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शेरदा ‘अनपढ़’ की कविताएँ

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Updated: 7 hours ago



शेरदा ‘अनपढ़’ की कविताएँ
कुमाऊँनी से अनुवाद एवं प्रस्तुति : भूपेन्द्र बिष्ट 

पैलियोलिथिक पुरातत्वविद एवं हिस्टॉरिकल लिंग्विस्ट अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि भाषा संकेतों पर आधारित एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें  किसी शब्द और उसके अर्थ का सीधा सम्बन्ध नहीं है। लेकिन इसके बरअक्स यह भी स्थापना दी जा रही है कि स्थानीय बोलियों में जीवन का सभी कुछ—परम्परा और आस्था, भली कहानियाँ तथा लोकगीत, रिश्तों की ऊष्मा और यादें, सपने सब बसे होते हैं। एतदर्थ, इनके ज़रिए जो संवाद फूटता है, वह अर्थपूर्ण लफ़्ज़ों का समुच्चय है। यह अलग बात है कि इनकी कोई प्रमाणिक लिपि चाहे न हो पर यहाँ संप्रेषणीयता जबरदस्त होती है।


चिंता की बात है कि इधर भाषा संपर्क का ज़रिया भर न होकर सामाजिक दर्जे तथा छवि से भी जुड़ गई और क़िस्सागोई की पुरानी धारा सूख-सूख गई। बच्चे यूट्यूब, इंस्टाग्राम व आंग्ल चैनलों से भाषा सीख रहे हैं। यह भाषा बदलने का ही मामला नहीं है अपितु वयस्क पीढ़ी की बदलती सोच का भी संकेत है। AI की धमक के बाद तो विषय और भी गहराता जा रहा है। दो वर्ष पूर्व यूनेस्को ने कह दिया था कि पिछले छह दशकों में भारत की 250 से ज्यादा भाषाएँ विलुप्त हो चुकी हैं और 197 बोलियाँ ख़त्म होने के कगार पर हैं। ऐसे में अपनी बोली-बानी की ओर लौटने की ज़रूरत एक प्यास की तरह व्यग्र तो करती है पर पानी मिलने का रास्ता....? बड़ा सवाल यह है!


उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल में बोली जाने वाली कुमाऊँनी भाषा मध्य हिमालय की अत्यंत प्राचीन और समृद्ध भाषाओं में से एक है। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से माना जाता है और समय के साथ इस पर संस्कृत, प्राकृत, नेपाली तथा स्थानीय बोलियों का प्रभाव पड़ा। इसकी उपबोलियाँ जैसे—सोर्याली, अस्कोटी, गंगोली, दनपुरिया, कत्यूरा और चौगर्खिया आज भी प्रस्फुटन की अवस्था में बोली और सुनी जाती हैं। प्रमुख कुमाऊँनी कवियों में गुमानी पंत, गौरीदत्त पांडे 'गौर्दा', मोहन उप्रेती, शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' तथा चारुचन्द्र पांडे का नाम लिया जा सकता है।


शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' पहाड़ की वादियों, घाटियों, उकाव-उतार, दर्रों, खाव, चुपटॉल, नदी-गाड़ और जंगल तथा जन जीवन में "शेरदा" नामल भौतै मक़बूल हुनेर भै। आपकी कुछ प्रसिद्ध कविताओं का हिंदी में लिप्यंतरण और अनुवाद प्रस्तुत है।


~भूपेन्द्र बिष्ट 



तुम कौन हो? (को छै तु?)


सुबह-सुबह की धुँधली और हल्की धूप जैसी, जो उजाले को बिखेरती है। भेकवा (एक पहाड़ी पेड़, जिसकी पत्तियाँ दुधारू मवेशियों को खिलाई जाती हैं) की टहनी जैसी लचक भरी पतली। खिलखिलाकर हँसती हुई, झुककर देखती हुई और अपने मन को तो कुरेदती हुई लेकिन होंठों पर बस एक बुदबुदाहट सी लिए। 


मिश्री से भी ज़्यादा मीठी लगने वाली, क्या तुम कार्तिक महीने का शहद हो? या फिर पूस के महीने में पड़ने वाले पाले जैसी कोई चीज़? ओ चंचल लड़की तुम कौन हो?


