ऐन कार्सन से विल एटकिन की बातचीत

ऐन कार्सन से विल एटकिन की बातचीत
(नोबेल पुरस्कार विशेष)
अनुवाद : सुमन शेखर
ऐन कार्सन और मेरी पहली मुलाकात 1988 में कनाडा में लेखकों की एक कार्यशाला में हुई थी। तब से हम एक-दूसरे की रचनाएँ पढते आ रहे हैं। आगे दिया गया यह साक्षात्कार हमारी आम बातचीत और उन विषयों पर चर्चा का मेल है, जो कार्सन के लेखन में बार-बार आते हैं। इनमें रहस्यवाद, प्राचीन सभ्यता, किसी चीज के प्रति जुनून और इच्छा जैसे विषय शामिल हैं।
कार्सन का जन्म 21 जून, 1950 को टोरंटो में हुआ था। वह मार्गरेट और रॉबर्ट कार्सन की दूसरी और आखिरी संतान थीं। उनकी माँ घर संभालती थीं और पिता टोरंटो डोमिनियन बैंक में काम करते थे। बचपन में उनका परिवार ओंटारियो के छोटे-छोटे कस्बों में एक बैंक से दूसरे बैंक जाता रहा। इनमें स्टोनी क्रीक, पोर्ट होप और टिमिन्स जैसे कस्बे शामिल थे।
1970 के दशक में कार्सन ने टोरंटो विश्वविद्यालय में प्राचीन साहित्य और सभ्यता का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने स्कॉटलैंड के सेंट एंड्रयूज विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध विद्वान केनेथ डोवर से प्राचीन यूनानी भाषा सीखी। 1981 में वह पीएचडी की थीसिस लिखने के लिए टोरंटो विश्वविद्यालय लौट आईं। उनकी थीसिस यूनानी कवयित्री सैफो पर थी, जो बाद में 'इरोस द बिटरस्वीट’ नामक किताब के रूप में प्रकाशित हुई। यह एक छोटी लेकिन विचारों से भरी किताब थी, जिसमें बताया गया था कि इच्छा के भीतर किसी चीज की कमी या अनुपस्थिति कितनी केंद्रीय भूमिका निभाती है। आज कार्सन एन आर्बर में रहती हैं और मिशिगन विश्वविद्यालय में प्राचीन साहित्य और तुलनात्मक साहित्य पढ़ाती हैं।
कार्सन हमेशा खुद को कवयित्री कहने से हिचकती रही हैं, लेकिन लगभग जीवन भर वह कविता के किसी अलग और परंपरा से हटकर दूसरे रूप में लिखती रही हैं। उनका लेखन अपनी बात पर अड़ा रहने वाला और नई राह खोलने वाला है। उसमें अलग-अलग विधाओं और शैलियों का मेल है। कई वर्षों तक उनके लेखन पर लोगों का ध्यान नहीं गया। अस्सी के दशक के आखिरी वर्षों में अमेरिका की कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं ने उनकी रचनाएँ प्रकाशित करना शुरू किया। कनाडा में उन्हें इससे कहीं कम स्वीकार्यता मिली। जब कार्सन बयालीस वर्ष की हुईं, तब जाकर कनाडा के एक छोटे प्रकाशक, ब्रिक बुक्स ने उनकी पहली किताब 'शॉर्ट टॉक्स प्रकाशित की।
नब्बे के दशक के मध्य तक स्थिति बदल चुकी थी। अब कार्सन को प्रकाशक ढूँढने की जरूरत नहीं थी, बल्कि प्रकाशक उन्हें ढूँढ रहे थे। कुछ ही समय में उनकी कविताओं और निबंधों की तीन किताबें प्रकाशित हुईं। इनमें 'प्लेनवॉटर : एसेज एंड पोएट्री '(1995), 'ग्लास, आयरनी एंड गॉड (1995) और 'मेन इन द ऑफ आवर्स' (2000) शामिल थीं। इसके अलावा 1998 में उनका पद्य-उपन्यास 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड' प्रकाशित हुआ। इसमें यूनानी मिथक, समलैंगिक प्रेमऔर ओंटारियो के छोटे कस्बों का जीवन सहज रूप से एक-दूसरे में घुल-मिल जाता है। इसके बाद 2002 में उनकी दो ऐसी किताबें आईं, जिन्हें मुख्य रूप से अकादमिक लेखन माना जा सकता है। ये थीं 'इकॉनमी ऑफ द अनलॉस्ट' और सैफो की कविताओं का उनका अनुवाद 'इफ नॉट, विंटर'।
इसके बाद पुरस्कार और सम्मान मिलने का सिलसिला शुरू हो गया। 1995 में उन्हें गुगेनहाइम फेलोशिप, 1996 में लैनन पुरस्कार, 1997 में पुशकार्ट पुरस्कार, 2000 में मैकआर्थर फेलोशिप और 2001 में ग्रिफिन कविता पुरस्कार मिला। 2002 में कार्सन इंग्लैंड का टी. एस. एलियट कविता पुरस्कार पाने वाली पहली महिला बनीं। उन्हें यह पुरस्कार उनकी किताब 'द ब्यूटी ऑफ द हज्बैंड : अ फिक्शनल एसे इन 29 टैंगोज' के लिए दिया गया।
पिछले कुछ वर्षों से कार्सन तीन रहस्यवादी स्त्रियों पर आधारित एक ऐसी ओपेरा-रचना पर काम कर रही हैं, जिसे बोलकर प्रस्तुत किया जाता है। ये तीन स्त्रियाँ हैं प्रेम की यूनानी देवी एफ्रोडाइट, चौदहवीं शताब्दी की फ्रांसीसी धर्म-विरोधी विचारक मार्गरीत पोरेते और सिमोन वेल। अगले वर्ष रैंडम हाउस उनकी इसी ओपेरा-रचना 'डिक्रिएशन' को नए निबंधों और कविताओं के साथ प्रकाशित करने वाला है।
हमने यह बातचीत 2002 में क्रिसमस के ठीक बाद शुरू की थी। त्योहार के दिनों की खुशी के साथ आने वाली भागदौड और थकान से चूर कार्सन नारंगी रंग के मखमली सोफे पर लेट गईं। हम दोनों ने कई घंटों तक ऊलॉन्ग चाय की चुस्कियों के साथ बातचीत की।
~ विल एटकिन
विल एटकिन : मैं आपकी कविता 'स्टैंजाज, सेक्सेज, सेडक्शन्स' से शुरुआत करना चाहता हूँ। उसमें एक पंक्ति है, जो पढते हुए मुझे बीच में ही रोक देती है : 'मेरी निजी कविता एक असफलता है।' इससे मेरे मन में दो सवाल उठे। आप अपनी निजी कविता किसे कहती हैं? और क्या आप सचमुच उसे असफल मानती हैं या यह केवल कविता में बोलने वाले व्यक्ति की आवाज है?
ऐन कार्सन : मुझे लगता है कि अलग-अलग कविताओं में मेरे व्यक्तित्व के अलग-अलग स्तर दिखाई देते हैं। कुछ कविताएँ मुझसे बहुत दूर लगती हैं और कुछ बिल्कुल करीब। जो कविताएँ मेरे करीब होती हैं, वे आम तौर पर वह बात नहीं कह पातीं, जो मैं उनसे कहलवाना चाहती हूँ। कविता में बोलने वाले व्यक्ति के साथ भी यही होता है और मेरे साथ भी।
विल एटकिन : उदाहरण के लिए, जब आप पीछे मुडकर 'द ग्लास एसे' को देखती हैं, तो क्या उसे निजी कविता मानती हैं? क्या आपको लगता है कि वह असफल रही?
ऐन कार्सन : मुझे लगता है कि वह उन चीजों के साथ एक ऊपरी स्तर पर किया गया काम है, जिन्हें मैं गहराई में जाकर समझना चाहती थी। मैं यह मानती हूँ कि मुझमें शारीरिक अनुभवों और भावनाओं से जुड़ी बातों को दर्ज करने की क्षमता है। जीवन कैसा महसूस होता है, उसकी मैं एक भरोसेमंद तस्वीर बना सकती हूँ। इसमें शरीर से जुडे अनुभव भी आते हैं और भावनात्मक अनुभव भी। लेकिन जब मैंने 'द ग्लास एसे' लिखी तो मैं इससे आगे जाकर यह भी समझना चाहती थी कि जीवन वास्तव में कैसा महसूस होता है। और मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा कर पाई। मुझे यह भी नहीं पता कि ऐसा कर पाना आखिर होता क्या है। लेकिन अगर आप वर्जीनिया वुल्फ या जॉर्ज एलियट को पढते हैं तो उनके लेखन से लौटते हुए आपके भीतर समझ की एक हल्की-सी महक रह जाती है। ऐसा लगता है जैसे आप कहानी के पात्रों के साथ किसी अनुभव से गुजरे हों और उस अनुभव को समझ भी पाए हों। अपने लेखन के बारे में सोचते हुए मुझे ऐसा महसूस नहीं होता।
विल एटकिन : क्या इसकी वजह यह है कि वह अनुभव अभी भी आपके निजी जीवन का हिस्सा है और आप उससे पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई हैं?
ऐन कार्सन : हो सकता है। लेकिन इन बातों का फैसला आखिर कोई कैसे कर सकता है?
विल एटकिन : या फिर ऐसा भी हो सकता है कि आपकी नजर में वह कविता असफल हो, लेकिन उसे पढने वाले बाकी लोगों के लिए वह सफल हो?
ऐन कार्सन : हाँ, मुझे ऐसा लगता है। भावनात्मक अनुभवों की बाहरी सतह को पकड़ना दूसरे लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है। वह उन्हें झकझोरता है, उन्हें सोचने के लिए प्रेरित करता है और उन्हें अपने स्तर पर समझने की कोशिश करने के लिए उकसाता है। लेकिन मुझे अब भी लगता है कि मैंने अपनी सोच को पूरा नहीं किया।
विल एटकिन : 'स्टैंजाज, सेक्सेज, सेडक्शन्स' में एक और पंक्ति है, "मैं असहनीय होना चाहती हूँ।" मुझे लगता है कि यह पंक्ति आपके लेखन को बहुत सटीक ढंग से व्यक्त करती है।
ऐन कार्सन : मुझे याद है, वह वाक्य अँधेरे में मेरी तरफ एक ग्लेशियर की तरह बढता हुआ आया था। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं दक्षिणी ध्रुव की ओर जा रहे किसी जहाज पर हूँ और अचानक अँधेरे से एक विशाल ग्लेशियर तेजी से मेरी ओर बढने लगता है। मैंने बस उस वाक्य को थाम लिया और लिख लिया। मुझे अच्छा लगता है कि वह वाक्य मेरे प्रभाव को ठीक तरह से व्यक्त करता है। मेरा लोगों पर जो असर पड़ता है, उसमें कुछ ऐसा है भी और मैं चाहती भी हूँ कि ऐसा हो। हालाँकि, मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि ऐसा क्यों है।
विल एटकिन : आपने एक बार कहा था कि असहनीय होने से आपका मतलब आध्यात्मिक अर्थ में असहनीय होना था।
ऐन कार्सन : हाँ, क्योंकि इसका मतलब शारीरिक रूप से असहनीय होना तो नहीं हो सकता, है न? जब तक कि मैं हथौड़ा लेकर लोगों के पीछे न दौडने लगूँ।
विल एटकिन : कुछ दिन ऐसे भी होते हैं।
ऐन कार्सन : नुकीली चीजों के साथ। यह सच है। इसीलिए मैं मुक्केबाजी की कक्षा में जाती हूँ, ताकि ये हुनर सीख सकूँ। लेकिन जैसा कि लोग कहते हैं, वह तो बस हवा में मुक्के मारने जैसा है।
विल एटकिन : वहाँ आप सचमुच किसी को मार नहीं सकतीं?
