सशक्त वैश्विक परिदृश्य के बाद हुआ हिन्दी साहित्य का आगाज!

सशक्त वैश्विक परिदृश्य के बाद हुआ हिन्दी साहित्य का आगाज!
सुधांशु गुप्त
हिंदी उपन्यासों पर बात करने से पहले एक नजर 14वीं से 17वीं सदी पर डाल ली जाए। इस कालखंड को रेनैसाँ या पुनर्जागरण काल भी कहा जाता है। यही वह काल था, जब यूरोप में मध्यकाल की जड़ता टूटी। मनुष्य, तर्क, कला और विज्ञान केंद्र में आए। साथ ही यह दर्शन भी सामने आया कि इंसान की गरिमा ईश्वर से अलग भी है। यही वह समय भी था जब ‘बाइबल’ का पहली बार लैटिन भाषा से इतर जर्मन में अनुवाद हुआ और कहा गया कि व्यक्ति ईसाई मतावलंबी भले ही रहे लेकिन दिमाग का इस्तेमाल भी करे। यह दिमाग के इस्तेमाल की शुरुआत का कालखंड है। यही वजह है कि इस कालखंड में दांते, पेट्रार्क, जियोवानी बोकाचियो, विलियम शेक्सपीयर, जॉन मिल्टन, लियोनार्दो द विंची और माइकल एंजेलो जैसे दार्शनिक, लेखक, मूर्तिकार एवं कलाकार विश्व पर अपनी अमिट छाप छोड़ गए। हिंदी साहित्य का उद्भव अभी हुआ नहीं था। इससे पहले 18वीं और 19वीं शताब्दी में वोल्टेयर, रूसो, गेटे, जेन ऑस्टेन, विक्टर ह्यूगो, पुश्किन, चार्ल्स डिकेंस, लियो टॉल्स्टॉय, फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की, गुस्ताव फ्लॉबेर, मार्क ट्वेन, एमिली ब्रोंटे, हेनरिक इब्सन, तुर्गनेव, बाल्ज़ाक, चेखव, निकोलाई गोगोल जैसे लेखक-दार्शनिक साहित्य को समृद्ध कर चुके थे। इस वैश्विक समृद्धि के बीच हिंदी उपन्यासों का सफ़र शुरू होता है। लाला श्रीनिवास के ‘परीक्षा गुरु’ (1872) को हिंदी का पहला उपन्यास माना जाता है। एक धारणा यह भी है कि श्रद्धाराम फुल्लौरी का ‘भाग्यवती’ (1877) हिंदी का पहला उपन्यास था। पहला उपन्यास कौनसा था, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इसके बाद उपन्यासों की राह साफ होती चली गई। प्रेमचंद ने हिन्दी में ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ की बुनियाद रखी। उन्होंने अपने उपन्यासों में कल्पना लोक की जगह आम आदमी की गरीबी, शोषण, रूढ़िवादिता और सामाजिक समस्याओं को दर्ज किया। उनका ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ चार्ल्स डिकेंस और टॉल्स्टॉय से प्रभावित था। इसके बाद जैनेंद्र, अज्ञेय और इलाचंद्र जोशी ने मनोविश्लेषण, दमित इच्छाओं, अंतर्द्वंद्व और यौन कुंठाओं का चित्रण किया। यशपाल, नागार्जुन और रांगेय राघव ने मार्क्सवाद और प्रगतिवाद को केंद्र में रखकर लेखन किया। इनके उपन्यासों में शोषित वर्ग और पूँजीपतियों का संघर्ष साफ तौर पर देखा जा सकता है। पश्चिमी दर्शन से प्रभावित अज्ञेय और निर्मल वर्मा के लेखन में व्यक्ति की स्वतंत्रता, अकेलापन और निरर्थकता जैसे विषय मुख्य धुरी रहे। उपन्यास लिखे जाते रहे, प्रकाशित होते रहे और शायद पढ़े भी जाते रहे। लेकिन 1990 के वैश्वीकरण ने अनायास उपन्यासों का दायरा बड़ा कर दिया। वह मध्यवर्ग, उपभोक्ता संस्कृति, बाजार जैसे विषयों के साथ-साथ दलित, आदिवासी और स्त्री और पितृसत्ता और यौन उन्मुक्तता पर बात करने लगे। 20वीं सदी के अंत तक आते-आते लेखकों की संख्या बढ़ी तो छपने वाले उपन्यासों की संख्या में भी बड़ा इजाफा हुआ। ‘पठनीयता के पैरोकार’ लेखकों ने उपन्यास लेखन के समय को बहुत सीमित कर दिया। अब लेखकों के उपन्यास लगभग एक माह में आने लगे। महानगरीय जीवन और उसका अकेलापन, गुम होते मानवीय रिश्ते, जनरेशन गैप, ऐतिहासिक किरदारों पर, पौराणिक कथाओं को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखे गए। शायद यही वह समय रहा जब अच्छे और बुरे का विवेक धुँधला पड़ने लगा। उपन्यासों की इस नई भीड़ में अब कुछ भी ‘आलोच्य’ नहीं रह गया। बल्कि यह तय करना भी कठिन से कठिनतर होता गया कि अच्छा उपन्यास किसे कहा जाए। यहाँ तक कि उपन्यास के अच्छा होने के मानक बदलकर बिक्री तक आ गए। बाजार ने हमें यह भी सिखा दिया कि ‘जो दिखेगा वही बिकेगा’। तो हम अधिक से अधिक दिखने लगे ताकि अधिक से अधिक बिकें। जाहिर है असुन्दर व्यक्ति का दिखना बिकने में बाधक है तो हम सुन्दर होकर दिखने लगे। लेकिन फिर भी कुछ लेखक ऐसे उपन्यास लिख रहे थे, जो बाजार की इन नीतियों से अलग खड़े थे और संजीदगी से अपना काम कर रहे थे।
