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ख़्वाब के मज़बूत पंख (विश्व सिनेमा)
कला आने वाली नस्लों को मनोरंजन के साथ-साथ तमाचे और प्यार के निशान सौंपती है।


इरफ़ान : ख़लिश है ये क्या ख़ला है
यह बात उनके जाने के छः साल बाद भी गले से नीचे नहीं उतरती कि ‘इरफ़ान अब नहीं हैं।’ उनकी फ़िल्में ढूँढ-ढूंढकर देखने का अजीब-सा चस्का चढ़ा हुआ है। बीते सालों में उनके जीवन के दर्जनों काम, जो उनके रहते नज़र में नहीं आए, आज सोशल मीडिया रील्स में काट कर चल रहे हैं।


सुमन शेखर की कविताएँ
बहुत आसानी से गुम हो जाती है हँसी
हवा मे डूब जाती है कोई चीख
हमारी देह क़ब्र का स्पर्श लिए फिरती रहती है
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