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ताकि स्मृति बची रहे (मंगलेश डबराल की कविता)

  • 1 day ago
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मैं चाहता हूँ कि स्पर्श बचा रहे / वह नही जो कंधे छीलता हुआ / आततायी की तरह गुज़रता है / बल्कि वह जो एक अनजानी यात्रा के बाद / धरती के छोर तक पहुँचने जैसा होता है


मंगलेश डबराल की यह कविता मुझे एक प्रार्थना की तरह लगती है। यह मानवता के प्रति कवि की कामना है। कवि का मूल उद्देश्य उन चीज़ों को बचाना है जिनसे मिल कर यह जीवन बना है– उनमें संवेदन और स्पर्श मुख्य हैं। आज के भयावह समय में मनुष्य की कोमल भावनाएँ ज़्यादा संकट में हैं– उसके लिए बचाव और राहत कार्य स्थगित हैं, बल्कि उसके साथ एक खेल रचा जा रहा है।‌ खेलने वाले हाथ खतरनाक हैं। यह विस्मरण का समय है जिसमें हम जीवन की ज़रूरी चीजों को भूलते जा रहे है– स्मृति की हमारे जीवन में कोई जगह नही है। उसकी जगह पर ग़ैर-ज़रूरी चीज़ें क़ाबिज़ हैं।


हमारा जीवन स्मृतियों से निर्मित है। उसमें समाज और प्रियजनों की स्मृतियाँ शामिल हैं– यह हमारी चेतना का हिस्सा है। जब कोई प्रिय व्यक्ति हमारे जीवन से चला जाता है तो उसके साथ हम भी थोड़ा चले जाते हैं। मंगलेश डबराल का जाना इसी तरह का जाना था– हम भले ही उनसे नियमित न मिलते रहे हों लेकिन वे हमारे बीच हैं, यह कम बड़ी आश्वस्ति नही थी। जब वे थे, उनकी कविताएँ पढ़कर महसूस करते थे कि उनके हाथ हमारे कंधों पर है लेकिन उनके जाने के बाद उस स्पर्श की कमी महसूस होती है।


कवि के जाने के बाद उसकी कविताएँ और स्मृति बची रहती है और जब तक हम उन्हें याद करते हैं, वे कवि के रूप में जीवित रहते हैं। मंगलेश डबराल की कविताएँ और यादें हमारे साथ रहेंगी, उनकी कविताओं के बिना हिन्दी कविता का मूल्यांकन अपूर्ण होगा। आठवें दशक के बाद की कविताओं में उनकी बराबर की हिस्सेदारी थी। हम उनके सहयात्री थे। 

मंगलेश डबराल पहाड़ से लालटेन लेकर दिल्ली में आए थे और धीरे-धीरे उसकी रौशनी बढ़ाते रहे, उसे बड़े प्रभामंडल में रूपांतरित किया। वे टिहरी गढ़वाल के एक छोटे से गाँव काफलपानी में 16 मई 1948 में पैदा हुए थे। काफलपानी गाँव से दिल्ली का सफ़र कम रोचक नही था, इस सफर में कम मोड़ नही थे। पहाड़ पर लालटेन से लेकर उनके अंतिम संग्रह ‘स्मृति एक दूसरा समय है’ के बीच फैली हुई उनकी कविताओं में अपने समय की ध्वनियाँ और अंतरध्वनियां साफ़ सुनाई पड़ती हैं। उनकी कविताओं में विरोध और प्रतिरोध निरंतर मुखर होता गया है। ‘पहाड़ पर लालटेन’ कविता संग्रह नागार्जुन को बहुत पसंद था। इस संग्रह के बाद उनकी संवेदना में व्यापक परिवर्तन हुए, कविता की जगहें बदल चुकी थीं। वे गाँव से शहर आ चुके थे। ‘घर का रास्ता’ संग्रह के प्रकाशन के बात कुछ लोग यह व्यंग्य से कहने लगे कि मंगलेश अपने घर का रास्ता भूल गए हैं।वस्तुत; कवियों के रूप और कथ्य जीवन के अनुभव के साथ बदलते रहते हैं–इसे सहज स्वीकार किया जाना चाहिए।