यहाँ हम पिछले कुछ वर्षों में प्रकाशित दस उपन्यासों पर बात करेंगे, जो अपने शिल्प, कथ्य, पठनीयता और विषय को लेकर भीड़ से अलग दिखाई देते हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए यह सूची बाकायदा बदल भी सकती है। वह इसमें अपने पसंदीदा उपन्यासों के नाम डाल सकता है―चाहे तो इनमें से कुछ नामों को हटा भी सकता है।
1. सच्चा झूठ-ममता कालिया (लोकभारती प्रकाशन)
जनवरी 2020 से 2023 तक विश्व ने कोरोना नामक महामारी झेली। लाखों लोग मौत के मुँह में समा गए। मनुष्य बेबस होकर सब कुछ बस देख भर सका। मनुष्य के अस्तित्व पर आया यह एक ऐसा संकट था, जिसने मनुष्य के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगा दिए। इस दौरान कोरोना पर बेपनाह कहानियाँ और उपन्यास लिखे गए। अधिकांश में कोरोना से उपजी पीड़ा को मार्मिक अंदाज़ में व्यक्त किया गया―किसी भावुक दृश्य की तरह। कोरोना काल के बाद वरिष्ठ कथाकार, साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता (जीते जी इलाहबाद) ममता कालिया का भी एक छोटा-सा उपन्यास प्रकाशित हुआ―सच्चा झूठ। ममता कालिया लंबे समय से लेखन से जुड़ी हैं। उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुईं और उन्हें अनेक पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है। लेखन के साथ-साथ ममता कालिया अपनी सादगी, सरलता और सहजता के लिए जानी जाती हैं। साथ ही वह इसलिए भी जानी जाती हैं कि हाशिए के लोगों का जीवन उनकी कहानियों और उपन्यासों में देखने को मिलता है। वह मनुष्यता के पक्ष में हमेशा दिखाई देती हैं। जब पूरी दुनिया मौत के मुहाने पर नजर आ रही थी उस दौर को चित्रित करता ममता कालिया का एक बेहद छोटा-सा उपन्यास ‘सच्चा झूठ’ आया। ममता कालिया अपने लेखन में विषय और भाषा उधार की नहीं लातीं बल्कि जीवन से निकले विषयों और भाषा को ही लेखन का आधार बनाती हैं। ‘सच्चा झूठ’ भी महामारी के उसी दौर का दस्तावेजीकरण है जब डर, सामाजिक दूरी, मानवीय रिश्तों में जटिलता आ रही थी। एक साधारण-सी कहानी में ममता कालिया ने असाधारण होती स्थितियों को चित्रित किया है। उपन्यास की शुरुआत इस वाक्य से होती है―बड़ा बेटा धवल रहता था मुंबई में और छोटा बेटा नवल दिल्ली में। मुंबई में पौत्र था समर्थ और दिल्ली में पौत्री अनन्या। समर्थ और अनन्या दोनों का जन्मदिन एक ही तारीख को पड़ता था, 18 मार्च को। दोनों चाहते थे कि उनके दादा और नाना जन्मदिन पर शामिल हों। विजेन्द्र और मेधा इलाहाबाद में रहते थे। इसका समाधान यह निकला कि दादा विजेन्द्र मुंबई गए और मेधा दिल्ली। दिल्ली और मुंबई के बहाने ममता कालिया ने कोरोना काल के संकट को जमीनी स्तर पर देखा। यह भी सच है कि विजेन्द्र और मेधा के बीच की भौगोलिक दूरियों के साथ कोरोना की त्रासदी बढ़ती चली गई। दिल्ली में मेधा देखती है कि किस तरह कोरोना से पैदा हुआ संकट रोजमर्रा के संकट में बदलता जा रहा है। ममता कालिया ने विभिन्न वर्गों की हैसियत के लोगों के किरदारों के दुख-सुख इस उपन्यास में चित्रित किए हैं। इस उपन्यास में मृत्यु का डर तो है ही, साथ ही आर्थिक-धार्मिक उलझनों, पारिवारिक रिश्तों में चौड़ी हो रही दरार और सामाजिक भेदभाव भी है, जहाँ मानवीय संवेदनाएँ कसौटी पर दिखाई देती हैं। लेकिन ममता कालिया सिर्फ दुखों पर फोकस नहीं करतीं बल्कि वे उस कठिन दौर में पनपने वाली हिम्मत, प्रेम और मानवीय रिश्तों के महत्व को भी रेखांकित करती हैं। इस उपन्यास की यही खासियत है कि यह आम लोगों से ‘कनेक्ट’ करता है। इसे पढ़कर आप यह भी देख और जान सकते हैं कि आपको कोरोना काल में किस तरह का व्यवहार करना चाहिए था। बेशक यह उपन्यास किसी बड़े विचार को स्थापित नहीं करता, लेकिन साधारण जीवन भी तो असाधारण हो सकता है! ममता कालिया साधारण जीवन की ही असाधारण लेखिका हैं।
2. समय-अश्व बेलगाम-चन्द्रकान्ता (राजकमल पेपरबैक्स)
कश्मीर में जन्मी चन्द्रकान्ता हिन्दी जगत में खासी लोकप्रिय हैं। वह 1967 से लेखन में निरंतर सक्रिय हैं। ‘कथा सतीसर’ उनका लोकप्रिय उपन्यास है। इस ऐतिहासिक उपन्यास की कहानी 1931-2000 के शुरुआती दशकों तक कश्मीर के बदलते हालात, अलगाववाद, आतंकवाद और कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन की दास्तान कहता है। कुछ समय पहले आया उनका उपन्यास ‘समय-अश्व बेलगाम’ विस्थापन के पार्श्व में लिखा गया है, लेकिन यहाँ वैश्वीकरण का समय है जहाँ लोग मजबूरन या समृद्धि पाने के लिए अपनी जड़ें छोड़ रहे हैं। कहानी कश्मीर से जान बचाकर निकले एक पंडित परिवार की है जो राजधानी में आकर अपने जैसे लोग खोजता है और नए सिरे से जीवन शुरू करता है। चन्द्रकान्ता एक तरफ कश्मीरी संस्कृति और वहाँ के पंडितों के विस्थापन की पीड़ा को सुर देती हैं तो दूसरी तरफ ग्लोबल दुनिया, भूमंडलीकरण की नीतियों, अमेरिकन संस्कृति, अमेरिका में बसने वाले लोगों के जीवन संघर्ष, अमेरिकन कंपनियों की राजनीति, भारतीय युवाओं की अमेरिका जाने की महत्वाकांक्षाओं, भारत में सरकारी कर्मचारियों की अकर्मण्यता और संवेदनहीनता पर को दर्ज करती हैं। चन्द्रकान्ता ने मल्टीनेशनल कंपनी में सीईओ आयुष के जरिए ही मल्टीनेशनल कंपनियों की मुनाफे के लिए शतरंजी चालों को दिखाया हैं तो दूसरी तरफ आयुष के भीतर इस बात का अपराध बोध भी दिखाया है कि उसके माता-पिता भारत में अकेले रहते हैं। अनेक स्तरों पर चलती इस कहानी में चन्द्रकान्ता समाज के विभिन्न हिस्सों में हो रहे हर शोषण के खिलाफ खड़ी नजर आती हैं। लेकिन उनके अवचेतन में विस्थापन हमेशा मौजूद रहता है। यह पीड़ा अनेक किरदारों के माध्यम से समय समय पर प्रकट होती रहती है। एक जगह सुरेन्द्रनाथ कहता है, अपने ही देश में बिना किसी विभाजन के हम शरणार्थी कैसे हो गए? एक स्थान पर आयुष सोचता है, अपने ही देश में अपमान की जिन्दगी से समझौता करने की बजाय पराए देश में होकर जीना अच्छा है। एक स्थान पर आयुष कहता है, “क्या यह हमारा देश नहीं अम्मा? हमारा आजाद गणतंत्र? घर छूटने से क्या हम अपने देश में ही विदेशी हो गए?”
स्त्री मुक्ति के प्रश्न, वृद्धों की समस्याएँ, विस्थापितों की पीड़ा, बदल रही संस्कृति में मूल्यों के विघटन आदि को चन्द्रकान्ता ने इस उपन्यास में अभिव्यक्त किया है। यह सत्य है कि समय का अश्व हमेशा बेलगाम होता है। यह कभी हमारे मनोनुकूल नहीं चलता। कभी यह पथरीले मार्ग पर दौड़ता है और कभी संकरी गलियों में, कभी उसकी दौड़ पहाड़ियों और दुर्गम मार्गों पर होती है और कभी वह मैदानी भागों में दौड़ने लगता है जिससे मानव-जीवन का प्रभावित होना स्वाभाविक है। चन्द्रकान्ता के ‘समय-अश्व बेलगाम’ में यही जीवन-दर्शन है। चन्द्रकान्ता जम्मू कश्मीर पर धारा 370 के हटाए जाने के ऐतिहासिक फैसले का भी स्वागत करती हैं। इसे हटाने को लेकर घर के बच्चों में बातचीत होती है और कई नये सवाल उठते हैं। सवाल चन्द्रकान्ता के जेहन में हैं और वे वैश्विक स्थितियों को भी विस्थापन से जोड़कर देखती हैं!
