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गीता मलिक की कविताएँ

  • 9 hours ago
  • 4 min read


नींद


नींद अक्सर एक दुस्साहस की तरह आती है 

चीरती, मिटाती स्मृति-गंध को 

किसी आलोक तृप्ति से सराबोर


प्रेम के चरमोत्कर्ष पर लगता है 

एक संज्ञाहीन नींद 

कितनी समीप है 

मृत्यु के


दहाड़ के पीछे की नियति 

और मृत्यु के आगमन की चाह 

जीवन के कितने पास।



घर


अब वह 

किसी भूली-बिसरी याद की तरह 

नहीं आता


देह में उतरता है 

रक्तचाप में बढ़ी बेचैनी की तरह


घर 

ईंट, पत्थर, गारे का नहीं

सम्मोहन का एकल वृत्तांत है

जो धुरी में नहीं समाता।



प्रेम मिट्टी का


तुम किसी पहाड़ी संगीत की तरह लग रहे हो 

नहीं हैं आस-पास कोई वाद्ययंत्र 

तुम्हारी हँसी मेमने-सा निश्छल राग है


यह भी एक तैरता दिन है

और हम शाख़ से गिरे पत्ते


दो बजकर छियालीस मिनट का टुकड़ा

इसे अप्रैल का कोई निष्ठुर दिन न कहो


घरों में अनाज भरे जा रहे है

हवाओं में तैरती भूसे की कणी

किसान के बदन का पसीना

कष्ट नहीं देता 

देता है दुख अभी बादल का बहकना 

खेत में इतनी स्वर्ण आभा है 

यह वक़्त धमनियों में गीत बन सकता है 


आम के बाग 

उद्घाटित करते हैं ऐसे समय को 

जिसमें बौराया है प्रेम 

पर बहुत अदृश्य है


हाथ की दरांती

बदन का गमछा

मिट्टी का प्रेम…।     



शोर


कुछ शोर का बेहूदा टकराव 

भरी हुई नींद

नींद जैसी नहीं

आंक से दूर बिस्तर मयस्सर नहीं

दीवार को तोड़ती चुभती कितनी अदृश्य दीवारें 

दर्ज नहीं है कहीं खोने का रोना

दर्द विकलता नहीं अब


तूफान भी रोज़ कहाँ आते हैं 

माँ का फ़ोन भी कम, कम आता है 


और एक भाई जैसा भाई 

इसी दुनिया में खो गया है कहीं


दूर..  दूर... दूर....

इतना शोर। 



स्पंदन


वह तुम्हीं तो हो 

जिसे समय और गंध ने 

बचा लिया है 


पुष्प के मोह में प्रेम फूटता है

कितने रंग आभा में संचित 

मेरे कंठ में जम गई हैं बूंदें

वह नेह जो छलक-छलक प्रवाहन में सिक्त

गिरा है अभी-अभी 


मैं कहूँ कि वह तुम ही हो 

जो बनाते हो वसंत

जो तंबूरे के चारों तारो को 

पृथ्वी की दिशाओं की तरह 

देते हो दृष्टि

वह तुम्हीं हो 


नींद का कुल्हड़ फोड़ देता

इतनी सरलता से बहता है पानी 

प्रेम स्वयं बना लेता है जगह

मुख़्तसर-सी राह पर 

वह जो कोकिल कलरव है

वह तुम्हीं तो हो


और फिर इतनी ऊहापोह में

दिन की मारा-मारी गुज़र जाती है

निशा की परात में जो उतरता है चाँदनी जैसा 

वह तुम्हीं तो हो


जो लौटता है बार बार 

हरीतिमा बन

और पत्तियों पर बने 

शिला विन्यास को जोड़ती मध्य शिरा 

तुम्हीं तो हो


वृहद और दीर्घ श्वास में 

आरोह पर सेंकता चुम्बन 

टीस पर विरह की आंच में भी 

जल नहीं पाते स्वप्न 

मुझे बाहुपाश में समेटते 

तुम ही तो हो।



स्वप्न का खून


पलायन के अपने शोर पर 

बहुत सी फ़ब्तियाँ दर्ज होंगी

चूक जाएंगे हम जो सच कहने से 

सत्ता का ज़हनी बंटवारा

सर्वप्रथम उन्हीं ने किया 

जो सेंध मारते है इंसान की खाल में


दरारें पड़ गई हैं अब

मजहब की चाल में


ठक ठक ठक

कितनी आवाज़ें हैं 


भाषा भ्रम तोड़ती है

निशीथ में उल्लू की आँख-सी

पूछती…

वसंत में जब पूरी धरती 

घूमती है प्रफुल्लित 

कैसे देखती होंगी आँखें

किसी पत्ते पर रक्ताभ शोणित क्षत-विक्षत


शून्य हमारी खोज नहीं करता

हम ही भागते हैं उसके पीछे


न ही दु:स्वप्न पुकारते है 

देखो तीसरी आँख से

 

जीवन क्या है? 

क्या मात्र इतना कि 

सनी रहे स्वप्न के ख़ून से

वे तमाम हत्याएँ

जिनके कारणों की शिनाख़्त

नदारद रही

कौनसा वर्ग

कौनसी जातियाँ

और कौनसे धर्म की बात उठाते हो 

कौनसी लड़ाइयाँ हैं

जिनकी तह मनुष्यता से ऊँची है 


एक स्मृति में ईश्वर अंधा है

एक में बहरा 

और एक की स्मृति में गूंगा

एक स्मृति पानी के पास पड़ी है 

डब-डब करती हुई

ठसाठस भरे इस अँधेरे बंद कमरे में

एक पुराना संदूक

कुछ पुरानी फ़ाइलें, कुछ किताबें 

एक एलबम भी जहाँ पिता का स्पर्श ठहरा है 

माँ की तवज्जो और रख-रखाव में एक भारी ताला 


मेरी माँ समझती है 

पुरानी चीज़ों का संचयन 

वर्तमान में तैरती हुई सुनहरी मछली बन जाता है

भले ही पानी का स्वाद खारा हो 

कितनी ख़ाली जगह है 

कितने सारे खारे पानी से भरी हुई 


दुनिया के तमाम समुद्र 

सुनहरी मछलियों के घर हैं

फिर 

धरती पर वसंत के दौर में

इतनी लाशें...



आवाज़


जबकि दुनिया एक फूलों की घाटी है

फूलों के बीच सिर्फ़ फूल नहीं होते 

गंध खाद मिट्टी  

पतझड वसंत

कभी-कभी लाशें और बंदूक 


मिलेंगे जलपरी बने लिजलिजे धड़

टेढ़े-मेढ़े जो चलते थे

उसी बगीचे में वायलिन और पियानो में क़ैद 


शोक का गहराता संगीत

गोल अंगूठी जैसा रोंदो

कालबेलिया घूमर या पोलोनेज़


एक नदी के किनारे वाली घाटी 

जो सहूलियत देती 

फूल को फूल बने रहने में 

लाश को लाश बने रहने में 

और दुःख को संगीत बन बह जाने में


कुदरत की आवाज़ों में

सबसे गहरी सदा

गिरते बहते झरने में

नीरव घाटी में

एकांत में खिले

उपेक्षित फूल में

और मिट्टी बनी मृत खाल में!


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गीता मलिक का एक कविता संग्रह ‘मूलतः मुझमें एक प्रच्छन्न दावानल भी है’ सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हो चुका है।


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