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पैमाना सिर्फ़ एक है कि लिखाई अच्छी होनी चाहिए

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पैमाना सिर्फ़ एक है कि लिखाई अच्छी होनी चाहिए
(प्रियंका दुबे से संतोष अर्श के दस सवाल)

कवि-गद्यकार प्रियंका दुबे लम्बे समय तक बीबीसी से जुड़ी पत्रकार रही हैं। उनकी पुस्तक 'नो नेशन फ़ॉर विमेन ' चर्चित रही है। कविताओं में रसानुभव रचने वाली प्रियंका रचनात्मक उद्विग्नताओं की ख़ूबसूरती से भी घिरी हुई रहती हैं। उनकी पाठकीय दृष्टि में विश्व की महान रचनाएँ हैं और फ़िक्शन उनकी रुचि का प्रमुख क्षेत्र है।


इन दस सवालों के उत्तरों में उन्होंने अपने निजी जीवन की कई परतें खोली हैं। स्त्री-विमर्श, फ़िक्शन और लेखन-प्रक्रिया पर उनके विचार गंभीर, विचारोत्तेजक और आत्मीय हैं। उनके उत्तर उनके व्यापक अध्ययन, गहरे अध्यवसाय और रचनात्मक दृष्टि का परिचय देते हैं।


~संतोष अर्श



1. “भारत वह भूमि है जहाँ स्त्रियों की स्थिति 'ब्लैक होल' जैसी है।” यह उद्धरण मैंने आपकी पुस्तक 'No Nation For Women' से लिया है। आपके जीवन में भी कोई 'ब्लैक होल' है?


‘ब्लैक होल’ के साथ-साथ तमाम आकाशगंगाओं और हमारे पूरे ब्रह्मांड से मेरा जिज्ञासा और प्रेम का पुराना संबंध रहा है। निश्चय ही मेरे अपने जीवन में भी ‘ब्लैक होल्स’ रहे हैं, मेरे अपने अतीत के कई ऐसे अंधेरे हिस्से जहाँ किसी क़िस्म की रौशनी पहुँच नहीं पाती। अपने उन निजी अंधेरों को मैं उपन्यास विधा में तो बरत सकती हूँ, लेकिन यहाँ आपको बताने में आत्मदया की सीमारेखा तक घिसट आने का ख़तरा है। ‘दिल में रखने की बात है ग़म-ए-इश्क़ इस को हरगिज़ न बरमला कहिए’, अपने प्रिय शायर दाग़ की यह बात बचपन से याद रखने वाली मैं एक ख़ुदमुख़्तार इंसान रही हूँ। इसलिए अपने ‘ब्लैक होल्स’ के बारे में सीधे-सीधे बात करना मेरे लिए शर्म का बायस (भी) है। फिर भी, ऊपर-ऊपर से कहूँ तो इतना कहूँगी कि मैंने बचपन से अपनी ज़िंदगी में बेइंतहा दुःख उठाए हैं। मेरी एक बड़ी बहन थी जो चल-फिर नहीं सकती थी। भाषा और साफ़ ज़ुबान भी उसे मयस्सर न थी। वह तेरह-चौदह बरस की उम्र जीकर इस दुनिया से चली गई। मैंने निक्कर और छोटी फ्रॉक पहनने के दिनों वाले अपने कोमल बचपन में उसकी मृत्यु को अपनी आँखों के सामने घटित होते हुए देख लिया। जब तक वह जीवित थी, तब तक हम दोनों एक साथ ही सोते थे, एक बिस्तर पर। वह बिस्तर गीला करती थी, इसलिए अपने पूरे बचपन में उसके साथ पॉलीथीन की परत के ऊपर बिछायी गई मोटी लेवनी पर सोती रही। उससे मुझे इतना गहरा प्रेम था कि मुझे आज भी लगता है कि मैं जब भी किसी को प्यार करती हूँ तो उसी को किया हुआ प्यार दोहरा रही होती हूँ। उसकी मृत्यु, उसकी लाश को देखने और उसकी अंतिम क्रिया का साक्षी बनने ने मुझे बचपन में ही बर्बाद कर दिया था। मैं तब दस वर्ष की भी नहीं थी, लेकिन मुझे उसके जाने का दिन लम्हा-ब-लम्हा याद है। उसके मरने के बाद अकेले कमरों से उठने वाला अपनी माँ की आत्मा कँपा देने वाला विलाप, मैं कुछ भी नहीं भूल पाई हूँ। मेरे माता-पिता ने और ख़ासकर मैंने उसे इतना चाहा, फिर भी हम उसे मरने से बचा नहीं पाए। उसके बाद जीवन में बहुत से दु:ख आए। एक से बढ़कर एक क्रूर नर्क देखे मैंने और हर बार यही सोचा कि बचपन में ही तैयारी हो गई थी मेरी। दुःख सहने की तैयारी। जिस बच्चे को बचपन में ही इतना गहरा घाव मिल जाए कि उसका सबसे प्यारा इंसान, जिसको वह दिन-रात चूमता हो, जिससे गहरा प्रेम करता हो, वह उसके ठीक सामने मर जाए, तो वह बच्चा फिर बच्चा नहीं रहता। मेरा उपन्यास, जिस पर मैं धीरे-धीरे ही सही, काम कर रही हूँ, वह मेरी बहन की वजह से ही संभव हो पा रहा है। उसके जाने के बाद भी दु:खों ने कभी मेरा पीछा नहीं छोड़ा, लेकिन उसके जाने के आगे अब किस दुःख का ज़िक्र करूँ? सुख भी आया जीवन में। पर मेरी ज़िंदगी इस लिहाज़ से बेहद इंटेंस रही कि जितना सुख आया, उससे कई गुना ज़्यादा दुःख किसी त्रासदी की तरह जैसे हमेशा चिपका रहा मुझसे। मैं स्वभाव से भी शायद इसलिए कुछ उदास मनुष्य हूँ, क्योंकि इतने दुःख जीने के बाद भी मैं दुःखों की आदी नहीं हो पाई हूँ।


