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दीप्ति कुशवाह की कविताएँ
ऋतुएँ आती रहेंगी
जंगलों के कंधों को छू कर
घास के रंग उलटती-पलटतीं
पहाड़ों के रंग बदलती हुईं




लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताएँ
चूल्हे की राख-सा
नीला पड़ गया है मेरे मन का आकाश
तभी तुम झम से आती हो
जलकुंभी के नीले फूलों जैसी खिली-खिली
तुम्हें देखकर पिघलने लगते हैं
दुनिया की कठोरता से सिकुड़े
मेरे सपनों के हिमखंड।






भूकंप-कथा (जो बचा रह गया)
घर के बीज तो हम ख़ुद में छिपाये फिरते हैं इसीलिए सैकड़ों बार उजड़ने के बाद दोबारा स्थापित हो जाते हैं।
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