नाना पाटेकर : मेरे लिए तुम गीत हो

नाना पाटेकर : मेरे लिए तुम गीत हो
सुमन शेखर
जिंदगी भर के लिए आप एक लंबा प्लान बनाते हैं। इस समय यह करना है, इससे यह और इस तरह ऐसे-ऐसे ये हासिल करना है। एक लंबी लिस्ट…
ईश्वर क्रूर है, वह आपकी बनाई सारी ख्वाहिशों की लिस्ट पर हँसता है। जब आप रुके हों, वह कुछ नहीं करता, जब आप रफ्तार में होते हैं, वह अचानक से आपको स्टेज पर गिरा देता है और आप मृत घोषित कर दिए जाते हैं। यानी एक ऐसा व्यक्ति जो अब कभी नहीं होगा। उससे न कोई संवाद होगा, न उसका स्पर्श। लंबी लिस्ट उस मृत देह के आसपास फड़फड़ाती रहती है।
उधर ईश्वर अट्टहास करता है, इधर मातम छाता है।
एक व्यक्ति जो यह सोचकर सोया हो कि सुबह उठकर यह सब काम करेगा, बाकी अधूरे काम पूरे करेगा, सुबह उठते ही वह मृत पाया जाए—यह कैसी मृत्यु है! इसे चैन की मृत्यु कह सकते हैं। उसके हिस्से जीवन का अवलोकन—कितना खोया, कितना पाया का गुणा-भाग भी शेष नहीं रह चुका होता है। किसी से आखिरी प्रेम, आखिरी संवाद भी नहीं, आखिरी दरस भी नहीं। ऐसे जाना कितना अधूरा जाना है! नाना पाटेकर का जाना इस तरह ही हुआ।
बचपन में नाना पाटेकर की फिल्म देखता तो मन में सोचता, यह आदमी अपनी जिंदगी में भी तो कुछ करता होगा, सब छोड़कर टीवी में कैसे आ जाता है! न शक्ल अच्छी है, न यह बड़े अभिनेताओं की तरह लगता है। और फिर हर बार अलग-अलग भेस में आ जाता है, कैसे!
दिल्ली आने के बाद इनकी सारी फिल्में एक-एक कर देख डालीं, और तब एहसास हुआ कि यह आदमी पैदा ही इसी वास्ते हुआ था। यह आदमी सिनेमाई दुनिया से दूर बहुत आसान-सा जीवन जीता है, इतना दमदार अभिनय करता है, गजब कॉम्बिनेशन है इस आदमी का।
नाना के चेहरे पर अभिनय दिखाई ही नहीं देता। एक किरदार दिखता है, जो जैसे अपने भीतर कुछ छिपाकर बैठा है। कभी वह गुस्सा है, कभी पश्चाताप, कभी हिंसा, कभी अकेलापन और कभी अचानक फूट पड़ने वाली हँसी। साँसों का इससे अच्छा इस्तेमाल मैंने किसी और के द्वारा नहीं देखा है। आवाज में उतार-चढ़ाव के साथ यह आदमी अपने आप में पूरी किताब रहा है।
नाना पाटेकर ने हिंदी और मराठी सिनेमा के साथ रंगमंच में भी लंबा काम किया। 1978 की ‘गमन’ से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ और आगे चलकर ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे विशिष्ट अभिनेताओं में स्थापित किया। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले और 2013 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
‘नटसम्राट’ का आखिरी दृश्य, जब मंच पर बैठकर नाना का मोनोलॉग आता है, अद्भुत है। कोई क्या ही उसे अचीव कर पाएगा! यूँ तो पूरी फिल्म ही मुझे बहुत पसंद है। हर तरह से संपूर्ण फिल्म है और इसमें सबसे बड़ा हाथ है नाना का।
नाना पाटेकर का चेहरा सड़क से, भीड़ से, हमारे बीच से आया हुआ लगता है। और यही कारण है कि उनके पात्रों में एक असाधारण विश्वसनीयता दिखाई देती है।
‘परिंदा’ में उनका अन्ना इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। विधु विनोद चोपड़ा की इस फिल्म में नाना ने जिस तरह हिंसा को अपने भीतर जमा हुआ अँधेरा बनाया, वह हिंदी सिनेमा के खलनायकों की पारंपरिक शैली से बिल्कुल अलग था। अन्ना बस एक अपराधी नहीं है। वह एक ऐसा आदमी है जिसने हिंसा को जीवन का सामान्य व्याकरण बना लिया है। नाना का अभिनय यहाँ चिल्लाता नहीं। कई बार वह केवल देखता है। और वह देखने भर से ही डर पैदा करता है। उनके चेहरे पर बहुत कम हलचल होती है, लेकिन दर्शक समझ जाता है कि इस आदमी के भीतर क्या चल रहा है। उनकी संवाद शैली, जिसमें शब्द केवल उचार भर देना नहीं रहा, वह शब्द को शरीर देते रहे। वाक्य कभी धीरे निकलता है, कभी अचानक टूटता है, कभी आवाज ऊँची नहीं होती, लेकिन उसका दबाव बढ़ता जाता है—एक सुर में, संगीतमय।
करने के लिए उनके पास जो भंगिमाएँ रहीं, वह ईश्वर ने किसी दूसरे के पास नहीं रखीं। ईश्वर ने हर व्याकरण को तोड़कर नाना को बनाया और खूब बनाया।
नाना के किरदारों में नरम दिल और रोबदार आवाज हमेशा संतुलन में रहीं। ‘वजूद’ का संवाद किसे याद नहीं होगा– “मेरे लिए तुम कौन हो!”