3. काला सूरज-दामोदर खड़से (भावना प्रकाशन)
डॉक्टर दामोदर खड़से लेखक एवं अनुवादक हैं। वह कविताएँ लिखते हैं, कहानियाँ लिखते हैं, यात्रा वृत्तांत लिखते हैं। वह अनेक पुरस्कारों से भी सम्मानित हैं। हाल ही में उनका एक उपन्यास पढ़ने को मिला-काला सूरज। सबसे पहला सवाल जेहन में यह आया कि इसका नाम ‘काला सूरज’ क्यों रखा गया। क्या इसलिए कि नायक कैलाश का जन्म सूर्यग्रहण (16 फरवरी) के दिन हुआ था या इसलिए कि पत्रकारिता में ऊँची उड़ान भरने के लिए बहुत से काले सूरज रास्ते में मिलते हैं जिन्हें पार करना होता है या फिर यह नाम इसलिए रखा गया कि आपसी रिश्तों में भी अनेक काले सूरज होते हैं जिन्हें सहनशीलता, विनम्रता और स्नेह से पार करना होता है। पत्रकारिता, परिवार, प्रेम के इर्द-गिर्द घूमता यह उपन्यास पत्रकारिता जगत को परत दर परत खोलता है। यह बताता है कि सत्ता, समृद्धि, संसाधनों के गलियारे से गुजरती पत्रकारिता भी अंततः व्यावसायिकता से घिरी होती है। कैलाश जैसे आदर्शवादी युवा प्रतिबद्ध पत्रकार भी निहित स्वार्थों के चलते इससे विचलित हो जाते हैं। कैलाश नागपुर और अंकोला के बाद मुंबई में एक प्रतिष्ठित अखबार में उप-सम्पादक की नौकरी प्राप्त कर लेता। महत्वाकांक्षी और जिम्मेदार कैलाश अपने पीछे पत्नी रूपा और बिटिया मनीषा को छोड़ आया है। किसी को, उसके लिए यह बताना मुश्किल है कि दोनों के बीच क्यों पटरी नहीं बैठी। वह पत्नी ही नहीं, अपनी प्रेयसी गीता (अनुराग रखने वाली) को भी छोड़ आया है। स्मृतियों में गीता उसके साथ-साथ चलती है और उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। उपन्यास में और भी बहुत से चरित्र उजागर होते रहते हैं। असुरक्षित और अभावग्रस्त स्थितियों में पले-बढ़े व्यक्ति के जीवन में एक ओर संबंधों का उफनता सैलाब है तो दूसरी ओर विकर्षण का रेगिस्तान भी है। कैलाश पत्रकारिता में तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ने लगता है। रूपा और गीता के अलावा पामेला नाम की एक लड़की उसके जीवन में आती है। वह कहीं भी रिश्तों के प्रति ‘कमिटेड’ नहीं हो पाता। वह यह भी पाता है कि आप अपनी मेहनत और प्रतिभा से यश और कीर्ति की जीत से शिखर पर तो पहुँच सकते हैं, लेकिन शिखर की फिसलन से आप अनजान होते हैं। सूरज कितना ही तेज क्यों ना हो, स्वार्थों का ग्रहण लगते ही वह भी काला पड़ने लगता है। उपन्यास किसी बड़े विचार को स्थापित नहीं करता लेकिन इस उपन्यास की खास बात यही है कि इसकी ‘अपरिपक्वता’ इसे असाधारण बना देती है। किरदारों के प्रति लेखक का ईमानदार व्यवहार, और किरदारों को महान ना बनाकर उन्हें आम रहने देना ही उन्हें विशेष बनाता है।
4. प्रार्थना में पहाड़-भालचन्द्र जोशी (आधार प्रकाशन)
‘शोर किए बिन मर जाए जो मन अपना
बिना आँसुओं के ही जो रो सकता है
आह भरे बिन जो चुपके से मर जाए
ऐसा व्यक्ति पहाड़ी, ऐसी जनता है।’
रसूल हमज़ातोव की यह कविता आदिवासियों के जीवन पर पूरी तरह फिट बैठती है। यह बात वरिष्ठ कथाकार भालचन्द्र जोशी के कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘प्रार्थना में पहाड़’ में देखी जा सकती है। इस उपन्यास को पढ़कर लगा कि अनुभव अनुभूति में किस तरह बदलते हैं। भालचन्द्र जोशी ने एक लम्बा हिस्सा आदिवासियों के बीच गुजारा है। उनके पास उस जीवन के कठिन और करुण अनुभव थे, स्मृतियाँ थीं। उसे ही उन्होंने उपन्यास की शक्ल दी है। शुरुआत में ही गाँव का पूरा दृश्य दिखाई देने लगता है, “गाँव के लोग पानी की तलाश में भटक रहे हैं। यहाँ का हर आदमी, औरत और बच्चे तक जानते हैं कि गाँव की नदी के अलावा पानी कहीं नहीं मिलेगा। भूख, प्यास और मृत्यु की आशंका हर व्यक्ति को घेरे रहती है।” बारिश गाँव के लोगों के लिए देवी थी और इन्द्र उनका देवता। लेकिन इस गाँव में रहने वालों की कोई मदद नहीं कर पाता। नदी का पानी जहरीला हो जाता है। इंसानों के साथ-साथ जानवरों की भी मृत्यु होने लगती है। आदिवासियों के जीवन के इस दुखद आख्यान के समानांतर ही शराब बनाने वाली फैक्ट्री के मालिक, राजनेता और पत्रकारिता का ‘नक्सेस’ भी दिखाई पड़ने लगता है। पता चलता है कि नदी में फैक्ट्री से निकला वेस्ट लिक्विड नदी के पानी को जहरीला कर रहा है। फैक्ट्री मालिक लिक्विड के डिस्पोजर के लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगवा सकता था, लेकिन उसे लगा कि आदिवासियों का जीवन बचाने के लिए इतना खर्च क्यों किया जाए। पूरे उपन्यास में एक तरफ आदिवासियों के दुःख गहरे होते जा रहे हैं और दूसरी तरफ फैक्ट्री मालिक, उसके पीआर के लोग, राजनीतिक आका और नौकरशाही आदिवासियों के दुखों को अनदेखा करते रहते हैं। उपन्यास में यह भी साफ दिखाई पड़ता है कि जो लोग सत्ता में बैठे हैं, उनका कभी कुछ नहीं बिगड़ता। वे ‘सब कुछ’ खरीदना जानते हैं। उपन्यास का अंत भालचन्द्र जोशी ने मिथकीय अंदाज में किया है। गाँव के लोग मरते चले जाते हैं और अंत में केवल दो लोग बचते हैं―रतन और रूपा। आदम और हव्वा की तरह ये दोनों सूखे से उपजी प्रलय का प्रतिआख्यान रचते हैं। इसे पढ़कर अनायास तेलुगु साहित्यकार केशव रेड्डी के उपन्यास ‘भू देवता’ की याद आ गई।
5. समंदर भर रेत-संदीप मील (राजपाल एण्ड सन्स)
युवा लेखक आजकल जिस तेजी से उपन्यास लिख रहे हैं, वह चौंकाता है। और यह भी याद दिलाता है कि गुस्तावे फ्लाबर्ट ने अपने बहु प्रसिद्ध उपन्यास ‘मादाम बावेरी’ (1857 में प्रकाशित) में कहवेखाने के एक दृश्य को लिखने में तीन माह का समय लगाया था, जबकि उपन्यास में इस दृश्य की अवधि तीन घंटे है। ऐसे में कोई युवा लेखक एक उपन्यास को लिखने में बारह वर्ष का समय लगाता है तो यह उसकी मेहनत और प्रतिबद्धता का संकेत है। ‘समंदर भर रेत’ ऐसा ही उपन्यास है।
इस उपन्यास को पढ़कर मन में आया कि रेत में समंदर का क्या अर्थ हो सकता है। पता चला कि प्राक-ऐतिहासिक काल में आज के राजस्थान का रेगिस्तान समंदर ही होता था। समय के चक्र और प्रकृति के बदलने से समंदर का पानी सूख गया और वह रेत से भर गया, भरता चला गया। रेत ही रेगिस्तान की पहचान बन गई और इसी पृष्ठभूमि में यह उपन्यास लिखा गया है। इस उपन्यास का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह परंपरागत शैली का उपन्यास नहीं है। लगभग आख्यान की शैली में शुरू हुए इस उपन्यास में व्यवस्थित किरदार आपको नहीं मिलेंगे। लेकिन यहाँ मिलेंगी आपको कथाएँ, उपकथाएँ, रेगिस्तान का कठोर जीवन, उनकी परम्पराएँ, मान्यताएँ, उनकी और उनसे जुड़ी लोककथाएँ, सामंती शोषण, प्रेम कहानियाँ, विरह और लोकोक्तियाँ। एक कहानी, दूसरी कहानी से इस तरह जुड़ी है कि उन्हें अलग-अलग करके देखना संभव नहीं है। एक कथा शुरू होती है। जब पाठक उसमें डूब जाता है तो दूसरी कथा, पहली कथा का सिरा पकड़कर आगे निकल पड़ती है और कथाओं का कोलाज, जीवन का कोलाज हमारे सामने उड़ता है। इस उपन्यास में आपको ढेरों प्रेम कहानियाँ मिलेंगी… कहानियों से जुड़ी और कथाएँ, कथाओं से जुड़ी किंवदंतियाँ, लोकोक्तियाँ, और ये सब रेगिस्तान में सदियों से रहने वाले लोगों के जीवन को चित्रित करता दिखाई देता है―लोक जीवन को। कमाल की बात यह भी है कि अनेक कथाएँ मूल कथाओं के साथ जुड़ती जाती हैं, इनका कालखंड अलग हो सकता है। यह भी हो सकता है कि यह संदीप की कल्पना हो या फंतासी हो। लेकिन कोई भी कथा कहीं ठहरती नहीं है। वे उपन्यास के प्रवाह को बनाए रखती हैं। उपन्यास में चोर और खोजी के बीच चलने वाला संघर्ष है तो नर कुंजराँ और मादा कुंजराँ के बीच का संघर्ष भी है। संदीप मील से कुछ भी ऐसा नहीं छूटा है, जो रेगिस्तान का हिस्सा न रहा हो। और किस्सागोई तो इस उपन्यास की ताकत है ही। यह ऐसा उपन्यास है जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। 19वीं सदी के ब्रिटिश पत्रकार, इतिहासकार और उपन्यासकार रैल्फ विंस्टन फॉक्स ने कहा था कि यदि आप लोक जीवन को ही ठीक से चित्रित कर पाते हैं तो यह एक बड़ी बात है और निस्संदेह संदीप मील राजस्थान के लोक जीवन को बेहतर ढंग से चित्रित कर पाए हैं।
6. नीना आंटी-अनुकृति उपाध्याय (राजपाल एण्ड सन्स)
