लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताएँ
- Jun 6
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हरेक रंग में दिखती हो तुम
1.
मदार के उजले फूलों की तरह
तुम आई हो कूड़ा भरे मेरे इस जीवन में
तितलियों, भौरों जैसा उमड़ता
सूंघता रहता हूँ तुम्हारी त्वचा से उठती गंध
तुम्हारे स्पर्श से उभरती चाहतों की कोमलता
तुम्हारी पनीली आँखों में छाया पोखरे का फैलाव
तुम्हारी आवाज़ की गूँज में चूते हैं मेरे अंदर के महुए
जब भी बहती है अप्रैल की सुबह में धीमी हवा
डुलती हैं चाँदनी की हरी पत्तियाँ अपने धवल फूलों के साथ
मचलता हूँ घड़ी, दो घड़ी के लिए भी
बनी रहे हमारी सन्निकटता।
2.
बभनी पहाड़ी के माथे पर उगी
संजीवनी बूटी हूँ मैं
जो तप रही है मई के जलते अंगारों-सी
जीवित हूँ यह उम्मीद लगाए
कि तुम आओगी बारिश की मेघ-मालाओं के साथ
बस एक छुअन से हरे हो जाएंगे
झुलस चुके मेरी देह के रोएँ।
3.
चूल्हे की राख-सा
नीला पड़ गया है मेरे मन का आकाश
तभी तुम झम से आती हो
जलकुंभी के नीले फूलों जैसी खिली-खिली
तुम्हें देखकर पिघलने लगते हैं
दुनिया की कठोरता से सिकुड़े
मेरे सपनों के हिमखंड।
4.
शगुन की पीली साड़ी में लिपटी
तुम दिखी थी पहली बार
जैसे बसंत बहार की टहनियों में भर गए हों फूल
सरसों के फूलों से छा गए हों खेत
भर गई हो बगिया लिली-पुष्पों से
कनेर की लचकती डालियाँ डुल रही हों धीमे-धीमे
तुम्हें देखकर पीला रंग उतरता गया
आँखों के सहारे मेरी आत्मा के गहवर में
समय के इस मोड़ पर नदी किनारे खड़ा
एक जड़ वृक्ष हूँ मैं
तुम कुंदरू की लताओं-सी चढ़ गई हो पुलुई पात पर
हवा के झोंकों-से गतिमान हैं तुम्हारे अंग-प्रत्यंग
तुम्हारे स्पर्श से थिरकता है मेरा निष्कलुष उद्वेग।
5.
दीए की मद्धिम लौ में पारा
काजल लगाती हो जब आँखों की बरौनियों में
काले रंग से चमक जाता है तुम्हारा चेहरा
जिसके बीच जोहता हूँ मीठे सपने
आशंकाओं के घने अंधकार में भी
दिख जाती है फाँक भर मुझे रोशनी की लकीरें
जिनके सहारे निर्विघ्न चल देता हूँ
ज़िंदगी की हर जंग में।
6.
भोर का उगता सूरज
गुलाब की खुलती पंखुड़ियाँ
स्थिर हो गई हैं तुम्हारे होठों की लाली पर
जिसके आगे फीके हैं अबीर-गुलाल के रंग
चकाचौंध से भरे बाज़ार के नकली उत्पादों के बरअक्स
हमने अपने हिस्से में बचा कर रखी है
यह अद्भुत नैसर्गिकता।
7.
इंद्रधनुष के रंग युग्मों-सी
घुल गई हो तुम मेरे संग
आंचल की किनारी से जब
सहलाती हो मेरे टभकते घावों को
घिर जाता हूँ मीठे सपनों की
बारिश की झड़ी में...
पहली बार
पेड़ों में आते हैं नन्हें टूसे
खलिहान से आती है नवान्न की गंध
तुम आती हो ख्यालों में
लीची का मधुर आभास लिए
मसूर के नीले फूलों-सी साड़ी लहराती
जैसे ताउम्र में झुरझुराकर
पहली बार बही हो बसंती हवा!
अंतहीन प्रतीक्षा में
नदियों ने बात की बादलों से
पर्वतों ने समुद्र से
झरनों ने झील से
खेतों ने किनारे खड़े पेड़ों से
कब से पास बैठी हो तुम
चुप-चुप सी सदियों से
तुम्हारे बोल सुनने को
बेताब हैं मेरे कान
तुम्हारी हर आहट,
तुम्हारी हर थिरकन की
अंतहीन प्रतीक्षा में।
पहली बारिश
मानसून की पहली बूँदों में
भीग रहा है गाँव
भीग रहे हैं जुते-अधजुते खेत
भीग रही है समीप की बहती नदी
भीग रहा है नहर किनारे खड़ा पीपल वृक्ष
हवा के झोंके से हिलती
भीग रही हैं बेहया, हंइस की पत्तियाँ
भीग रही हैं चरती हुई बकरियां
भीग रहा है खंडहरों से घिरा मेरा घर
ओसारे में खड़ी हुई तुम
भीग रही हो हवा के साथ
तिरछी आती बारिश बूँदों से
खेतों से भीगा-भीगा
लौट रहा हूँ तुम्हारे पास
मिलने की उसी ललक में
जैसे आकाश से टपकती बूँदें
बेचैन होती हैं छूने को
सूखी मिट्टी से उठती
धरती की भीनी गंध।
बारहमासा
सावन भादों की रिमझिम फुहारों के बीच
कुदाल लेकर जाऊँगा खेत पर
तुम आओगी कलेवा लिए साथ
चमकती बिजली, गरजते बादलों के बीच
तुम गाओगी रोपनी के अविरल गीत
बिचड़े डालते मोर सरीखा थिरकेगा मन
खड़रिच-सा फुदकेंगे कुआर-कार्तिक में
कास के उजले फूलों के बीच
सोते की धार-सी रिसती रहोगी तुम
गम्हार वृक्ष-सा जडें सींचता रहूँगा कगार पर
धान काटते, खलिहान में ओसाते
अगहन-पूस के दिनों में बहेगी ठंडी बयार
तुम सुलगाओगी अंगीठी भर आग
चाहत की तपन से खिल उठेंगे मेरी देह के रोएँ
माघ-फागुन के झड़ते पत्तों के बीच
तुम दिखोगी तीसी के फूल जैसी
छाएगी आम के बौराए मंजर की महक
तुमसे मिलने को छान मारूंगा
चना-मटर-अरहर से भरी बधार
चैत्र-बैसाख में चलेंगी पूर्वी-पश्चिमी हवाएँ
गेहूँ काटने जायेंगे हम सीवान में
लहराओगी रंग-बिरंगी साड़ी का आँचल
बोझा उठाए उडता रहूँगा
सपनों की मादक उड़ान में
तेज़ चलती लू में बाज़ार से लौटते हुए
जेठ-आषाढ़ के समय
सुस्तायेंगे पीपल की घनी छाँव में
पुरखे तपन में ठंडक देते हैं वृक्षों का रूप धर
हम बांटेंगे यादें अपने बचपन की
तुम कहोगी हिरनी-बिरनी के साहसिक क़िस्से
खड़खड़ाऊंगा कष्टप्रद दिनों से जूझने की
शिरीष फलियों की अपनी खंजड़ी !
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लक्ष्मीकांत मुकुल (जन्म : 08 जनवरी 1973) किसान कवि हैं। इनके दो कविता संकलन ‘लाल चोंच वाले पंछी’ व ‘घिस रहा है धान का कटोरा’ और ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित पुस्तक ‘यात्रियों के नज़रिए में शाहाबाद’ प्रकाशित हैं। ईमेल : kvimukul12111@gmail.com
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