दही जैसी गोरी और साफ़-सुथरी। हिसालू और किल्मोड़ा (पहाड़ी जंगली फल) जैसी खट्टी-मीठी। आँखों में ही बसी रहने वाली आँखों की पुतली जैसी। जहाँ भी चलती हो तुम, ऐसा लगता है जैसे वहाँ साक्षात 'फूलदेई' (उत्तराखंड का लोक पर्व, जिसमें ख़ुशहाली के फूल बिखेरे जाते हैं) का त्योहार आ गया हो और चारों ओर जीवन का संचार हो गया हो।


तुम्हारे स्पर्श से ही पत्ते हरे (जीवित) हो जाते हैं, क्या तुम गर्मियों की बारिश हो? सरसराती हुई ठंडी हवा के झोंके जैसी, बहुत प्यारी सी, तुम कौन हो?


तुम कभी चातुर्मास में दिखाई देती हो, तो कभी गर्मियों में। कभी सुनसान शामों में दिखती हो, तो कभी सर्दियों की सुबह वाली तुहिन में। कभी तुम हरेला (हरियाली) बनकर आती हो, तो कभी पूजे गए च्यूड़े (त्योहारों का आशीर्वाद) जैसी पवित्र लगती हो। तुम कद्दू की बेल के भीतर छिपे हुए ककड़ी के उस पीले और सुंदर फूल जैसी हो—जो सादगी में भी बेहद ख़ूबसूरत लगता है।


बाहर से तुम अनार के दाने जैसी साबुत और पुष्ट दिखती हो, लेकिन भीतर से तुम सेब की तरह मीठी और कोमल हो। नौ रत्ती व बावन तोले जैसी अनमोल, ओ सम्मोहित करने वाली! तुम आख़िर कौन हो?


जहाँ भी देखता हूँ, खेतों में, फूलों और पत्तों में तुम ही तो दिखाई देती हो। मक्खन की तरह तुम मेरे दिन-रात में पिघलती रहती हो। मैं ऐसा कौन सा फूल तुम पर सजाऊँ कि जिसका रंग तुममें न हो? हाँ, सुनो ना—न तुम कोई पराई हो, न मैं कोई पराया हूँ। मैं तुममें हूँ और तुम मुझमें समाई हो।


तारों जैसी चमकती हुई तुम्हारी मुस्कान है, जो पहाड़ों की चोटी के उस पार तक फैली है। डोली के भीतर बैठी हुई दुल्हन की तरह शर्माती हुई, ओ रूपसी! तुम आख़िर कौन हो?


जागते हुए तुम मेरे कमरों या विचारों में रहती हो और सोते हुए मेरे सिरहाने या सपनों में होती हो। चाहे पास रहो या दूर, मेरे मन की हर दिशा में तुम ही हो। मेरे इस मिट्टी के शरीर की तुम ही प्राण शक्ति हो। न जाने किस युग से, युगों-युगों की हमारी यह पहचान है।


जो मेरी साँसों में गुदगुदी करती रहती है। किसी गहरी माया और घनघोर प्रेम की मूरत जैसी, हमेशा मेरे सामने रहने वाली, ओ! सदा मुस्कुराने वाली तुम आख़िर कौन हो?



चातुर्मास की शादी (चौमाँसकि ब्याव)


भाद्रपद महीने में सुबह-सुबह जब कोहरा छँटता है, तो ऐसा लगता है जैसे विदाई या बारात के स्वागत की तैयारी हो रही हो। इंद्रधनुष आसमान में इस तरह सज गया है, जैसे शादी का तोरण-द्वार सजाया गया हो। पहाड़ों का आँचल और शिखर खिले हुए हैं, मुस्कुरा रहे हैं। मानो चौमासे (बरसात) की शादी हो रही हो।


आसमान से पानी के घड़े इस तरह छलक रहे हैं कि धरती का कोना-कोना भीग गया है। ऊँचे पहाड़ों से पानी बहकर नीचे आ रहा है। गाँव के तलाऊँ, खेत, क्यारियाँ और दलदली ज़मीनें पानी में लबालब डूब चुकी हैं। छोटे-छोटे बरसाती नाले-गधेरे उफान पर हैं और वे सब मिलकर बड़ी नदी (गाड़) में समाकर उसे रौद्र और उन्मुक्त रूप दे रहे हैं।


