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मिथ्या आख्यान बनाम सत्य के प्रतिरोध

7 hours ago
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मिथ्या आख्यान बनाम सत्य के प्रतिरोध
समीक्षक : राजाराम भादू 

कहते हैं कि झूठ के फैलने की गति सच की तुलना में कई गुना ज्यादा होती है और अफवाहों के तो पंख होते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कई दशकों तक चले शीतयुद्ध में दुनिया की महाशक्तियाँ तक अपना पक्ष निर्मित करने के लिए झूठ का सहारा लेती थीं। लेकिन पिछले दो दशक से अधिक समय से दुनिया में दक्षिणपंथी राजनीति का पुनः उभार हुआ है और कई देशों में ऐसी शक्तियाँ सत्ता में आई हैं। इसके बाद झूठ को सत्ता का अनुमोदन और समर्थन शुरू हुआ। रूस और चीन की सर्वसत्तावादी सरकारों में तो असमहतियों के लिए पहले से ही जगह नहीं थी। किंतु स्वयं को लोकतंत्र के पहरुए के रूप में प्रस्तुत करने वाले अमेरिका ने भी ट्रंप के पिछले कार्यकाल से अपना यह चोला उतार फेंका। अब तो इस बात का रिकॉर्ड मौजूद है कि ट्रंप ने उस काल में कितनी बार झूठ बोला। मीडिया ने भी धीरे-धीरे सच से किनारा करना शुरू कर दिया था। किंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह था कि अकादमिक क्षेत्र ने इसे सीधे असत्य कहने के बजाय पूरे काल को ही पोस्ट-ट्रुथ पीरीयड नाम दे दिया, अर्थात उनके अनुसार सत्य अब गुजरे जमाने की चीज हो गयी। इसका एक नतीजा यह है कि अमेरिकी सत्ता पर दूसरी बार काबिज ट्रंप धडल्ले से झूठ पर झूठ बोलते हुए मनमानी करते हैं।


पोस्ट-ट्रुथ के इस दौर में आक्रमण को भी युद्ध कहा जाता है। अमेरिका ने ईराक पर आक्रमण किया और सद्दाम हुसैन पर रासायनिक हथियार रखने का आरोप लगाया जो अंततः झूठा साबित हुआ। जो बाडेन के समय ही अमेरिका की ईरान से परमाणु ऊर्जा को लेकर डील हो गयी थी और ईरान परमाणु ऊर्जा के लिए बनी अन्तर्राष्ट्रीय समिति द्वारा निरीक्षण किए जाने के लिए राजी था। इसके बावजूद परमाणु शस्त्रों को ही मुद्दा बनाकर अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला कर दिया। इससे पहले इजराइल ने गजा में जो किया उसे संयुक्त राष्ट्र संघ नरसंहार तथा अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय युद्ध-अपराध बता चुका है। फिर इजराइल ने वैसा ही आक्रमण लेबनान पर किया। रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए आक्रमण की भी कोई राजनीतिक वैधता नहीं है। दूसरी ओर म्यांमार में सैनिक तानाशाही लगातार नागरिक आवाजों का दमन कर रही है, उसे चीन का समर्थन प्राप्त है। हांगकांग और ताइवान चीनी आतंक के साये में जी रहे हैं। विश्व जनमत मीडिया और राज्य सत्ताओं द्वारा निर्मित प्रचार का प्रभावी प्रतिकार करने में असहाय जैसा है।


भारत में भी पिछले एक दशक से मीडिया और अकादमिक क्षेत्र नैरेटिव को लेकर डिबेट करते रहे हैं और जो नैरेटिव राजनीतिक जीत हासिल कर लेता है, उसे ही सही ठहरा देते हैं। अकादमिक क्षेत्र इसके लिए पोस्ट-ट्रुथ की थियरी को प्रयुक्त करता है। चूँकि देश में सत्ताधारी दल के पास अकूत शक्ति और संसाधन हैं तथा सरकारी एजेंसियों के अलावा मीडिया और अकादमिक संस्थानों तक उसका प्रभाव विस्तार हो गया है तो उसके द्वारा प्रचारित नैरेटिव को वैधता देने का उपक्रम अनवरत जारी है। देश में ऐसी आवाजें कम होती गयी हैं जो इन छद्म आख्यानों का प्रामाणिक विखंडन करती हैं और सत्य का पक्ष प्रस्तुत करती हैं। जाहिर है कि ऐसा करना लोकतंत्र के प्रति गहरी पक्षधरता और मेहनत की ही मांग नहीं करता बल्कि इसके लिए अदम्य साहस की भी जरूरत होती है। मीरा नंदा की किताब ‘सत्य विपरीत भारत : विनाशकाल की नियमावली’ बौद्धिक प्रतिरोध का एक ऐसा ही उपक्रम है।


