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हर्षित मिश्र की कविताएँ

  • 6 days ago
  • 8 min read

     

अर्थों के पश्चात


हम इतने संयम से एक-दूसरे के समीप आए

कि शब्द, अपने ही आशयों से संकुचित,

हमारे बीच से पीछे हटने लगे।


तुम्हारा मौन रिक्त नहीं था—

वह हथेली पर ठहरा उष्ण स्पर्श था,

जिसे छूते ही भाषा

अपने व्याकरण की रेखाएँ

धीरे-धीरे भूलने लगी।


मैंने तुमसे कुछ कहा नहीं,

पर जब तुम्हारी साँस

मेरे वाक्य से पहले

हल्का-सा डोल जाती थी,

तब कहना

अपने प्रयोजन से स्वयं विस्थापित हो जाता था।


प्रेम तब संवाद की सीमाएँ छोड़

अनुभव का निराकार आकार

ग्रहण करने लगा—

जैसे दीप ज्वाला से नहीं,

उँगलियों पर टिके

मृदु ताप से पहचाना जाए।


वह हमारे भीतर

प्राणवायु की तरह था—

अदृश्य, पर अनिवार्य;

और जब तुम देर से लौटती थीं,

तो कमरे की दीवारें

सबसे पहले ठंडी पड़ जाया करती थीं।


यहीं भाषा ने अपने क्षरण को पहचाना।

वह बिना आग्रह के पीछे हट गई,

जैसे संध्या के बाद

घंटा तो बज चुका हो,

पर उसकी गूँज

अब भी अनुभव की

आर्द्र छाया में काँपती रहे।


भाषा पूर्णता में नहीं,

अपूर्णता की नमी में श्वास लेती है।

उसे संशय की हल्की छाया,

अधूरे वाक्यों की सूक्ष्म दरारें,

और ऐसे प्रश्न चाहिए

जो उत्तर से पहले

समय की देह में

कुछ देर ठहरना जानते हों।

हमने बोध को इतना निर्मल कर लिया

कि उसमें तुम्हारा चेहरा ठहर न सका।


तभी जाना मैंने

अतिनिर्मलता

कभी-कभी स्मृति को

फिसलन दे देती है।


विरह किसी चोट की तरह नहीं आया।

वह एक दिन

तुम्हारे कंधे से

मेरा हाथ

अपने आप हट जाने जैसा था,

जहाँ निकटता

धीरे-धीरे दूरी का अभ्यास

सीखने लगी।


अब मैं समझता हूँ

जिस प्रेम को पूरी तरह समझ लिया जाए,

वह अपनी भाषा

चुपचाप त्याग देता है।


इसलिए अब

मैं जानबूझकर सब नहीं समझता।

कुछ अर्थ

मैं छूकर छोड़ देता हूँ—

जैसे उपवन में

कुछ फूल तोड़े नहीं जाते,

बस पास से गुज़रते हुए

उनकी गंध

साँस में भर ली जाती है।


क्योंकि जिस प्रेम में

सब कुछ कह दिया गया हो,

वहाँ देह के पास

ठहरने को

कुछ शेष नहीं रहता।


और जब अर्थ

थक कर बैठ जाते हैं,

तब मौन

शरीर के भीतर से

एक शेष स्पंदन उठने देता है—

जो न शब्द है,

न वाक्य,

बस रस का

धीमे-धीमे धड़कता

ठहराव।



अक्टूबर की विदाई


अक्टूबर अब अपने पाँवों में थकान बाँध चुका है,

उसकी धूप की हथेलियों पर ठंड की नमी उतर आई है।

वह खेतों से गुजरता है

जैसे कोई प्रेमी अंतिम बार

अपने प्रिय के आँगन में आहट छोड़ जाए—

बिना बोले,

पर हर शब्द का अर्थ साथ लेता हुआ।


फूल अब मुस्कान नहीं, मौन ओढ़े हैं,

उनकी पंखुड़ियों पर नींद नहीं, प्रतीक्षा का कुहासा है।