गोठ (मवेशियों के रहने का स्थान) में बिछाई जाने वाली पिरूल (चीड़ की सुइयाँ-पत्तियाँ) भीग चुकी हैं। इस सुहावने और भीगे मौसम में 'भौजी' अपनी घाघरी समेटकर चल रही हैं और 'दाज्यू' (बड़े भाई) अपने सुरयाव (चूड़ीदार पायजामे) को संभाल रहे हैं। पहाड़ों के आँचल में चारों तरफ ख़ुशियों का माहौल है क्योंकि चौमासे की शादी का उत्सव जो चल रहा है।


खेतों में रोपाई करने वाली महिलाएँ हँसते-खेलते, लोकगीत गाते हुए दिन बिता रही हैं। बादलों की लुका-छिपी के बीच जब तीखी धूप व्यापती है तो उमस बढ़ जाती है, लेकिन ठंडी हवाएँ बाँसुरी की धुन की तरह सुहानी लगती हैं। प्रकृति के इस संगीत और काम के बीच लोग अपनी थकान भूलकर आनंदित हैं।


खेतों में 'कौणी' (एक पहाड़ी अनाज) के पौधे हवा के झोंकों से इस तरह झूम रहे हैं मानो नाच रहे हों। मडुवे (रागी) और झुंगारे के पौधे लहलहा रहे हैं और उनके सिरों पर बालियाँ आने लगी हैं। इस भरपूर पैदावार और हरियाली को देखकर पहाड़ों की चोटियाँ भी मुस्कुरा रही हैं।


सावन के महीने में ही 'संण-संण' करती ठंडी हवाएँ चल रही हैं और 'तड़-तड़' करती बारिश की बूँदें गिर रही हैं। घर के बड़े-बुजुर्ग कुशा (पवित्र घास) लेकर पूजा-पाठ कर रहे हैं और कुशल-क्षेम पूछ रहे हैं। बहनें और माताएँ हाथ जोड़कर देवताओं की आराधना कर रही हैं। पूरे दिन-रात चारों ओर 'ज्यूजाग' (दीर्घायु होने का आशीर्वाद) और 'पैलाग' (बड़ों को प्रणाम) की गूँज है।


पहाड़ों के गधेरों और रास्तों में पानी इतना साफ़ और सफ़ेद बह रहा है, मानो दूध की नदियाँ बह रही हों। चारों तरफ फैली इस प्रचुरता और हरियाली को देखकर जीव-जंतु और प्रकृति के सभी अंग तृप्त होकर शांत भाव से इस उत्सव का आनंद ले रहे हैं।


भुट्टा, तुमड़ी, पिनालू (अरबी) और जंगली वनस्पतियाँ आपस में ख़ुशी से फुसफुसाहट कर रही हैं। चु (एक स्थानीय अनाज), कुट्टू और तिल मानो खुशी में बड़े बुबू (ताऊ) का हाथ थाम रहे हैं। चमेली के फूल खिलकर छपेली (पारंपरिक लोकनृत्य) गा रहे हैं, चाची गुलदस्ते की तरह सज रही हैं और रंगीले देवर के साथ सब शामिल होकर नाच रहे हैं।


गहत, भट्ट, मास (उड़द) और रेंस (लोबिया/राजमा) जैसी पहाड़ी दालें आँगन में झूम रही हैं। नाई और अन्य लोग ख़ुशी के मारे उछल-कूद कर रहे हैं। पहाड़ों की गोद में प्रसन्नता से भरी चौमास की शादी हो रही है।


कद्दू, चिचंडा, लौकी और तोरई बेलों पर ठसाठस भरे हुए फले हैं। पत्तों की ओट में छिपकर रात के समय ककड़ी मानो कोई कहानी कह रही है। नाशपाती और अन्य फल पककर मीठे हो रहे हैं। बेडू, आडू और घिंगारू (पहाड़ी फल) पककर इतने रसीले हो गए हैं, मानो मिश्री घुल गई हो।


खूँटी पर, ओहरी (कमरे) में और बाहर सब जगह ख़ुशहाली फहर रही है। गौशाले में गाय-बैल भी ख़ुश और डौंरी रहे हैं (मस्त हैं)। पहाड़ों की गोद में प्रफुल्लित चौमास की शादी हो रही है।