मीरा नंदा विज्ञान की शिक्षार्थी रही हैं लेकिन पिछले वर्षों में भारत में विस्तारित धार्मिक और सांस्कृतिक पहचानों से प्रेरित आख्यानों का विखंडन करने के लिए उन्होंने अपने वैज्ञानिक अध्ययन को प्रयुक्त किया है। उन्हें अमेरिकन काउंसिल ऑफ लर्न्ड सोसायटीज और जाॅन टेम्पलटन फाउंडेशन जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं से शोधवृत्तियाँ प्राप्त हुई हैं। वह 2009-10 में जेएनयू के जवाहरलाल इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज में विजिटिंग फेलो भी रहीं। उनका लेखन अपने समय के निर्णायक सवाल से जूझता है। क्या विज्ञान और आस्था एक साथ खड़े हो सकते हैं, या धर्म के दबाव में विज्ञान अंततः झुक जाता है? मीरा नंदा की किताब ‘दि गाॅड मार्केट’ काफी चर्चित रही है।


‘सत्य विपरीत भारत : विनाशकाल की नियमावली’ अंग्रेजी से अनूदित है जिसे एक नए प्रकाशन आस पब्लिकेशन ने शुरू किया है। यह प्रकाशन तीन युवाओं―अक्षत, अमृता बेरा और शहादत ने मिलकर शुरू किया है जिनमें से दो अक्षत और शहादत इसके अनुवादक हैं जिनका लक्ष्य अंग्रेज़ी में छपी बेहतरीन समकालीन पुस्तकों को हिन्दी में लाना है। इस क्रम में इन्होंने तीन किताबें छापी हैं और तीन के प्रकाशन की घोषणा की है। अनुवादकों ने अपनी टिप्पणी में जर्मन उपन्यासकार गुंटर ग्रास को उद्धरित किया है। उनसे किसी पत्रकार ने कहा था―ज्ञान की लौ मंद पड रही है। ग्रास का उत्तर था―लेकिन प्रकाश का कोई और स्रोत भी नहीं है। अनुवादक मानते हैं कि अँधेरे को तेजी से फैलाने वाली शक्तियाँ पहले से कहीं अधिक संगठित, अधिक तकनीकी और अधिक वैधता प्राप्त कर चुकी हैं। लेकिन इसके बावजूद ज्ञान, तर्क और वैज्ञानिक चेतना ही वह किरण है जिसकी ओर हम लौट सकते हैं। वे मानते हैं कि इसके लिए प्रतिरोध की नयी संरचना को गढ़‍ना पड़ेगा।


उनका कहना है, अनुवाद का एक बड़ा उद्देश्य भाषा में नया शब्द-संसार गढ़ना भी था। आज हिंदी में वैज्ञानिकता, आधुनिकता और सामाजिक आलोचना से जुड़ी शब्दावली अक्सर या तो पुरानी है या उधार की। ‘सत्य विपरीत भारत : विनाशकाल की नियमावली’ ने हमें यह अवसर दिया कि हम ऐसे शब्द चुनें जो न केवल लेखक का भाव व्यक्त करें, बल्कि भविष्य के आलोचनात्मक विमर्शों में हिन्दुस्तानी के पाठकों के लिए उपकरण का काम भी दें। मिथक-निर्माण, कृत्रिम-विज्ञान, अति-राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व-वैज्ञानिकवाद, ज्ञान-आधारित नागरिकता―इन सभी शब्दों को हमने इसलिए गढ़ा या स्थिर किया ताकि हिंदी में नये बौद्धिक प्रतिमान विकसित हो सकें। कहना न होगा कि पोस्ट-ट्रुथ के लिए उन्होंने हिन्दी अकादमिक हलके में प्रचलित उत्तर-सत्य के स्थान पर सत्य-विपरीत पद का प्रयोग किया है। उनका यह भी मानना है कि लोकतंत्र का पहला स्तंभ लोक है और लोक तभी सक्षम होता है जब उसके पास ज्ञान और तर्क की भाषा हो।