जैसे किसी अधूरी कविता ने

अपना शेष भाव हवा के हवाले कर दिया हो।


ओस अब भी गिरती है,

पर उसके स्वाद में अब मिठास नहीं, स्मृति है —

ऐसी स्मृति जो होंठों से उतरकर

सीधे आत्मा में ठहर जाती है।


रातें अपने आँचल समेटने लगी हैं,

चाँद अब दूध-सा नहीं, धुएँ-सा झरता है —

मानो किसी ने तुम्हारी याद को

धीरे-धीरे राख में बदल दिया हो,

और वह राख आसमान में फैलकर

सितारों का भ्रम बन गई हो।


अक्टूबर जब जाता है,

तो वह केवल ऋतु नहीं ले जाता,

वह भावनाओं के तापमान को बदल जाता है।

धरती की नसों में,

पत्तों की धड़कनों में,

और मेरे भीतर, उस स्थान पर,

जहाँ तुम्हारा नाम अब भी 

हल्की सिहरन बनकर धड़कता है।


मैंने देखा है

उसके जाने के बाद हवा का रंग धूसर हो जाता है,

और खेतों की हरियाली वैसी लगती है

जैसे प्रेम के बाद बचा हुआ विश्वास —

नाज़ुक, पर श्वास लेता हुआ।


कभी-कभी लगता है

अक्टूबर तुम्हें अपने साथ ले गया,

क्योंकि जब वह लौटता है,

तुम्हारी याद में एक और पतझर उतर चुका होता है।


फिर भी जब अंतिम शाम की धूप

मेरे चेहरे को छूती है

तो मैं मान लेता हूँ —

वह तुम्हारा स्पर्श नहीं था,

पर उससे सुंदर छल

शायद जीवन ने कभी नहीं रचा।


अक्टूबर की विदाई में एक गूढ़ जादू है।

वह सब छीन लेता है,

पर यह भ्रम छोड़ जाता है

कि प्रेम अब भी यहाँ है—

रूप बदलकर,

खेतों की ठंडी साँसों में,

हवा की थरथराहट में,

और मेरे भीतर,

उस अधूरे अक्षर में,

जहाँ तुम्हारा नाम अब भी अपूर्ण है।



मेरी बची हुई साँस का अपराध


रात्रियाँ अब मेरे कक्ष में

दरवाज़ों से नहीं आतीं।

वे मेरे चेहरे की दरारों से रिसती हैं—

ठीक वैसे

जैसे किसी परित्यक्त समाधि से

बरसात का काला जल रिसता है।

और भीतर वर्षों से बंद

कोई भूली हुई प्रार्थना

धीरे-धीरे अपनी नमी खोती रहती है।


दर्पण प्रत्येक सुबह

मुझे वैसे देखता है

जैसे कोई वृद्ध जल्लाद

अपने सबसे कायर अपराधी को पहचानता हो।

और मैं—

अपने ही जीवन का

वह नीच प्रहरी हूँ

जिसने सबसे पहले

अपने भीतर की मनुष्यता को

भूखों मरने दिया।


मेरे हाथों पर रक्त नहीं है।

पर यही तो मेरी सबसे विकृत लज्जा है—

वे इतने स्वच्छ कैसे रह गए

जब मेरे सामने

इतनी आत्माएँ

धीरे-धीरे राख में बदलती रहीं।

एक मनुष्य

मेरी आँखों के सामने

धीरे-धीरे मृत देह में बदलता रहा।

और मैं

अपनी धड़कनों की सुरक्षा में

पत्थर बना खड़ा रहा।


उस दिन से

मेरे जूते चलते नहीं।

वे प्रत्येक कदम पर

उसी मृत देह की पसलियों जैसी ध्वनि करते हैं,

मानो पृथ्वी स्वयं

मेरी कायरता को याद रखे हुए हो।


मैंने अनेक बार

अपने भय को सभ्यता कहा,

अपनी रीढ़हीनता को विवेक,