ऐन कार्सन : नहीं, किसी को नहीं।
विल एटकिन : लेकिन क्या आप अक्सर किसी को मारने के बारे में सोचती हैं?
ऐन कार्सन : मुक्केबाजी की कक्षा में तो सोचती हूँ। इसीलिए तो वहाँ जाती हूँ। यह हमेशा हैरान करता है कि मन में अचानक कौनसा व्यक्ति सामने आ जाता है जिसे आप मारना चाहते हैं। आम तौर पर वह व्यक्ति नहीं होता, जिसकी आप उम्मीद करते हैं।
विल एटकिन : क्या आपके शिक्षक आपको उन लोगों के नाम जोर से बोलने के लिए कहते हैं, जिन्हें आप अपना निशाना बनाना चाहती हैं?
ऐन कार्सन : नहीं, लेकिन यह अच्छा विचार होगा।
विल एटकिन : मेरे शिक्षक ऐसा करते थे। हालाँकि मेरी कक्षा में ज्यादातर महिलाएँ थीं। वे 'जॉर्ज ', 'फ्रेड' और 'टॉम' के नाम चिल्ला रही थीं। मैं भी उस माहौल में शामिल हो गया और मैंने चिल्लाकर कहा, 'पियरे!' कुछ पल के लिए सब चुप हो गए। फिर पूरी कक्षा 'पियरे!' चिल्लाने लगी और हम सब कुछ देर तक पियरे की पिटाई करते रहे।
ऐन कार्सन : यह तो अच्छा हुआ। असहनीय होने से ही इस तरह की सामूहिक मौज-मस्ती पैदा होती है। यह ज्यादातर अकेले की जाने वाली गतिविधि है। मैं वास्तव में नहीं जानती कि असहनीय होना क्या है। लेकिन मुझे लगता है कि लोगों पर मेरा जो प्रभाव पड़ता है, वह उन्हें एक ऐसी स्थिति में ले जाता है, जहाँ सब कुछ एक किनारे पर आकर ठहर जाता है। वे लोग व्यक्ति या उसके लेखन से आकर्षित भी होते हैं और साथ ही किसी ऐसे खुलासे से डरते भी हैं जो लगभग होने वाला है, लेकिन कभी पूरी तरह नहीं होता।
विल एटकिन : एक तरह की तेज चमक?
ऐन कार्सन : हाँ, मेरे पीछे से आती हुई एक तेज चमक। मान लीजिए कि मैं मंच पर खडी एक छोटी-सी अभिनेत्री हूँ। मेरे पीछे से एक भयानक तेज रोशनी आ रही है। लोग उसे महसूस करते हैं। मुझे खुद वह रोशनी महसूस नहीं होती, लेकिन मुझे पता रहता है कि वह मेरे पास से गुजर रही है। मैं लोगों के चेहरों पर घबराहट देखती हूँ जिसके साथ कोई दूसरी भावना भी मिली हुई होती है। शायद यही कारण रहा हो कि कभी-कभी लोग मुझे रहस्यमय या डरावना समझते हैं। उस तेज रोशनी के साथ बचपन सी मासूमियत भी जुडी रहती है, जो लोगों को निहत्था कर देती है। उन्हें इन दोनों चीजों का सामना करना पडता है।
विल एटकिन : लेकिन वह तेज चमक आखिर है क्या?
ऐन कार्सन : मैं कैसे बताऊँ! शायद वह भय है। उस सच्चाई से टकराना कि आप अकेले मरते हैं। जीवन भर कभी-कभी आप इस बारे में सोचते हैं। लेकिन यह बात आपकी उन तमाम छोटी-छोटी कोशिशों के सामने कोई अर्थ नहीं रखती, जिनके जरिए आप खुश रहने, दोस्त बनाने और समय बिताने की कोशिश करते हैं।
विल एटकिन : क्या हर व्यक्ति अपने भीतर उस चमक को लेकर चलता है? क्या आपके पीछे वह बस दूसरों से ज्यादा साफ दिखाई देती है?
ऐन कार्सन : मुझे लगता है कि हर व्यक्ति उस तक पहुँच सकता है। लेकिन लोग उसे अलग-अलग तरीकों से छिपा लेते हैं। किसी कारण से मैं उसे छिपाने के कम तरीके जानती हूँ।
विल एटकिन : क्या आपको लगता है कि यह भावना बचपन से ही आपके भीतर रही है? आपका बचपन कैसा था? मुझे पता है कि आप लोग बहुत जगहों पर रहे।
ऐन कार्सन : मेरे पिता बैंक में काम करते थे। कनाडा की बैंकिंग व्यवस्था में बैंक अधिकारियों का एक जगह से दूसरी जगह जाना आम बात है, क्योंकि वहाँ हर तीन साल में तबादला करने की नीति है। इसका उद्देश्य उन्हें अलग-अलग समुदायों और बैंकिंग के अलग-अलग तरीकों का अनुभव देना है। इससे बैंक को फायदा होता है, लेकिन परिवार के लिए यह बहुत मुश्किल खड़ी करता है।
विल एटकिन : तो हर तीन साल में आपका स्कूल भी बदल जाता था?
ऐन कार्सन : जी हाँ, लगभग हर बार। मुझे लगता है कि इससे मुश्किल परिस्थितियों में खुद को संभालने की मेरी क्षमता बढी। मुझे एक दिन की बात याद है। हम घर से निकल रहे थे। मैं अपने सबसे अच्छे दोस्तों को हाथ हिलाकर अलविदा कह रही थी, यह जानते हुए कि अब उन्हें फिर कभी नहीं देख पाऊँगी। उसी समय मैंने सोचा था कि अगली बार जब मैं कहीं जाऊँगी तो दोस्त बनाऊँगी ही नहीं। दोस्ती करने का कोई भविष्य ही नहीं है क्योंकि कुछ समय बाद मुझे वहाँ से चले जाना होगा। इस तरह मेरे भीतर धीरे-धीरे सिमटने और अपने चारों ओर दरवाजे बंद कर लेने की भावना पैदा हुई।
विल एटकिन : क्या अगले कस्बे में आपने कोई नए दोस्त नहीं बनाए?
ऐन कार्सन : बिल्कुल बनाए, लेकिन समय के साथ फिर मैं दोस्ती करने में ज्यादा सावधान होती गई। आपके मन का कम-से-कम आधा हिस्सा हमेशा यही सोचता रहता है कि मुझे यहाँ से जाना है, यह सब हमेशा नहीं रहने वाला। अगर मैं बौद्ध होती तो यह एक बहुत अच्छी बौद्ध भावना होती। इससे मुझे बहुत मदद मिलती। लेकिन इत्तेफाक से मैं बौद्ध नहीं हूँ, इसलिए मेरे लिए यह बस उदासी है।
विल एटकिन : अगर आप बौद्ध होतीं, तो ज्ञान प्राप्त करने की राह पर काफी आगे बढ चुकी होतीं।
ऐन कार्सन : इसके बजाय मैंने ज्ञान प्राप्त करने से पूरी दृढता के साथ दूरी बनाए रखी है।
विल एटकिन : अब मैं प्राचीन यूनान की बात करना चाहता हूँ। आपने यूनानी भाषा पढना पहली बार हाई स्कूल में शुरू किया था?
ऐन कार्सन : जी हाँ, तेरहवीं कक्षा में।
विल एटकिन : क्या आपको उसी समय समझ में आ गया था कि यह आपकी जिंदगी बदल देगी?
ऐन कार्सन : हाँ। तब श्रीमती कोवान ने मुझे यूनानी भाषा सिखाना शुरू किया था। वह पोर्ट होप के हाई स्कूल में हमारी लैटिन की शिक्षिका थीं लेकिन उन्हें साथ ही यूनानी भाषा भी आती थी। जब उन्हें पता चला कि मुझे उसमें दिलचस्पी है तो उन्होंने मुझे अलग से पढाने की पेशकश की। हम दोपहर के भोजन के समय पढते थे।
विल एटकिन : क्या वहाँ यूनानी भाषा की कोई अलग कक्षा नहीं थी?
ऐन कार्सन : नहीं। मेरे अलावा किसी को उसमें दिलचस्पी नहीं थी। हम दोनों ने साथ बैठकर सैफो को पढा और मेरे लिए यह अनुभव क्रांतिकारी था। मुझे नहीं पता कि दुनिया की हर भाषा कैसी है। शायद अगर मुझे संस्कृत और चीनी आतीं तो मैं कुछ और अलग सोचती। लेकिन यूनानी भाषा में कुछ ऐसा है जो आधुनिक भाषाओं की तुलना में शब्दों की जड़ों तक अधिक गहराई से पहुँचता है। उसे पढते हुए लगता है कि आप उस जगह तक पहुँच गए हैं, जहाँ शब्द काम करना शुरू करते हैं। अंग्रेजी में हम पेड़ की ऊपरी डालियों पर होते हैं, जहाँ इधर-उधर उछलते रहते हैं। यूनानी भाषा ने मुझे चकित कर दिया था। वह मेरे लिए एक नई खोज थी। आज भी वह मुझे उतना ही चकित करती है। वह एक ऐसे बंदरगाह की तरह है, जहाँ हमेशा आपका स्वागत होता है। यह अजीब है, लेकिन स्वागत करने वाला।
विल एटकिन : बहुत से लोग कहते हैं कि प्राचीन यूनानी लोग वास्तव में हमारे समकालीन हैं। क्या आप इससे सहमत हैं?
ऐन कार्सन : मुझे प्राचीन चीजों और आधुनिक जीवन के बीच कोई बहुत सीधा संबंध दिखाई नहीं देता। सत्तर और अस्सी के दशक में, जब मैं अपनी डिग्री पूरी कर रही थी और पढा रही थी, उस समय यह मानना एक तरह का चलन था कि प्राचीन साहित्य के अध्येता का काम अतीत में आज के जीवन से जुडी प्रासंगिकता ढूँढना है। तब ऐसे पाठ्यक्रम बनाए जाते थे, जिनसे विद्यार्थियों को यह समझाया जा सके कि आधुनिक जीवन के बारे में जो कुछ जानना जरूरी है, वह सब प्राचीन यूनानियों को पढकर सीखा जा सकता है। कम-से-कम कहूँ तो यह बहुत अजीब विचार है। यूनानियों के बारे में आकर्षक बात यह है कि उनकी दुनिया में हमें कभी-कभी अपने जीवन जैसी कुछ झलकियाँ दिखाई देती हैं, लेकिन वे झलकियाँ एक ऐसी दुनिया के भीतर मौजूद हैं, जो हमसे बिल्कुल अलग है। वहाँ दुनिया को लेकर ऐसी अजीब मान्यताएँ हैं और जीवन के प्रति ऐसी प्रतिक्रियाएँ हैं, जिनका हमारे लिए कोई अर्थ निकालना आसान नहीं है।
विल एटकिन : तो आपके सामने एक ऐसी अलग दुनिया है, जिसे आप जानना चाहती हैं। वह हमारे जीवन के लिए प्रासंगिक है या नहीं, यह दूसरी बात है।
ऐन कार्सन : यूनानियों के बारे में एक बात मैं समझती हूँ। वे भी इस बात को समझते थे कि जो चीज हमसे अलग है, उसका अपना महत्व है। वे उस भिन्नता को महत्व देते थे। देवता डायोनिसस इसी विचार का प्रतीक है। वह ऐसी चीज के सामने आ जाने का अनुभव है, जो हमसे इतनी अलग है कि हमें अपने ही भीतर से बाहर धकेल देती है। हम ऐसी जगह पहुँच जाते हैं जहाँ होने के बावजूद हम अपने भीतर भी मौजूद रहते हैं। वहाँ हमारा अपने ही एक दूसरे रूप से संबंध बनता है। यूनानी इसे 'एक्स्टेसी ' कहते थे, यानी अपने सामान्य आत्मबोध से बाहर निकल जाने की अवस्था। यह विचार यूनानियों ने स्वयं विकसित किया था, लेकिन वे खुद भी हमारे लिए इस विचार को साकार करते हैं। हालाँकि, ऐसा उनके प्रति उपयोगितावादी नजरिए के कारण भी हो सकता है। लेकिन कौन कह सकता है? हम हमेशा यूनानियों को देखते रहेंगे और यह समझने की कोशिश करते रहेंगे कि वे हमारे मुकाबले कहाँ खडे हैं। हम अपनी जगह से बाहर निकलकर किसी तीसरी जगह पर नहीं पहुँच सकते, जहाँ खड़े होकर हम दोनों को एक साथ देख सकें और उनके बारे में निष्पक्ष फैसला कर सकें।
विल एटकिन : यानी किसी ऐसी जगह से, जहाँ से हम पूरी तरह निष्पक्ष होकर देख सकें?
