पलायन
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पलायन
कहानी : दीपिका घिल्डियाल
गोबर सने हाथ को मिट्टी के फर्श पर फेरते हुए उसे महसूस हुआ कि एक गर्म आंसू उसकी ऐनक पर अटक गया है। यह महसूस होते ही वह इतनी फुर्ती से उठी कि उसके घुटनों की बूढ़ी, सूख चुकी हड्डियों से चरमराहट जैसी आवाज निकल आई, तेज़ दर्द का एहसास भी हुआ लेकिन उसने इसकी परवाह ना की, बस उस जगह से उठी और दहलीज पर जाकर रुक गई….
ठा (कुल देवता का देवस्थान) में आंसू नहीं गिराना बेटी वरना देवता अपनी दीसा (विवाहिता बेटी) के साथ लग जाता है और उसे रुलाने वालों को तहस-नहस कर देता है फिर चाहे वे उसके अपने परिवार वाले ही क्यों ना हों…
बस वो दिन जब मां ने पहली बार ये हिदायत की थी और आज का दिन कि उसने कभी ठा में आंसू नहीं बहाए हालांकि ये तो उसके मायके का भी ठा नहीं,ससुराल का है लेकिन मायके के गिने-चुने दिनों के मुकाबले उसने सारी उमर तो इसी घर में बिता दी है, चौदह बरस की उमर में ब्याह हुआ तो बस यही घर, यही गांव और यही देवता उसका अपना हो गया। अब तक तो मायके का देव उसे भूल भी चुका होगा, सारी उमर इसी ठा और इसी देव के सहारे कट गई तो इसी को अपना सब कुछ मानती है वह…
फुर्ती से उठ तो गई थी लेकिन दहलीज में बैठते हुए खासी मशक्कत करनी पड़ी. बुढ़ापा अब शरीर के हर अंग में जैसे घुल सा गया है और कभी हिरन की फुर्ती से चलने, उठने बैठने वाली वह अब बैठने के नाम से ही सिहर जाती है।
दहलीज पर बैठी, धोती के एक किनारे से, आंख से उमड़ रहे आंसू पोंछती वह बस यही सोच रही है कि इतने साल उसके कुल देवता ने उसका साथ नहीं छोड़ा वरना कैसे बिना आदमी के इतनी मुश्किल जिंदगी काट पाती? फौजी पति तो बस साल में एक बार घर आता था, पूरे साल उसके पीछे से बूढ़े सास-ससुर, चार बच्चे, खेत और मवेशी संभाले उसने, और किसका सहारा ठहरा? इसी कुलदेवता का तो। कभी उसकी बद्री गाय ने अचानक दूध देना बंद कर दिया हो या बूढ़े ससुर के शरीर का ताप तीन दिन से ना उतरा हो, कभी मायके की इकलौती निशानी सोने की झुमकी खेत में गिर गई या कभी दुधमुंहे बच्चे की छाती सर्दी से जम गई हो, और तो और कभी फौजी साब की चिट्ठी-पत्री दो महीने से ना मिली हो तो इसी ठा में मन्नत मांगकर अपनी हर मुश्किल का हल पाया उसने, देवता ने कभी उसका विश्वास टूटने नहीं दिया वरना होने को तो क्या नहीं हुआ और कितनी बार नहीं हुआ। जो थैली भर भर के पांच-दस पैसे के सिक्के और चवन्नी-अठन्नी भरी पड़ी हैं ना ठा में, इन्हें दुनिया आज खोटे सिक्के कहती है। एक वक़्त में इन्हीं मन्नत के पैसों के सहारे दुख के भीषण दिनों और अकेलेपन की लंबी रातों को पार किया है उसने।
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आज उसी ठा की लिपाई कर दी आखिरी बार। हाँ, शायद आखिरी बार ही तो क्योंकि कहावत है ना कि किसी के यहां जाना अपने पैर और लौटना उनके पैर मतलब ये कि जहां जा रही अब तो उनकी इच्छा और सुविधा पर लौटना होगा, जिसके आसार भी कम ही हैं…
वह मन ही मन देवता से कहती है कि आज से मैं तेरी दीसा हुई, तेरी बेटी। जैसे आज तक सहारा दिया, वैसे ही आगे भी साथ लगे रहना हो। मेरा कुल परिवार, आस विश्वास बचाए रखना। मेरे बच्चों के पैर में कांटा भी ना चुभने देना और उनकी आन-औलाद को धूप और बारिश में छांव देते रहना।
बहुत मान है उसे अपने परिवार पर। अपने बच्चे तो सभी के अच्छे होते हैं,उसकी तो दोनों बहुएं भी सुलक्षिणी हैं। शहर में रहकर थोड़ी चाल-ढाल बदल गई है लेकिन सास को सास की जगह रखती हैं, कोई कमी नहीं सेवा-पानी में।
वह तो भरे-पूरे घर में जा रही लेकिन अपने पीछे जिन्हें छोड़कर जा रही उनका क्या होगा?