युवा लेखिका अनुकृति उपाध्याय के उपन्यास के केन्द्र में ‘नीना आंटी’ है! मोपासां कहते थे एक सरल जीवन जीने वाली स्त्री की कहानी नहीं होती, विरल जीवन जीने वाली स्त्री की होती है। नीना आंटी भी सरल नहीं विरल है। वह विरल क्यों है? 65 वर्ष की उम्र में भी वह कमनीय आकर्षण रखती है। वह अपने फैसले खुद लेना जानती है, उसे सिगरेट पीने से कोई परहेज नहीं रहा, वह बेलौस किसी लड़के के साथ भाग सकती है, फिर वापस लौटकर आ सकती है, बाद में वह उससे विवाह से इनकार कर सकती है। नीना आंटी का इतिहास विद्रोहों, उद्दंडता, प्रेम और आवेगों से भरा है। वह अपनी पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चली जाती है, कॉलेज के प्रोफेसर के साथ उसका नाम जुड़ता है, लेकिन वह उसकी कोई परवाह नहीं करती, और भी बहुत से लोगों से नीना का नाम जुड़ता है, लेकिन नीना इस सबसे बेपरवाह है, नीना छोटी जाति के रिसर्च स्कालर लड़के को अपने घर पर रख लेती है, अफवाहें उड़ती हैं। नीना अपने हर कदम पर यह संदेह छोड़ती है कि वह किससे प्रेम करती थी, लेकिन कोई नहीं जान पाता। नीना का मंगेतर रेलवे लाइन पर मृत मिलता है। उसकी जेब में गुलाब भरे हुए थे। इसके बाद से नीना आंटी के बंगले में कभी लाल गुलाब के पौधों पर फूल नहीं आए। अनुकृति लिखती हैं, “नीरस और शुष्क बातें करने वाले गणितज्ञ प्रेमी ने चिट्ठी को अपने खून से सरोबार करने से पहले उसपर अपने दिल निकाल कर रख दिया था, नीना को उद्दाम प्रेम से भरे संबोधनों से पुकारा था, अपने अडिग प्यार का हवाला दिया था और गहरी पीड़ा में भरकर पूछा था-तुम मुझ पर इतना भयावह अत्याचार क्यों कर रही हो नीना? इतनी विदारक क्रूरता, मैं तुम्हारे प्यार से ऐसे भर गया था जैसे आकाश की सबसे खूबसूरत चिड़िया के लिए पेड़ की डाल ख़ुद-ब-ख़ुद हरी-भरी हो जाती है। तुम मेरे लिए सुनसान समुद्र का द्वीप हो, नीना। क्या तुम यह नहीं जानती?” (पृष्ठ 38)।
नीना एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और साहसी महिला है, जो जानती है कि प्रेम भीख में नहीं मिलता। इसलिए प्रेम की भीख कभी नहीं माँगनी चाहिए। नीना आंटी के किरदार की अस्पष्टता ही उसके प्रति आकर्षण पैदा करती है। नीना अपने माँ-पिता और बहनों से विद्रोह करती है और अपनी राह ख़ुद बनाती है। नीना अपने बंगले में अकेली रहती है। उनके गार्डन में किसिम-किसिम के फूल हैं, बस लाल गुलाब ही नहीं हैं। नीना की सबसे बड़ी ताकत नई पीढ़ी है, जिनमें उनकी भांजियाँ हैं। नीना इन सबको सपोर्ट करती है। भांजियों में भी सुदीपा अहम है। नीना सब बच्चों को अपने फैसले खुद लेना सिखा रही है। वह चाहती हैं कि बच्चे अपने फैसले खुद लेना सीखें। कोई तलाक लेने का फैसला करता है तो नीना उसके साथ है, कोई प्रेम विवाह करना चाहता है तब भी नीना की ही शरण में जाता है, यहाँ तक कि कोई लड़की समलैंगिक विवाह की ओर जाती दिखाई पड़ती है, तब भी उसे थामने के लिए नीना की ही उंगली दिखाई पड़ती है। क्या इसे नीना (आंटी) की जीत माना जाए या उन मूल्यों की जीत कहा जाए जो न जाने कब से पुराने मूल्यों से लड़ रहे हैं? नीना आंटी उपन्यास लड़कियों को नए मूल्य देता दिखाई पड़ता है और उन्हें स्वतंत्र स्त्री बनाने की वकालत करता है। जीवन भर नीना का विरोध करने वाले पिता भी अंत में नीना के पास ही आकर रहने लगते हैं। यही नीना की जीत है और यही उपन्यास की सफलता है।
7. अजायबघर : केशव चतुर्वेदी (काव्यांश प्रकाशन)
मूलतः इलाहबाद के रहने वाले केशव चतुर्वेदी दो दशक से अधिक प्रिंट, टेलीविज़न, रेडियो और ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय रहे हैं। इतिहास, भूगोल, साहित्य और पर्यटन उनके प्रिय विषय हैं। ‘अजायबघर’ उनका पहला उपन्यास है। उपन्यास एक घर की कहानी है जो चार पीढ़ियों के उत्थान और पतन का मूक गवाह है। उसकी मौन ईंटें, छीजता पलस्तर और बेनूर होती दीवारें उसमें रहने वाले परिवार की भाग्य-गाथा की भित्तिचित्र हैं। इसमें रहने वाले इतिहास के एक ऐसे कालखंड में पैदा हुए, पले, बढ़े और काल के ग्रास में समाए जहाँ समाज, विश्व, टेक्नोलॉजी, मूल्य और राजनीति आमूलचूल परिवर्तन से गुज़र रही थी। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में जब साम्राजयवाद की जड़ें कमजोर होने लगी थीं और साम्यवाद की आंधी बस उठने को ही थी, ऐसे में इस घर की नींव पड़ी। आखिरकार सौ वर्षों बाद जब घर के आखिरी निवासी ने यहाँ से बोरिया बिस्तर बांधा, उस समय इंटरनेट युग के बाल कदम को समाज बड़े कौतूहल से देख रहा था। परिवर्तन के इतने विराट राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक के नीचे एक परिवार की चार पीढ़ियाँ अपनी-अपनी काबिलियत, हैसियत और समझ के साथ अपनी प्रासंगिकता और भूमिका तय करने की कोशिश करती रहीं। इससे जूझती रहीं। इस संघर्ष में कुछ सदस्य सफल रहे, कुछ विफल रहे। कुछ ने हालात से समझौता कर लिया, कुछ लड़ते-लड़ते हार गए। परिवर्तन की अग्नि में सभी तपे लेकिन बिरले ही कुंदन बन कर निकले, ज्यादातर उसमें स्वाहा हो गए।