ऐन कार्सन : ऐसी कोई निष्पक्ष जगह होती ही नहीं है।
विल एटकिन : बहुत से लोगों को यह नहीं पता कि आप शब्दों के साथ काम करने वाली कलाकार होने के अलावा दृश्य कला की कलाकार भी हैं। आप किताबें बनाती हैं, और हर व्यक्ति के लिए एक अलग किताब। मुझे याद है, एक बार हम ओंटारियो के ग्रामीण इलाके से गुजर रहे थे। चारों ओर बर्फ ही बर्फ थी। आपने दूर की ओर इशारा करके कहा था, 'मैं वहाँ रहा करती थी। ' शायद वह पोर्ट होप था। मैंने बाहर देखा और सोचा कि वहाँ तो कभी कोई रहा ही नहीं होगा। वहाँ कुछ भी नहीं था। फिर आपने मुझे वह सफेद किताब दी थी जो आपने अपने भाई माइकल की मृत्यु के बाद उसके लिए तैयार किया था।
ऐन कार्सन : जब मैं यहाँ से टोरंटो जाने वाली ट्रेन में बैठती हूँ, तो पोर्ट होप से गुजरने का विचार मुझे हमेशा परेशान करता है। मेरा परिवार वहाँ छह-सात साल रहा था। मेरे माता-पिता लगभग पंद्रह साल वहाँ रहे और मेरा भाई भी बीच-बीच में वहाँ रहता था। वह किताब मेरे भाई के बारे में है, इसलिए उसका उस जगह से गहरा संबंध है। लेकिन वह ऐसी जगह भी है, जहाँ हम सबका जीवन बिखर गया था। नहीं नहीं, यह कहना शायद बहुत कठोर होगा। वह वह जगह थी, जहाँ मेरे भाई और मैंने अपनी किशोरावस्था का अंत देखा। यह अपने आप में एक बड़ी बात है।
विल एटकिन : तो आपने अपने भाई के शोक को व्यक्त करने के लिए वह किताब लिखी?
ऐन कार्सन : जी हाँ। जब मेरे भाई की मृत्यु हुई, तब मुझे उसे देखे हुए बाईस साल हो चुके थे। वह मेरे लिए एक रहस्य था। उसकी अचानक मृत्यु दूसरे देश में हुई थी। मुझे उसके जीवन की बिखरी हुई कहानी के टुकडों को इकट्ठा करके किसी ऐसी चीज में बदलने की जरूरत महसूस हुई, जिसे मैं अपने भीतर समेट सकूँ। इस अर्थ में वह एक शोकगीत है कि मैं उस व्यक्ति को किसी रूप में अपने पास रखने की कोशिश कर रही थी, जिससे अब मेरा संपर्क संभव नहीं था।
विल एटकिन : और वह एक प्राचीन शोकगीत पर आधारित थी, है न?
ऐन कार्सन : हाँ। वह पहली शताब्दी ईसा पूर्व के रोमन कवि कैटुलस की एक कविता पर आधारित है। कैटुलस का भाई ट्रॉय में मर गया था, जबकि कैटुलस इटली में रह रहा था। वह एशिया माइनर में स्थित ट्रॉय गया, अपने भाई को दफनाया और उसके बारे में एक कविता लिखी। उसमें एक पंक्ति बार-बार आती है, 'अलविदा और विदा। ' अपनी किताब में मैंने पहले उस कविता का पूरा पाठ छापा और फिर उसे टुकडों में बाँट दिया। मैंने हाल ही में एक लेख पढ़ा था, जिसमें टी. एस. एलियट के इस कथन का उल्लेख था, 'कविता विराम-चिह्न है। ' उसके बाद जैक लाकाँ का एक कथन दिया गया था, 'हम कविता के पास ज्ञान पाने के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान को तोड़ने के लिए जाते हैं। ' मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी।
इस किताब में मैंने कैटुलस की कविता को इस तरह तोड़ा कि हर पन्ने पर केवल एक शब्द था। बाईं ओर लैटिन शब्द और शब्दकोश में उसका अर्थ दिया गया था। दाईं ओर मेरे भाई के जीवन की किसी याद का एक छोटा-सा अंश था, जिसका संबंध बाईं ओर दिए गए शब्द से होता था। जहाँ शब्दकोश का अर्थ मेरी याद से मेल नहीं खाता था, वहाँ मैंने उसे बदल दिया। इस तरह मैंने कुछ ऐसी बातें भी चुपके से जोड़ दीं, जो पूरी तरह प्रामाणिक नहीं थीं। लेकिन इससे किताब के दोनों हिस्से एक-दूसरे से जुड़ जाते थे। पूरी किताब एक ओर कविता के अनुवाद की कहानी कहती थी और दूसरी ओर मेरे भाई के जीवन की यादों को भी तोड़कर नए रूप में रखती थी।
विल एटकिन : आपने परिवार की पुरानी तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया था, लेकिन उनमें ज्यादातर पीछे का हिस्सा ही दिखाई देता है। ऐसा क्यों?
ऐन कार्सन : मुझे लगा कि हमारे परिवार की तस्वीरों में सामने दिखाई देने वाले लोग और दृश्य बिल्कुल साधारण हैं। लेकिन तस्वीरों की पृष्ठभूमि डरावनी थी और उसमें बहुत कुछ छिपा हुआ था। इसलिए मैंने तस्वीरों से पृष्ठभूमि के हिस्से काटकर निकाले। खासकर वे हिस्से, जहाँ सामने खड़े लोगों की परछाइयाँ पीछे की ओर अजीब ढंग से पड़ रही थीं। उन पृष्ठभूमियों में बहुत सच्चाई थी। मैंने माइकल के पत्रों के कुछ हिस्से भी इस्तेमाल किए। वे उसके असली पत्रों के टुकड़े थे। मैंने उसकी चिट्ठियों के जवाब में मेरी माँ ने जो लिखा था, उसके कुछ अंश भी लिए। इसके अलावा रंग, प्लास्टिक, स्टेपल और दूसरी सजावटी चीजों का इस्तेमाल किताब के दाईं ओर किया।
बाईं ओर के पन्नों को मैंने पुराना रूप देने की कोशिश की, क्योंकि किताब का आधार एक प्राचीन रोमन कविता थी। इसके लिए मैंने पन्नों को चाय में भिगोया। इससे उन पर एक रहस्यमय भूरा रंग चढ गया।
विल एटकिन : मैं सोच रहा था कि आपको पुरानी और टूटी-फूटी चीजें इतनी पसंद क्यों हैं।
ऐन कार्सन : किसी चीज की बाहरी सतह पर पूर्णता मुझे कम आकर्षक लगती है। उदाहरण के लिए, कविता लिखे हुए एक साफ पन्ने की तुलना में वह पन्ना अधिक सुंदर लगता है, जिस पर कविता के साथ चाय के दाग भी हों। उन दागों से उसमें इतिहास जुड़ जाता है। यह इतिहास को देखने का एक तरीका है। प्राचीन यूनानियों के ग्रंथ भी हमारे पास टूटे-फूटे रूप में पहुँचे हैं। मुझे यह बात अच्छी लगती है। अब जरा सोचिए, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में पपीरस के पन्नों पर कुछ लिखा गया। फिर उसकी नकल बनाई गई। उसके बाद उन पन्नों को किसी ममी के चारों ओर लपेटकर दो सौ साल तक रखा गया। फिर वे खोजे गए, संग्रहालय में पहुँचाए गए और नौ अलग-अलग विद्वानों ने उनके टुकड़ों को जोड़कर उन्हें फिर से तैयार किया। उसके बाद उन्हें संग्रहालय में वापस रखा गया, फिर बाहर निकालकर उनकी तस्वीरें खींची गईं और उन्हें किसी किताब में प्रकाशित किया गया।
ये सारी परतें मिलकर उसमें और जीवन जोड़ देती हैं। आप अपने जीवन में भी इस तरह की परतें बना सकते हैं। कपड़ों पर लगे दाग भी ऐसा ही करते हैं।
विल एटकिन : क्या उस किताब को बनाने से आपको अपने भाई को समझने में मदद मिली?
ऐन कार्सन : नहीं। मुझे नहीं लगता कि इससे उसे समझने की मेरी क्षमता पर जरा भी असर पड़ा। आखिरकार मैंने तय किया कि शोक का संबंध समझने से नहीं है। शोकगीतों का भी नहीं। उनका काम उस कुरूप अव्यवस्था से कुछ सुंदर बनाना है, जो किसी की मृत्यु के बाद हमारे हिस्से में आती है। हम उस अव्यवस्था को अच्छा बनाना चाहते हैं। मेरे लिए किसी चीज को अच्छा बनाने का अर्थ है उसे ऐसी वस्तु में बदल देना, जिसे देखना रोमांचक और सुंदर लगे।
विल एटकिन : यह दिलचस्प है कि आपने 'वस्तु ' शब्द का इस्तेमाल किया। आपकी कविताएँ भी कविताओं की बजाय वस्तुओं जैसी लगती हैं। ऐसा लगता है, जैसे उन्हें किसी चित्र की तरह बनाया गया हो।
ऐन कार्सन : हाँ, ऐसी वस्तुएँ जिनके भीतर आप यात्रा कर सकते हैं। मुझे लगता है कि कविता का काम यही होना चाहिए। प्राचीन यूनानी जब कविता की बात करते थे, तो वे 'माइमेसिस ' शब्द का इस्तेमाल करते थे। इसका अर्थ केवल किसी चीज की नकल करना नहीं था, बल्कि पाठक पर कविता की वास्तविक क्रिया या उसके प्रभाव से भी था। कुछ लोगों का मानना है कि इसका अर्थ है कि कवि किसी घटना की तस्वीर उतार लेता है और फिर पन्ने पर उसका एक सटीक विवरण रख देता है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि बात इतनी सीधी है। मेरे विचार से, जब कोई कविता सचमुच काम करती है, तो वह मन की एक गतिविधि होती है, जिसे पन्ने पर पकड़ लिया गया है। जब पाठक उस कविता से जुड़ता है, तो उसे भी उस गतिविधि के भीतर प्रवेश करना पड़ता है। उसका मन उस प्रक्रिया को दोहराता है और उसी रास्ते से गुजरता है। यह किसी विचार या सोचने की प्रक्रिया के भीतर से गुजरने जैसा ही है। जब आप कविता के अंत तक पहुँचते हैं, तो आप शुरुआत में मौजूद व्यक्ति जैसे नहीं रह जाते। आप अपने भीतर उस बदलाव को महसूस करते हैं।
विल एटकिन : तो यह लेखक और पाठक, दोनों के लिए एक क्रिया है।
ऐन कार्सन : जी हाँ, बिल्कुल है। लेखक ने वह काम बहुत पहले किया था, लेकिन जब आप कविता पढते हैं, तो आपको लगता है कि आप किसी दूसरे व्यक्ति के मन के साथ मिलकर एक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।
विल एटकिन : क्या आपको याद है कि आपने पहली बार कब ऐसा महसूस किया था कि आपको इस तरह की रचना करनी चाहिए? आपने लिखना कब शुरू किया?