मंगलेश मेरे प्रिय रहे हैं ,उनकी कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। इलाहाबाद और लखनऊ के उनके प्रवास में मिलता रहा हूँ। तब उनके पास खूब वक्त था। दिल्ली पहुँचते उनकी व्यस्तता बढ़ती गयी। दिल्ली ने उनकी कविता को ही नहीं, उन्हे भी बदल दिया था। जो भी दिल्ली पहुँचता है, यह महानगर उसे बदल लेता है। कभी-कभी तो इस परिवर्तन का पता तक हमें नहीं लग पाता है। दिल्ली के जादू से विरले ही बच पाते हैं। मंगलेश इसके अपवाद नहीं थे। उनकी कविताओं को नए अनुभव मिल रहे थे। उनके पास ‘पहाड़ पर लालटेन’ और ‘घर का रास्ता’ से आगे के अनुभव थे। उनकी कविताओं में धीरे-धीरे नागर जीवन और उसकी त्रासदियाँ प्रवेश कर रही थीं– उनके निशाने पर शासक समुदाय और शहर को नरक बनाने वाले माफिया और डाॅन थे जो देश की राजनीति तय करते थे।


जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त की कविता पंक्ति है- “पहाड़ों की यातना हमारे पीछे है, मैदानों की हमारे  आगे।” मंगलेश की कविताओं में पहाड़ और मैदान के बीच एक जद्दोजहद है- 


मैं पहाड़ में पैदा हुआ और मैदान में चला आया / यह कुछ इस तरह हुआ जैसे पहाड़ दिमाग में छूट गया हो / और शरीर मैदान में चला आया हो /या इस तरह जैसे पहाड़ सिर्फ दिमाग में रह गया /और मैदान मेरे शरीर में बस गया हो…


यही मंगलेश का आत्मसंघर्ष था जिसके अनेक रूप उनकी कविताओं में दिखाई देते है। किसी कवि का जीवन आसान नही होता, उसके संघर्ष के कई स्तर होते हैं। इन्हीं के बीच से कविताओं का जन्म होता है। मंगलेश डबराल कई शहरों की यात्रा कर दिल्ली पहुँचे थे। इसलिए उनके पास अनुभवों की कमी नही थी। अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया में तनाव बहुत होते हैं। वे उसे लांघ कर अपने काव्य-कर्म में लगे रहे। पहाड़ और शहर की सीमाएँ पार कर आयोवा के अतिथि कवि-लेखक बने। इस प्रवास के अनुभव को लेकर उन्होंने ‘एक बार आयोवा’ नामक किताब लिखी। यूरोप के कई शहरों मे उनके काव्य-पाठ आयोजित हुए। इस तरह का यश बहुत कम कवियों के खाते में दर्ज है। उनकी कविताओं के अनुवाद विश्व की कई भाषाओं में हुए। इसके अतिरिक्त उन्होंने नेरूदा, ब्रेख्त, अर्नेस्तो कार्देनाल, यानिस रित्सोस जैसे विश्व प्रसिद्ध कवियों के अनुवाद हिन्दी में किए। इस तरह वे विश्व कविता से जुड़े रहे। दुनिया के महत्वपूर्ण कवियों का अनुवाद कर मंगलेश ने हमारा परिचय विश्व कविता से कराया और कविता के वितान को बड़ा किया। अनुवाद का काम मूल रचना के सृजन से कम कठिन नही होता। इस तरह वे दुनिया की तमाम भाषाओं के बीच आवाजाही करते रहे। इससे उनकी कविता भी समृद्ध होती रही।


मंगलेश डबराल कवि के साथ गद्यकार और संपादक भी रहे– ‘लेखक की रोटी’, ‘कवि का अकेलापन’, ‘एक सड़क एक जगह’ उनके गद्य संग्रह हैं। उनके गद्य में उनके कवित्व की झलक मिलती है जैसे कोई लंबी कविता पढ़ी जा रही हो। रघुवीर सहाय और विष्णु खरे की तरह वे अख़बारों की दुनिया से जुड़े हुए थे। उन्होंने भयानक ख़बरों को कविता में बदलने का काम किया और कविता को ख़बर बनाया। इस उपक्रम में कविता में अनुशासन और संरचना के प्रति वे सतर्क रहे। जिन संस्थानों से जुड़े हुए थे, उसमें कविता के लिए जगह बनाई, नए कवियों को प्रस्तुत किया।


