
लोग नहीं होते तो गाँव नहीं होता
अब लोग नहीं हैं,
गाँव अब भी है
गाँव सोचने पर बस गाँव दिखता है
लोग नहीं दिखते।
गाँव सोचते हैं लोगों को
कि अब आएंगे तब आएंगे,
इन बिखरते घरों को संवार जाएंगे ,
टूटे रास्तों को बना जाएंगे,
बंजर खेतों को बसा जाएंगे।
गाँव लोगों को सोचते-सोचते
बूढ़ा हो जाता है।
लोग तो बस छोड़ते हैं गाँव
गाँव को सोचते नहीं।
मैं गाँव सोचती हूँ,
गाँव वाला घर सोचती हूँ,
पर अपने आप को नहीं सोच पाती।
मैं भी तो उन्हीं लोगों में से हूँ।
अधूरे काम
अभी मैंने नहीं पढ़ा
सारी दुनिया का साहित्य।
प्रेमचन्द भी तो कितने बचे हैं,
टॉलस्टॉय और काफ्का
रुके हुए हैं अपनी बारी के लिए
मेरी किताबों के जत्थे में।
अभी मैंने पेंटिंग करना नहीं सीखा।
सारे लैंडस्केप कहाँ जाने लगे अभी से,
जंगल भी तो कम दिखाई देने लगे हैं,
मेरे रंग अभी इंतज़ार में ही बैठे हैं।
अभी मैंने संगीत पढ़ना नहीं सीखा।
बीथोवन और किशोरी अमोनकर को भी तो
पूरा कहाँ सुन पायी हूँ,
कि कर पाऊँ उनकी नक़ल
अपनी गिटार पर।
अचानक
गीतों में मशीनों-सी आवाज़
क्यों आने लगी है?
अभी मैंने नहीं लिखीं
सौ कविताएँ,
बीस कहानियाँ
और एक उपन्यास।
पता नहीं,
वे लिखे जाने के इंतज़ार में बैठी भी हैं या नहीं।
ये सब साहित्य कह रहे हैं जिसे
एक जैसा क्यों लगने लगा है आजकल?
मुझे बस
एक दीवार,
एक अनंत लंबी छत
और उस पर रखी टंकियों में
पानी देखते लोग
क्यों दिखाई दे रहे हैं?
वे बड़े-बड़े खेत
कम कैसे हो गए?
ये बड़े-बड़े बदसूरत डिब्बे
इतनी जल्दी कहाँ से आ गए,
जो देखने भी नहीं देते मुझे
इस पार से उस पार?
मेरे घर के सामने का पहाड़ कहाँ है?
कहाँ चले गए
मेरे पेड़,
मेरे खेत,
मेरी पगडंडियाँ?
ये आसमान
धुआँ-धुआँ-सा क्यों हो चला है?
लोग कह रहे हैं,
साँस नहीं आती आजकल।
अभी तो
मेरे कैमरा रोल में
पूरा कुमाऊँ भी नहीं आया है।
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अंजलि नैलवाल हिंदी की नई कवियों में से हैं। गद्य लेखन में भी सक्रिय। विश्वरंग, सदानीरा, जानकीपुल और अनुनाद में अंजलि की रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। ईमेल : nailwal.anju04@gmail.com
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उजड़ती प्रकृति , नष्ट होते पहाड़ ... सारे परिदृश्य को प्रेम की आंखों से देखना और कविता के माध्यम से उनकी पीड़ा को अभिव्यक्त करना सचमुच कितना आकर्षक है। 'आसपास की वो तमाम खूबसूरत चीजें जो मनुष्य से प्रेम करती हैं, धीरे धीरे मनुष्य उन्हें ही क्यों नष्ट करता जाता है?' कविताओं को पढ़ते हुए यह सवाल जब भीतर कहीं से चलकर आया तब यूं लगा कि हम सब उस अपराधी की तरह होते जा रहे हैं जो अपनी गैर जरूरी आवश्यकताओं के लिए जीवन में हर घड़ी प्रेम को नष्ट करता हुआ आगे बढ़ता है।
अंजलि को इन सुंदर कविताओं के लिए बधाई।