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उसके मन में दो तरह के डर हैं—अपने देवता छूट जाने का डर और इस डर को वह ऐसे महसूस करती है मानो उसके अंदर कुछ बैठा है जो उसके कलेजे को खरोंच रहा हो और उससे भी बड़ा डर कि उसका देवता भी तो अकेला छूट जाएगा?
क्या देवता का मन नहीं होता? क्या देवता को अकेलापन नहीं लगता? क्या सैकड़ों मील दूर से याद करने पर भी देवता के प्रति वैसी ही ममता जागेगी जैसे हर दिन उसके ठा में माथा नवाने पर जागती है?
इंसान तो फिर भी अपने मन के दुख एक दूसरे से कह कर बांट लेते हैं,देवता किस से कहेंगे भला?
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यही सब सोचते उसका ध्यान अपने हाथों पर गया जिन पर लगा मिट्टी और गोबर का घोल अब सूख कर पपड़ी की तरह जम गया था। हाथ तो धोने ही पड़ेंगे और उसके लिए उठना भी पड़ेगा। किसी तरह दरवाजे की चौखट थाम कर वह उठी और सोचा कि क्यों ना पंदेरे (पानी के प्राकृतिक स्रोत) जाकर हाथ-पैर धो आऊं। यू़ं तो अब आंगन में नल है, उतनी दूर जाने की क्या ही पड़ी है लेकिन इसी बहाने पंदेर भेंट भी हो जाएगी। गांव में रस्म है कि नई दुल्हन को सबसे पहले पंदेरे जाकर पूजा करनी होती है। आखिर पानी ही तो जीवन का आधार ठहरा। वहीं से नए जीवन की शुरुआत करनी हुई। जब दुल्हन बनकर यहां आई थी, तब उसने भी इसी रस्म के साथ नई शुरुआत की थी। लेकिन उसके लिए पंदेरे का मतलब सिर्फ पानी का स्रोत भर नहीं था। पंदेरा वह जगह थी जहां उसके और उसकी सखियों के मन में दबे-छिपे भाव भी पानी की तरह तरल होकर बह जाते थे। सास की कसैली बातों से मन में कड़वाहट आ गई या मायके की याद से कलेजे में बेमौसम धुंध छा गई हो, इसी पंदेरे के पानी में सब बहा देती थीं वे सारी बहुएं। तब तक रोती थीं जब तक आँख का खारा पानी मीठा ना हो जाए। इतना रगड़ती तांबे की गगरी को सास समझ कर कि सारा गुस्सा निकलने तक गगरी लालिमा से चमकने लगती और मन को गहरी तसल्ली मिल जाती। इस तरह गागर और पहाड़न दोनों निर्मल हो जाने वाली हुई और वैसे भी हमेशा रोने वाली बातें ही थोड़े ना होने वाली हुईं; छेड़-छाड़, हंसी-मजाक भी इसी पंदेरे में होने वाला हुआ। एक-दूसरे की खूब टांग खिंचाई और पेट दुखने तक हंसी भी इसी जगह गिरी है।