ऐन कार्सन : मुझे दूसरी कक्षा का एक दिन याद है। हमें खेत और पशुओं के बाड़े का चित्र बनाना था। शिक्षिका ने कहा कि अगर हम चाहें, तो अपने चित्र के साथ एक कहानी भी लिख सकते हैं, ताकि वह समझाया जा सके कि हमारे चित्र में क्या है। मेरे लिए तब वह एक बड़ी खोज थी। चित्र और कहानी को एक साथ रखना।
मेरी पहली कविता की किताब 'शॉर्ट टॉक्स ' भी शुरू में कुछ चित्रों का संग्रह थी, जिनके साथ केवल शीर्षक लिखे थे। फिर मैंने उन शीर्षकों को थोड़ा विस्तार दिया। धीरे-धीरे मुझे लगा कि किसी को उन चित्रों में दिलचस्पी नहीं है। इसलिए मैंने चित्रों से शीर्षक अलग कर लिए। उसके बाद वे छोटे-छोटे व्याख्यान जैसे अंश बन गए।
विल एटकिन : तो ट्राउट मछली वाली कविता में शुरू में ट्राउट मछलियों के चित्र थे?
ऐन कार्सन : उस कविता में एक मछुआरे का चित्र था। मेरे पास घर पर उसका मूल मसौदा है, जिसमें सारे चित्र बने हुए हैं। किसी को मेरे चित्र कभी पसंद नहीं आए। मुझे नहीं लगता कि मैं चित्र बनाने में बहुत अच्छी थी। शायद अगर मैंने उतने ही चित्र बनाए होते, जितना मैं लिखती रही हूँ, तो मैं अच्छी चित्रकार बन सकती थी। लेकिन चित्र बनाना मुझे ज्यादा डरावना लगता है। उसमें आप खुद को अधिक खुलकर सामने रखते हैं। चित्र बनाते समय आप अपने असली रूप को छिपा नहीं सकते।
विल एटकिन : मैं हमेशा सोचता था कि चूँकि आपका मुख्य काम लिखना है, इसलिए आप आराम करने के लिए चित्र बनाती होंगी।
ऐन कार्सन : नहीं, ऐसा नहीं है।
विल एटकिन : तो लिखना आपके लिए आराम करने जैसा है?
ऐन कार्सन : जी हाँ। चित्र बनाने की तुलना में लिखना मेरे लिए खेल जैसा ही है। चित्र बनाना बहुत खुला और असुरक्षित कर देने वाला काम है। उसमें आप पूरी तरह नंगे हो जाते हैं। डरावने ढंग से नंगे। लेकिन मुझे हमेशा लगता रहा है कि अगर मैं खुद को हर दिन चित्र बनाने के लिए मजबूर कर पाती, तो शायद एक बेहतर इंसान भी बन जाती। इससे मुझे ईमानदारी और ईमानदार बने रहने के अनुशासन की ओर बढने में मदद मिलती। उन चीजों से, जिनमें मैं आम तौर पर ढिलाई कर जाती हूँ। चित्र बनाते समय मैं बहुत खुश भी होती हूँ। यहाँ तक कि माइकल की किताब बनाते समय भी, जिसका विषय पूरी तरह दुख से भरा था, मुझे बहुत खुशी महसूस हुई। मुझे लगा कि मैं कुछ ऐसा कर रही हूँ, जिससे भीतर से संतुष्टि मिल रही है।
विल एटकिन : और लिखते समय आपको कभी ऐसी खुशी महसूस नहीं होती?
ऐन कार्सन : नहीं, या कहें बहुत कम। शायद एक पल के लिए या कभी-कभी कुछ क्षणों के लिए। लेकिन लंबे समय तक ऐसी खुशी नहीं रहती। कोई वस्तु बनाना मेरे पूरे अस्तित्व को जिस तरह अपने भीतर समेट लेता है, लेखन ऐसा नहीं करता।
विल एटकिन : तो फिर आप लिखती ही क्यों हैं?
ऐन कार्सन : मैं यह जानने के लिए लिखती हूँ कि किसी चीज के बारे में मैं वास्तव में क्या सोचती हूँ।
विल एटकिन : क्या आप बता सकती हैं कि आप लिखने के लिए कैसे काम करती हैं?
ऐन कार्सन : मैं तीन अलग-अलग मेजों पर काम करती हूँ। मान लीजिए, हर मेज पर एक अलग दुनिया खुली हुई है। एक मेज पर अकादमिक काम, दूसरी पर लेखन और तीसरी पर चित्र से जुड़ा काम होता है। मैं इन पर अनियमित ढंग से काम करती हूँ। कभी-कभी एक ही घंटे में तीनों मेजों पर बैठ जाती हूँ। इन तीनों कामों के विचार एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और एक-दूसरे से कुछ न कुछ लेते रहते हैं।
विल एटकिन : तो यह कोई नियमित दिनचर्या नहीं, बल्कि एक व्यवस्था है।
ऐन कार्सन : यहाँ एक दिलचस्प अंतर है। मैं कहूँगी कि दिनचर्या इस अर्थ में है कि हर सुबह उठकर टहलने जाती हूँ। लौटकर चाय और नाश्ता बनाती हूँ। फिर एक घंटे तक पढ़ती हूँ। इन दिनों मैं प्रूस्त को पढ रही हूँ। उनकी किताब मेरे पास है और मैं उसे शब्दकोश की मदद से पढती हूँ। इसके बाद मैं अपनी मेजों पर काम करने बैठती हूँ। इसलिए दिन की शुरुआत एक तय दिनचर्या से होती है, लेकिन उसके बाद काम एक बहती हुई व्यवस्था की तरह चलता है।
विल एटकिन : लेखन के प्रेरणा की प्रक्रिया के बारे में क्या कहेंगी? कौनसी चीजें आपको लिखने के लिए प्रेरित करती हैं?
ऐन कार्सन : कुछ खास दृश्य या तस्वीरें मेरे भीतर सोचने और काम करने की शुरुआत करती हैं। उदाहरण के लिए, 'द ग्लास एसे ' की शुरुआत मेरी माँ के घर के पास एक जमी हुई नाली को देखते हुए हुई थी। मुझे लगता है कि वह दृश्य, कविता में भी कहीं आता है। इस तरह कोई चीज जिसे आप अपनी इंद्रियों के माध्यम से अनुभव करते हैं, किसी विचार को जन्म दे सकती है।
विल एटकिन : क्या ध्वनि, गंध या बस में किसी की सुनी हुई बात भी इसमें भूमिका निभाती है?
ऐन कार्सन : जी हाँ। बस में सुने गए वाक्य या सपनों में आए वाक्य भी। कभी-कभी मैं सपने में कोई वाक्य सुनती हूँ और उठकर उसे लिख लेती हूँ। आम तौर पर उसका कोई अर्थ नहीं होता, लेकिन कभी-कभी वह किसी दूसरी दुनिया की चाबी जैसा लगता है।
विल एटकिन : आप ऐसी चीजों को जोड़कर काम करती हुई दिखाई देती हैं, जिनके बीच संबंध जोड़ने के बारे में शायद दुनिया में कोई दूसरा व्यक्ति सोच भी न सके।
ऐन कार्सन : आप किन चीजों के बीच संबंध बनाने के बारे में सोचते हैं, यह आपके नियंत्रण में नहीं होता। यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि आप कौन हैं और दुनिया से टकराते हुए कैसे आगे बढते जाते हैं। लेकिन आप उन चीजों को किस तरह जोड़ते हैं, इससे आपके मन की प्रकृति का पता चलता है। किसी व्यक्ति की अपनी पहचान इस बात में छिपी होती है कि वह चीजों के बीच संबंध कैसे बनाता है।
विल एटकिन : आपकी किताब 'इकॉनमी ऑफ द अनलॉस्ट ' में आपने सिमोनिदीज और पॉल सेलान को एक साथ रखा है। सिमोनिदीज समाधिलेख लिखते थे और वह पहले कवि थे, जिन्हें अपनी कविता के लिए पैसे मिले। दूसरी ओर पॉल सेलान उनसे कई शताब्दियों बाद आए। आपको इन दोनों को जोड़ने का विचार कैसे आया?
ऐन कार्सन : मैं आपको उन चीजों की सूची दे सकती हूँ, जिन्हें मैंने देखा था, लेकिन इससे यह नहीं पता चलेगा कि मैंने उन्हें एक साथ क्यों रखा। वह तो बाद में बनाई गई व्याख्या होगी। मैंने उन्हें संयोग से एक साथ रखा था। और मुझे इसमें कोई परेशानी नहीं है। मैं संयोग से काम करने के लिए तैयार रहती हूँ। मेरे लिए दिलचस्प बात यह है कि एक बार संयोग घट जाने के बाद, जब सिमोनिदीज और पॉल सेलान दोनों मेरी मेज पर आ जाते हैं, तो मैं उस संबंध का क्या करती हूँ?
मैं उसके साथ क्या करूँगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस समय तक मैंने अपने जीवन में क्या-क्या सोचा है और उस समय मैं कौन हूँ। उनकी जगह सिमोनिदीज और अजवाइन भी हो सकती थी। इससे कोई फर्क नहीं पडता। फर्क केवल इस बात से पड़ता है कि मैं उस संबंध से कला की कोई रचना बना पाती हूँ या नहीं। एक ओर यह सब पूरी तरह मनमाना लगता है, लेकिन दूसरी ओर यह मेरे सोचने के ढंग और मेरे व्यक्तित्व के बारे में बहुत खास बात बताता है।
विल एटकिन : तो पहले आप एक रचना को समझती हैं, फिर दूसरी को, और धीरे-धीरे उनके बीच ऐसे संबंध दिखाई देने लगते हैं, जो शुरू में साफ नहीं थे?
ऐन कार्सन : जी हाँ, बिल्कुल। मुझे लगता है कि मैं किसी शिकारी कुत्ते की तरह उनका पीछा करती हूँ। मेरी नाक जमीन के पास होती है और मैं किसी गंध के निशान के बजाय आकृतियों के निशान खोज रही होती हूँ। मैं विचारों को भी अलग-अलग आकारों वाली चीजों की तरह देखती हूँ। जब मुझे लगता है कि दो अलग-अलग लेखों या लेखकों के भीतर एक जैसे आकार मौजूद हैं, तो मैं समझ जाती हूँ कि उन्हें एक साथ रखा जा सकता है।
विल एटकिन : जब आप इस तरह के संबंध बना लेती हैं, तो यह कैसे तय करती हैं कि उससे कविता बनेगी या गद्य?
ऐन कार्सन : यह बताना असंभव है। मैं इसे कोई फैसला लेना नहीं कहूँगी। यह कुछ-कुछ सूँघते हुए अपना रास्ता खोजने जैसा है।
विल एटकिन : क्या 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड ' शुरू में गद्य जैसी लगी थी?
ऐन कार्सन : मैंने शुरू में उसके कुछ हिस्से गद्य के रूप में टाइप किए थे, लेकिन वे बहुत उलझे हुए और बेवकूफी भरे लग रहे थे। मुझे लगता है कि मैंने वह लेखन बेन सोनेनबर्ग को भेजा था। उस समय वह ग्रैंड स्ट्रीट पत्रिका चलाते थे। उन्होंने कहा कि मुझे उसे फेंक देना चाहिए।
विल एटकिन : आपकी किताबों में कभी-कभी कविता में बोलने वाला व्यक्ति समलैंगिक पुरुष या लडका होता है। जैसे 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड ' में गेरियॉन हेराक्लीज से प्रेम करने लगता है। क्या आप समलैंगिक पुरुष के रूप में अपने जीवन के बारे में कुछ बताना चाहेंगी?