दिल्ली सत्ता का मुख्य केंद्र है। वहाँ शासक, राजनेता, पूंजीपति और दलालों की रिहाइश है। इस शहर की कल्पना एक निर्मम नगर के रूप में की जाती है। मंगलेश डबराल ने दिल्ली के रहनुमाओं पर कई कविताएँ लिखी हैं जो सत्ता के चरित्र को उजागर करते हैं। केवल सत्ता नहीं काॅर्पोरेट भी जनता के शत्रु हैं।‌ 2013 में प्रकाशित उनका संग्रह ‘नए युग में शत्रु’ 2014 में आने वाली आहटों का पता देता है। इसे हम आज के समय में स्पष्ट देख रहे हैं…‌। देखें– 


तानाशाह भाषण देते हैं और भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं / कि वे मनुष्य हैं लेकिन इस कोशिश में उनकी भाव- भंगिमा / जिन प्राणियों से मिलती हैं वे मनुष्य नही होते 


मंगलेश डबराल उन थोड़े बुद्धिजीवी कवियों में रहे जिन्होंने अपनी कविता में प्रतिरोध का स्वर बुलंद किया। मंगलेश की कविताएँ हमें बताती है कि प्रजातान्त्रिक ढ़ाचे के भीतर तानाशाही संभव है। इस तरह के प्रयोग दुनिया के तमाम देशों में किए जा रहे हैं। जनता का दिमाग़ बदलने लिए मीडिया और न्याय व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा रहा है। झूठ को सच की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। मंगलेश की कविताओं में इस तरह के संकेत मौजूद हैं। अब यह कहा जाता है कि यह अघोषित आपातकाल है, इसके लिए सविधान में परिवर्तन की ज़रूरत नही है। केवल शासक ही हमारा शत्रु नही है, काॅर्पोरेट और नव धनाढ्य भी हैं जिनकी सत्ता संचालन में महती भूमिका है। मंगलेश लिखते हैं-


अंतत: हमारा शत्रु भी एक नए युग में प्रवेश करता है / अपने कपड़ों ,जूतों और मोबाइल के साथ / वह एक सदी का दरवाजा खटखटता है / और उसके तहखाने में चला जाता है 


हमारे समय के भयावह दृश्य उनकी कविताओं में मिलते हैं। इस तरह की कविताओं में उनकी आक्रामकता दिखाई देती है,उनकी भाषा भी तदनुसार बदली हुई होती हैं। उनकी कविताओं का वितान बड़ा है। उसमें जीवन और समाज के अनेकों ब्यौरे हैं। 


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स्वप्निल श्रीवास्तव सुपरिचित वरिष्ठ कवि-गद्यकार हैं। 05 अक्टूबर 1954 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के जनपद सिद्धार्थनगर (तत्कालीन बस्ती) के एक गाँव मेहदौना में जन्म। 


कविता संग्रह : ईश्वर एक लाठी है, ताख पर दियासलाई, मुझे दूसरी पृथ्वी चाहिए, ज़िन्दगी का मुकदमा, जब तक है जीवन, घड़ी में समय, समकाल की आवाज (चयनित कविताएँ), रोटी के बराबर ज़मीन।


कहानी संग्रह : एक पवित्र नगर की दास्तान, स्तूप, महावत तथा अन्य कहानियाँ, दूर के मेहमान, चयनित कहानियाँ।


उपन्यास : कवि की अधूरी कविता


संस्मरण/वृत्तांत : जैसा मैंने जीवन देखा, लेखक की अमरता, एक सिनेमाबाज़ की कहानी, पहाड़ों और नदियों के देस में, दियासलाई में चाबी, तानसेन एक शहर का भी नाम है।


समीक्षात्मक आलेख : कवियों की दुनिया।


संपादन : ताकि स्मृति बची रहे (मंगलेश डबराल पर केंद्रित पुस्तक)।


पुरस्कार/सम्मान : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, फिराक सम्मान, केदार सम्मान, शमशेर सम्मान, रूस का अंतर्राष्ट्रीय पुश्किन सम्मान।


अनुवाद : रूसी, अंग्रेज़ी, नेपाली, बंगाली, मराठी, पंजाबी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में कविताओं के अनुवाद।


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