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आज वह फिर पंदेर भेंट करने आई है। पहली बार नए सफर की शुरुआत के लिए किया था। आज उस सफर को आखिरी पड़ाव तक ले जाने के लिए करना होगा। इतना बुरा तो तब भी नहीं लगता था जब सास अधपेट रोटी देकर सुबह-सवेरे जंगल घास लकड़ी लेने भेज देती थी और उसका मन घर वापस जाने का नहीं होता था। मन करता कि इसी पंदेरे का पानी छक करके पिए और शाम होने तक पास के जंगल में बांज के पेड़ तले पड़ी रहे। जाने क्यों पंदेरे के पास होने से उसे अपनी मां के पास होने जैसा एहसास होता। मां की ममता जैसा मीठा पानी जो गर्मी में ठंडा और सर्दी में गुनगुना हो जाता और अपनी जाई को थोड़ा आराम दे देता मौसम की मार से वरना पहाड़ में और पहाड़ में भी ससुराल में जीना कहां आसान हुआ।
इस पंदेरे में कभी हर वक़्त रौनक रहती थी : बहू बेटियों की हंसी और मीठी चुहलबाजियों से यहां हर वक़्त एक गुंजन बनी रहती थी। अब तो पानी के धारे तक का रास्ता भी झाड़-झंखाड़ से भर गया है। साल नहीं तो महीने हो गए होंगे जो किसी ने इधर झांका भी हो। वह खुद ही आज जाने कितने महीनों बाद इधर आई है और इस बार पर कितना पछता रही है कि इतने दिनों में क्यों आई है।
वह यहां है तो इस पंदेरे को भी आस रहती होगी कि देर-सबेर कभी तो आयेगी, कभी तो फिर से अंजुरी भर-भर के पेट भर जाने तक छक के पानी पियेगी और कभी जब अपने मन का दुख-सुख सुनाने का मन करेगा तो मन हल्का होने तक इसी धारे के पास बैठी रोती रहेगी। जैसे पहले किया करती थी। फिर चाहे वह रोना मन में चुभी किसी फांस से उपजा हो या चार लोगों के सामने पिता समान ससुर ने जो तारीफ कर दी थी उससे मन भर आया हो। रोना तो पहाड़न का वह हथियार हुआ जिससे वह मन पर पड़े तमाम बोझ जड़ से काट कर उसे जंग लगने से बचा लेती है और खुशी भी तो आंखों के रास्ते ही जता पाती है…
बड़ी मशक्कत के बाद, किसी तरह झाड़ियों के बीच से रास्ता बनकर जब वह धारे तक पहुंची तो एक घुटी हुई चीख गले में फंस कर रह गई। मन किया कि धारे को कसकर गले लगा ले जैसे कि वह कोई इंसान हो।
धारे के पास पड़े पत्थर को साफ करके वहां बैठ गई और अपनी ऐनक निकलकर किनारे रख दी। वह जानती थी कि अब जो सैलाब बहेगा, वह तभी रुकेगा जब धारे के पानी में मिलेगा।
रुंधे गले से बोली : मुझे माफ करना हो, बहुत दिन बाद आई। अब आई हूं तो शायद फिर कभी ना आ पाऊं, आखिरी भेंट समझना और माफ कर देना।
कुछ देर तक हिचकियों में रोती रही,फिर जरा सम्भल कर बोली : बहत्तर साल की हो जाऊंगी इस पूस में। तुमने तो मुझे चौदह से अब तक देखा है। तुमसे मेरा क्या छिपा है। ना, ना मुझे कोई शिकायत नहीं किसी से। मैने अच्छी-बुरी जैसी जी, भरपूर जी लेकिन अब मेरे बस में कुछ नहीं।