ऐन कार्सन : मेरा यह सफर कुछ उतार-चढ़ाव भरा रहा है। मैं इसमें कभी पूरी तरह सफल नहीं रही। मुझे लगता है कि इसकी शुरुआत हाई स्कूल में हुई, जब मुझे ऑस्कर वाइल्ड से गहरा लगाव हो गया। मेरे कुछ दोस्तों को भी उनमें दिलचस्पी थी। हम ऑस्कर वाइल्ड की तरह कपड़े पहनते थे, उनके वाक्य याद करते थे और दोपहर के भोजन के समय इस तरह बातचीत करते थे, मानो हम ऑस्कर वाइल्ड और उनके दोस्त हों। मुझे ठीक से याद नहीं कि मैं ऑस्कर वाइल्ड पर इतनी केंद्रित क्यों हो गई थी। लेकिन मुझे लगता है कि उनसे मुझे सौंदर्यबोध की समझ मिली। साथ ही, मैंने अपने ही बारे में एक तरह की विडंबनापूर्ण दूरी बनाना भी सीखा, जो आगे के जीवन में उपयोगी रही। मुझे लगता है कि बहुत से समलैंगिक पुरुष सामाजिक और निजी जीवन से गुजरने के लिए अपने चारों ओर विडंबना का एक कवच बना लेते हैं। मैंने भी उस कवच को अपने लिए उपयोगी पाया।
विल एटकिन : प्लेनवॉटर में 'द एंथ्रोपोलॉजी ऑफ वॉटर ' की कविता में भी एक ऐसा ही पात्र है।
ऐन कार्सन : अच्छा, आपको लगता है कि वह पुरुष है?
विल एटकिन : आप उसमें एक जगह खुद को पुरुष कहती हैं।
ऐन कार्सन : समलैंगिक पुरुष होने की यही तो एक और बात है। आप ऑस्कर वाइल्ड को अपना आदर्श बना लेते हैं और फिर हर समय झूठ बोलते रहते हैं।
विल एटकिन : 'द एंथ्रोपोलॉजी ऑफ वॉटर ' में सैंटियागो दे कोम्पोस्तेला की तीर्थयात्रा का वर्णन है। आपने सचमुच वह यात्रा की थी, है न?
ऐन कार्सन : हाँ, मैं पैदल स्पेन के एक बडे हिस्से से गुजरी थी। यह लगभग 380 मील की यात्रा है और इसमें छह सप्ताह लगते हैं। मैंने सॉकोनी कंपनी के दस साल पुराने दौडने वाले जूते पहने थे। वे दुनिया के सबसे अच्छे जूते थे। मेरे साथ मेरा एक दोस्त था, जिसे मैंने किताब में 'एल सिड ' नाम दिया है।
विल एटकिन : क्या आपको पहले से पता था कि आप इस अनुभव को किताब में बदलेंगी?
ऐन कार्सन : मैं पूरी यात्रा के दौरान हर शाम छोटी-छोटी किताबों में लिखती रही थी। शुरुआत से ही मैं लगभग उन्हीं विषयों पर लिख रही थी। पैदल चलने का अनुभव, प्रायश्चित का विचार और उस आदमी के साथ मेरा संबंध, जो मेरे साथ यात्रा कर रहा था। वह उस तरह के पुरुषों का प्रतीक है, जो मेरे जीवन में आते रहे हैं।
विल एटकिन : यानी आपके लेखन में आने वाले वे पुरुष, जो अपने विचारों पर अड़े रहते हैं और जिनके भीतर कुछ छिपा होता है?
ऐन कार्सन : हाँ, वह पुरुष जिसके भीतर एक छिपा हुआ व्यक्तित्व है। उसका वह रूप, जहाँ तक पहुँचना संभव नहीं है।
विल एटकिन : जब मैं 'द एंथ्रोपोलॉजी ऑफ वॉटर ' पढ़ रहा था, तो मुझे लगा कि यह आपके बारे में है। आपकी और एल सिड की कोम्पोस्तेला यात्रा के बारे में। कम-से-कम तब तक, जब तक आप अचानक कुछ ऐसा नहीं कहतीं, जिससे पता चलता है कि आप एक युवा पुरुष हैं।
ऐन कार्सन : अच्छा, हाँ। ऐसा हो सकता है। मैंने वह रचना काफी समय से नहीं पढी है, लेकिन मुझे लगता है कि आप सही कह रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि मैंने कभी खुद को पूरी तरह स्त्री महसूस किया है। हालाँकि, शायद बहुत से लोग ऐसा महसूस नहीं करते। मुझे लगता है कि जीवन के अलग-अलग समय में मैंने अपने लिए लिंग की इस सीमा के भीतर अलग-अलग जगहें चुनी हैं। तीस की उम्र के दौरान, जब मैंने वह तीर्थयात्रा की थी, कई वर्षों तक मेरा स्त्री होने की पहचान से कोई संबंध नहीं था। मैं यह नहीं कहूँगी कि मैं खुद को ठीक-ठीक पुरुष महसूस करती थी। लेकिन जब आप अपने बारे में बात करते हैं, तो आपके सामने केवल दो विकल्प होते हैं। हमारे पास उस लिंग के लिए कोई शब्द नहीं है, जो किसी एक जगह पर ठहरा हुआ नहीं है और जिसके भीतर हम सभी शायद आराम करना चाहेंगे।
मेरी कविता 'अनबीयरेबल ' में नपुंसक लिंग का उल्लेख आता है, लेकिन उससे भी मेरी भावना पूरी तरह व्यक्त नहीं होती। क्योंकि आप खुद को नपुंसक महसूस नहीं करते। आपको बस लगता है कि कुछ गलत है। जिस लिंग का आपको होना चाहिए, उसके संबंध में आप गलत हैं और दूसरे लिंग के संबंध में भी गलत हैं। तो फिर आप हैं क्या? इतिहास में पुरुषों को सभी लिंगों के लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है, क्योंकि जीत पुरुषों की हुई है। इसलिए जब आप किसी मुश्किल स्थिति में फँस जाते हैं, तो उस शब्द का इस्तेमाल करना सुविधाजनक हो जाता है।
विल एटकिन : जब आप पहली बार मॉन्ट्रियल आई थीं, तब आपकी नारीवाद में बहुत दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन बाद में आप उन महिलाओं के एक समूह में शामिल हुईं, जो साथ बैठकर पढती थीं। आपके भीतर क्या बदला?
ऐन कार्सन : क्या मैंने ऐसा किया था? यह तो मुझमें बहुत साहस की बात थी।
विल एटकिन : शुरुआत में आप इस विचार के प्रति संदेह से भरी हुई थीं, बल्कि कुछ हद तक विरोधी भी थीं, क्योंकि दूसरी महिलाएँ नारीवादी थीं। लेकिन फिर कुछ हुआ और अचानक आप महिलाओं और मिट्टी के बारे में लिखने लगीं।
ऐन कार्सन : हाँ, सही है। घटनाओं का कोई क्रम रहा होगा। अच्छा, अब जब मैं पीछे मुडकर देखती हूँ, तो मुझे लगता है कि लंबे समय तक मैं सिर्फ अपने ही संसार में बंद रही। ऐसा नहीं था कि मैं नारीवादी नहीं थी या नारीवाद को समझती नहीं थी। मैं पुरुषों के प्रभुत्व वाली सोच को भी नहीं समझती थी। सच तो यह है कि मैं इंसान होने का अर्थ ही नहीं समझती थी। यह किशोरावस्था के लंबे समय तक खिंच जाने की समस्या है। आप नहीं जानते कि किसी समूह का हिस्सा होते हुए भी खुद कैसे बने रहें। इसलिए आप खुद को एक बिल्कुल अलग और अजीब व्यक्ति के रूप में देखते हैं और दूसरों की ओर से आपको परिभाषित करने की हर कोशिश का विरोध करते हैं। मुझे लगता है कि ज्यादातर लोग सत्रह साल की उम्र तक इस दौर से गुजर जाते हैं, लेकिन मेरे साथ यह लगभग चालीस साल की उम्र तक चलता रहा।
कुछ समय पहले तक मेरे ऐसे दोस्त नहीं थे, जिनके साथ मैं सहज रह सकूँ और अपनी सारी अजीबोगरीब बातें बिना किसी डर के सामने रख सकूँ। अब मेरे पास ऐसे लोग हैं। वे मेरे अजीब होने की वजह से मुझसे अपना संबंध नहीं तोड़ते। पुरुषों के साथ मेरा अनुभव यह रहा है कि अगर वे आपको पसंद नहीं करते, तो आपको छोडकर चले जाते हैं।
विल एटकिन : क्या यही वह बात है जिसका आपका मतलब था, जब आपने मुझसे कहा था कि आप खुद को बुरा या दुष्ट समझती हैं?
ऐन कार्सन : हाँ, हो सकता है। यह उसी बात को कहने का एक और तरीका है, कुछ ज्यादा नाटकीय तरीका। जब मैं अपने भीतर कुछ बेहतर सोच पैदा करना चाहती हूँ, तो कभी-कभी खुद को झकझोरने के लिए बुराई और अच्छाई जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हूँ।
विल एटकिन : 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ रेड ' में ऐसा लगता है कि गेरियॉन खुद को दुष्ट समझता है। वह एक राक्षस है। यह उसकी अपनी नजर में उसकी पहचान है, किसी और की ओर से उस पर थोपी गई पहचान नहीं। आपके खुद को देखने के तरीके में भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। मैं जानना चाहता हूँ कि यह भावना कहाँ से आती है। इसका एक हिस्सा 'डर्ट एंड डिजायर ' में सामने आता है। वहाँ स्त्रियों को इस तरह देखा जाता है कि वे…
ऐन कार्सन : अपवित्र हैं।
विल एटकिन : जी हाँ, अपवित्र। जिन्हें किसी सीमा में बाँधा नहीं जा सकता। वे हर तरफ फैल जाती हैं, उनके भीतर छेद हैं और आपको उन्हें हमेशा भीतर रोककर रखना पडता है, वरना वे बाढ की तरह सब कुछ बहा ले जाएँगी।
ऐन कार्सन : हर तरफ रिसती हुई।
विल एटकिन : यह तो इतिहास से मिला जवाब हुआ। लेकिन क्या इसका कोई निजी कारण भी है?
ऐन कार्सन : मुझे नहीं पता। गेरियॉन की कहानी ने मुझे उसकी राक्षसी प्रकृति के कारण आकर्षित किया था। हालाँकि, यह कहना कुछ घिसा-पिटा विचार है कि हम सब खुद को राक्षस समझते हैं। लेकिन इसका संबंध लिंग से जरूर है। मुझे नहीं पता कि एक स्त्री के रूप में बड़े होने में ऐसा क्या है, जो किसी को यह सोचने पर मजबूर करता है कि वह एक राक्षस है।
विल एटकिन : क्या हम सैफो की इकतीसवीं कविता के अंश पर बात कर सकते हैं? 'इरोस द बिटरस्वीट ' में आपने उसका इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया था कि इरोस के भीतर किसी चीज की कमी है। लेकिन जब आप 'डिक्रिएशन ' में उसी कविता पर लौटती हैं, तो उसकी व्याख्या लगभग पूरी तरह बदल जाती है। वहाँ आप उसे आध्यात्मिक अर्थ में पढती हैं।
ऐन कार्सन : हाँ, यह थोडा उलझाने वाला है। दोनों व्याख्याओं में अंतर इस बात से पैदा होता है कि हम पांडुलिपि में मौजूद कविता की आखिरी पंक्ति को नजरअंदाज करते हैं या उसे ध्यान में रखते हैं। वह आधी पंक्ति बहुत रहस्यमय है। उसका संबंध साहस करने और गरीबी से है। जब मैंने 'डिक्रिएशन ' में उसका अर्थ समझने की कोशिश की, तो मुझे उसका अर्थ आध्यात्मिक रूप में ही समझ में आया। उस बिंदु तक कविता प्रेम और इच्छा के एक त्रिकोण के बारे में है। लेकिन उस आधी पंक्ति में वह एक नई जगह पर पहुँच जाती है। मैंने उस जगह को ईश्वर के सामने खडे होने की जगह के रूप में समझने का फैसला किया। मुझे नहीं पता कि सैफो के लिए आध्यात्मिक वास्तविकता का क्या अर्थ था। उस आधी पंक्ति के बाद कविता आगे नहीं बढती। लेकिन 'डिक्रिएशन ' में मैं उसकी व्याख्या रहस्यवाद के उस अर्थ में करना चाहती थी, जहाँ गरीबी का मतलब अपने अहं या स्वयं को मिटा देना है।
कविता का इकतीसवाँ अंश :
वह मुझे देवताओं के बराबर लगता है, वह आदमी,
जो भी हो वह, जो तुम्हारे सामने
बैठा है और तुम्हारी मीठी बातों को
ध्यान से सुनता है,
तुम्हारी प्यारी हँसी को सुनता है
ओह, यह मेरे सीने में दिल को
पंख लगा देता है
क्योंकि जब मैं तुम्हें देखती हूँ, चाहे एक पल के लिए ही,
तो मेरे भीतर बोलने की शक्ति नहीं बचती
नहीं, मेरी जीभ टूट जाती है और एक पतली-सी
आग मेरी त्वचा के नीचे दौड़ने लगती है।
मेरी आँखों की रोशनी चली जाती है और कानों में
ढोल बजने लगते हैं
ठंडा पसीना मुझे जकड़ लेता है और
मेरा पूरा शरीर काँपने लगता है
मैं घास से भी अधिक हरी पड़ जाती हूँ।
मैं मर चुकी हूँ, या लगभग मर चुकी हूँ।
कम-से-कम मुझे तो ऐसा ही लगता है।
लेकिन हर चीज का साहस करना चाहिए,
क्योंकि एक गरीब व्यक्ति भी...