रंगीली पहाड़ियों की चोटियाँ कोहरे और हरियाली की धोती पहनकर सज गई हैं। ऊपर-नीचे हर तरफ प्रकृति ने मखमली पिछौड़ी (पारंपरिक पहाड़ी दुपट्टा) ओढ़ ली है। इस सुनहरी धरती का शरीर मक्खन की तरह कोमल और सुंदर हो गया है। अब दिन दूल्हे (ब्यौल) जैसा तेजस्वी और रात दुल्हन (ब्यौलि) जैसी रूपवान लग रही है।


पानी के नौलों (पारंपरिक जल स्रोतों) से पानी फूट-फूटकर बह रहा है और हृदय में जौ के अंकुर जैसा उत्साह उमड़ रहा है। छाती में ख़ुशी की गुदगुदी हो रही है। पहाड़ों की गोद में हँसते हुए चौमास की शादी हो रही है।



जा बेटी, जा ससुराल (जा चेली जा सौरास)


जा बेटी, जा ससुराल। एक न एक दिन तो जाना ही हुआ। घड़ी-दो घड़ी के लिए चेली दम ले ले, फिर उम्र भर तुझे वहीं (ससुराल की ज़िम्मेदारियों में) दौड़ना/खटना ही ठहरा।


यहाँ (मायके) में अब तेरा क्या रह गया है पगली? क्यों बेकार में मायके की रट लगाए बैठी है? आज तक मायका (माता-पिता का घर) आख़िर किसका रहा है? यह तो भाइयों और भाभियों का देश (घर) है, यहाँ अब तेरा क्या हक़ बनता है? तूने यहाँ सब देख लिया, सुन लिया और मन की सारी इच्छाएँ-आकांक्षाएँ यहीं जी लीं। अब यहाँ का मोह छोड़।


अपने मन को समझा ले, मालूम है नहीं मानेगा? यह अभागा मन तो ऐसा ही होता है, जो जल्दी नहीं मानता। लेकिन जा बेटी जा ससुराल, एक दिन तो जाना ही हुआ।


इस संसार में किसके दुख को कम बताऊँ, यह पूरी दुनिया ही चिंताओं और दुखों से भरी है बेटी। यहाँ सुख तो पल-दो पल के लिए ही होते हैं, दुखों की कोई थाह नहीं। मरते दम तक इंसान 'मेरा-मेरा' करता रहता है और हाड़-मांस का शरीर भी यहीं रह जाता है। सब जानते हैं कि कोई साथ नहीं आने वाला, तो फिर यह 'मेरा-मेरा' का एक झूठा मोह ही तो हुआ।


मानने के लिए अब किसकी बात मानेगी? सब अपनी-अपनी ही कहते हैं बेटी। जा बेटी जा ससुराल, एक दिन तो जाना ही हुआ।


अरे बेटी! धन-दौलत और इस मायके के मोह को छोड़, इसे पल भर में भुला दे। जो दुख अपनों (ससुराल वालों के संग) के साथ मिलकर सहना पड़े, वह भला कैसा दुख? यह तो भगवान के घर की बनाई हुई रीत है, जो सदियों से चली आ रही है। फिर इस तरह अपना दिल छोटा करने या उदास होने से क्या फ़ायदा? जब तुझे एक न एक दिन जाना ही है, तो फिर आँखें सुखाने, आँसू बहाने से क्या फ़ायदा?


मायके के दिन अब पूरे हो गए हैं और यहाँ का नियत समय भी समाप्त हो गया है। जा बेटी जा, एक न एक दिन तो हर बेटी को अपने ससुराल जाना ही होता है।


माता-पिता का घर तो सिर्फ़ तब तक ही अपना होता है जब तक माता-पिता हैं, उसके बाद यहाँ रहने का क्या फायदा?


जहाँ अच्छे से तुम्हारे दिन बीत जाएँ (ससुराल में), वही आगे चलकर तुम्हारा असली मायका बन जाता है। यहाँ तुम अब पराई हो गई हो, तुम्हें यहाँ कौन और क्यों रोक कर रखेगा? तुम्हारा असली घर तो वही है प्यारी पोथी (बेटी), जहाँ तुम्हें ब्याह कर भेजा गया है।


वहाँ (ससुराल में) तुम्हारी अपनी 'थात' (विरासत/ज़मीन/घर) है बेटी, जिसे तुम्हें ख़ुद सँवारना और कमाना है। जा बेटी जा‌, ससुराल एक न एक दिन तो जाना ही हुआ।