एक-एक करके सारा गांव खाली हो गया है। जब तक रमेश के बाबू जिंदा थे, हमारे पास एक-दूसरे का सहारा भी था और मेरे पास यहां रहने का बहाना भी था कि ऐसे दुर्वासा बूढ़े ने बहुओं को चैन से नहीं जीने देना। उनके जाने के बाद भी मैं जिद करके यहीं रुकी रही क्योंकि गांव में लक्ष्मण की बहू अपने दो बच्चों के साथ रह रही थी तो उनका सहारा था। बोल-बचन हो जाती थी। इस बात की तसल्ली थी कि अगर कभी अचानक मैं मर गई तो लाश पड़ी सड़ती नहीं रहेगी। लक्ष्मण की बहू मेरे बच्चों को फोन करके बुला लेगी लेकिन पिछले महीने लक्ष्मण भी अपने बच्चों को साथ ले गया कि अगर उसके बीवी बच्चों को भी बाघ (गुलदार) ने खा लिया तो क्या होगा। उसकी बात भी सही ठहरी, अब तो पहाड़ के लोग बीमारी से ज्यादा बाघ-रीख के हाथों मर रहे।
तो अब पूरे गांव में रह गई मैं। निपट अकेली, बाघ-रीख और बंदर-सुँवरों के बीच। यह बात मेरे बच्चों को कैसे अच्छी लगती। तो एक महीने से रमेश ने रोज रट लगा रखी थी कि तू अब चल मेरे साथ दिल्ली। तेरे दो, दो बेटे होकर तू अकेली गांव में मरेगी तो दुनिया थूकेगी हम पर और हम भी कैसे चैन से सो पाएंगे यह सोचकर कि मां इस उमर में निपट अकेली है गांव में।
तो अब जा रही मैं भी। तीन दिन पहले आया वह मुझे लेने और कल ले जाएगा। आज का दिन था तो सोचा तुझे भेंट जाऊं, फिर क्या पता इस जनम में भेंटना हो कि नहीं।
इतना कहकर उसकी रुकी रुलाई फिर से फूट पड़ी। अगर आस-पास के जंगल से कोई देवता, कोई भूत, कोई परी कोई आछरी उसकी रुलाई सुन लेती तो कलेजा फट जाता उनका भी।
अगले जन्म में मैं चिड़िया बनूंगी। ये जो सबसे बड़ा बांज का पेड़ है न, इसपर घोंसला बनाकर रहूंगी। तब तक तू आबाद रहना, सूख मत जाना हो, मेरा इंतजार करना।
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इतना कहकर वह जैसे-तैसे उठ खड़ी हुई। उठते ही मुंह फेरा और आगे की राह पकड़ ली। उसे पता था, पलट कर देख लिया तो फिर जा नहीं पाएगी और जाना तो है ही, चाहे फैसला अपना हो ना हो।
पूरे रास्ते यही सोचती रही कि हर कोई हम औरतों को दोष देता है कि हम पहाड़ में नहीं रहना चाहतीं। अरे हमसे ज्यादा कौन पहाड़ में रहना चाहता है? ये पहाड़, ये जंगल, ये मिट्टी और ये हवा, यही तो हमारे अपने हैं। कैसे एक महीने से बिना किसी इंसान का मुंह देखे बड़े आराम से काट लिए उसने क्योंकि वह अपने घर में थी, अपनों के बीच में।
अपने पाले-पोसे पेड़ों के बीच, अपनी मेहनत से बनाए घर में, अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़ी हुई।
पहाड़ छोड़ने वाले आदमी हुए, उनके पीछे हम औरतों को मजबूरी में जाना पड़ता है। एक औरत गिना दो जिसने अपने पति से पहले पहाड़ छोड़ा हो? अभी भी कौन रह रहा है पहाड़ों में? किसके बच्चे जानवरों का निवाला बन रहे हैं? कौन बच्चे जनते हुए बिना इलाज के मर रही हैं? कौन अपनी जिद पर बचे-खुचे गांवों को आबाद रखे हुए हैं?
हम ही तो, कहीं की दीसा, कहीं की बहू। और कौन?
बड़-बड़ करती, डगमग कदमों से वह धीरे-धीरे गांव में पहुंच गई थी। उसे खयाल आया कि गौरा को घास देने का वक़्त हो चला है। उसने अपने कदम छानी (गौशाला ) की तरफ मोड़ दिए। गौरा उसकी गाय है जो उसकी ही तरह अब बूढ़ी हो चुकी है। पिछले महीने ही पंद्रह साल पूरे किए हैं उसने और अब बस दिन गिन रही है कि कब वक़्त कटे और वो गौलोक को जाए।
वह नहीं चाहती थी कि वह गौरा के बाद जाए। अपनी औलाद की तरह पाला है गौरा को और अपनी औलाद के लिए यह सोचना कि यह मुझसे पहले विदा हो, कलेजे को सौ टुकड़ों में चीर देता है लेकिन वह जानती थी कि वह ना रही तो गौरा की बहुत बेकद्री होगी और वह बहुत बुरी मौत मरेगी लेकिन चाहने भर से क्या होता है?
अब यही गौरा कल एक अनजान अजनबी के साथ दूसरे गांव चली जाएगी। रमेश गया है किसी से बात करने। बोल रहा था : मैं महीने के पैसे बांध दूंगा, जब तक गौरा जिएगी उसकी सेवा करते रहने के लिए। पैसे के लालच में ही सही मां, तेरी गौरा को अच्छी देखभाल मिल जाएगी।
वह जानती है, उसके अलावा गौरा को अच्छी देखभाल कोई नहीं दे पाएगा। हां, घास पानी समय-समय पर उसे जरूर मिलता रहेगा लेकिन तीन बखत का लाड़ , पुचकार कौन करेगा? कौन उसका मन समझकर कभी आटे के गोले में गुड़ मिलाकर देगा तो कभी देर-देर तक उसके बदन पर हाथ फिराकर उसका दर्द कम करने की कोशिश करेगा? गौरा की मां उसे जनते हुए मर गई थी। बिन मां की बछिया को कैसे-कैसे पाला उसने। कुछ दिन तो छानी में रखा ही नहीं, घर ही ले आई थी। बांस की नली से दूध पिलाकर जिंदा रखा। बीमार हुई तो जड़ी-बूटियां खिलाईं। और तो और कुलदेवता के नाम का पैसा भी निकाला कि इसे जिला दे बस। जाने क्यों ऐसा मोह हो गया था इस अभागी से? नाम भी बहुत लाड़ से रखा था, गौरा।
गौरा थी भी बहुत अलग। बहुत सुंदर रंगत, पनीली काली चमकीली आँखें और बेहद चंचल। उसकी आवाज भर सुन लेती तो अपने खूंटे के चारों ओर कूदने लगती और तब तक ना थमती जब तक वह आ ना जाती।
एक बार गांव में पालतुओं की कोई जानलेवा बीमारी फैली। धड़ाधड़ कई जानवर मर गए। कितना घबरा गई थी वह कि अगर गौरा को भी कुछ हो गया तो क्या करेगी? कितने जतन कर डाले। जिसने जो बोला, वह खिलाया। जंगल छान मारे बूटी के लिए। आखिर सुनी कुलदेवता ने। कुछ ना हुआ गौरा को जबकि उसी छानी से तीन पालतू गए थे उस बीमारी से।
तीन साल की उमर में गौरा ने पहला बछड़ा जना और उस पूरे समय वह उसके साथ रही, उसकी पीठ सहलाती, उसे हिम्मत बंधाती उसका दर्द अपने अंदर महसूस करती। मां बनी गौरा एकदम से समझदार हो गई लेकिन उसके लिए तो गौरा आज भी वही बिन मां की बच्ची है।
वह जानती है कि गौरा सब समझ गई है। तभी तो जब से रमेश आया है, यह एकदम शांत हो गई है। ठीक से घास भी नहीं खा रही, बस चुपचाप शिकायती नजरों से देखती रहती है कि अब इस चला चली की बेला में क्यों खुद से अलग करती हो? इतना रुक गई तो कुछ दिन और रुक जाओ। मैं चली जाऊं तो चली जाना अपनों के बीच। तब तक के लिए मुझे तो परायों में मत भेजो।
