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ख़्वाब के मज़बूत पंख‌ (विश्व सिनेमा)

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ख़्वाब के मज़बूत पंख‌ (विश्व सिनेमा)

सुमन शेखर 


दुनिया को हिंसा और युद्ध की ज़रूरत नहीं है, दुनिया को केवल प्यार की ज़रूरत है। प्यार सारे घाव पचा जाता है। हिंसा और युद्ध नस्लों का जीवन, सुख और चैन चबा जाता है। दुनिया फिर भी किस मतवालेपन में युद्ध चाहती है? कौन हैं ये लोग? कहाँ से आए हैं?‌ इंसान ऐसे तो नहीं थे! 


द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद देवता बहुत नाराज़ हुए। उन्होंने कहा, “हमारी बनाई धरती को यूँ ही खेल-खेल में बर्बाद कर दिया! नीचे क्या हाल बनाकर छोड़ रखा है इन नीच इंसानी जानवरों ने! जानवर भूख से ज़्यादा फिर भी नहीं खाते। इंसान अपनी भूख में एक दिन दुनिया चबा जाएगा। जिसे हमने अपनी प्यारी संतान माना, उसे संतान स्वीकारने में भी अब कलेजा मुँह को आता है। छीः… ऐसा हाल बना छोड़ने के लिए बुद्धि, विवेक और ज्ञान पाया था। किसी चीज़ को अगर तैयार करने का हुनर नहीं है तो उसे बर्बाद करने में कुछ तो शर्म करो, बेवक़ूफ़ो!”

देवताओं ने ग़ुस्से में आकर अंततः स्वयं ही धरती को बर्बाद ही कर देने की ठान ली। तभी उनके पास आए दो एंजिल्स (फ़रिश्ते), जिन्होंने कहा, “एक अंतिम मौका इन्हें देकर देखना चाहिए। अगर नहीं संभले, तो हम ख़ुद आपके साथ चलेंगे और हम सब ख़त्म कर देंगे।”


देवताओं ने एकमत होकर अपने ग़ुस्से पर काबू पाया। एंजिल्स ने कहा, “हम धरती पर जाते हैं और देखकर आते हैं कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद अब वे क्या सोचते हैं, उनकी अब क्या-क्या इच्छाएँ हैं, वे कितनी ग्लानि में तड़प रहे हैं। उनमें कितना अपराध बोध है।”


देवताओं ने पूछा, “धरती के कौन-से हिस्से में जाना चाहते हो?”


“बर्लिन।” बिना ज़्यादा सोचे उन्होंने कहा और पंख लगाए उतर आए बर्लिन की धरती पर।


***


यहाँ आकर मुझे लगा कि दादी मेरे इस फ़ैसले पर कहतीं, “जाते टोक्यो, क्योटो, पेरिस, लंदन, इंडिया, ट्राइस्टे... लेकिन बर्लिन?”


योद्धा आकांक्षाओं में युद्ध चाहते हैं। आकांक्षाएं इतनी ज़्यादा रहीं, इंसान मलबे के भीतर दबकर कचरे के ढेर मे बदलता गया।‌ इंसान और भी ज़्यादा युद्ध का तांडव करता रहा। 


धरती युद्ध और हिंसा में मारे गए लोगों की लाशों पर बिछी है। 


यहाँ अब भी वही गंध है,

लेकिन उसके साथ चिपकी है धूल, सड़ी हुई लाशों की गंध,

मौत की चीख़ें, क्रूरता की हद को पार करती हँसी और भद्दा अट्टहास।


एक-एक कर मैं चुनूँगा सारे टुकड़े

जिसने बसाया हो घर

वह एक-एक टुकड़े का महत्व जानता है।


खोया है मैंने अपना सब कुछ, लेकिन

चेहरे पर हैरानी का कोई वजूद नहीं

कोई आँसू नहीं, कोई दुःख नहीं

शायद आने वाले समय के लिए बचा रखा हो।


बर्लिन की लड़ाई में नुक़सान बाक़ी देशों की अपेक्षा बहुत अधिक था। बर्लिन के पतन के साथ सोवियत सेना को 80,000 से अधिक मृत या लापता सैनिकों की भारी क्षति हुई। इसके अलावा सोवियत सेना में 2,80,000 से अधिक सैनिक बीमार या घायल थे। जर्मन मौतें कम से कम 92,000 थीं या संभवतः 1,00,000 तक भी। इसके अलावा 2,00,000 से अधिक जर्मन सैनिक घायल हो गए। मार्च 1945 के अंत तक बर्लिन पर कुल 314 हवाई हमले हुए थे, जिनमें से 85 पिछले बारह महीनों में हुए थे। देश का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रहने लायक नहीं रह गया था और शहर का बड़ा हिस्सा मलबे के ढेर में तब्दील हो गया था।