उस पर काम भी मेरा बेहद दुःखी करने वाला ही रहा, गोया अपने कम थे जो दूसरों के भी दुःख ढूँढ-ढूँढ के लिखने लगी। छोटी उम्र से ही मैं काम करने लगी थी। यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी होने से पहले ही मेरी पहली नौकरी लग चुकी थी, एक अंग्रेज़ी अख़बार (हिंदुस्तान टाइम्स) में। हालाँकि यूनिवर्सिटी के दौरान भी मैंने लगातार अख़बारों और रेडियो में गंभीरता से काम किया ही था, जिसके मुझे थोड़े ही सही, पैसे भी मिलते थे। हिंदुस्तान टाइम्स वाली इस पहली पूरी तनख़्वाह वाली नौकरी में आने के दो महीने के भीतर ही मुझे ‛तहलका’ पत्रिका में बतौर मध्यप्रदेश संवाददाता काम मिल गया था। अपनी बहन की मृत्यु देखने और फिर दो छोटे भाइयों को लगभग बड़ा करने की वजह से मेरे भीतर बचपन से ही बच्चों, स्त्रियों और शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम (differently abled) लोगों के प्रति गहरी फ़िक्र और करुणा रही। अपने आस-पास स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव और हिंसा को भी मैंने बचपन से ही बेहद गहराई से अपने ज़ेहन में दर्ज किया। शायद यही वजह होगी जो मैंने गुमशुदा बच्चों, महिलाओं व बच्चों की तस्करी, सामाजिक न्याय और हिंसा पर लंबा काम किया। फिर जातिगत हिंसा, बलात्कार, नाबालिग अपराधियों (जूविनाइल इन कॉन्फ़लिक्ट विद् लॉ), विकास की राजनीति, सामाजिक न्याय और स्वास्थ जैसे विषयों पर भी लगातार लंबा काम संभव हुआ। तब एकदम रंगरूट रिपोर्टर ही थी। सोचिए, कोई इक्कीस-बाईस बरस का युवा, जिसका दिल पहली बार दुनिया के सामने कुछ इस तरह लहूलुहान हो रहा हो, वह कितने गहरे अवसाद में आ जाएगा!? शुरू-शुरू मैं हर रिपोर्ट के दौरान फील्ड पर सिसकने लगती थी। बड़ी मुश्किल से ख़ुद को संभला। संभालना पड़ा इसलिए कि साथ आए ड्राइवर साहब या टीम के बाक़ी सदस्य मुझे एक कमज़ोर लड़की न मानने लगें। कमज़ोर तो मैं बहुत हूँ, बस दुनिया के सामने बहादुर बने रहना पड़ता है, क्योंकि यह देश एक लड़की को सार्वजनिक रूप से कमज़ोर होने की अनुमति नहीं देता। यदि वह हुई तो उसकी प्रोफेशनल क्षमता पर सवाल उठाया जाएगा, उसका मज़ाक़ उड़ाया जाएगा और उसका फ़ायदा उठाने की कोशिश की जाएगी। यह एक (स्त्री) रिपोर्टर के रूप में मेरे अकेलेपन की शुरुआत थी। इसके बाद मैंने अकेले बंद कमरों में रोना शुरू किया। दुःख का कोई अथाह समंदर था जो ख़त्म ही नहीं होता था।


मैं कभी भी अपनी रिपोर्टिंग और उससे मिलने वाले दुःख के साथ एक सामान्य रिश्ता नहीं बना पाई। यहाँ भी, आदी नहीं हो पाई मैं दुःख की। जिसे ‘by-line hardened journalist’ कहते हैं, ऐसे रिपोर्टर जिनमें समय के साथ कठोरता आ जाती है और फिर उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता―मृत्यु, तबाही, कुछ भी देखने-लिखने से, वह मैं कभी नहीं बन पाई। दस साल बाद भी वैसे ही घबराहट से मेरे पेट में करछुल घूमती, पहले दिन की तरह कलेजा मुँह में रहता, चेहरे पर इतना तनाव कि बस जैसे किसी तरह आँसू रोक कर काम कर रही हूँ। मेरी एम्पैथी मेरी ताक़त है, मगर मुझे मिला सबसे बड़ा श्राप भी। इस एम्पैथी की वजह से मैं लगातार घायल होती रही हूँ। कभी सब्जेक्ट से दूर नहीं कर पायी ख़ुद को। दूर खड़े होकर नहीं लिख पाई, न ही रिपोर्ट कर पाई। ‘नो नेशन फॉर वीमेन’ मेरे अनगिनत आँसुओं, बेतहाशा घबराहट और तकलीफ़ की क़ीमत पर बनी किताब है। और यह किताब मेरी प्रकाशित रिपोर्टिंग का कुल दस प्रतिशत भी नहीं। पूरी रिपोर्टिंग का ट्रॉमा तो बेहिसाब रहा है।


ये इतने सारे ब्लैकहोल्स लगातार ऐसे बनते रहे जीवन में कि जब भी सुख आता तो मुझे यक़ीन न होता। कोई जुनून था जैसे, पागलपन कोई, जिसके वशीभूत मैं दिन-रात सिर्फ़ फिरा करती थी गाँव-गाँव, शहर-शहर।


रिपोर्टिंग के दौरान मुझे बरसों तक हर साल ‘हीट स्ट्रोक’ होता रहा, जैसे पचास डिग्री में एनआरसी के मुद्दे पर असम के गाँवों में रिपोर्टिंग करते हुए धूप में उल्टियाँ करती थी। हर दूसरे हफ़्ते बुख़ार रहता, इतनी भूखी फिरती रही सालों तक और दिन-दिन भर होश भी नहीं रहता था कि भूखी भी हूँ। काम का स्वभाव ही ऐसा था। आप उसके साथ बैठे हो जिसकी बच्चियाँ यौन शोषण के बाद आम के पेड़ों से लटकी हुई मिलीं हैं। कहाँ से याद रहेगी भूख? जन्म देने वाला परिवार पहले ही लगभग बिसरा सा चुका था मुझे। जीवन में न सिगरेट थी, न शराब, न चाय, न ज़्यादा कोई दोस्त-यार, न घर, न कोई दिवाली-होली की छुट्टी। यह सब एक तरफ़ जहाँ मेरे काम का हिस्सा था, वहीं दूसरी ओर मेरे जुनून का नतीजा भी। सिर्फ़ कहानियाँ थीं। ऑडियो टेप्स में बंद आवाज़ें थीं, काग़ज़ों के पहाड़ थे, होटलों के अकेले कमरे, दिल्ली का मेरा छोटा और बेहद बेघर सा कमरा, हर जगह कीबोर्ड पर लगातार उँगलियाँ पटकती मैं और मेरे फ़ोन में दर्ज पाँच हज़ार फ़ोन नम्बर, जिनमें से पाँच भी मेरे ‛अपनों’ के न थे।



2. “बलात्कार सत्ता का प्रदर्शन है”―क्या आप इसे आज के भारतीय परिदृश्य में और स्पष्ट करेंगी?