लेकिन वह गौरा को यह भी नहीं समझा सकती कि उससे कहीं ज्यादा लाचार है वह। ना होती तो एक पल भी खुद से दूर ना जाने देती। अच्छी-भली फौजी पेंशन छोड़ कर गए हैं रमेश के बाबू। सौ साल तक गौरा के लिए घास-पानी का इंतजाम हो सकता है लेकिन पैसा होने से भी कौन सा अपनी मर्जी की जिंदगी जी सकती है औरत? अपनी खुशी की मौत भी नहीं चुन सकती।
गौरा और उसका नसीब एक जैसा ठहरा। अब इस आखिरी बखत में अजनबी देश जाना पड़ेगा। अब थोड़े ना ढब पाएंगे परदेस में। पौध वाली उमर की बात अलग होती है। तब जड़ें कमज़ोर होती हैं, खाद-पानी पाकर मजबूत हो जाती हैं, जम जाती हैं। अब इस उमर में तो जड़ें सूख चुकी हैं,अब कितना ही खाद पानी मिले, नई जमीन पर जम नहीं पाएंगी।
गौरा की पीठ पर अपना झुर्री भरा हाथ फेरती जाती और रोती जाती। आंख हैं या भादो का बादल जो थमने का नाम ही नहीं लेता। कितना पानी और अटाया होगा इनमें? यही सोचती रहती आजकल।
उसे ढूंढता हुआ रमेश भी छानी में ही आ गया था। बोला : मांष तेरी गौरा का अच्छा ठिकाना कर आया हूं। रामी भाभी मान गई है इसे रखने को। पांच सौ रुपया महीना भेज दिया करूंगा। आराम से पल जाएगी। वैसे भी इसने जीना ही कितने दिन हुआ अब। कल हमारे जाने से पहले आकर इसे ले जाएगी। अब तू बेफिक्र हो जा इसकी तरफ से।
हां बेटा, यही तो कहती रही मैं भी तुझसे कि कितना ही जीना हुआ हमने, रहने दे यहीं पर तू सुने तब ना।
उसकी बातों में उलाहने से ज्यादा उदासी थी, ना समझे जाने की हताशा थी।
रमेश ने मां की बात सुनकर भी अनसुनी कर दी।
दूर पहाड़ी पर सूरज डूबने लगा था, अब गौरा को अंदर करने का वक़्त था।
दोनों मां-बेटे गौरा को छानी के अंदर उसके खूंटे पर बांधकर घर चले आए थे। लौटते हुए उसने गौरा के माथे पर खूब सारा प्यार किया और उसके कान में बस इतना बोली : मन छोटा ना करना, तू अकेली नहीं उजड़ रही है।
वापसी का रास्ता बहुत मुश्किल था। ऐसा लग रहा था मानो गौरा उसकी पीठ पर लदकर साथ हो आई हो।
बस इस तरह आज का दिन भी बीत गया। रात तो हमेशा की तरह लंबी और उदास थी। अपनी चारपाई पर पड़ी वह यही सोच रही थी कि काश जीवन अभी और यहीं खत्म हो जाता। उसे कल की सुबह ना देखनी पड़ती लेकिन मन का चाहा होने वाला होता तो आज की रात आई ही ना होती।
वह ना कल की सुबह को टाल सकती है, ना अपने पलायन को… अपनी मर्जी से कोई भी अपना घोंसला नहीं छोड़ता, चिड़िया हो या औरत…
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दीपिका घिल्डियाल युवा गद्यकार-कवि हैं। उनकी कहानियाँ हंस और इंडिया टुडे जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कुछ कविताएँ ऑनलाइन पोर्टल्स पर प्रकाशित हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : देवभूमि बनाम भूतभूमि
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