30 अप्रैल तक जर्मन संसद भवन, रीचस्टैग, पर सोवियत सेना ने क़ब्ज़ा कर लिया और हिटलर तथा उसकी पत्नी ईवा ब्राउन ने आत्महत्या कर ली। 1945 में रीचस्टैग की जीत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इस इमारत को नाज़ी फासीवाद के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। अगले दिन सोवियत झंडा इमारत पर फहराया गया जो सोवियत विजय और यूरोप में नाज़ीवाद के अंत का प्रतीक था। नाज़ी शासन पूरी तरह नष्ट हो गया। अगले दिनों में अन्य जर्मन नेताओं ने भी हिटलर की तरह आत्महत्या कर ली। इन घटनाओं के बाद बर्लिन शहर ने 2 मई 1945 को आत्मसमर्पण कर दिया।


पिछले सौ सालों में दुनिया के पास बर्लिन जैसे युद्धों और इंसानों के तांडवों की लंबी लिस्ट है। 


**


मेरा दिल मेरे पैरों के नीचे लगा है

दिल धड़कता है ज़ोरों से, 

जब-जब बढ़ाता हूँ क़दम लाशों के ढेर पर 

सवालों का हुजूम आता है उन बच्चों की तरफ़ से 

जिन्होंने अभी दुनिया देखी भी नहीं 

उनका क्या रहा दोष?

 

सारी चीख़ें धूल में मिलती जाती हैं

बहुत हल्की लगती हैं मेरे दर्द की चीख़ें तुम्हें!


पूरा शहर मेरे दर्द को ढोता रहा, 

एक आह न सुनी मैंने

गुज़रो जो कभी सन्नाटे से तुम,

संभाले रखना अपना दिल।


काश ऐसा होता कि मेरे ज़ख़्म की सूरत

लगाए रखते तुम अपने पास, बहुत भीतर

बँट जाती मेरी चीख,

मेरा दर्द,

तबाही का हर मंजर

उतर जाता गर तुम्हारी आँखों में


काश ऐसा होता कि तुम भी शर्म से गड़कर पस्त हो पाते।


“बचपन क्या होता है?” पूछा नहीं किसी ने किसी से, लेकिन पूछा गया ज़रूर कहीं-न-कहीं।

“जिसमें न कोई आदत हो, न बंदिशें हों; एक पल के भीतर जीवन भरपूर दिखता हो; फ़र्श पर बहता पानी पल भर में नदी की धार हो जाए; तालाब में समंदर-सा सुख मिल जाए...” 


बस-बस, अब मत याद दिलाओ उस खोए हुए दोस्त की, जिसे दुबारा पाया न जा सके। बचपन से दूर आकर बचपन बहुत याद आता है। 


दोनों एंजिल्स बर्लिन के ऊँचे मकानों पर आकर खड़े होते हैं । शहर की गलियों की तरह मन और ख़्वाबों की भी गलियाँ होती हैं। दोनों शहर की गलियों को नापते हैं । उन्हें सबसे पहले एक चीख़ सुनाई देती है। इतिहास चीख बुदबुदाती है। दोनों रुकता है, चौंकता है, चलता है, थकता है, हताश और निराश होता है। चलता है उम्मीद की पहली रौशनी की तरफ़। 


एक चिड़िया थी। राजा ने उसका बलात्कार कर उसे मार दिया। अब वह नहीं है, लेकिन उसकी कूक पूरे देश में अपने पूरे वजूद के साथ गूँजती है। मरने के बाद अभी भी वह रोती है और राजा के शागिर्द उसे अब भी ढूँढ़ रहे हैं। उसकी आवाज़ दबे पाँव आती है, राजा के कानों को छूती है, राजा को पागल कर देती है। राजा नींद में भी उसके साथ दुबारा बलात्कार करना चाहता है, जबकि अब न कोई देह है, न कोई सूरत, न कोई चिड़िया बची है शेष।


“तुम अब भी क्यों ढूँढ़ते हो उसे?”


