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पाताल की दुखती रगें
पाताल की दुखती रगें कहानी : तौसीफ़ बरेलवी उसे कई रोज़ से अपने हम नफ़्सों के ख़ून की बू आ रही थी लेकिन वह उस बू के पीछे जा भी नहीं सकता था। हाँ उसके अंदर से एक हौल ज़रूर उठ रही थी कि कुछ बहुत भयानक होने वाला है। पूरा जंगल रोज़ जिन परिंदों कि चहचहाहटों से अपनी सुबह करता था, अब वे आवाज़ें ख़ामोश होने वाली थीं। आख़िर ऐसा भी क्या हो गया था...? वह उस पसरती हुई ख़ामोशी का पता लगाना चाहता था लेकिन उससे कुछ करते नहीं बन रहा था। आख़िर वह कर भी क्या सकता था? अपनों के ख़ून की बू के साथ ही दिल को थर्


अंजलि नैलवाल की कविताएँ
मैं गाँव सोचकर सबसे पहले
लोगों को नहीं सोच पाती
मैं नहीं समझ पाती कि मैं लोगों से हूँ
या पत्थरों-पहाड़ो से,
गाँव लोगों से है या बस अपने होने से।


संसार का सबसे खूबसूरत डूबा हुआ आदमी
पहली बार वहां मौजूद आदमियों और औरतों ने अपनी गलियों के सूनेपन, अपने आंगन के सूखेपन, अपने ख्वाबों के ओछेपन को जाना—जब उन्होंने डूबे हुए आदमी की भव्यता और खूबसूरती का सामना किया।


दीप्ति कुशवाह की कविताएँ
ऋतुएँ आती रहेंगी
जंगलों के कंधों को छू कर
घास के रंग उलटती-पलटतीं
पहाड़ों के रंग बदलती हुईं




लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताएँ
चूल्हे की राख-सा
नीला पड़ गया है मेरे मन का आकाश
तभी तुम झम से आती हो
जलकुंभी के नीले फूलों जैसी खिली-खिली
तुम्हें देखकर पिघलने लगते हैं
दुनिया की कठोरता से सिकुड़े
मेरे सपनों के हिमखंड।






भूकंप-कथा (जो बचा रह गया)
घर के बीज तो हम ख़ुद में छिपाये फिरते हैं इसीलिए सैकड़ों बार उजड़ने के बाद दोबारा स्थापित हो जाते हैं।
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