तुम न आती रहोगी और फिर जाओगी भी। बेटियों को लेकर यही रीत चली आ रही है। लेकिन हमारी प्यारी बेटी आज हमें सूना (ख़ाली) करके चली गई है। इतनी लाडली बेटी का अब यहाँ सिर्फ़ मेहमान की तरह आना-जाना लगा रहेगा। रास्ते में संभलकर जाना हाँ बेटी। देखते-सुनते कहीं रास्ते में ही रात न हो जाए। आज के दिन तुम्हारे ससुराल वाले भी टकटकी लगाए तुम्हारी राह देख रहे होंगे।


सुन बेटी! आज तो विदाई के इस दुःख को दिल के भीतर ही छुपाना होगा, छाती पर पत्थर रखना होगा बेटा। जा बेटी जा‌, ससुराल एक न एक दिन तो जाना ही हुआ।


कहने-सुनने को तो बहुत कुछ था बेटी, पर अब समय नहीं बचा, फिर कभी कह लूंगा। अब क्या मुझसे मिलने तू आएगी या तुझसे मिलने मुझे ही आना होगा? मेरा जीवन तो अब पहाड़ की धार पर ढलते हुए सूरज जैसा हो गया है बेटी, न जाने कब डूब जाए। और कौन जानता है, तेरे अपने ससुराल पहुँचने से पहले ही कहीं मेरे प्राण-हंस अपने लोक को न उड़ जाएं!


कौवों का ग्रास (यानी मृत्यु और अंतिम संस्कार) तो एक दिन सबको होना ही है, यह संसार का नियम है। इसलिए इस मोह को छोड़ और जा बेटी जा, ससुराल। एक न एक दिन तो जाना ही हुआ।



मृतक का वक्तव्य (मुर्दाक् बयान)


जब तक मैं बैठने (थोड़ा और रुकने) को कह ही रहा था, तब तक ‘बाँधो-बाँधो’ (अर्थी तैयार करो) होने लगा। अभी प्राण पूरी तरह छूटे भी नहीं थे कि ‘उठाओ-उठाओ’ की आवाज़ें आने लगीं। जिस दिन को मैं 'अशुभ' या बुरा समझता था, वही दिन मेरे लिए शांत और बिल्कुल सच्चा निकला। जिसे मैं अब तक 'ससुराल' (पराया घर/संसार) समझता रहा, वही वास्तव में मेरा 'मायका' (अपना असली घर/परमधाम) निकला।


माया की जो उलझी हुई मजबूत गाँठ थी, वह आज अपने-आप ही खुल गई। दुनिया ने चाहे जितनी भी ताक़त लगाई, आख़िरकार हाथ ख़ाली के ख़ाली (मुट्ठी बंद) ही रह गए।


एक अनदेखे, अनजाने रास्ते पर मुझे ‘ले जाओ-ले जाओ’ की पुकार होने लगी। अभी प्राण पूरी तरह छूटे भी नहीं थे कि ‘उठाओ-उठाओ’ होने लगा।


जिन लोगों (या जिन चीज़ों) को मैंने जीवन भर इकट्ठा किया था, उन्होंने ही आज मुझे अपने से अलग कर दिया।


जिन्हें मैंने हमेशा घर के भीतर और दिल के क़रीब) रखा, उन्होंने ही आज मुझे सबसे पहले घर से बाहर कर दिया।


जिनको सहारा देने (या ढँकने) के लिए मैंने जीवन भर मेहनत कर-कर के अपना सिर फोड़ा, इस अंतिम विदाई की घड़ी में, उन्होंने ही मुझे सबसे अकेला और बेसहारा छोड़ दिया।


आज अपनों के ही आँगन और चौखट से ‘निकालो-निकालो’ होने लगा।


अभी प्राण पूरी तरह छूटे भी नहीं थे कि ‘उठाओ-उठाओ’ होने लगा।


जीते जी जिसने कभी पीने को पानी या छाछ का एक घूँट तक न दिया, आज मेरे मर जाने पर वह मेरे सामने दिखावे के लिए दान-सामग्री रख रहा है।


मिट्टी का एक ढेर (पार्थिव शरीर) है और उस पर नौ गज का कपड़ा (कफ़न) चढ़ाया जाता है। ज़रा देखूँ तो सही कि किसने कैसा कफ़न चढ़ाया है। दुनिया के लोग तो बस दो घड़ी या दो मुट्ठी मिट्टी देने तक साथ निभाते हैं, धुआँ देखने के लिए तो अपने माँ-बाप और सगे-संबंधी ही आते हैं।