“उसकी आवाज़ का ख़त्म होना अभी बाकी है, उसकी चीख़ अभी बाकी है।”


**


जो शहर बम से नहीं मरता, अंदर पल रहे, जल रही स्मृतियों के ताप से मर जाता है। स्मृतियाँ बचाने से ज़्यादा बिगाड़ देती हैं। जब युद्ध समाप्त होता है, तब भी उसकी प्रतिध्वनियाँ बहुत लंबे समय तक सुनाई देती रहती हैं, क्योंकि नष्ट हुए घरों को दुबारा बनाया जा सकता है, लेकिन सब नष्ट हुई स्मृतियों को पचा पाना कहीं अधिक कठिन होता है।


शहर की गलियों में भटकते दोनों एंजिल्स ऊब जाते हैं और लोगों के मन के भीतर पल रहे ख़्वाबों की गलियों में सफर करते हैं।


“नए सूरज की रोशनी में अब भी यहाँ जीवन, स्वप्न की तरह चमकता है क्या?”


**


“मैं भटक गया हूँ रास्ता। हम क़ब्रिस्तान जाना चाहते थे।”


“अच्छा?”


दोनों एंजिल्स में से कौन क्या कह रहा है, यह मालूम नहीं। लेकिन कब-कब और क्या-क्या कहा गया, यह मालूम है।


“आज ही के दिन बीस साल पहले स्पंदाउ झील में एक सोवियत जेट लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। आज ही के दिन पचास साल पहले ओलंपिक खेल खेले गए थे। आज ही के दिन दो सौ साल पहले ब्लैंचर्ड ने गुब्बारे में शहर के ऊपर पहली उड़ान भरी थी, एक भगोड़े की तरह। और आज... लिलिएनथेलर चौसी पर एक आदमी धीरे-धीरे चलता है और अपने कंधे के ऊपर से अंतरिक्ष की ओर देखता है।”


“दूसरी तरफ़ डाकघर नंबर 44 पर कोई व्यक्ति चाहता है कि आज इसे ख़त्म कर दे।”


**


जीवन में जहाँ इतनी बाधाएँ हैं, खंडहरनुमा इतिहास है, लाशों से पटी धरती है, मलबे के भीतर दबा भविष्य है, चिथड़ों से भरा वर्तमान है, वहीं एक सर्कस, लाइब्रेरी और एक फ़िल्म निर्देशक भी है। एक लड़की है, जो सर्कस में जान लगाकर लोगों को हँसाती है। एक पेंटर है, जो फ़िल्म भी बनाता है, या कहें कि एक निर्देशक है जो पेंटिंग बनाता है, या वह दोनों ही है। कुछ बच्चे हैं, जो सर्कस देखते हैं, किताबें पढ़ते हैं, खुलकर हँसते और रोते हैं। बूढ़े हैं, जो किताबों से चिपके हुए हैं और सबने बचाकर रखे हैं अपने ख़्वाबों के पंख। सब भूलकर नया जीने और रचने की चाह से भरे हैं। 


जीवन में संयम सीखना था,

निष्ठुरता सीख ली।


प्रेम की भाषा बोलने की जगह को 

भर दिया नफ़रती लबों से


सारी अच्छाई दबी है किताब के पन्नों में

पुरखों के वाक्यों को चाट गया है दीमक

हमने फूँक मारी और उड़ा दिया।


बचपन मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है, क्योंकि

इसमें आँखें साफ़ होती हैं

ज़ुबान किसी की नक़ल नहीं होती

हथेली में बिछे होते हैं ख़्वाबों के पंख

साफ़ देखने के लिए आँखों का साफ़ होना ज़रूरी है।


बड़ों की उद्दंडता, हिंसा और अनुशासनसीनता का असर बच्चों पर बहुत होता है। बच्चे अगर ज़ाहिर कम करने लगें, समझना कि इनको भविष्य में रोने और केवल रोने को तैयार किया जा रहा है। 


**


“हमें कोई देख क्यों नहीं पाता?”


