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अनिल गंगल की कविताएँ
किसके खेत में भूख उगती है?
किसके घर में नफ़रत पकती है?
किसकी ज़ुबान पर ताला लगता है?
और किसके हाथ में इतनी ताक़त आ जाती है
कि वह अपने झूठ को देश का सच कह सके?


जितेन्द्र विसारिया की कविताएँ
मैं-मैं हम पता नहीं
कब से कर रहे हैं
हम होकर उस
सँकरी गली में
चलकर देखें
जहाँ दो नहीं
समाते


धर्मेश सिंह की कविताएँ
मेरे भीतर की स्त्री और उसका पुरुष
कभी एक-दूसरे से लिपटकर रो नहीं पाए
कि कहीं उनके प्रेम को
कमज़ोर या कायर न समझ लिया जाए


अंजलि नैलवाल की कविताएँ
मैं गाँव सोचकर सबसे पहले
लोगों को नहीं सोच पाती
मैं नहीं समझ पाती कि मैं लोगों से हूँ
या पत्थरों-पहाड़ो से,
गाँव लोगों से है या बस अपने होने से।


दीप्ति कुशवाह की कविताएँ
ऋतुएँ आती रहेंगी
जंगलों के कंधों को छू कर
घास के रंग उलटती-पलटतीं
पहाड़ों के रंग बदलती हुईं


हर्षित मिश्र की कविताएँ
अक्टूबर जब जाता है,
तो वह केवल ऋतु नहीं ले जाता,
वह भावनाओं के तापमान को बदल जाता है।
धरती की नसों में,
पत्तों की धड़कनों में,
और मेरे भीतर, उस स्थान पर,
जहाँ तुम्हारा नाम अब भी
हल्की सिहरन बनकर धड़कता है।


रामदरश मिश्र : सहजता जहाँ एक काव्य निकष है
रामदरश मिश्र अपने राजनीतिक होने का शोर नहीं करते। उनकी कविताएं भी किसी प्रकार का शोर नहीं करतीं। एक कवि के रूप में वे अपने आरंभिक दिनों से आश्वस्त हैं कि इस तरह का कोई भी शोर अंततः एक साहित्यिक प्रदूषण है।


ताकि स्मृति बची रहे (मंगलेश डबराल की कविता)
जो भी दिल्ली पहुँचता है, यह महानगर उसे बदल लेता है। कभी-कभी तो इस परिवर्तन का पता तक हमें नहीं लग पाता है। दिल्ली के जादू से विरले ही बच पाते हैं। मंगलेश इसके अपवाद नहीं थे।


विधान गुंजन की कविताएँ
कुम्हार का घर चलाने में
उन पत्थरों का भी योगदान रहा,
जिनकी वजह से
अक्सर फूट जाया करते थे
मटके


हर्षवर्धन सिंह की कविताएँ
माया!
मुक्त जटिल कुंतल जाल, कंपित!
दुर्बोध—महामाया का भैरवी नृत्य
झम झमा झम झम.
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