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शेरदा ‘अनपढ़’ की कविताएँ
मिश्री से भी ज़्यादा मीठी लगने वाली, क्या तुम कार्तिक महीने का शहद हो? या फिर पूस के महीने में पड़ने वाले पाले जैसी कोई चीज़? ओ चंचल लड़की तुम कौन हो?


अंजलि नैलवाल की कविताएँ
मैं गाँव सोचकर सबसे पहले
लोगों को नहीं सोच पाती
मैं नहीं समझ पाती कि मैं लोगों से हूँ
या पत्थरों-पहाड़ो से,
गाँव लोगों से है या बस अपने होने से।


देवभूमि बनाम भूतभूमि
वक़्त बीतने के साथ उत्तराखंड के गाँवों से लोग पलायन करने लगे। गाँव ख़ाली होते गए और अब गाँवों में देवता ज़्यादा और लोग कम रह गए हैं।
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