इस एक वाक्य को स्पष्ट करने के लिए मुझे 270 पन्ने की एक पूरी किताब लिखनी पड़ी है। बलात्कार निश्चय ही सत्ता का प्रदर्शन है, लेकिन भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में यह अलग-अलग स्वरूपों में सामने आता है। कभी राजनीतिक सत्ता दिखाने के लिए, कभी जातिगत-सत्ता दिखाने के लिए, कभी क्षेत्रीय-सत्ता दिखाने के लिए, कभी बच्चों पर होने वाली यौन हिंसा के रूप में तो कभी पुलिस और सुरक्षा बल जैसे सरकारी महकमों में काम करने वाले लोगों द्वारा आम नागरिकों पर शक्ति प्रदर्शन के लिए स्त्रियों के ऊपर यौनिक हिंसा की जाती रही है। अधिकतर मामलों में इन यौन अपराधों के पीछे एक साझा धागा होता है और वह धागा है―पितृसत्ता। यह विचार कि यदि लड़की ने फ़लाँ-फ़लाँ कपड़े पहने हैं या वह फ़लाँ बजे घर से बाहर घूम रही है या यदि उसका कोई बॉयफ़्रेंड है तो वह उपलब्ध है, वह हिंसा डिज़र्व करती है, उसके साथ तो यह होना ही था। अनंत काल से चली आ रही वही पुरानी पीड़ित को दोष देने की निकृष्ट दक्षिण एशियाई प्रवृत्ति जो इतने सालों बाद भी मेरा दिल तोड़ देती है। उन्हीं पर हो रहे अपराधों के लिए औरतों को ही दोष देने का यह सिलसिला इतना पुराना है और अब भी हमारे पितृसत्तात्मक समाज की जड़ों में इस कदर जड़े जमाए बैठा हुआ है कि मुझे हमेशा लगता है कि स्त्री मुद्दों के हवाले से हमारे समाज की स्थिति इतनी गई-बीती है कि हम निगेटिव में चल रहे है। अभी शून्य तक पहुँचने के लिए भी हमें लंबी यात्रा तय करनी होगी।



3. क्या सभ्यता में 'प्रेम' और 'न्याय' जैसी वस्तुएँ होती हैं?


कम-अज़-कम अवधारणात्मक रूप से देखा जाए तो आदर्श यही है कि सभ्यता में ‘प्रेम’ और ‘न्याय’ दोनों हों। यह अलग बात है कि इन दोनों ही तत्त्वों का फलना-फूलना और बढ़ना आज हमारी सभ्यता में दुर्लभ है। मेरी दृष्टि में लेखक की एक भूमिका आज समाज में इन मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए प्रयासरत होने की भी है। साथ ही यहाँ यह दोहराना ज़रूरी है कि लेखक की सबसे महत्त्वपूर्ण और प्राथमिक ज़िम्मेदारी अच्छा लिखना है।



4. बचपन कैसा रहा? कभी यौन-उत्पीड़न या भेदभाव का सामना करना पड़ा ?


बचपन सख़्त रूढ़िवादी निम्न-मध्यवर्गीय परिवार में गुज़रा। माँ को अक्षर सीखने का अवसर नहीं मिला था, लेकिन पिता ने सरकारी स्कूल की अपनी पढ़ाई बड़ी मुश्किलों से किसी तरह पूरी की थी। दूध बेचकर, ट्यूशन पढ़ाकर और भी तरह-तरह के काम करते हुए उन्होंने स्कूल पूरा किया। स्कूल के बाद आगे पढ़ने का उनको मौक़ा नहीं मिला। ग़रीबी थी, मगर पिता जुझारू थे और दिन भर, जो मिल सकी थी वह छोटी सी नौकरी कर, शाम को दस किलोमीटर साइकिल चलाकर एक सरकारी कॉलेज में डिप्लोमा की पढ़ाई पढ़ने जाते। फ़ीस इत्यादि का इंतज़ाम तो नवीं-दसवीं से वे ख़ुद ही कमाकर करते रहे थे। उस समय उनके डिप्लोमा पढ़ने पर मेरे दादा-दादी अधिक प्रसन्न नहीं होते थे। वे चाहते थे कि फ़ीस इत्यादि में नौकरी का कमाया पैसा ज़ाया न हो और उन्हें ही दे दिया जाए। ग़रीबी इतनी थी कि पढ़ने को शुरू से ही हमारे घर में फ़िज़ूल माना जाता था―पैसे और समय की बर्बादी। ग़रीबी से उपजने वाली तल्ख़ी भी परिवार में थी, पर मेरे पिता ने किसी तरह डिप्लोमा पूरा किया और फिर उस छोटी सी डिग्री के आधार पर एक ज़रा बेहतर नौकरी उनकी लग पाई―जिसकी बदौलत मुझे और मेरे दो छोटे भाइयों को पढ़ना-लिखना नसीब हुआ। पिता ने आगे भी जीवन भर लगातार नौकरी करते हुए जितनी हो सकी उतनी पढ़ाई की, परीक्षाएँ दीं और रिटायर होने के वक़्त इंजीनियर की रैंक तक पहुँचे।


बचपन की स्मृति मेरी बड़ी बहन को गोद में लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भागते हुए अपने माँ-बाप की स्मृति है। ऐसा कोई पत्थर नहीं होगा जिसे मेरी माँ ने मेरी बहन के लिए प्रार्थना करते हुए नहीं पूजा हो। कोई मंदिर, कोई दरगाह नहीं होगी जहाँ वह नहीं गई हों। मेरे माँ-बाप की जवानी और मेरा बचपन मेरी बहन ही थी। उसको नहलाते, कौर खिलाते, उसकी पेशाब-टट्टी साफ़ करते, उसके पैरों की मालिश करते, साफ़ कपड़े पहनाते, उसे फिज़ियोथेरेपी के लिए दूर-दूर तक ले जाते मेरे माँ-बाप। मुश्किलें और तंगी तमाम थीं, लेकिन माँ-बाप थे तो सर पे छाया थी। बड़ी बहन से कुछ क्षण बचाकर बीच-बीच में माँ मुझे भी हाथों में लेतीं, दुलारती थीं। अब लगता है कि उसी दो बूँद दुलार की वजह से ज़िंदा रह पाई हूँ। करुणा का बीज मुझमें यहीं से आया। मैंने अपने माँ-बाप को कभी अपनी बहन पर खीझते, ग़ुस्सा होते या उसे कोसते नहीं देखा―यह कहते हुए कि एक तो पास रुपया नहीं है उस पर यह ‛विकलांग’ बच्चा उनकी जवानी के सबसे सुंदर वर्ष सोख गया―कभी नहीं! वे उसे लगातार सिर्फ़ और सिर्फ़ प्यार करते रहते थे, किसी प्रार्थना की तरह। वे कुछ भी करके बस उसे ज़िंदा रखना चाहते थे। जितने भी थोड़े-बहुत उनसे संभव हो पाते, वह सारे जोड़े हुए पैसे लगाकर उसे मद्रास-दिल्ली-बंबई सब जगह बड़े डॉक्टरों को दिखाने ले जाया जाता। भटकते ही रहते उसे लिए-लिए दोनों। उन्हीं को देख-देख मैंने भी उसे प्यार करना सीखा। चार-पाँच बरस की मैं अपनी दीदी के बालों में फूल लगाती, चम्मच से उसे पानी पिलाती, उसे चूमती और गले लगाती। बिना शर्त प्यार का वह मेरा पहला पाठ था। ख़ैर, सब करके भी हम उसे जाने से नहीं रोक पाए।