मीरा नंदा इस पुस्तक में एक रूपक की तरह प्रस्तुत करती हैं कि मौजूदा सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी पुराने साम्राज्यवादी शासकों की तरह लोकतंत्र से प्रयाण करती हुई सर्वसत्तावाद की ओर बढ़ रही है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसमें पुराने पुरोहित वर्ग की भूमिका में है जो एक ओर शासक वर्ग को सलाह देता है तो दूसरी तरफ उसके कामों को वैधता प्रदान करने का उपक्रम करता है। मीरा नंदा इजराइल को एथनिक डेमोक्रेसी (नस्लीय लोकतंत्र) का एक माॅडल मानती हैं जिसकी भारत नकल कर रहा है। नस्ल की जगह यहाँ धर्म है जिसे हिन्दुत्व के रूप में एक खास खांचे में ढालने की कोशिशें हो रही हैं। अपने अध्ययन में वे दो क्षेत्रों का आकलन करती हैं जिनमें एक मेडिकल है जिसमें एलोपैथी के ऊपर आयुर्वेद को वरीयता दी जा रही है। दूसरा क्षेत्र शिक्षा है जिसमें भारतीय ज्ञान परंपराओं के नाम पर अनेक गैर-वैज्ञानिक और विवेकहीन धारणाओं का आरोपण किया जा रहा है। आयुर्वेद भी भारतीय ज्ञान परंपरा में देखा जाता है जिसे योग, ध्यान और ज्योतिष जैसे अनुशासनों से सम्बद्ध कर दिया गया है।


मीरा नंदा मौजूदा सत्ता के साथ ही पोस्ट-सेक्यूलर भारत की शुरुआत मानती हैं जिसकी स्थिति सत्योत्तर है। उपनिवेश-मुक्ति और पश्चिमी ज्ञान प्रणाली से छुटकारे के नाम पर वैज्ञानिक मानसिकता को विस्थापित किया जा है―यह एक गहरा पैराडाइम शिफ्ट है। न्यूयॉर्क टाइम्स (9 जनवरी, 2021) को टिमोथी स्नाइडर ने लिखा था―पोस्ट-ट्रुथ फासीवाद से पहले की अवस्था है... यह कानून के राज को धीरे-धीरे खोखला कर देता है और मिथकों के शासन को आमंत्रित करता है। पोस्ट-ट्रुथ शब्द को आक्सफोर्ड डिक्शनरी ने 2016 में ‘वर्ड ऑफ द ईयर’ घोषित किया था। इसकी परिभाषा इस प्रकार दी गई थी―ऐसे हालात जिनमें भावनात्मक अपीलें सार्वजनिक राय को आकार देने में वस्तुनिष्ठ तथ्य से ज्यादा प्रभावशाली होती हैं। यानी पोस्ट-ट्रुथ का अस्तित्व भी इस बात पर निर्भर करता है कि कहीं न कहीं सत्य का विचार अब भी बना हुआ है हालाँकि उसे लगातार दबाया, झुकाया और अपदस्थ किया जा रहा है।


स्वाभाविक सवाल उठ सकता है कि सत्य इतना हाशिए पर कैसे चला गया? लोग इस हद तक उदासीन कैसे हो गए कि उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं रही कि वे जो मानते हैं, उसका तथ्यात्मक आधार है या नहीं? इस सत्य-संकट की कई परतें हैं। सत्ता के अनुषंगी संगठनों द्वारा निरंतर काॅन्स्पिरेसी थियरी चलाई जाती हैं और सूचनाओं के सही स्रोतों को अवरुद्ध कर दिया जाता है। जबकि लोकतंत्र तभी चल सकता है जब नागरिक पर्याप्त जानकारी रखते हों और जिस दुनिया में वे रहते हैं, उसके बुनियादी तथ्यों पर किसी हद तक सहमति हो। राजनीति की नैतिक गिरावट को सामान्य करार दिया गया है। एक बार जब हर व्यक्ति को ऊपर से नीचे तक अपने स्वार्थ के लिए काम करते हुए देखा जाने लगता है, तब वैकल्पिक तथ्यों में से वही चुन लेना आसान हो जाता है, जो आपके हित और विश्वास के अनुकूल हों। उन्नत उदार लोकतंत्रों में सार्वजनिक संस्थाओं पर भरोसा टूटता जा रहा है। फिर जब विश्वास का ताना-बाना ढहने लगता है तो झूठ की बेलें आसानी से सार्वजनिक क्षेत्र पर कब्जा कर लेती हैं।