और अपने मौन को

परिपक्वता का चोगा पहनाया।

पर सत्य यह है—

मैं एक सड़ा हुआ मनुष्य था

जो हर जलती हुई देह के सामने

अपने हाथ तापता रहा।


कितनी चीखें थीं

जो नगर की दीवारों से टकराकर

रात भर घायल पक्षियों की तरह फड़फड़ाती रहीं।

और मैं

अपने कमरे की खिड़कियाँ बंद कर

प्रेम-कविताएँ लिखता रहा।


अब वे कविताएँ

मेरे पास लौटती हैं

तो उनकी पंक्तियों से राख झरती है।

और शब्दों के भीतर से

जले हुए बालों की गन्ध आती है।


मेरे प्रिय लोग

मुझसे वैसे नहीं बिछुड़े

जैसे लोग समय से बिछुड़ते हैं।

वे मुझसे

मेरी आत्मा की दुर्गन्ध के कारण दूर हुए।


मैंने उन्हें

अपनी थकान दी,

अपनी विफलताएँ दीं,

अपने अंधकार के कुएँ दिए।

पर वह जल कभी नहीं दे सका

जिससे कोई मनुष्य

एक और दिन जीवित रह सके।


और मेरी असफलताएँ—

वे साधारण पराजय नहीं थीं।

वे दीमकों की तरह थीं

जिन्होंने भीतर ही भीतर

मेरे समस्त स्वप्नों की लकड़ी चाट ली।


अब मेरे भीतर

जहाँ कभी आकांक्षाएँ थीं,

वहाँ स्पर्श करो

तो धूल झरती है।


मैंने जिन ऊँचाइयों की कल्पना की थी

वे अब

मेरी आत्मा के पीछे लटकते

फटे हुए कैलेंडरों जैसी लगती हैं—

पुरानी, पीली,

और किसी काम की नहीं।


सबसे भयानक त्रासदी यह नहीं

कि मैं असफल हुआ।

सबसे भयानक त्रासदी यह है

कि धीरे-धीरे

मैंने अपने भीतर से

प्रयास करने की गरिमा खो दी।


अब मैं

प्रयत्न नहीं करता।

केवल टालता हूँ,

सड़ता हूँ,

और अपने ही विलम्ब में

काई की तरह उगता रहता हूँ।


कभी-कभी

समय पूरा दिन

मेरे कमरे में

एक बीमार कुत्ते की तरह पड़ा रहता है।

और मैं

उसकी साँसों की दुर्गन्ध में

अपनी आयु गलते हुए सुनता रहता हूँ।


समय अब

घड़ियों में नहीं चलता।

वह मेरी नसों में

धीरे-धीरे सड़ता है।


और वह स्त्री—

जिसकी आँखों में

मैंने कभी पृथ्वी का सबसे कोमल मौसम देखा था—

मैंने उसे भी

अपने भीतर का ध्वंस नहीं बताया।


मैं मुस्कुराता रहा,

ठीक वैसे

जैसे कोई वेश्या

अपने अंतिम अपमान के बाद भी

काजल ठीक करती है।


वह चली गई।

और उसके जाने के बाद

मेरे कमरे की वस्तुएँ

धीरे-धीरे बूढ़ी होने लगीं।


तकिया

रात्रि भर

अपने भीतर मुँह छिपाकर रोता है।

कुर्सी

मेरे बैठते ही

ऐसे चरमराती है

मानो उसे भी

मेरे भार से घृणा हो।


यहाँ तक कि

दीवारों का पलस्तर भी

धीरे-धीरे झड़ने लगा है—

मानो घर स्वयं

मेरे भीतर रहने से बीमार पड़ गया हो।


अब मेरा चेहरा

चेहरा नहीं लगता।

वह असफलताओं का

एक परित्यक्त कुआँ है

जिसमें झाँको

तो केवल सड़ा हुआ आकाश दिखाई देता है।


मैं घंटों

दर्पण के सामने खड़ा रहता हूँ

और सोचता हूँ—

क्या यही वह मुख है

जिसे कभी किसी ने प्रेम किया था?