विल एटकिन : क्या कविता में यह आनंद अपने आपको मिटा देने से पैदा होता है?
ऐन कार्सन : हाँ। सैफो अपनी कविता में एक्स्टेसी शब्द का इस्तेमाल नहीं करतीं, लेकिन वह अपने बारे में इस तरह बात करती हैं, जैसे वह खुद से बाहर खड़ी होकर अपनी ही स्थिति को देख रही हों। यही अपने आप में आनंद की अवस्था है। लेकिन यह उस स्थिति से भी जुड़ती है, जिसे बहुत से रहस्यवादी प्राप्त करना चाहते हैं। वे अपने व्यक्तित्व को मिटाकर खुद को एक खाली पात्र बनाना चाहते हैं, ताकि ईश्वर उसमें प्रवेश कर सके। मुझे नहीं लगता कि सैफो के मन में ठीक यही विचार था। उनकी कविता के बारे में ऐसा कहना इतिहास की दृष्टि से गलत होगा। लेकिन मुझे लगता है कि देवताओं और मनुष्य के साथ उनके संबंधों का वर्णन करते समय सैफो के लेखन में एक गहरी आध्यात्मिकता है। वह केवल सजावट या काव्यात्मक प्रभाव पैदा करने वाली चीज नहीं है। उनकी कविताएँ पढते समय हमें इस पहलू को भी ध्यान में रखना चाहिए। यह उसी अलगपन का एक हिस्सा है, जिसके बारे में हमने पहले बात की थी। यूनानी लोग गहरे धार्मिक थे। उनके सैंकड़ों देवता थे और धार्मिक विचार उनके जीवन के हर हिस्से में मौजूद थे।
विल एटकिन : 'डिक्रिएशन ' में एक विचार यह भी है कि मनुष्य खालीपन में बड़बड़ाता रहता है, क्योंकि ईश्वर से बात करने या उस तक पहुँचने की उम्मीद करने का यही एक तरीका है। वह बस वहाँ खडा होकर जो मन में आए, बोलता रहता है।
ऐन कार्सन : नहीं, मैं इसे बडबडाना या मन में आने वाली हर बात उगल देना नहीं कहूँगी। सैफो की कविता में देवताओं को संबोधित करते हुए जो बातें कही गई हैं, वे व्यवस्थित हैं और बहुत सुंदर काव्यात्मक रचनाएँ हैं। लेकिन कविता जिस तरह बीच में टूटकर रुक जाती है, वही इस तरह के अधूरे अंशों का जादू है। उसके बाद हम एक ऐसे विचार के सामने पहुँच जाते हैं, जिसे कभी पूरी तरह समझा या पकड़ा नहीं जा सकता। वहाँ किसी विचार के लिए जगह तो है, लेकिन आप उस विचार तक पहुँच नहीं सकते। मुझे वह जगह बहुत पसंद है। यही कारण है कि मुझे अधूरे अंशों के साथ काम करना अच्छा लगता है। क्योंकि कोई विचार अगर पूरी तरह व्यक्त कर दिया जाए, तो वह उस संकेत जितना अच्छा नहीं रह जाता, जो उसके अधूरे रह जाने से पैदा होता है। कोई भी पूरी तरह विकसित विचार उस खाली जगह जितना ध्यान खींचने वाला और रहस्यमय नहीं हो सकता।
विल एटकिन : 'डिक्रिएशन ' में आप सैफो, मार्गरीत पोरेते और सिमोन वेल को ऐसी लेखिकाओं के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जिनका लेखन अपने आपको व्यक्त करने और लोगों के सामने अपने आपको प्रदर्शित करने का एक तरीका है। लेकिन साथ ही आप कहती हैं कि वे तीनों अपने आप से दूर भागने की कोशिश भी कर रही थीं। यही उलझन 'इकॉनमी ऑफ द अनलॉस्ट ' में भी सामने आती है। एक जगह आप कहती हैं, 'मेरे लेखन में स्वयं बहुत अधिक है। ' क्या अलग-अलग तरह के काम करना, जैसे कविता, निबंध, ओपेरा, अकादमिक लेखन और पढाना, अपने भीतर की दीवारों में खिडकियाँ बनाने की कोशिश है?
ऐन कार्सन : नहीं। मैं कहूँगी कि यह अपने किसी एक रूप में बँध जाने से बचने का तरीका है। मैं एक पहचान से दूसरी पहचान की ओर जाती रहती हूँ, ताकि मेरा कोई एक निश्चित व्यक्तित्व न बन जाए, जिसमें मैं पूरी तरह कैद हो जाऊँ।
विल एटकिन : आप अक्सर दूसरे कलाकारों के साथ मिलकर काम करती हैं…
ऐन कार्सन : 'डिक्रिएशन ' को कई अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया गया है। इसे कला-स्थापना के रूप में, मंच पर प्रदर्शन के रूप में और पढाने के एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया है। न्यूयॉर्क, मिशिगन, सैन फ्रांसिस्को, पॉट्सडैम, मॉन्ट्रियल, इंग्लैंड और फिर मिशिगन में भी इसे अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया गया।
विल एटकिन : आपने दूसरे लोगों के साथ मिलकर किताबें भी तैयार की हैं।
ऐन कार्सन : कैलिफोर्निया की कलाकार किम ऐनो के साथ मैंने एक किताब तैयार किया, जिसमें 'डिक्रिएशन ' के गीतों और संवादों के कुछ हिस्से थे। इसके अलावा, हाल ही में न्यूयॉर्क की कलाकार रोनी हॉर्न ने मुझसे चार अन्य लोगों के साथ मिलकर एक किताब तैयार करने के लिए कहा। उन लोगों में लुईज बुर्जुआ, एलेन सिक्सू और जॉन वाटर्स शामिल थे।
विल एटकिन : दूसरे कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव आपके लिए कैसा रहता है?
ऐन कार्सन : यह मेरे लिए तभी अच्छा रहता है, जब मैं उस काम के केंद्र से थोड़ा बाहर रह सकूँ। जब मैं उसकी व्यवस्था करने वाली, उसका निर्देशन करने वाली या उस काम की धुरी न बनूँ।
विल एटकिन : क्या इससे आप उस काम को किसी दूसरे नजरिए से देख पाती हैं?
ऐन कार्सन : इससे मेरी चिंता कम होती है और चिंता कम होने पर नए विचार पैदा हो सकते हैं। केंद्र से बाहर की जगह अधिक खुली होती है।
विल एटकिन : मानो आपको अपनी ही रचना से अचानक मुलाकात करनी पडती हो?
ऐन कार्सन : बिल्कुल। मुझे उसमें अपने लिए जगह चुपके से बनानी पडती है।
विल एटकिन : कुछ साल पहले आपने कॉलेज के विद्यार्थियों के साथ 'डिक्रिएशन ' का एक नाट्य-प्रदर्शन किया था। आपने ऐसे लोगों के साथ काम करने का फैसला क्यों किया, जिन्हें इस तरह के काम का कोई अनुभव नहीं था?
ऐन कार्सन : लोगों को बिल्कुल अनजानी चीजों से परिचित कराना एक नशे जैसा अनुभव है। शायद अगर मुझे आम तौर पर लोगों को नई चीजों से परिचित कराना अच्छा न लगता, तो मैं पढाने के पेशे में भी नहीं आती।
विल एटकिन : पढाने का आपके रचनात्मक काम पर क्या असर पडता है?
ऐन कार्सन : इससे मेरे जीवन को एक ढाँचा मिलता है और मुझे बात करने के लिए लोग मिलते हैं। इस तरह यह मुझे मानसिक रूप से स्वस्थ रहने में मदद करता है।
विल एटकिन : 'इकॉनमी ऑफ द अनलॉस्ट ' में आप कहती हैं कि अकादमिक लेखन अपने सबसे अच्छे रूप में व्यक्ति को अपने अहं से मुक्त करता है। लेकिन फिर आप इस विचार से पीछे हटती हैं और मानती हैं कि आपका सबसे अच्छा अकादमिक लेखन अक्सर आपके निजी संसार से आता है, जहाँ आप सौंदर्य और कला के बारे में सोचती हैं।
ऐन कार्सन : मुझे सिखाया गया था कि अकादमिक सवालों पर निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ ढंग से लिखना ही विद्वत्तापूर्ण लेखन का आदर्श रूप है। लेकिन जब मैंने खुद अकादमिक लेखन किया, तो मुझे यह संभव नहीं लगा। मैं जब भी सोचती थी, तो इस बात के बारे में भी सोचती थी कि मैं सोच कैसे रही हूँ। मैं यह नहीं जानती कि यह मेरी अपनी समस्या है या इंसान होने की समस्या। इसलिए मैंने मान लिया कि यह मनुष्य होने की समस्या है। इस कारण मेरा अकादमिक लेखन, जहाँ तक वह अकादमिक लेखन है, बहुत निजी है। लेकिन चूँकि मुझे पता है कि यह एक समस्या है, इसलिए मैं अपने निजी अनुभव और पाठक के बीच लगातार एक पुल बनाने की कोशिश करती हूँ। मेरी दृष्टि निजी होती है, लेकिन समय-समय पर मैं पाठक को भी उस दृष्टि के भीतर आने का अवसर देती हूँ।
विल एटकिन : क्या कैथोलिक धर्म आपके लिए अपने आप से बाहर निकलने का कोई रास्ता है?
ऐन कार्सन : नहीं, इसके ठीक उलट। जब मैं चर्च में बैठकर यह समझने की कोशिश करती हूँ कि आखिर मैं वहाँ क्यों आई हूँ, तो शायद मैं अपने आप से सबसे अधिक जुड़ी हुई होती हूँ। उस समय मैं अपनी माँ के बारे में सोचती हूँ और उन तमाम दिनों को याद करती हूँ, जब हम साथ में चर्च जाया करते थे। चर्च से जुड़ी मेरी सबसे अच्छी याद यही है कि प्रार्थना के समय मैं अपनी माँ के नकली फर वाले कोट से सटकर बैठती थी। मुझे उस कोट की गंध याद है। सर्दियों के ठंडे दिन में वह मुझे कितना सुकून देती थी। लेकिन नहीं, चर्च जाना अपने आप से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है।
विल एटकिन : क्या आप खुद को बहुत धार्मिक मानती हैं?
