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दुःखी जीवन (कला समीक्षा)
यह उदाहरण केवल उस समय का ही नहीं, बल्कि हर उस दंगे का है, जो उस समय के बाद से लगातार होते ही रहे हैं। देश के अनेक शहरों को हिंसा का स्वाद दिया गया और आगे भी दिया जाता रहेगा। बिना किसी डर और संकोच के। आग ने घरों के अलावा मानवीय संबंधों, उनके सपनों को भी राख कर दिया।


संदीप निर्भय की कविताएँ
जीवन की गाड़ी को धकियाकर ले आया तीस के पार
क्या बाक़ी का बचा जीवन यों ही गुज़र जाएगा
इन ठग-ठगोरी भारतीय रेलों में
जहाँ-तहाँ ज़िम्मेदारियों का थैला कंधों पर लिए


ख़बरों से बाहर ग़ज़ा (पुस्तक समीक्षा)
शरणार्थी होना केवल अपना भूगोल खो देना नहीं है। यह धीरे-धीरे अपनी रोज़मर्रा की स्वायत्तता खो देना भी है। खाना कब मिलेगा, राशन कब बँटेगा, काम मिलेगा या नहीं, बच्चे के लिए कपड़ा आएगा या नहीं—जीवन के सबसे साधारण निर्णय भी किसी दूसरी व्यवस्था की अनुमति पर टिक जाते हैं।


देवभूमि बनाम भूतभूमि
वक़्त बीतने के साथ उत्तराखंड के गाँवों से लोग पलायन करने लगे। गाँव ख़ाली होते गए और अब गाँवों में देवता ज़्यादा और लोग कम रह गए हैं।
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