अपने माता-पिता से मेरा संबंध जटिल हुआ, मेरे सोलह-सत्रह वर्ष का होने के बाद। स्त्रियों में मैं अपने घर की ‛first generation female learner’ रही और माँ-बाप के साथ मेरा बीस-पच्चीस की वय तक का समय बेहद मुश्किल बीता। यह वह समय था जब परिवार का रूढ़िवाद और पितृसत्तात्मक स्वरूप मेरे सामने स्पष्ट हुआ। इस बारे में पूरी तरह लिखना मेरे लिए गहरे मानसिक कष्ट का बायस है, लेकिन यदि सिर्फ़ तिनका भर बताऊँ तो कहूँगी कि वे कभी नहीं चाहते थे कि मैं पत्रकार बनूँ, क्योंकि यह पेशा, तब उनके अनुसार किसी भी ‛इज़्ज़तदार’ घर की लड़की को शोभा नहीं देता था। रात-दिन की यात्राएँ और कचहरी-थाने जैसी जगहों तक लड़कियों का फिरना उनके लिए कल्पना से परे था। रिश्तेदारों ने भी उलाहना देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह मेरे जीवन का बेहद कष्टप्रद पक्ष है जिसे दर्ज करना मेरे लिए आज भी आज़माइश ही है, क्योंकि मैं अपने माँ-पिता से गहरा प्रेम भी करती हूँ। अब वे बहुत बूढ़े हो चुके हैं और मेरे मन में उनके प्रति सिर्फ़ परवाह और उन्हें सुरक्षित देखने-रखने की भावना है। ख़ैर, आगे तमाम निजी विद्रोहों के बाद मैं पत्रकार हो पाई और बीस वर्ष की उम्र से तो मैंने बतौर पत्रकार लिखने-पढ़ने से अपने पैसे कमाने भी शुरू कर दिए थे। मेहनती और जुनूनी बहुत रही। यूनिवर्सिटी की परीक्षा में अव्वल रही, ग्रेजुएशन में सिल्वर मेडलिस्ट रही और फिर आगे अपने पेशे में भी दुनियावी दृष्टि से जिसे हम ‛सफलता’ कहते हैं―वह बेशुमार मिली। दर्जन भर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, अंतरराष्ट्रीय फ़ेलोशिप, रेसीडेंसी, ग्रांट इत्यादि। पासपोर्ट बनवाकर वज़ीफ़े पर बाहर पढ़ने-सीखने जाने या पुरस्कार लेने जाने वाली अपने घर की पहली व्यक्ति। धीरे-धीरे हुआ यह कि जब मेरे शहर भोपाल के अख़बारों में इन पुरस्कारों की ख़बर और मेरे फ़ोटो छपते तो बाबूजी (मेरे पिता) अख़बार संभाल के रखने लगे। इतने सारे ‛अच्छे अंकों, मेडलों और पुरस्कारों आदि’ से शायद कहीं मैंने अपने पिता का मन बदल दिया था। लेकिन मेरे लिए इस दुनियावी ‛सफलता’ का अर्थ सिर्फ़ इतना ही था कि मैं अपने माँ-पिता को यह साबित कर पाई कि मेरा अस्तित्त्व और मेरी रिपोर्टिंग उनकी बदनामी करवाने वाला कोई ऐसा बोझ नहीं है जिसे फेंक दिया जाना चाहिए। उत्पीड़न जैसा कुछ मेरे साथ कभी नहीं हुआ। लेकिन दु:ख बचपन से इतने देखे और जिए कि ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?’ सोलह-सत्रह में ही प्रिय गीत बन गया। मृत्यु और गाढ़े शोक का साक्षी मुझे इतनी शुरुआत से होना पड़ा, और लगातार साल-दर-साल होते ही रहना पड़ा कि इस बीच कहीं मेरा mutation हो गया था। ब्लैक होल्स की छायाएँ अब भी पीछा नहीं छोड़ती। यदि मुझे फ़िक्शन और कविता का साथ समय पर न मिला होता तो शायद मैं अब तक ज़िंदा भी न बच पाती। मैं फ़िक्शन की तरफ़ मुड़ी ही इसलिए थी, क्योंकि फ़िक्शन ने मुझे बचा लिया था। मेरे बचपन में किताबें और किताबों की कोई विरासत या कोई संस्कार या संस्कृति नहीं थी। उन्हें मैंने बड़ी मेहनत से, कम कपड़े पहनकर, कम खाकर, सारी कमाई और समय लगाकर―अपने लिए अर्जित किया है। इसलिए मैं किताबों तक थोड़ी देर से पहुँची। लेकिन पहुँच पाई और शायद इसलिए आज यह जवाब लिखने को ज़िंदा हूँ। क्योंकि मार्जाने सत्रापी की मृत्यु पर आए उनके परिवार के वक्तव्य के बहुत पहले से मेरा मानना रहा है कि अत्यधिक दुःख से इंसान मर सकता है। जिनकी महसूसने की क्षमता या एम्पैथी उनका वरदान और श्राप दोनों हो, वे तो मर ही सकते हैं।



5. आपकी दृष्टि में आख्यान (फ़िक्शन) क्या है?