जैसे ही बलि के बकरे की तरह शरीर से प्राण छूटे, लोग तुरंत 'चढ़ाओ-चढ़ाओ' (अर्थी पर कफ़न चढ़ाने) की जल्दी करने लगे। प्राणों को पूरी तरह छूटने का वक्त भी नहीं दिया और 'उठाओ-उठाओ' (अर्थी उठाने) का शोर मच गया।


जो लोग घर से बाहर के, दूर के नातेदार थे, वे तो दुख प्रकट करने के लिए तैयार खड़े थे। लेकिन जो लोग घर-भीतर के बहुत क़रीबी थे, वे शव को फूँकने (दाह-संस्कार करने) की तैयारी में लग गए।


जिन्हें हम 'पराया' समझते थे, वे तो अंतिम समय में मुँह में गर्म पानी (गंगाजल/तुलसी जल) डाल गए और जिन्हें हम उम्र भर 'अपना' कहते रहे, वे ही हमें मिट्टी में मिलाकर चले गए।


दुनिया की यही रीति चली आ रही है और इस रीति का चलना भी ज़रूरी है। यहाँ जीवन भर ज़िंदा रहना तय नहीं है, लेकिन एक दिन मरना बिल्कुल निश्चित और जरूरी है।


लोग कहते हैं कि दुनिया बदल गई है, लेकिन भाई! दुनिया के दस्तूर तो आज भी वही पुराने हैं। इस दुनिया से गले लगाने (सच्चा प्रेम करने) वाले तो चले गए, पर पीठ पीछे आग लगाने (बुराई करने या चिता को आग देने) वाले आज भी वहीं के वहीं मौजूद हैं।


जिसने जीवन भर अपने घर के दरवाज़े सबके लिए खुले रखे, अंत समय में उसे अर्थी के डंडों व लाठियों पर टेक दिया गया। प्राण छूटते ही 'उठाओ-उठाओ' की रट लग गई। जब तक कोई कहता कि 'ज़रा बैठो तो सही', तब तक सब विदा होकर अपने-अपने रास्ते निकल गए।


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शेरदा 'अनपढ़' (3 अक्टूबर 1933-20 मई 2012) कुमाऊँनी बोली के महान कवि हैं। वे अनपढ़ ज़रूर कहलाते रहे पर उनकी कविताएँ ख़ूब पढ़ी जाती रहीं। उनके लिखे को जब भी सुना जाता है, पहाड़ी जीवन की तकलीफ़ और यहाँ का लोक एक गीत बनकर मन में कुहुकने लगता है। 30 जनवरी 1970 को आकाशवाणी, लखनऊ से जब शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ का गीत  —'ओ परुवा बौज्यू चप्पल कि लाछा यस...' बजा तो समूचे पहाड़ और प्रवासी पहाड़ियों के लिए वे स्टार की मानिंद हो गए। 


1933 में ग्राम माल, अल्मोड़ा के एक किसान परिवार में जन्मे शेरदा ने छुटपन से ही ग़रीबी से लड़ाई लड़ी। एक मालकिन मास्टरनी ने उन्हें कामचलाऊ अक्षर बोध करा दिया था, फिर आगरा ए. एस. सी. में बॉय के जॉब से होते हुए वे दोबारा अपने गाँव माल, अल्मोड़ा लौट आए।


अब तक ख़ुद के प्रयासों से उनके तीन कविता संग्रह : 'दीदी बैणी', 'हंसणै बहार' और 'हमार मै-बाप' छप चुके थे। शेरदा इन गीतों को गाँव-गाँव जाकर, स्कूलों और मेलों में गा-गाकर सुनाने लगे। गिदार माँ से विरासत में मिली उनकी यह प्रतिभा रंग लाई और एक आंचलिक कवि, गायक के रूप में उनकी पहचान बनती चली गई। इसी से रंगकर्मी ब्रजेंद्रलाल साह ने उनका चयन गीत और नाटक प्रभाग, नैनीताल में कलाकार के तौर पर करा दिया।


