जगतारजीत सिंह की कविताएँ
- Jun 21
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जगतारजीत सिंह की कविताएँ
पंजाबी से अनुवाद : गुरमान सैनी
नानी
नानी बैठी सोच रही है
फिर आएंगे बच्चे मेरे
अपनी माँ के साथ
नानी सोचे—
कितनी बूढ़ी हो गई हूँ मैं
कहानी जीते, सुनाते,
ख़ुद इक कहानी हो गई हूँ मैं
उसने देखा था अपनी बेटी को
कहानियाँ सुन-सुन
अपनी आँखों के सामने बड़ा होते
अकेली बैठी वह याद करती है
बच्चे आएंगे
अपने साथ छुट्टियां की गठरी लेकर
साल भर की दबा रखी
हँसी और शरारतें
खट से टूट जाएंगी
सवालों के आगे लगी बंदिशें
जब वे यहाँ आएंगे
भूली नानी को याद करते ही
बच्चों के कानों में गूंजने लगे
उसके रसीले बोल
छँटने लगे माथों पर लगे
गर्म चिकने चुंबनों के निशान
आँखों में तैरने लगे
राजा, रानी, प्रेत और फ़क़ीर
आसमान से उतर आईं
बेशुमार परियां
नानी अपनी बेटी संग
बेटी अपने बच्चों के साथ
इकट्ठी हो कर बैठेंगी
तारों के शामियाने तले
सबसे ऊपरी छत पर
फिर एक बार
इस साल...
मौत
सड़क पर गिरी मूली
एक-दो बार बची होगी
चीखते-चिल्लाते चले जाते
पहियों के वार से
हिले होंगे हरे-हरे पत्ते
हर बार बच जाने की कोशिश में
इस समय पड़ी है
सड़क से लगी
वरक-सी बनी हुई
देखते ही देखते
उसका लहू एकसार बिखर गया चारों ओर
अब जब भी कोई पहिया गुज़रता
ले जाता अपने साथ
उसके जिस्म का चिथड़ा
उतर रही ठण्ड में
वह ऐसे ही बुहारी जायेगी
सड़क से
अंश-अंश करके
कुछ ही समय में यह जगह भी
साथ वाली जगह की तरह
स्याह हो जायेगी।
सूर्य
देखो, वह देखो
सड़क पर उतरता हुआ सूर्य
देखते-देखते चलने लगेगा
सड़क पर हमारी तरह
चलने से पहले उसे चाहिए जगह
अपने हजारों हज़ारों पैर टिकाने के लिए
वह देखता है
खचाखच भरी सड़क को
अपने पूरे तेज के साथ
सूर्य तो रोज़ आता है इसी समय
इसी जगह टिक ढूंढता रहता
अपने पैर रखने की जगह
हर बार मुड़ता रहा बिना उतरे
शर्म से लाल होकर
चलते-चलते गुम हो जाए
अंधेरा खाए आकाश में
आता तो तब भी होगा
जब यहाँ सड़क नहीं थी
कोई पगडंडी भी नहीं थी
आदम स्पर्श से धरती कोरी थी
उतर कर चलता होगा
बेआबाद जगह पर
बिना किसी रोक-टोक के
चल, चल कर जब थक जाता होगा
सिर टिका सो जाता होगा
यहीं कहीं इसी धरती पर।
मैं और बादल
बादल का पीछा करते-करते
पैर-पैर चढ़ने लगा चढ़ाई
चढ़ते-चढ़ते आ जाती उतराई
ऐसा होते हुए भी
वह नज़रों से अलग न हुआ
कभी कभी लगा हम दोनों
पहाड़ चढ़-उतर रहे हैं
अपनी ज़िद लिए
चढ़ते-चढ़ते जा खड़ा हुआ
पहाड़ के शिखर पर
मुझसे पहले पहुँचे बादल ने
घेर लिया मुझे
पानी से तर जिस्म को लगा
जैसे वह बादल हो गया है।
हार
शिखर दोपहरी में बैठा
गूँथ रहा हूँ हार
पकड़-पकड़ सूर्य किरणें
गूँथता-गूँथता सोचता हूँ
वह हार
उनके गले में डालूँगा
जो, लड़कर आएंगे
स्याह अँधेरों के साथ।
बुद्ध
झाँकता है बुद्ध प्रबुद्ध
पलक से जुड़ी पलक के पीछे से
उसके आगे आने-जाने वाले
उसको देखने वाले
उसकी बात करने वाले
उसके आगे नमन करने वाले
सब जानते हैं
सबके पास कहने को बहुत कुछ है
उसके बारे में जो मौन है
जब जी में आए
वह बोल लेता होगा स्वयं से
वह बंद पलकों के पीछे से झाँकता है
बोलता नहीं
बोलता है वह
जिनके बीच घिरा हुआ वह
अबोल, अडोल बैठा है
गर्दिश के बीच टिका बुद्ध
झाँकता है
अपने होने के पहले समय में
अपने होने के बाद के समय में।
हवा
हवा जितनी भी तेज़ चलती
घास उतना ही
झुक कर दोहरी हो जाती
झोंके के बाद
चला आता और तेज़ झोंका
उसे और झुका जाता
हवा ख़ुश हुई, अपने आगे
नतमस्तक घास को देख
हवा के गुज़र जाने के बाद
घास की पत्ती-पत्ती
पहले जैसी सीधी खड़ी हो गयी
एक बार फिर
हवा धोखा खा गुज़र गयी।
रावी
पहले पहल पानी चला होगा
इधर-उधर से
ऊपर से नीचे की ओर
हर नदी अपने घर से
इसी तरह चली होगी
अपने पानी के साथ
अपनी राह बनाती हुई
नदी तो
पहचानी जाती है
अपने पानी से
नदी का नाम तो
बहुत समय बाद
किसी ने रखा होगा।
पानी
वह जो क़रीब हुआ करता था
दो-चार हाथ
अब उतर गया
जैसे अंधे कुएँ में
वहाँ से वापस नहीं आता
आजकल कोई अक्स
और न ही लौटती है
उसमें उतरी हुई आवाज़।
आँसू का रिश्ता
वह चला गया तो
कोसा आँसू
ख़ुद ही उतर आया आँख से
आँसू ने नहीं बताया था पहले
अपने इस तरह चले आने के बारे में
जाने वाले के साथ
जो भी रिश्ता था
मैं ही जानता हूँ
रिश्ते की चुगली
चली होगी
किसी न किसी मुँह से
जिसे जान यह चला आया
अपने आप
कोसा और खारा
जाने वाले के बाद
ना चले आने की
ज़िद के बावजूद
वह उतर आया, उसी तरह
जैसे वह पहले आम तौर पर
ऐसे समय में करता रहा था।
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वरिष्ठ पंजाबी कवि जगतारजीत सिंह के पाँच कविता संग्रह, बाल कहानियों की तीन पुस्तकें, कला निबंधों/समीक्षा की पंद्रह पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकीं हैं।
गुरमान सैनी पंचकूला निवासी लेखक-अनुवादक हैं। पंजाबी में कविता पुस्तक ‘नीला लिफाफा’ प्रकाशित। हिन्दी में ‘संख और सीपियां’ एवं पंजाबी में ‘अहदनामा’ पुस्तकें प्रकाशनाधीन। हिन्दी में दो पुस्तकों ‘आते हुए लोग’ और ‘व्हाट्सएप की कहानियाँ’ का संकलन व संपादन।
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