यह महत्त्वपूर्ण सवाल है और इसका जवाब कई तरीक़ों से दिया जा सकता है। फ़िक्शन यूँ तो बहुत समावेशी माध्यम है, इतना समावेशी कि अपने लिए बनाए गए तमाम नियमों को तोड़कर अपने साथ तमाम प्रयोग करने की अनुमति भी यह ख़ुद ही देता है। इसलिए कला में मैं एक ही नियम मानती हूँ कि कोई कड़ा नियम नहीं है। यहाँ हर तरह के नियम तोड़े गए हैं और इस तरह फ़िक्शन में हुए तमाम प्रयोगों का भरा पूरा इतिहास हमारे सामने हैं। ‛टिरिनी ऑफ़ प्लॉट’ की अवधारणा को भी उपन्यास की दुनिया में आए युग बीत चुका है। तो अब आप प्लॉट के साथ लिखिए, बिना प्लॉट के लिखिए, जॉर्ज पेरेक की तरह वर्णमाला के किसी एक ख़ास अक्षर के इस्तेमाल के बिना पूरी किताब लिखिए, लीडिया डेविस की तरह एक-एक पंक्ति और एक-एक पैराग्राफ जितनी छोटी कहानियाँ लिखकर बुकर पाइए, एनी अर्नों की तरह अपने जिए को ऑटो-फ़िक्शन के रूप में दर्ज कर नोबेल पाइए, अम्बर्टो इको की तरह लाइब्रेरी और शोध पर भारी तरह से निर्भर किताबें लिखिए या जैसे जी आए वैसे लिखिए, उदाहरण इतने हैं कि दर्जनों पन्ने कम पड़ जाएँगे। मुराद कुल यह है कि गद्य की विधा बहुत पुरानी है और 2026 तक बहुत लंबी यात्रा तय चुकी है।


यहाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि भाषा, फॉर्म और कथ्य के स्तर पर हमारे पुरखे बहुत बेहतर किताबें हमें दे चुके हैं। इसलिए मेरी दृष्टि में पैमाना सिर्फ़ एक है कि लिखाई अच्छी होनी चाहिए। फिर आप फॉर्म के साथ खेलिए, भाषा के साथ खेलिए या विचारधारा के आधीन होकर लिखिए, किताब ऊँचे पाए की बनेगी तो अपने आप अपनी जगह बना लेगी। उदाहरण के लिए ‘Beloved’ मेरा बहुत प्रिय उपन्यास है जिसका पाठ कई बार प्रगतिशील विचारधारा वाले उपन्यास के तौर पर किया जाता है। मेरा कहना है कि ‘Beloved’ महज़ इसलिए महान पुस्तक नहीं है, क्योंकि वह प्रगीतिशील विचारधारा से संबंधित है। वह इसलिए महान है, क्योंकि वह किसी भी एक विचारधारा से बहुत अधिक है। वह पन्नों पर अपना विराट संसार खड़ा कर पाती है, संसार जिसमें हर तरह के वैचारिक और मानवीय पक्ष अपना स्थान पा सकते हैं, पाते हैं। साथ ही उस उपन्यास में विकट कल्पना शक्ति है, ग़ज़ब का मार्मिक बयानिया है और वह (उपन्यास) हर दृष्टि से ख़ुद में एक धड़कते ज़िंदा संसार को धारण करता है। टोनी मोरिसन के पास अपना एक विज़न है और अपनी सिग्नेचर भाषा है―जो कि मैं समझती हूँ कि हर उपन्यासकार के पास होनी ही चाहिए।


अपना सिग्नेचर विज़न (दृष्टि) और अपनी सिग्नेचर भाषा : मेरे लिए ये दो बेहद महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं फ़िक्शन के। अगर ये नहीं हैं तो कुछ और तैयार हो सकता है, उपन्यास तो नहीं ही हो सकता।


मैं (सिर्फ़) अख़बारों और टीवी न्यूज़ मीडिया की ख़बरों―और ख़बरों में रहने वाले विषयों के आधार पर बने उपन्यासों को आम तौर पर बहुत ख़राब उपन्यास मानती हूँ। इसका एक कारण यह भी है कि मैं ख़ुद खबरों की दुनिया में धँसी रही हूँ और हमारे यहाँ (पत्रकारिता में) इन विषयों पर बहुत बेहतर काम होता है। 18-20 हज़ार शब्दों के ड्राफ्ट तो मैंने ख़ुद की दर्जनों रिपोर्टों के बनाए हैं। यह मेहनत का काम है और इसका अपना क्राफ्ट है। पत्रकारिता के इस अप्रोप्रीयशन के तहत हिन्दी के उपन्यासकार इन रिपोर्टों और अख़बारी क़तरनों को उठाकर सिर्फ़ नाम बदल देते हैं और थोड़ा-बहुत कुछ जोड़-जाड़ के पाठकों के सामने रख देते हैं―वह भी लंबी कहानियों को उपन्यास के नाम से परोसते हुए। जिस विधा में युद्ध, अन्याय और हिंसा पर लिखने वाले इमरे कर्तीश, टोलस्टॉय और स्टाइनबेक जैसे लोग हुए, उस विधा में आप इतना उथला काम प्रस्तुत करें और चाहें कि उसे स्वीकार्यता सिर्फ़ इसलिए मिल जाए क्योंकि वह किसी एक राजनीतिक कैम्प से जुड़ा लेखन है तो यह ज़्यादती ही है। बात वही है कि आप कुछ भी लिखें, लिखाई अच्छी और गहरी होनी चाहिए। ऊपर मैंने Beloved का उदाहरण इसी संदर्भ में दिया था। यदि ‘वॉर एंड पीस’ को छोड़ भी दें तब भी युद्ध के ख़िलाफ़ लिखे बेहतर उपन्यासों में ‘स्लॉटर हाउस फाइव’ जैसी महान किताबें शामिल हैं। लेकिन हम क्या करते हैं? कोरोना हुआ या इज़राइल-फ़िलिस्तीन हुआ, कुछ भी जो ख़बरों में चल रहा है, उस पर बेहद कमज़ोर और लचर क़िस्म की चीज़ें (कविता हो या गद्य) तुरंत प्रकाशित करवा देते हैं। कोरोना पर भी इतने ख़राब उपन्यास आए जो कि असल में कोरोना पर हुई रिपोर्टिंग से भी बुरे थे। हम यह भी नहीं सोचते कि ये घटनाएँ जिन पर हम उपन्यास आदि लिख रहे हैं, उनका लाइव टेलीकास्ट हुआ है। लोगों ने इन घटनाओं के विज़ुअल्स लाइव देखें हैं। आप कुछ तो सोचिए कि आप अपनी किताब में संबंधित विषय पर हुई रिपोर्टिंग और लिखी गई तमाम नॉन्फ़िक्शन किताबों से आगे क्या जोड़ रहे हैं?