शेरदा की लोकप्रियता का आलम फिर ऐसा जमता गया कि वे लखनऊ, अल्मोड़ा, रामपुर और नज़ीबाबाद आकाशवाणी केंद्रों के स्थायी कलाकार बन गए तथा शरदोत्सव समिति, नैनीताल व पिथौरागढ़ और कुमाऊँनी सांस्कृतिक परिषद, कौसानी के प्रत्येक कार्यक्रमों हेतु अनिवार्य हिस्सा भी हो गए। कुमाऊँनी कविता एवं संस्कृति के क्षेत्र में अनूठे और विशिष्ट योगदान के लिए उ. प्र. हिंदी संस्थान, लखनऊ और उत्तराखंड शोध संस्थान जैसी कई संस्थाओं ने उन्हें समय-समय पर नवाज़ा भी।


शेरदा को असल प्रसिद्धि जहाँ उनके कविता संग्रहों : 'मेरि लटि पटि' (1981), 'जांठिक  घूंघूँर' (1994) और 'फचैक' (1996) से मिली, वहीं बी. बी. सी. की लघु फिल्म ‘जिम कार्बेट ऑफ कुमाऊँ’ तथा अमेरिका की शाॅर्ट मूवी ‘इंडियन किंगडम ऑफ द टाइगर’ में उनके अभिनय से भी उनके बहुआयामी टेलेंट का पता चलता है। 2008 में संस्कृति विभाग, उत्तराखंड सरकार के सौजन्य से शेरदा की समस्त कविताओं का संकलन ‘शेरदा समग्र’ सामने आया।


मिसिरि है मिठि लागीं/ कारतिकी मौ छै तू?

पूसकि पालंग जसि/ ओ खड्यूणी को छै तू?

भ्यार बै अनारै दांणी/ भितेर बै स्यो छै तू

नौ रति बावन त्वालैकि/ ओ दाबणी को छै तू?


प्रेयसी के लिए जिन उपमानों और बिंब का प्रयोग शेरदा ने किया है, वैसी लोकशैली वाली अभिव्यक्ति सर्वथा विरल है। इसी तरह दुनियावी नश्वरता के चित्रण हेतु जैसा 'विट' उनकी कविता 'मुर्दाक बयान' में पढ़ने को मिलता है, वह भी अप्रतिम ही कहा जाएगा : 


जब तलक बैठुल कुनैछी, बट्ट्यावौ-बट्ट्यावौ है गे

पराण  लै  छुटण  निदी,  उठाऔ - उठाऔ  है  गे.

जो दिन अपैट बतूं छी,  वी मैं हूं पैट हौ

जकैं मैं सौरास बतूं छी, वी म्यौर मैत हौ

माया को मार गांठ आज, आफी-आफी खुजि पड़ौ

दुनियल  तरांण  लगै  दे, फिरलै  हाथ  हैं मुचि पड़ौ.

बेई  तक आपण आज, निकाऔ - निकाऔ है गे. ...


शेरदा ने जिस खसपर्जिया कुमाऊंनी में काव्य की रचना की है, उसमें काव्यत्व के समस्त गुण विद्यमान हैं। उनकी कविताओं को बरतने से जीवन की ऐसी दार्शनिक और मानववादी समझ पैदा होती है, जो वस्तुतः व्यवहारिक है। यूं ही नहीं उन्हें कुमाऊं का महेंद्र मिसिर कहा जाता है।


शेरदा 'अनपढ़' की सर्जना पर रमेश चंद्र शाह की टिप्पणी है कि उनकी संवेदना का पाट बहुत चौड़ा है, वास्तव में। 



कवि-अनुवादक भूपेन्द्र बिष्ट अल्मोड़ा अपने अनूठी भाषा ज्ञान से चकित करते हैं। लोक के अति महत्वपूर्ण कवि शेरदा  'अनपढ़' की कविताओं के न‌ केवल अनुवाद बल्कि उनकी कविताई पर विस्तृत जानकारी देने के लिए गोल चक्कर उनका आभारी है। पोएट्री सोसाइटी (इंडिया) प्रतियोगिता 1983 में कविता चयनित तथा 'सार्थक कविता की तलाश' संग्रह में संकलित। पंजाबी भाषा में कविताएँ अनूदित-प्रकाशित। आकाशवाणी केंद्रों से प्रसारण। एक कविता संग्रह ‘गोठ में बाघ’ (अंतिका प्रकाशन) प्रकाशित। 


गोल चक्कर पर भूपेन्द्र बिष्ट का अन्य प्रकाशित काम देखिए : भूपेन्द्र बिष्ट 





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