ऐन कार्सन : नहीं। मैं खुद को ऐसा व्यक्ति मानती हूँ, जो बहुत उलझन में है। एक ओर ईश्वर का पूरा सवाल है और मनुष्य का ईश्वर से क्या संबंध है, यह समझना मुश्किल है। दूसरी ओर, शायद मेरे जीवन में बहुत सारी खाली जगहें हैं, इसलिए मैं इस बात को जानने और समझने के लिए तैयार रहती हूँ कि इसका अर्थ क्या हो सकता है। मैं चर्च इस उम्मीद से नहीं जाती कि मुझे वहाँ कोई संतुष्टि मिलेगी या कोई आध्यात्मिक रौशनी मिलेगी। मैं वहाँ इसलिए जाती हूँ क्योंकि मैं हमेशा से जाती रही हूँ, मेरी माँ जाती थीं और उनकी माँ भी जाती थीं। वहाँ एक तरह की सोच पैदा होती है, जो कहीं और पैदा नहीं होती। प्रार्थना चाहे जितनी भी नीरस हो या पादरी का उपदेश चाहे जितना भी बेमतलब का हो, फिर भी वहाँ एक ऐसी जगह होती है जहाँ कुछ और नहीं हो रहा होता। उस खाली जगह में ईश्वर के बारे में या ईश्वर के होने के सवाल के बारे में सोचा जा सकता है। लेकिन इससे कुछ बदलता नहीं है। मैं इस बारे में कोई अधिक बुद्धिमान नहीं बन जाती। न ही मैं नैतिक रूप से बेहतर या अधिक दिलचस्प व्यक्ति बनती हूँ। मैं वैसी ही रहती हूँ, जैसी पहले थी।
विल एटकिन : तो धर्म के सिद्धांतों को लेकर आपका कोई बहुत कठोर या निश्चित नजरिया नहीं है?
ऐन कार्सन : मैं यह नहीं कहूँगी कि कैथोलिक धर्म के सिद्धांतों का हर पहलू मुझे समझ में आता है। उसके इतिहास और उसके कई नियमों का मेरे लिए कोई खास अर्थ नहीं है। इसलिए नहीं, मैं कैथोलिक विचारों को अपने जीवन का मार्गदर्शन करने वाला साधन नहीं मानती। लेकिन मुझे लगता है कि देवताओं और ईश्वर के सवाल से जूझना इंसान होने का एक हिस्सा है। यह केवल एक ऐतिहासिक संयोग है कि मेरी माँ ने मुझे कैथोलिक बनाया और उन्हें उनकी माँ ने कैथोलिक बनाया था। यह परंपरा, जो हमें अपने साथ लेकर चलती है, एक तरह का संयोग ही है। मैं मुस्लिम भी हो सकती थी और तब भी शायद उतनी ही उलझन में रहती।
विल एटकिन : क्या आपको लगता है कि आपका ईश्वर के साथ कोई संबंध है?
ऐन कार्सन : नहीं। लेकिन इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में, जब से मैं 'डिक्रिएशन ' पर काम कर रही हूँ और रहस्यवादियों को पढ रही हूँ, खासकर सिमोन वेल को, तब से मैं इस बात को बेहतर ढंग से समझने लगी हूँ कि एक इंसान के रूप में हम अधिक-से-अधिक यही उम्मीद कर सकते हैं कि हम उस खालीपन के साथ कोई संबंध बना सकें जहाँ ईश्वर हो सकता था, अगर वह हमारी पहुँच में होता। लेकिन ईश्वर हमारी पहुँच में नहीं है। यह एक दुखद सच्चाई है। इसलिए इसकी आदत डाल लीजिए, क्योंकि इसके अलावा कुछ और होने वाला नहीं है।
विल एटकिन : क्या ईश्वर हमारी पहुँच से बाहर इसलिए है क्योंकि वह खुद को हमसे दूर रखना चाहता है, या इसलिए कि उसका अस्तित्व ही नहीं है?
ऐन कार्सन : इन दोनों में से किसी कारण से नहीं। वह हमारी पहुँच से बाहर इसलिए है क्योंकि वह उस तरह का अस्तित्व नहीं है, जिसे हम अपनी पहुँच में ला सकें। रहस्यवादी इसे कहते हैं, 'जिसे जाना नहीं जा सकता। ' और ईश्वर की उपासना करने वाला व्यक्ति उससे ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। वह चाहता है कि ज्ञान का एक आदान-प्रदान हो, जिसमें वह ईश्वर को जाने और ईश्वर उसे जाने। प्रेम के किसी भी संबंध में लोग यही चाहते हैं। ईश्वर के साथ हमारा संबंध भी प्रेम का संबंध माना जाता है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि मनुष्यों और देवताओं के बीच इस तरह का ज्ञान कभी संभव हो पाएगा।
विल एटकिन : क्या यह समस्या ईश्वर के स्वभाव में ही है?
ऐन कार्सन : यह दोनों के अस्तित्व के अलग-अलग स्तरों के कारण है। अगर ईश्वर को जाना जा सकता, तो हम उस पर विश्वास ही क्यों करते?
विल एटकिन : तो वह प्राचीन यूनानियों की तरह है, एक ऐसा दूसरा अस्तित्व जिसे जाना नहीं जा सकता। जिसकी उपस्थिति आकर्षक है और किसी तरह हमें कुछ समझने में मदद करती है, लेकिन जिसे हम वास्तव में समझ नहीं सकते।
ऐन कार्सन : जी हाँ। वह ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसे हम अपनी जरूरतों को पूरा करने या अपने कामों में इस्तेमाल करने के लिए उपलब्ध साधन की तरह देख सकें। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उसका अस्तित्व ही नहीं है।
विल एटकिन : मुझे पता है कि आप समय-समय पर उदात्तता के विचार पर काम करती रही हैं। क्या उसमें माइकल एंजेलो एंतोनियोनी और अभिनेत्री मोनिका विती का संबंध भी शामिल है?
ऐन कार्सन : उसके कुछ हिस्सों में था। लेकिन मुझे लगता है कि मैंने अब उदात्तता के विचार पर काम करना छोड दिया है। कुछ समय पहले मैंने उसे समझने की कोशिश की थी। किसी कारण से मुझे लगा कि मोनिका विती, खासकर रेड डेजर्ट में, उदात्तता का प्रतीक हैं। इसलिए मैंने 'रेड डेजर्ट ' का अध्ययन किया, उसके बारे में कुछ लिखा और फिर उदात्तता के सिद्धांत तक पहुँची। मैंने अलग-अलग लोगों के विचार पढे। एडमंड बर्क, कांट और खुद एंतोनियोनी के विचार भी। लेकिन यह विषय मेरे लिए बहुत बडा था। मैं कुछ समय तक उसके इर्द-गिर्द लिखती रही। फिर मैंने उससे थोडा बाहर निकलकर देखा कि क्या उसमें कोई ऐसा सूत्र है, जिसे मैं पकड़कर आगे बढा सकती हूँ। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाई। उस विषय ने मुझे हरा दिया।
विल एटकिन : मैं खास तौर पर उस कविता के बारे में सोच रहा हूँ, जिसमें एंतोनियोनी एक पागलखाने में जाते हैं।
ऐन कार्सन : हाँ, वह एक सच्ची घटना है। वह पहली बार फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे थे और एक पागलखाने में शूटिंग करने गए थे। उन्होंने वहाँ रहने वाले लोगों से अपने लिए अभिनय करवाने की कोशिश की।
विल एटकिन : क्या उन्होंने उन लोगों को बताया था कि उन्हें क्या करना है?
ऐन कार्सन : वह इतनी दूर तक पहुँच ही नहीं पाए। वह उस कमरे में गए, जहाँ उन लोगों को लाया गया था। उन्होंने उन्हें किसी तरह खड़ा किया और फिल्म बनाने के लिए जरूरी लाइटें जला दीं। इसके बाद वे लोग बेकाबू हो गए। वहाँ मौजूद डॉक्टरों ने अनुमान लगाया कि ऐसा लाइटों की वजह से हुआ था।
विल एटकिन : आपकी कल्पना यह है कि वे लोग जान-बूझकर जमीन पर लोटने लगते हैं, क्योंकि उन्हें पता चल जाता है कि पागल होने का नाटक करते हुए वे एक-दूसरे को चूम सकते हैं।
ऐन कार्सन : यह थोडा जटिल खेल है। मुझे लगता है कि जब भी कोई परिस्थिति खतरे या किसी नई चीज का संकेत देती है, तो वे सब मिलकर एक तरह का खेल खेलने लगते हैं। इसलिए वे जमीन पर गिरकर लोटने लगते हैं। फिर उनमें से कुछ लोग, जो एक-दूसरे को पसंद करते हैं, इसी मौके का इस्तेमाल चूमने के लिए भी कर लेते हैं। लेकिन यह केवल एक अतिरिक्त बात है। जमीन पर लोटने का मुख्य कारण यह नहीं है। उदात्तता के बारे में पारंपरिक विचारों में, जैसे कांट के विचारों में, अक्सर बाहरी दुनिया की कोई घटना इस अनुभव की शुरुआत करती है। उदाहरण के लिए, गरजता हुआ तूफान, कोई ऊँची चट्टान या तारों से भरी विशाल रात। यह अनंतता के सामने चक्कर आने जैसा अनुभव है। उसके बाद व्यक्ति भयभीत होकर पीछे हटता है। फिर उसे लगता है कि उसने उस भय पर विजय पा ली है। वह सोचता है, देखो, कितना अविश्वसनीय भय था और देखो, अपने अद्भुत मानवीय मन की मदद से मैं उससे कितना ऊपर उठ गया हूँ!