क्या गजब इंसान, जब किरदार में हो, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि शरीर का क्या हुआ, कितना खून बहा, कितना बुखार है। इसके बहुत वाकयात है।
‘अग्निसाक्षी’ का पति हो, ‘अंगार’ का अपराधी संसार हो, ‘अपहरण’ का राजनीतिक अपराध जगत या ‘अब तक छप्पन’ का पुलिस अधिकारी, इन पात्रों के भीतर हिंसा अलग-अलग रूपों में आती है। अब तक छप्पन का साधु आगाशे इसका बेहद दिलचस्प उदाहरण है। वह पुलिस अधिकारी है। उसका काम अपराधियों को खत्म करना है। लेकिन फिल्म धीरे-धीरे एक असुविधाजनक सवाल पूछती है, अपराधी को मारने वाला आदमी खुद कितना बदल जाता है?
संजय लीला भंसाली की ‘खामोशी’ में नाना पाटेकर को बिल्कुल अलग तरह से देखना चाहिए। एक ऐसे पिता की भूमिका, जो सुन और बोल नहीं सकता, अभिनेता के लिए एक कठिन चुनौती है। जब शब्द चले जाते हैं तो अभिनय को आँखों, हाथों, शरीर और चेहरे में अपना घर बनाना पड़ता है। उनके चेहरे की छोटी-सी हलचल, बेटी की ओर देखने का तरीका, किसी बात को समझने या न समझ पाने की बेचैनी, इन सबके बीच एक पिता धीरे-धीरे बनता है।
और फिर वही अभिनेता अचानक ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी बनकर आता है। पहली बार देखने पर यह फिल्म मेरे लिए फुल मसाला फिल्म रही, जिसमें नाना को फुल-ऑन कॉमेडी के फॉर्म में देखा। उदय शेट्टी अपराधी है, लेकिन फिल्म उसे हास्यास्पद बनाती है। और नाना इस हास्य को भी बहुत गंभीरता से निभाते हैं।
नाना पाटेकर के जीवन को केवल फिल्मों के संदर्भ में देखना भी अधूरा ही होगा। उन्होंने ग्रामीण जीवन और किसानों के सवालों से जुड़कर सामाजिक काम किया और साल 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ के माध्यम से महाराष्ट्र में सूखे से प्रभावित किसानों के लिए काम किया। आत्महत्या कर रहे किसानों, उनके परिवारों, विधवाओं और बच्चों को आर्थिक सहायता दी। ‘राज कपूर पुरस्कार’ के रूप में मिले दस लाख रुपये उन्होंने पूरे के पूरे महाराष्ट्र में सूखा राहत कार्यों के लिए दान कर दिए।
उन्होंने महज 13 साल की उम्र में मुंबई के चूनाभट्टी इलाके में फिल्म पोस्टर पेंट करने का काम शुरू कर दिया था। इस काम से उनकी शुरुआती कमाई करीब 35 रुपये महीने बताई जाती है। वह रोजाना कई किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाते थे। यही संघर्ष आगे चलकर उनके फिल्मी करियर की सबसे बड़ी ताकत बना। उन्होंने कई बड़ी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई। बाद में फिल्मों में अपनी कीमत उन्होंने खुद तय की और अपनी शर्तों पर रहे।
उनके सिनेमा में जो आदमी बार-बार व्यवस्था से भिड़ता दिखाई देता है, वास्तविक जीवन में भी उसकी रुचि धीरे-धीरे चमकदार फिल्मी दुनिया से बाहर निकलकर उन लोगों तक पहुँची, जिनकी जिंदगी कैमरे के फ्रेम में कम दिखाई देती है।
समय पर जब भी मौका बना, उन्होंने अपनी बात रखी। जहाँ बोलना था, खुलकर बोला और बिना किसी डर के बोला। उनको कभी कोई फर्क नहीं पड़ा, कोई क्या सोचेगा। इस वजह से कई बार विवादों में भी रहे, कई बार सामने आकर सफाई भी देनी पड़ी।
मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ का अंतिम दृश्य,जिसमें वह कहते हैं– “मी आहे ओथेलो... हेम्लेट... जूलियस सीझर... मैकबेथ... आणि किंग लिअरसुद्धा! मीच साकारले हे सगळे... आणि आज मी काय आहे? एक साधा, पडद्यामागचा नट...!”
जीवन के रंगमंच का पर्दा गिरा और अभिनेता सांसहीन, जड़वत…।
चार दिन पहले का दृश्य जिसमे एक समारोह में नाचते-गाते, खुश चेहरे पर अचानक उतर आया शांत मौन...भरी मुट्ठी खाली है, जीवन यही है…। लेकिन उनका काम हमारे साथ है। और बखूबी डंके की चोट पर है। किसी को फटकार लगाने वाला उनका रोब, उनकी ईमानदार आँखें, उनका मिजाज सब यहीं है।
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सुमन शेखर युवा कवि हैं। लेखन के साथ रंगकर्म और अभिनय में निरत। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : सुमन शेखर
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