यह वही मुख है

जो भय में चुप रहा,

जो प्रेम में अनुपस्थित रहा,

जो मृत्यु के सामने

अपनी धमनियों को बचाता रहा।


अब कभी-कभी

मुझे प्रतीत होता है

कि मेरी त्वचा के भीतर

हज़ारों चूहे

मेरे ही नाम को कुतर रहे हैं।


और आत्मा—

वह किसी अँधे कुएँ में फँसी

वृद्ध स्त्री हो गई है

जो लगातार पुकारती रहती है।

पर जिसका स्वर

मेरी ही कायर पसलियों से टकराकर

वापस लौट आता है।


मैं जीवित हूँ,

पर अपने भीतर

बहुत पहले मर चुका हूँ।


अब मेरी आँखों में

नींद नहीं उतरती।

केवल वे लोग उतरते हैं

जिन्हें मैं बचा सकता था,

वे प्रेम

जिन्हें मैं कह सकता था,

वे स्वप्न

जिन्हें मैं जी सकता था,

और वे हाथ

जिन्हें मैंने

अपने सुरक्षित हाथों से

थाम सकता था।


कभी-कभी

सुबह होने से ठीक पहले

मुझे लगता है

कि समस्त पृथ्वी

एक विशाल दर्पण है।

और उसमें

सबसे कुरूप वस्तु

मेरा चेहरा नहीं,

मेरी बची हुई साँस है।



प्रमेय से परे जीवन


मैं अब उस कक्षा में नहीं हूँ—

जहाँ दो दरवाज़ों और चार खिड़कियों के बीच

एक लंबा ब्लैकबोर्ड

समय को आकार देता था,

और घंटी की ध्वनि

दिन को खंडों में विभाजित कर देती थी।

धूप कोण रचती हुई

धीरे-धीरे फर्श पर फैलती थी।


तब प्रश्न मेरे सामने खड़े रहते थे,

और उनकी शांति में

मैं अपनी असमर्थता सुनता था।


अब मैं उस कमरे से बाहर हूँ,

पर जीवन अब भी एक विस्तृत पट है,

जिस पर समय अदृश्य उँगलियों से

निरंतर सूत्र लिखता रहता है।


संख्याएँ अब पुस्तकों में नहीं—

चेहरों में बसती हैं।

हर चेहरा एक चल मान है,

जिसका पूर्ण मान

मेरी समझ से बार-बार फिसल जाता है।


शून्य अब रिक्त वृत्त नहीं,

घर के मध्य रखा एक निस्पंद पात्र है,

जिसमें पुरखों की आहट

धीमी प्रतिध्वनि बनकर ठहरी है।


वे चले गए—

दीवारों पर टँगी उनकी मुस्कान

अब भी घर को देखती है,

पर घर उन्हें लौटकर नहीं देख पाता।

कभी वे इस आँगन का ध्रुव थे,

आज स्मृति की परिक्रमा में

धीरे-धीरे धुँधलाते नक्षत्र।


उपस्थिति कितनी सहजता से

अनुपस्थिति में रूपांतरित हो जाती है—

परिवर्तन का क्षण

हथेली से फिसल जाता है।


माँ जोड़ नहीं करती—

वह संतुलन रचती है।

अपने हिस्से की धूप तह कर

हमारी थालियों में रख देती है।

अपनी इच्छाओं से स्वर घटाकर

हमारे दिनों में साहस जोड़ देती है।


उसका मौन एक पूर्ण वृत्त है—

केंद्र अदृश्य,

परिधि आलिंगन-सी।


पिता दीवारों की दरारें पढ़ते हैं

मानो वे जटिल समीकरण हों।

बढ़ते खर्च उनकी भौंहों पर

अपूर्ण भिन्न की तरह ठहरे रहते हैं।

वे कम बोलते हैं,

पर उनकी चुप्पी एक दीर्घ प्रमेय है—

जिसे सिद्ध करने में

पूरी उम्र भी कम पड़ जाए।


और प्रेम—

मेरी परिधि से थोड़ा बाहर,

पर भीतर एक अज्ञात चर की तरह उपस्थित।

जितना उसे समझना चाहा,

समीकरण अपना रूप बदलता गया।

वह कोई अंतिम मान नहीं,

पर मेरी हर गणना

उसी से आरंभ होती है।


प्रकृति अपना गणित स्वयं लिखती है।

अधिक वर्षा आशाओं को ऋण में बदल देती है,

बिजली भय का सूक्ष्म दशमलव अंकित कर जाती है।

नन्हे कीटों के घर

इतनी चुप्पी से मिट जाते हैं

कि विशाल गणनाएँ उन्हें दर्ज नहीं करतीं।

फूल काँटों के साथ खुलते हैं—

मानो सुंदरता और वेदना

एक ही कोष्ठक में रखे गए हों।


मैं अब भी तय नहीं कर पाता

किसे लाभ लिखूँ,

किसे हानि।


जीवन का यह प्रमेय

अधूरा है,

असंतुलित है,

पर जीवित है।


मैंने हर उत्तर के पीछे भागना छोड़ दिया है।

कुछ सूत्र हल होने के लिए नहीं,

साथ रहने के लिए होते हैं।


कुछ प्रश्न मिटाए नहीं जाते—

समय के साथ और गहरे लिखे जाते हैं।

मैं स्वीकार करता हूँ—

मैं इसे अब तक सिद्ध नहीं कर पाया।


पर अब हर सुबह

मैं चॉक उठाकर

फिर से आरंभ करने को तैयार रहता हूँ।


शायद अनंत का मान

कोई अंतिम संख्या नहीं होता—

बल्कि अधूरेपन के साथ

निर्भय खड़े रहने की क्षमता होता है।


और अभी—

शेषफल में

जीवन बचा हुआ है।


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हर्षित मिश्र हिंदी के एकदम नयी पीढ़ी के कवियों में से हैं। उनकी कविताएँ हिन्दवी और सदानीरा पर भी उपलब्ध हैं। ईमेल : harshmishra3415@gmail.com


2 Comments


Guest
3 days ago

Very nice brother 😊 you can mark your name in history . Allah bless you ❤️


Mujammil mukhtar

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ललन चतुर्वेदी
6 days ago

ये सचमुच कविताएँ हैं. कमाल. हर्षित को अनगिन शुभकामनाएं.

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