“हमें देखने के लिए मन और आत्मा का साफ़ होना ज़रूरी है।”


“तो क्या कोई भी...”


“बच्चे... सिवाय बच्चों के एंजिल को कौन याद करता है? कौन देखता है उन्हें अपने सपनों में?  कौन खोलकर रखता है अपने मन की सारी बातें बच्चों के सिवाय?”


बम गिरने से टूटी इमारत की छत, टूटे-बिखरे हुए मलबे को फ़िल्म निर्देशक अपने कैमरे में बंद करता है। शहर के ऊपर हुए विध्वंस को एक सबूत और सलाहियत की तरह देखती है उसके कैमरे की आँख। तस्वीरों को बचाए रखकर दिखाना चाहता है उस तमाचे का ख़ाली निशान, जो उसके पुरखों को मारा जाना था उस वक़्त। 


कला आने वाली नस्लों को मनोरंजन के साथ-साथ तमाचे और प्यार के निशान सौंपती है‌। 


प्रत्येक पर्वत के पास लालसा थी

एक और ऊँचे पर्वत की


प्रत्येक शहर को लालसा थी

एक बड़े शहर की


इंसानों के भीतर लालसा थी 

और फैल जाने की 

सुंदरता को नष्ट कर ख़तरनाक बनाने की। 


मेरे भीतर लालसा रही 

एक और ख़्वाब के पंख लगा 

फुर्र से उड़ जाने की। 


दो में से एक एंजिल को सर्कस में काम करती लड़की भा जाती है और वह अपने साथी को छोड़ पा लेता है-एक आदमी का जीवन। 

न रहने लायक बची इस धरती पर प्रेम उसे रोक लेता है। हमने जाना कि प्रेम सब स्वीकार कर लेता है।


आदमी की शक्ल में उसे सड़क पर लेटा देख बच्चे हँसते हैं, “आज इसने ज़्यादा पी ली है।”

टगता (लड़खड़ाता) चलता हुआ, वह जाकर मिलता है उसी लड़की से, जिसे एंजिल की शक्ल में वह देख रहा था, लड़की उसे नहीं देख पा रही थी। 

सर्कस का खेल जिसे देखने आते थे बच्चे और खिलखिलाते थे करतब देखकर, अब ख़त्म हो चुका है। भरा हुआ मैदान सपाट निपट अकेला लग रहा है। अब फ़िल्म की शूटिंग भी ख़त्म हो चुकी है, बाकी सब वैसा का वैसा ही है, दुनिया अब भी वही है। वही हैं ख़्वाब , वही हैं सब। लेकिन कहाँ बचा है सब, वही का वही? 


 ** 


फ़िल्म का निर्देशन, फ़िल्म का कम और दर्शक की आत्मा और मन का निर्देशन अधिक लगता है। एंजिल की घुमक्कड़ी में साथ-साथ हम भी उन आज्ञाकारी बच्चों की तरह पीछे हो लेते हैं, जिन्हें सब जानना है। 


ब्लैक एण्ड व्हाइट और रंगीन ट्रीटमेंट के ज़रिए धीरे-धीरे हम समझने लगते हैं एंजिल्स और बाक़ी पात्रों के बीच की दूरी। 


बर्लिन, जिसे इतिहास में बुरी तरह तोड़ा गया, इस कहानी की ज़मीन है। संवाद मन को, आँखों को धीरे-धीरे भिगोते है।


युद्ध सिवाय तबाही, भुखमरी और ख़ात्मे के कुछ नहीं देता। फिर भी दुनिया युद्ध से पटी हुई है। कुछ पाने की चाह में लड़ा गया कोई भी युद्ध सब छीन लेता है।  सब मतलब सब...


ख़्वाब  के मज़बूत पंख सभ्यताओं का भविष्य वहन करते हैं। 


फ़िल्म :  विंग्स ऑफ़ डिज़ायर 

निर्देशक : विम वेंडर्स 

वर्ष : 1987

IMDb रेटिंग : 7.9/10



सुमन शेखर युवा कवि हैं।  लेखन के साथ रंगकर्म और अभिनय में निरत। गोल चक्कर पर इनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : सुमन शेखर




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