फ़िक्शन को महान कला इसलिए माना जाता है, क्योंकि वह पत्रकारिता, डाक्यूमेंट्री और नॉन-फ़िक्शन से आगे की चीज़ है। इसलिए यह सबसे बड़ा स्वप्न है जिसे पाने की ललक हर लिखने वाले के दिल में रहती है। अच्छे फ़िक्शन की शेल्फ लाइफ़ ज़्यादा होती है। प्रकाशन के सौ वर्ष बाद भी वह औचित्यहीन नहीं होता।


अच्छे फ़िक्शन का एक और गुण यह भी है कि अमूमन उसे एक पंक्ति में समझाया नहीं जा सकता। मसलन हम ‘स्नो’ या ‘माय नेम इज़ रेड’ के बारे में एक पंक्ति में नहीं कह सकते कि यह किताब फ़लाँ-फ़लाँ विषय पर है। क्योंकि इन किताबों में परतें हैं, नुआँस है, विरोधाभास है और कई विचार प्रक्रिया के कई सारे कोणों को ये किताबें ख़ुद में धारण करती हैं। जिन उपन्यासों को एक पंक्ति में समझाया जा सके―मसलन, फ़लाँ उपन्यास कोरोना की महामारी के बारे में है या दूसरा भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं पर है―ऐसे उपन्यासों को मैं कमज़ोर फ़िक्शन मानती हूँ। मैं यह जो―‛बारे में है’ वाले उपन्यास हैं, उनके बारे में पढ़कर ही उदास ही जाती हूँ, क्योंकि अक्सर उनका परिचय किसी अच्छे रिपोर्टर की रिपोर्ट से भी कमज़ोर होता है।


उपन्यास का फॉर्म एक विराट फॉर्म है। नागरिक चिंताएँ और स्त्रीवाद जैसे तमाम वाद उसके विशाल फ़लक का एक महत्त्वपूर्ण, मगर छोटा हिस्सा हैं। एक अच्छा उपन्यास जब अपनी पूरी ताक़त में खड़ा हो दुनिया को संबोधित करता है, तब वह ख़ुद में सामाजिक न्याय से जुड़ी तमाम नागरिक चिंताओं, उन चिंताओं का विलोम, तमाम विचारधाराएँ और उन विचारधाराओं का विलोम, प्रेम, हिंसा, भीड़, एकांत, आंतरिक यात्रा, बाहरी यात्रा और संसार में बचा हुआ वह सब कुछ भी जो मूलतः विरोधाभासी है, उसे आराम से अपने में धारण कर सकता है। इसके बाद भी उपन्यास में जगह होगी―वह ‘और कुछ’ हो जाने के लिए जो आप उसे बनाना चाहते हैं।


अच्छा फ़िक्शन हमें अधिक मानवीय और कम कट्टर बनाता है। सुज़न सोंटैग के शब्दों में अच्छा फ़िक्शन हमारे हृदय को शिक्षित करता है। यह अप्रिय स्थितियों में अप्रिय लोगों के प्रति भी उदार रहने और उन्हें समझने की कोशिश करने के लिए हमें तैयार करता है। अच्छा फ़िक्शन पढ़ना इंसान को कम जज़मेंटल बनाता है। अच्छा फ़िक्शन मनुष्य को जाति, धर्म, क्लास, लिंग आदि जैसे विभाजनों से ऊपर उठता है, ‛नफ़रत’ जैसे विचारों से जुड़ा व्यर्थताबोध आप में भरता है, आपके अंदर कोमलता और करुणा का पौधा रोपता है और इस तरह धीरे-धीरे मनुष्य के अंदर मौजूद हर तरह की कट्टरता को ख़त्म कर देता है। मेरी दृष्टि में फ़िक्शन की यह भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसे वह तब ही निभा सकता है जब उसे ठीक से बरता गया हो- यानी अच्छे से लिखा गया हो। मेरे प्रिय उपन्यासकार डेविड फोस्टर वालेस कहते थे कि दोस्तोवस्की जैसे लेखकों को जो बात महान बनती है वह उनकी आत्मा की वह गहराई है जिसे वह पन्ने पर उतारते हैं―उनकी ‘कैपेसिटी ऑफ़ स्पिरिट’। उपन्यासकार में यह ‛कैपेसिटी ऑफ़ स्पिरिट’ होना बहुत ज़रूरी है।


इसके उलट ख़राब उपन्यास को चिह्नित करना आसान है। एकांगी दृष्टि, कमज़ोर क़िस्म की नारेबाज़ी, पात्रों की बजाय निजी विचारधाराओं को सामने लाने पर ध्यान। कमज़ोर गद्य को पहचानने का एक और तरीक़ा यह भी है कि वे अक्सर राजनीतिक मुखपत्र की तरह लिखे जाते हैं और उसी तरह प्रचारित भी किए जाते हैं। मुझे ऐसी सामग्री दु:खी इसलिए भी करती है, क्योंकि मैं असली मुखपत्र लिखने वालों को जानती हूँ, रिपोर्टर रहने की वजह से तमाम राजनीतिक पार्टियों के दफ़्तरों में फिरते हुए बड़ी हुई हूँ। मुखपत्र लिखने वाले, भले ही वे वाम के हो या दक्षिण के, अपना काम मेहनत से करते है। एक्टिविस्ट लोग भी बहुत मेहनती और समर्पित होते हैं। लेखक को फ़िक्शन में उनके राजनीतिक मुखपत्रों और इंस्टाग्राम की रीलों से आगे का, उससे nuanced, बहुपरतीय और गहरा काम करने की कोशिश करनी चाहिए। अच्छे उपन्यासकार का काम चीज़ों को प्रॉब्लेमेटाइज़ करना भी है, न कि सिर्फ़ बनावटी नैतिकता के फेर में रहना। आपको अपनी विधा के इतिहास और उसकी समृद्ध पृष्ठभूमि का एहसास भी होना चाहिए। आपके यहाँ हिंसा पर इतने बड़े-बड़े काम हुए हैं―नाम मैंने कई ऊपर गिनाये ही हैं—उसी का भान रहे तो कुछ बेहतर काम हो। आज अधिकतर लिख रहे लोगों में न अपनी भाषा पाने की कोई बेचैनी है, न ही भाषा के प्रति (एक तत्त्व की तरह) कोई आम जिज्ञासा ही है, न फॉर्म से खेलने का जुनून है, न ही अपने भीतर के उपन्यासकार के मौलिक विज़न को विकसित करने या अपना विज़न हासिल करने के प्रति कोई बेचैनी है। ज़्यादातर लोग सिर्फ़ लिखने के लिए लिख रहे हैं। यह बात मुझे बेहद उदास करती है।



6. आपकी कविताओं में रसानुभव (erotics) हैं, जो कि सुज़न सोंटैग का प्रभाव लगता है। कला की व्याख्या किस तरह करेंगी?