उपन्यास में ऐतिहासिक घटनाओं और बदलावों को नितांत व्यक्तिगत स्तर पर घटते हुए दिखाया गया है जिससे पता लगता है कि आम जन अपने सामने घट रहे इतिहास की विकरालता और महत्व को अक्सर नहीं समझता। उनकी सीमित सोच और क्षमता उन्हें बाध्य करती है कि वह बस बदलाव के उसके तात्कालिक जीवन पर पड़ रहे प्रभाव से प्रेरित होकर अपने स्वार्थों को बचाए रखने के लिए जूझता रहे। यह तो एक पीढ़ी के बाद पता चलता है कि उस बदलाव के दौर में उस पीढ़ी के सदस्यों ने परिवर्तन की लहरों पर सवारी की या उसके वेग में बह गए। अजायबघर बिना कहे इस बात की ओर इशारा करता है कि निश्चित सवारी और दिशाहीन बहाव ही सफलता और विफलता तय करते हैं। यह उपन्यास इस बात को भी रेखांकित करता है कि समाज में सौ साल में आए बड़े बदलावों का समाज की सबसे छोटी इकाई यानी परिवार पर क्या असर पड़ा। चार पीढ़ियों की यह कथा शंकर और दुर्गा से शुरू होती है और चौथी पीढ़ी-सत्या, मुरली, बाबू, मुन्नू और राम तक जाती है। इस कथा में केशव यह भी तलाश करने की कोशिश करते हैं कि विकास का अर्थ हमारे लिए केवल व्यक्तिगत विकास ही क्यों होकर रह गया? और क्या ऐसा पूरी दुनिया में हुआ या सिर्फ भारत में? ऐसे तमाम सवाल केशव अपने इस उपन्यास में उठाते हैं। उपन्यास की भाषा के साथ एक अच्छी बात यह है कि केशव इसमें दार्शनिक बातों का प्रयोग बिल्कुल सहजता से करते हैं। इसलिए भी यह उपन्यास महत्वपूर्ण हो जाता है।
8. हेति सुकन्याः अकथ कथा-सिनीवाली (अंतिका प्रकाशन)
युवा लेखिका सिनीवाली के पास संस्कृतनिष्ठ परिपक्व भाषा है। वह कहानियाँ लिखती हैं। उनका पहला उपन्यास आया-हेति सुकन्याः अकथ-कथा। इसके लिए सिनीवाली ने जिस नायिका का चयन किया है, वह महाभारत से ली गई है। महाभारत में वर्णित ऋषि च्यवन और सुकन्या को केंद्र में रखकर सिनीवाली वे तमाम सवाल उठाती हैं, जो आज भी स्त्री को परेशान कर रहे हैं या जिनके जवाब किसी के पास नहीं हैं। राजा शर्याति की पुत्री, अप्रतिम सौन्दर्य और बुद्धि की स्वामिनी सुकन्या को परिस्थितियाँ ऋषि च्यवन की पत्नी बना देती हैं। ऋषि एक वृद्ध जीर्ण-शीर्ण व्यक्ति हैं। यहीं से स्त्री पुरुष संबंधों के सत्यों का उद्घाटन शुरू होता है। क्या विवाह के बाद सचमुच पुरुष स्त्री को पा लेता है। यहाँ से दो यात्राएँ शुरू होती हैं। एक पति-पत्नी के रिश्तों की और एक स्त्री की अपनी निजी यात्रा। सिनीवाली लगभग चार हजार साल पहले की इस कथा में स्त्रियों के आज के सवाल भी समाहित करती हुई चलती हैं। तप करने वाले ऋषि च्वयन भी अपनी शारीरिक दुर्बलता को स्वीकार नहीं कर पाते। ऋषि के बहाने सिनीवाली ने यह भी कहा है कि आप कितने भी तपी क्यों न हों, शारीरिक दुर्बलता को कोई स्त्री बर्दाश्त नहीं कर पाती। सुकन्या ने जो सवाल उठाए, वे आज की स्त्री के भी सवाल हैं। सुकन्या कहती है, “निरपराध स्त्री का पुरुष परित्याग कर सकता है तो अपराधी, नीच पुरुष का स्त्री क्यों नहीं? पतिव्रता धर्म की बेड़ियाँ स्त्री के लिए ही क्यों निर्मित की गईं? आपका धर्म क्या मात्र नारी को नियंत्रित करने के लिए ही निर्मित हुए है? स्त्री पुरुष जब एक ही प्रकृति की संतानें हैं तो उनके लिए भिन्न-भिन्न मापदंड क्यों? वासना की अग्नि ने आपको तपस्वी तो क्या सामान्य मनुष्य भी नहीं रहने दिया। आपने मेरे रूप से आकर्षित होकर मुझे बंदी बनाया। अब यदि मैं आपके सुन्दर तरुण रूप के कारण ही आपका परित्याग कर दूँ तो?” यह सवाल दरअसल सुकन्या का ही नहीं है बल्कि चार हजार सालों से पूछ रही स्त्री का पुरुष वर्चस्व से है। यह सवाल स्त्रियों के उस आत्मविश्वास का भी प्रतीक है, जो सदियों से स्त्री की पूंजी रहा है। यह सवाल ऋषि को भी निरुत्तर कर देता है। सिनीवाली इस सवाल के पार्श्व में और भी बहुत से सवाल उठाती हैं, पुरुष मानसिकता, पितृसत्ता, स्त्री की इच्छाएँ, उसकी देह से जुड़े सवाल और मुख्य सवाल यह कि क्या विवाह के बाद स्त्री की देह उसकी अपनी नहीं रहती।