ऐसा नहीं कि मीरा अपने विश्लेषण में सिर्फ निराशा उपजाती हैं। वे गहरे छद्म (डीप फेक) के प्रतिकार का भी उल्लेख करती हैं। हन्ना आरेंट, जाॅर्ज ऑरवेल, सिंक्लेयर लुइस, वाक्लाव हावेल जैसे लेखकों को फिर से पढा जा रहा है, जिन्होंने निरंकुश सत्ता की झूठ आधारित रणनीतियों को उजागर किया था। जाॅर्ज ऑरवेल का विख्यात उपन्यास ‘1984’ एक बार फिर बेस्टसेलर बन गया है। यद्यपि शिक्षातंत्र को लगातार दूषित किया जा रहा है। जबकि धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का लक्ष्य यह होता है कि छात्र संदेह करना सीखें, विचारों की जाँच करें और जरूरत पडे तो उन्हें पूरी तरह खारिज भी करे। पहले अध्याय का उपसंहार वे चित्रकार फ्रांसिस्को गोया की एक कलाकृति के शीर्षक से करती हैं―द स्लीप ऑफ रीजन प्रोड्यूसेज माॅन्सटर्स, अर्थात जब विवेक सो जाता है तो राक्षस जन्म लेते हैं।


अगले अध्याय में मीरा नंदा विस्तार से मेडिकल सुविधाओं के निजीकरण, उनके महँगे तथा जनसाधारण की पहुँच से बाहर होने पर आयुर्वेद, पतंजलि जैसे संस्थानों के उभार और ध्यान-योग के विराट संस्थानीकरण का ब्योरा देती हैं जिन्हें सरकार अनुमोदित और सम्वर्धित करती है। इसका निष्कर्ष ब्रिटिश विचारक क्रिस्टोफर हिचेंस के शब्दों में यह है―जो दाव बिना प्रमाण के किया गया है, उसे बिना प्रमाण के खारिज भी किया जी सकता है। देश के शीर्ष संस्थानों को इतिहास की पुनर्व्याख्या में लगा दिया गया है जो सिंधु घाटी सभ्यता में यूनीकाॅर्न खोज रही हैं। आईआईटी खड़गपुर का त्रैविध कैलेंडर है―वेदों के रहस्य की पहचान, सिंधुघाटी की पुनर्व्याख्या और आर्य आक्रमण के मिथक का खंडन। अमेरिकी तर्ज पर उन्हें इंडिया फर्स्ट नारा थमा दिया गया है। हम एक ऐसे अंधकार युग में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ दंतकथाओं और मिथकों के यूनिकाॅर्न (एवं स्वस्तिक) हमारे मस्तिष्क के विचारशील हिस्से पर कब्जा कर लेंगे। ऐसे में उस समाज के लिए कुछ भी अच्छा नहीं हो सकता, जिसने तर्क को भुला दिया हो।