मुझे लगता है कविता बस मुझ तक आ गई जब-जब उसे आना था। लेकिन वह मूलतः मेरा फॉर्म नहीं है। साहित्य के संदर्भ में मुझे लगता है फ़िक्शन मेरी विधा है और उसके बाद आलोचना भी। मैंने निबंध लिखे हैं और आगे भी लिखना चाहती हूँ, अपनी तरह के निबंध। मैंने कविता लिखने की या कवि होने की कभी कोशिश नहीं की। तक़रीबन 75-80 कविताएँ मैंने लिखीं हैं और शायद इसकी आधी प्रकाशित करवाईं। जो भी कविता संभव हुई, वे सब गहरे दु:ख और उतने ही गहरे सुख के अभूतपूर्व क्षणों में अपने आप चेतना में एक लघु विस्फोट की तरह उतर आईं। रसानुभव तो शायद मेरे गद्य में भी है। ऐन्द्रिकता को पन्ने पर पकड़ना मुझे भाता है, क्योंकि जीवन में भी मैं ऐसी ही हूँ। कला तो वह है जो जीवित रखती है मुझे, जिसे समझने और जिसमें डूब जाने की ख़्वाहिश लिए सब कुछ छोड़ दिया है मैंने।



7. उत्तर-आधुनिक स्त्रीवाद क्या अमरीकी पूँजीवाद का ही एजेण्ट है?


यह इस विषय को देखने की एक दृष्टि हो सकती है जिसके पक्ष में तर्क भी जुटाये जा सकते हैं। लेकिन मैं नहीं मानती कि स्त्रीवाद कभी भी ‛पूँजीवाद’ जैसी किसी भी दूसरों के दमन और शोषण पर आधारित व्यवस्था का समर्थक हो सकता है। हाँ, स्त्रीवादी विचारधारा का दुरुपयोग कर पूँजीवादी उसे अपने पक्ष में ऐक्सपॉलिट करने की कोशिश ज़रूर कर सकते हैं, लेकिन वह दुरुपयोग ही होगा, स्त्रीवाद नहीं।


स्त्रीवादी विचारधारा मूलतः बहुत समावेशी और संवेदनशील विचारधारा है। यह दूसरों का शोषण करना नहीं सिखाती, बल्कि पुरुषों समेत सभी के प्रति बराबरी की दृष्टि के साथ-साथ अधिक मानवीय, उदार और संवेदनशील होने को कहती है।



8. एपस्टीन फ़ाइल्स से पता चलता है कि छोटी बच्चियों की देह से विश्व-व्यवस्था को नियन्त्रित किया जा रहा है। स्त्री-देह के राजनीतिक इस्तेमाल को आप कैसे विश्लेषित करेंगी?


मेरी किताब में इस विषय पर कई अध्याय हैं। स्त्री देह का राजनीतिक इस्तेमाल हमेशा से होता आ रहा है। भारत में तो जातिगत शक्ति-प्रदर्शन के लिए, किसी ख़ास राजनीतिक पार्टी का समर्थन करने के लिए, पुरानी रंजिश मिटाने के लिए या फिर दादा-परदादा से कोई हिसाब चुकता करने के लिए भी बलात्कार किए जाते हैं। यह बहुत डरावना है। मैंने अपनी किताब में भी लिखा है कि यहाँ स्त्री के शरीर को उस खेल के मैदान की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जिस पर मर्द अपनी लड़ाइयाँ लड़ते हैं। इसका मूल कारण पितृसत्ता और पुरुषों में मौजूद अंतहीन हिंसक-सर्वाधिकारबोध के साथ-साथ उनके द्वारा स्त्रियों को एक स्वायत्त स्वतंत्र मनुष्य न मानकर महज़ लेन-देन या हिसाब चुकता करने या सबक़ सिखाने या बदला लेने के लिए इस्तेमाल में आने वाली कोई वस्तु समझाना है।


अमेरिका-इज़रायल द्वारा जो किया जा रहा है वह भयावह और क्रूरतापूर्ण है। भारत में भी छोटी बच्चियाँ बड़ी तादाद में तस्करी का शिकार होती रहीं हैं। तस्करी के बाद उन्हें शारीरिक शोषण और बंधुआ मज़दूरी की एक अंतहीन सुरंग में ढकेल दिया जाता है। बच्चों को लेकर इस दुनिया की क्रूरता आपको भीतर तक तोड़ सकती है। हर साल जारी होने वाले सरकारी आँकड़े भी हमें यही बताते हैं कि बलात्कार के साथ-साथ बच्चों पर होने वाली हिंसा भी लगातार बढ़ रही है।



9. अन्तिम चुनाव क्या होगा? कल्पना या यथार्थ, कविता या फ़िक्शन, अस्तित्त्व या अस्मिता, कला या विचार?


इन विकल्पों में से किसी एक को चुनना मेरे लिए संभव नहीं। मुझे अपनी रचनाओं और जीवन में दोनों चाहिए—कल्पना को ताक़त देता यथार्थ और यथार्थ को स्वप्निल बनती कल्पना भी, फ़िक्शन में काव्य की प्रज्ञा और कविता में फ़िक्शन जैसा बहुआयामी सामर्थ्य भी, कला में वैचारिक शक्ति का आधार और विचार में कला से उपजाने वाला दुर्लभ transcendence (पार पाने की क्षमता) भी। इस मामले में मैं ख़ुद को ओरहान पामुक और उनके उपन्यासों के बहुत क़रीब पाती हूँ। उनकी कृतियाँ एक तरह से मेरे आदर्श उपन्यासों के बहुत क़रीब हैं।



10. हिन्दी के किन लेखकों को पढ़ना पसन्द है? और क्यों ?