विल एटकिन : मुझे याद है, वह समय बहुत पहले का नहीं है, जब लोग आपके लेखन को गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं थे। आप कहा करती थीं, 'मेरी मृत्यु के पंद्रह मिनट बाद मैं प्रसिद्ध हो जाऊँगी। ' पिछले कुछ वर्षों में सब कुछ बदल गया है। मैं जानना चाहता हूँ कि इससे आपके निजी जीवन और पेशेवर जीवन पर क्या असर पडा है।
ऐन कार्सन : इससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पडा। हाँ, इतना जरूर है कि हवाई अड्डों पर लोग मेरा स्वागत करने आ जाते हैं। यह अच्छा लगता है। मेरे लेखन पर भी इसका बहुत अधिक असर नहीं हुआ। बस अब मुझे लगता है कि मैं जो चाहूँ, वह करने के लिए कुछ अधिक स्वतंत्र हूँ। यह अच्छी बात भी है और बुरी भी। अच्छी इसलिए कि इससे मुझे नई चीजों को खोजने की जगह मिलती है। बुरी इसलिए कि मुझे नहीं पता कि लोग अब मेरे काम को पहले की तरह गंभीरता से परखते भी हैं या नहीं। पहले एक खाली जगह होती थी, जहाँ मेरे काम को देखकर लोग फैसला करते थे कि यह अच्छा है या बुरा। अब पहले से एक जगह बनी हुई है। लोगों का फैसला पहले ही तय हो चुका होता है और मुझे बस उस फैसले के अनुरूप काम करना होता है या उससे अलग जाना होता है। जब तक मैं उस जगह में प्रवेश करती हूँ, वह पहले ही बदल चुकी होती है।
विल एटकिन : पहले आपके लेखन को देखकर लोग पूरी तरह उलझन में पड़ जाते थे। वे कहते थे, 'लेकिन यह कविता नहीं है, यह तो साफ तौर पर गद्य है। मैं गद्य और कविता के बीच का फर्क जानता हूँ। ' उनकी प्रतिक्रियाएँ पूरी तरह नकारात्मक होती थीं।
ऐन कार्सन : हाँ। उसके बाद जिसे लोग विचारों में बदलाव या पैराडाइम शिफ्ट कहते हैं, वह हुआ। अब स्थिति ऐसी है कि मैं कुछ भी गलत नहीं कर सकती। लेकिन वास्तव में इसका अर्थ यह है कि लोग मेरे काम के बारे में अब भी उतने ही बिना सोचे-समझे फैसले कर रहे हैं, जितने पहले करते थे। मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों होता है। शायद लोग सोचने से डरते हैं। वे चाहते हैं कि उन्हें पहले से एक श्रेणी मिल जाए, जिसमें किसी चीज को रखकर वे कह सकें कि अब हमें पता है कि यह अच्छी है और हम इसका आनंद ले सकते हैं।
विल एटकिन : क्या मैकआर्थर पुरस्कार मिलने का भी ऐसा ही असर हुआ? मुझे पता है कि इससे आपकी जीवनशैली बहुत आलीशान नहीं हो गई।
ऐन कार्सन : आपका क्या मतलब है? मुझे लगता है कि मैंने कुछ मोजे खरीदे थे। मोजे और तकिए का एक नया खोल। इसके अलावा, अब मैं किसी भी समय बैंक में जा सकती हूँ। बैंक के दरवाजे बंद हो जाने के बाद भी वे दौड़कर आते हैं और मुझे भीतर ले जाकर पिछले कमरे में पहुँचा देते हैं। मुझे यह सब बहुत प्यारा लगता है। इसके अलावा, ज्यादा कुछ नहीं बदला।
विल एटकिन : पैसे के बारे में आपका एक दिलचस्प विचार है।
ऐन कार्सन : वह इतना दिलचस्प भी नहीं है। यह बस पैसे को लेकर प्रचलित विचार का उलट है। आम तौर पर लोग मानते हैं कि जीवन में पैसा ही नहीं, बल्कि सभी संख्याएँ बढनी चाहिए। लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि उन्हें बड़ा ही क्यों होना चाहिए। अगर आप इस विचार को उलटकर सोचें कि जीवन में सभी संख्याएँ छोटी होनी चाहिए, तो इससे जीवन बेहतर हो जाता है।
विल एटकिन : आपके पिता इस विचार के बारे में क्या सोचते थे?
ऐन कार्सन : मुझे कहना होगा कि पिताजी इस विचार से सहमत ही नहीं थे।
विल एटकिन : पैसे के बारे में उनका नजरिया क्या था?
ऐन कार्सन : यह एक जटिल मामला था। मुझे नहीं लगता कि मैं उन्हें पूरी तरह समझ पाई। मुझे केवल इतना याद है कि जब भी हम आर्थिक मामलों के बारे में बात करते थे, तो अंत में हम मेज पर बैठे होते थे। हमारे चारों ओर रुमाल पडे होते थे, जिन पर तरह-तरह के हिसाब लिखे होते थे। हम दोनों के लिए यह पूरी तरह निराश कर देने वाली स्थिति होती थी।
विल एटकिन : क्या कनाडा में पैदा होने और वहाँ से जुड़े होने ने एक लेखक के रूप में आपको किसी तरह बनाया है?
ऐन कार्सन : नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता। मुझे नहीं पता कि अगर मेरा जन्म किसी दूसरी जगह हुआ होता, तो मैं अलग होती या नहीं। जब मैं अमेरिका जाती हूँ, तो मुझे अपने भीतर कुछ अलग महसूस होता है, लेकिन मैं उसे शब्दों में ठीक से व्यक्त नहीं कर सकती। जब मैं वापस कनाडा आती हूँ, तो राहत महसूस करती हूँ। शायद इसलिए कि यहाँ सबके बीच अलग दिखाई न देना अच्छा लगता है। यहाँ आप आसानी से लोगों की नजरों से दूर रह सकते हैं। मुझे कनाडा की चट्टानों, वहाँ की हवा और उस गंध की याद आती है, जो वहाँ की दुनिया में मौजूद है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि कनाडा ने मुझे एक लेखक के रूप में बनाया है।
विल एटकिन : क्या आज के लेखक आपके लेखन को किसी तरह प्रभावित करते हैं? क्या दूसरों के प्रभाव में आ जाने का डर आपको परेशान करता है?
ऐन कार्सन : जब मैं किसी लेखक को पढती हूँ और सोचती हूँ कि मैं भी ऐसा ही कुछ लिखना चाहती हूँ, तो मैं उसे पढना बंद कर देती हूँ। मैं उसकी नकल नहीं करना चाहती। मेरे भीतर नकल करने की एक प्रवृत्ति है। मैं आसानी से किसी दूसरे की नकल करने लग सकती हूँ। और फिर वह नकल एक तरह की पैरोडी बन जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं उस व्यक्ति की तरह बनना नहीं चाहती, जिसकी नकल करना मुझे अच्छा लगता है। लेकिन जब आप किसी की नकल करना चाहते हैं, मगर उसके जैसा बनना नहीं चाहते, तो अंत में आपके पास उसका मजाकिया या व्यंग्यात्मक रूप बनाने के अलावा क्या बचता है? उदाहरण के लिए, मुझे माविस गैलेंट का लेखन पसंद है। लेकिन जब मैं खुद लिख रही होती हूँ, तो कोशिश करती हूँ कि उन्हें न पढूँ। क्योंकि मुझे डर है कि मैं उनके लेखन में पूरी तरह घुल-मिल जाऊँगी। इसलिए मैं अपनी अलग आवाज गढने की कोशिश नहीं करती, लेकिन इतना जरूर चाहती हूँ कि मेरी आवाज किसी दूसरे की आवाज में मिलकर खो न जाए।
विल एटकिन : जब मैं आपके और एलिस मनरो के लेखन के बारे में सोचता हूँ, तो मुझे आप दोनों के बीच कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं। आप दोनों का भौतिक दुनिया और जीवन की छोटी-छोटी चीजों से गहरा लगाव है। ऐसा लगता है कि आप उन चीजों का आनंद लेती हैं, चाहे वे अच्छी हों, बुरी हों, दुख देने वाली हों या कुछ और। क्या आपको भी ऐसा लगता है?
ऐन कार्सन : मैं इस बात को समझ सकती हूँ। किसी चीज का आनंद लेने के लिए रम जाना एक अच्छा शब्द है। लेकिन वह और मैं बहुत अलग हैं। हमारे बीच जो समानता है, वह शायद यह है कि जीवन चाहे जितना बुरा हो, उसमें से कुछ दिलचस्प बना लेना जरूरी है। इसका बहुत गहरा संबंध भौतिक दुनिया से है। चीजों को ध्यान से देखने से। बर्फ, रोशनी, जालीदार दरवाजे की गंध और उन तमाम चीजों से, जो हर पल हमारे वास्तविक अनुभव का हिस्सा बनती हैं। इस बात में कितना सुकून है कि ये चीजें लगातार मौजूद रहती हैं। आप इनके बारे में सोचते रह सकते हैं और फिर इन्हें पन्ने पर उतार सकते हैं।
विल एटकिन : और यह अनुभव सभी लोगों के लिए मौजूद है।
ऐन कार्सन : हाँ, यह सभी के लिए मौजूद है और हम हमेशा इसके बारे में एक-दूसरे से बात कर सकते हैं। जब मैं जॉर्ज एलियट को पढती हूँ, तो शायद मैं उनकी किताबें मौसम के वर्णन के लिए पढती हूँ। हो सकता है कि यह उन्हें पढने का गलत तरीका हो, लेकिन मुझे बहुत सुकून मिलता है कि वह किस तरह पेड़ों पर पड़ती रोशनी, बेंच पर फैलती रोशनी और वहाँ बैठे किसी व्यक्ति के पैर का वर्णन करते हैं।
विल एटकिन : लेकिन आप एलियट के एक कथन का उल्लेख करती हैं, जिसमें वह कहते हैं कि किसी चीज का वर्णन करने की कोशिश करना मूर्खतापूर्ण है। क्या उन्होंने सचमुच ऐसा कहा था?
ऐन कार्सन : हाँ, उन्होंने ऐसा कहा था। लेकिन वह खुद लगातार वर्णन करने की कोशिश भी करते रहते हैं। हालाँकि, वह अपने वर्णन को सीमित रखते हैं। मुझे लगता है कि उनमें वर्णन करने की क्षमता उससे कहीं अधिक है, जितना वह खुद इस्तेमाल करते हैं। आमतौर पर वह हर अध्याय की शुरुआत में मौसम का एक छोटा-सा वर्णन करते हैं। फिर वह बात जीवन के अर्थ पर होने वाली दार्शनिक बातचीत की ओर बढ जाती हैं। लेकिन हर अध्याय की शुरुआत में मौसम मौजूद रहता है और उसे नकारा नहीं जा सकता। वह उसे बिल्कुल सही ढंग से पकड लेते हैं। उदाहरण के लिए, वह बताते हैं कि सुबह ग्यारह बजे ओक के पेड़ों वाले जंगल के रास्ते पर सूरज के सामने से बादल किस तरह गुजरते हैं। वह दृश्य बिल्कुल वैसा ही लगता है, जैसा वास्तव में हो सकता है। लेखन के किसी भी दूसरे पहलू की तुलना में मैं इसकी अधिक प्रशंसा करती हूँ।
विल एटकिन : शाम के समय का वर्णन भी वह बहुत अच्छा करते हैं। ऐसा लगता है कि अध्याय की शुरुआत में सुबह के मौसम का वर्णन होता है और अंत में शाम ढलने का।
ऐन कार्सन : हाँ, और यही कारण है कि मुझे चीनी और जापानी कविता पढने में संतोष मिलता है। मुझे लगता है कि उनका उद्देश्य भी यही है। वास्तव में, वास्तविकता को समझने का उनका पूरा तरीका इसी पर आधारित है कि किसी खास पल के अनुभव को पकड़ लिया जाए और फिर उससे उस पल से बडा कोई अर्थ निकलने दिया जाए। मुझे लगता है कि लेखन में यह किसी तरह की अंतिम उपलब्धि है। मेरे अपने लेखन में यह सब उलझ जाता है, क्योंकि मैं मौसम का वर्णन करने के साथ अपनी माँ, अपने मोजों या अपने प्रेम संबंधों के बारे में भी लिखने लगती हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि अगर मैं एक बेहतर इंसान होती, तो इन सब चीजों को लेखन से हटा पाती। तब मैं केवल मौसम, बर्फ या रोशनी के किसी क्षण का वर्णन करती और शायद एक बेहतर कलाकृति बना पाती।
विल एटकिन : मुझे लगता है कि आपने अपनी माँ की मृत्यु की बरसी पर मुझे जो ईमेल भेजा था, उसमें आपने ऐसा ही किया था। आपने लिखा था, 'मुझे उनकी याद किसी पुराने मोजे की तरह आती है। '
ऐन कार्सन : एक मोजा हो तो दूसरे मोजे की जरूरत हमेशा पडती है। उस ईमेल से मैंने यही सीखा कि कहाँ रुक जाना चाहिए। कब लिखना बंद करना है, यह जानना ही अच्छे लेखन की पहचान है।
विल एटकिन : मुझे लगता है कि बातचीत समाप्त करने के लिए यह एक अच्छी जगह है। या आप कुछ और जोडना चाहेंगी?
ऐन कार्सन : मैं स्टाइन की कही हुई एक समझदारी की बात जोडना चाहूँगी- 'इस तरह काम करो कि किसी केंद्र की कोई जरूरत ही न रहे। ' मैं अपने विद्यार्थियों को यही सिखाने की कोशिश करती हूँ। धन्यवाद
(यह साक्षात्कार पेरिस रिव्यू के लिए 2004 में लिया गया है।)
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ऐन कार्सन को साल 2026 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया है।
सुमन शेखर युवा कवि हैं। लेखन के साथ रंगकर्म और अभिनय में निरत। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : सुमन शेखर
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