2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शैक्षिक पाठ्यक्रमों को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करने और उसे भावना व विषयवस्तु दोनों में अधिक भारतीय बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। मीरा नंदा के अनुसार, हिन्दू धर्म का छद्म-वैज्ञानिकीकरण मौजूदा सत्ता के साथ ही शुरू नहीं हुआ था। आज के हिन्दू राष्ट्रवादी दरअसल लगभग दो सदियों से चल रही धुँधलाते की उस प्रक्रिया के वारिस हैं, जिसकी शुरुआत 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुए हिन्दू पुनर्जागरण से हुई थी। अनुभववाद की चुनौती का मुकाबला हिन्दू चिंतकों ने एक नई परंपरा गढ़कर किया। इसे हम कह सकते हैं―रहस्यात्मक अनुभववाद या आध्यात्मिक विज्ञान। इस विचारधारा के माध्यम से उन्होंने एक साथ दो लक्ष्य साधे―एक ओर आधुनिक विज्ञान की आलोचना से हिन्दू विश्वासों की रक्षा की, दूसरी ओर यह दावा किया कि हिन्दू धर्म स्वयं एक तर्कसंगत और अनुभव-आधारित धर्म है जिसने वैज्ञानिक विधि को आधुनिक विज्ञान के जन्म से हजारों वर्ष पहले ही अपनाया हुआ है। यह धारणा कि हिन्दू धर्म विज्ञान का धर्म है, आधुनिक हिन्दू चिंतन की एक केन्द्रीय धुरी  रही है; विशेषकर उन प्रवृत्तियों में, जो हिन्दू राष्ट्रवाद से जुड़े हैं।


हिन्दुत्व समर्थक शक्तियों द्वारा सबको वैदिकता के अनुरूप ढालने के व्यापक अभियान को मीरा नंदा नए संस्कृतिकरण की संज्ञा देती हैं, जिसके जरिए निम्न जातियाँ और जनजातियाँ उच्च द्विज जातियों के विश्वासों, रीति रिवाजों और जीवन शैली को अपनाती हैं। संस्कृतिकरण केवल सामाजिक समूहों को जातीय पदानुक्रम में शामिल करने तक सीमित नहीं रहता,  बल्कि यह उन बाहरी विश्वासों को आत्मसात करने पर भी लागू होता है जिनमें भाषा, साहित्य, कला, संगीत, नाटक, धार्मिक नियम, आर्युविज्ञान और दर्शन शामिल हैं। एक बहुसंख्यकवादी राष्ट्र अब केवल आशंका भर नहीं रह गया है। वह पहले से ही एक वास्तविकता बन चुका है। भारत के लोकतंत्र के सामने जो खतरे खड़े हैं, उन्हें देखते हुए यह जरूरी है कि बुद्धिजीवी अपने समय और समाज की केवल व्याख्या भर न करें, बल्कि उसमें हस्तक्षेप भी करें, ताकि बदलाव संभव हो सके।


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राजाराम भादू का जन्म 24 दिसम्बर 1959 को पूर्वी राजस्थान के भरतपुर जिले के एक गाँव लुधावई में हुआ। साहित्य लेखन के साथ शिक्षा और संस्कृति में अनुसंधान।


कविता के संदर्भ, शब्दों की दुनिया, सृजन―संदर्भ, कला-प्रसंग, कविता के आयाम, एक आलोचक के नोट्स, आलोचना का अंतरंग (आलोचना); स्वयं के विरुद्ध, जीवन ही कुछ ऐसा है, चयनित कविताएँ (कविता-संकलन) ; धर्मसत्ता और प्रतिरोध की संस्कृति, संस्कृति के प्रश्न, सांस्कृतिक हिंसा के रूप, सांस्कृतिक बहुलवाद तथा बन्धुत्व और साहचर्य (संस्कृति) शिक्षा के सामाजिक सरोकार, हाशिये के समुदायों में शिक्षा और स्कूल की संस्कृति (शिक्षा) पुस्तकें प्रकाशित।


दिशाबोध (पाक्षिक), शिक्षा-विमर्श (मासिक) और मीमांसा (द्विमासिक) पत्रिकाओं का संपादन।


सेन्टर फाॅर स्टडीज ऑफ डेवेलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस), रज़ा फाउंडेशन और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, उदयपुर व संगीत नाटक अकादमी, नयी दिल्ली से फेलोशिप। वर्तमान में संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की वरिष्ठ फेलोशिप पर कार्यरत।


कला, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, राजस्थान सरकार द्वारा संस्कृति-संवर्धन सम्मान। राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर से देवराज उपाध्याय आलोचना पुरस्कार एवं सृजन सेवा संस्थान, श्रीगंगानगर की ओर से आलोचना पुरस्कार। डूंडलोद विद्यापीठ, झुंझुनू द्वारा साहित्य मनीषी, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति डूंगरगढ और अंतरीप की ओर से साहित्य-सम्मान।


समानांतर संस्थान के मानद निदेशक।


ईमेल : rajar.bhadu@gmail.com


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