हिन्दी में फ़िक्शन लिख रही हूँ और ख़ुद को इस भाषा परिवार का सदस्य मानती हूँ इसलिए जो लेखक पसंद नहीं भी आते, उन्हें भी ध्यान से पढ़ती हूँ। बल्कि जो पसंद नहीं आते उन्हें ज़्यादा पढ़ती हूँ। जो पसंद हैं उनमें निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, मुक्तिबोध, अज्ञेय, विनोद कुमार शुक्ल, शमशेर, कुँवर नारायण, कृष्णा सोबती, धर्मवीर भारती―सभी के कुछ-कुछ काम यानी सभी की दो-तीन किताबें पसंद हैं। अलग अलग किताबों को पसंद करने के अलग-अलग कारण हैं। वर्तमान में लिख रहे लोगों में अलका सरावगी, गीतांजलि श्री, गगन गिल, तेज़ी ग्रोवर, जयशंकर, उदयन वाजपेयी―सभी के अलग-अलग विधाओं में प्रकाशित काम पढ़ती रही हूँ। इस संदर्भ में मुझे उर्दू लेखक भी बहुत भाते हैं। ‛बस्ती’ मेरी प्रिय किताबों में से है और इंतज़ार हुसैन मेरे प्रिय गद्यकार रहे हैं। बचपन में मंटो और इस्मत चुग़ताई को ख़ूब पढ़ा फिर बड़े होने पर मीर-ग़ालिब हमसफ़र बन गए। गंभीरता से परखती हूँ तो पाती हूँ कि मुझे उर्दू वाले कुछ ज़्यादा ही पसंद हैं। शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी साहब हों, नैयर मसूद हों, ख़ालिद जावेद हों या कुर्रतुलैन हैदर―इन्हें मैं बड़ा उपन्यासकार मानती हूँ। इनके पास अपनी सिग्नेचर भाषा है, अपना विज़न है। उर्दू वाले मेहनती भी बहुत होते हैं। उनमें दम होता है, मोटी किताबें लिखते हैं। मोटी किताब में एक्सपोज़ होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है शायद इसलिए अक्सर लोग लिखते नहीं। उर्दू के बड़े कथाकारों के यहाँ ऐसा नहीं है कि अस्सी-नब्बे पन्नों की लंबी कहानी को स्पेस दे-दे के एक सौ बीस पन्नों में छपवा रहे हैं और उसे उपन्यास मनवाने पर तुले हैं। ‘उपन्यास स्टैमिना का भी खेल है’―यह डेबोरा लेवी का कथन है। बाँधिए आप नैरेटिव, सजाइए अपना मंच! गीतांजलि जी कहती हैं कि उपन्यास एक पेशकश है, एक परफ़ॉर्मेंस है। कीजिए परफ़ॉर्म। यही तो मज़ा है फ़िक्शन का, यही चुनौती भी है। लेकिन अब तो लोग लिखते ही कम हैं। कितनी ही किताबें मैंने देखीं हैं जो सिर्फ़ फ़ेसबुक टिप्पणियों को जैसे-तैसे बढ़ा-बढ़ा के बनाई गई हैं। शर्म से डूब मरने को जी चाहता है। हमारे यहाँ बस यही चल रहा है कि कैसे भी करके हर साल एक किताब आती रहे तो किताब आने से जुड़ी सारी चमक-धमक मिलती रहे। हमारे समय में आलस्य की इस पराकाष्ठा ने साहित्य का बहुत नुक़सान किया है। मुझे हमारा वर्तमान समय बेहद एंटी-लिटरेरी लगता है। यह बात मुझे उदास तो करती है, लेकिन निराश नहीं। क्योंकि मेरा मानना है कि इस तरह के अँधेरे समय में ही अच्छा काम करने का महत्त्व है।


ख़त्म करने से पहले जहाँ रहती हूँ, उस शहर और राज्य का ज़िक्र करती चलूँ। अम्बर पांडेय, जिनसे मैं प्रेम करती हूँ और जिनकी पहली पाठक भी हूँ, उनका लिखा सब पढ़ती हूँ। सामुदायिकता में मेरा गहरा विश्वास है और मेरी कोशिश रहती है कि अपने आसपास काम कर रहे लोगों का काम ध्यान से पढ़ूँ। हमारे यहाँ तीन लोगों ने अनुवाद में काफ़ी काम किया है : राजुला, तेज़ी और रुस्तम―इन्हें पढ़ती हूँ। कविता में आशुतोष दुबे और आचोलना में मदन सोनी के साथ-साथ आशुतोष भारद्वाज (जो हमारे प्रदेश के नहीं हैं) के आलोचना कर्म को भी महत्त्वपूर्ण मानती हूँ। अच्छी आलोचना पढ़ने से मुझे यह शिक्षा मिली कि हमें उपन्यास से बड़ी उम्मीद करनी चाहिए। सुज़न सोंटैग के शब्दों में : Expect something big, something exalting or deepening from a novel. (मैं ज़िंदा रहने के हर क्षण में पढ़ने की कोशिश करती हूँ इसलिए बहुत से नाम हैं हिन्दी में जो मुझे पसंद हैं, जिनकी कोई एक कविता या कोई एक कहानी या कोई एक उपन्यास मुझे प्रिय रहा है। जो एकदम याद आए वह सब नाम लिखे। लेकिन जितने लिखे उससे कहीं अधिक छूट गए हैं।)


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अंग्रेज़ी और हिन्दी में लिखने और प्रकाशित होने वाली प्रियंका दुबे की पहली किताब ‘नो नेशन फ़ाॅर विमन’ अमरीकी प्रकाशन गृह ‘साइमन एंड चिश्टर’ द्वारा 2019 में प्रकाशित की गई थी। 2019 में ही इस किताब को शक्ति भट्ट फ़र्स्ट बुक प्राइज़, टाटा लिटेरेचर लाइव अवार्ड और प्रभा खेतान विमेन्स वोईसे अवार्ड के लिए शॉर्ट लिस्ट लिया गया था। ‘आवर फ़्रीडम्स : एसेज़ एंड स्टोरीज़ फ्रॉम इंडियाज़ बेस्ट राइटर्स’ और ‘इंडिया-वीमेन’ नामक दो अन्य पुस्तकों में उनके संस्मरण और निबंध प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक ‘नूह का कबूतर’ में भी उनका सृजनात्मक गद्य प्रकाशित हुआ है। हिन्दी की कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं ऑनलाइन पोर्टल्स पर उनका फिक्शन, कविता, आलोचना, संस्मरण तथा निबंध प्रकाशित हैं। पत्रकारिता के संसार में उनका प्रकाशन एवं पुरस्कारों से समृद्ध एक लंबा जीवन रहा है जिसका ज़िक्र इस परिचय में, सायास ही, नहीं किया जा रहा है।


सन्तोष अर्श का जन्म अवध में बाराबंकी जनपद के गाँव मँझपुरवा (1987) में हुआ। छोटी उम्र से लेखन शुरू किया और कुछ समय तक लखनऊ में फ़्रीलांसिंग की। मूलतः कवि। आलोचना और सम्पादन में भी सक्रिय। जनकवि रमाशंकर यादव 'विद्रोही' पर आधारित पुस्तक 'विद्रोही होगा हमारा कवि' (2020) और 'परस्तार-ए-लखनऊ' (2025) का सम्पादन। 'आलोचना की दूसरी किताब' (2024) शीर्षक से उनकी एक आलोचना पुस्तक भी प्रकाशित हुई है। ईमेल : poetarshbbk@gmail.com


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