सिनीवाली ने सुकन्या के बहाने एक खूबसूरत, विचारणीय और पठनीय उपन्यास लिखा है, जिसमें प्रकृति का नैसर्गिक चित्रण है, जहाँ नदियाँ हैं, फूल हैं, जड़ी बूटियाँ हैं और संस्कृति भाषा का प्रयोग है। और हैं स्त्री से जुड़े वे प्रश्न जो चार हजार सालों से पूछे जा रहे हैं।
9. आसमान के ताक पर―रवीन्द्र आरोही (राजपाल एण्ड सन्स)
पिछले कुछ वर्षों में पढ़े उपन्यासों में जो सबसे लंबे समय तक भीतर बना रहा, वह है–रवीन्द्र आरोही का ‘आसमान के ताक पर।’ आरोही का यह पहला उपन्यास है। इसलिए और भी अधिक महत्वपूर्ण है। शानदार गद्य इस उपन्यास की ताकत है। लेकिन आरोही के पास केवल भाषा का वैभव नहीं है, उनके पास परिवेश और कथ्य का बड़प्पन भी है। स्मृतियाँ और स्वप्न रवीन्द्र आरोही के गद्य की आत्मा है। लेकिन स्मृतियों और स्वप्न के मोह में वह कथा की समाधि नहीं बनाते, बल्कि कथा निरंतर प्रभावशाली बनती चली जाती है। इस उपन्यास की एक और खास बात है। यह एक कालखण्ड की कथा तो है लेकिन यह कालखण्ड अतीत, वर्तमान और भविष्य को भी अपने भीतर समेटे है। रवीन्द्र वर्तमान में खड़े होकर, अतीत और भविष्य दोनों की डोर थामे रहते हैं। वह कहीं भी डोर को टूटने या छूटने नहीं देते। कई बार पाठक को यह भ्रम भी हो सकता है कि कथा किस दौर में चल रही है! आरोही पाठक के इस भ्रम को अपने शिल्प और कथा से ही तोड़ते चलते हैं। गाँव की एक साधारण जिन्दगी से उठकर सुजांव नाम का एक युवा कोलकाता के अकादमिक और सांस्कृतिक जगत में स्थान बनाने के लिए पहुँचता है। उपन्यास में प्रेम है, स्मृतियाँ हैं, उदासी है, गाँव है, नदी है, दोस्त है, रंगमंच है, कविता है और जीवन दर्शन है। वाक्यों के रूप में... “जो लोग घर से भागते होंगे, कभी-कभी रास्ते में कितना डर जाते होंगे”, “जीवन भी कितने इत्तेफाकों से भरा है, यदि सारे इत्तेफाक लिख दिए जाएँ तो कहानियाँ भी झूठी लगने लगें,” “जो लोग कुछ नहीं होते वे सड़क हो जाते हैं, जिसपर चलकर दूसरे लोग कहीं पहुँच जाते हैं…”
यह दर्शन थोपा हुआ नहीं है बल्कि सहज जन्म लेता है। इसलिए पाठक खुद को रिलेट करता है। उपन्यास में सुजांव के अलावा उसका दोस्त उत्पल है, देबजानी है, घोष है, सुलोचना है। घाघरा, हावड़ा, रेलगाड़ी और बरगद के पेड़ भी ‘किरदार’ दिखाई देते हैं। यह उपन्यास की ताकत है। बरगद तो इतना अहम किरदार रवीन्द्र आरोही ने बना दिया है कि हर व्यक्ति बरगद होना चाहे। “सुजांव के सारे किस्से बरगद को अपने किस्से लगते थे और बरगद खुद भी तो सुजांव के एक बड़े जीवन का साथी रहा था।” उपन्यास में बरगद एक ऐसा पेड़ है जो कथा का शिल्प बदल रहा है। देबजानी और सुजांव के प्रेम का किस्सा काव्यात्मक अंदाज में सुनाई-दिखाई पड़ता है।
उपन्यास में ममता कालिया की लिखी किताब ‘थियेटर रोड के कौवे’ का जिक्र आता है तो नागार्जुन की कविताओं का भी जिक्र आता है। केदारनाथ सिंह सशरीर एक साहित्यिक कार्यक्रम में उपस्थित दिखाई देते हैं, पूरे परिवेश के साथ। सत्यजीत रॉय, अशोक कुमार, संजीव कुमार और कई अन्य हस्तियों से सुजांव की मुलाकात होती है। ये मुलाकातें सच में हुई होंगी या स्वप्न में, यह बेमानी है। रवीन्द्र ने पूरे उपन्यास को कालखंड में बाँधने का कोई प्रयास नहीं किया है। ऐसा लगता है कालखंड भी उनके अनुरूप अपनी भूमिका बदल रहा है। हिन्दी उपन्यास की रूढ़िवादिता को तोड़ता यह उपन्यास, उपन्यासों की दुनिया में नई बयार पैदा करेगा।
10. कौन से देस उतरने का-सविता पाठक (लोकभारती पेपरबैक्स)
उपन्यास शुरू होता है दिल्ली मेट्रो में घटे एक वाकये से। लेकिन इससे पहले सविता पाठक एक छोटी-सी कहानी और बताती हैं। एक लड़के की और कोल्हू की। दोनों की खूब बनती थी। पत्थर के कोल्हू पर उभरा पेड़, उड़ती चिड़िया, केले का खम्भा और नाचते-गाते औरत-मर्द, सब असली में बदल जाते थे। लड़का और पत्थर पर सजी दुनिया आपस में बहुत सारी बातें करते थे।
अब राजधानी की मेट्रो से कहानी बाकायदा शुरू ही मान लीजिए। मेट्रो में कोई बोलता है, “भाई! कौन से देस उतरने का?”
समझ में आता है कि पत्थर के कोल्हू से जिस लड़के की खूब छनती थी, वह राजधानी आ गया है। यहीं से दो दुनियाएँ खुलती हैं एक गाँवों की दुनिया और दूसरी शहरों की दुनिया। त्रासदियाँ दोनों ही जगह हैं। गाँव की त्रासदी यह है कि वे ‘ठहरे हुए’ हैं तो शहर में सीमेंट की चहारदीवारी लगातार बढ़ती जा रही है। आम आदमी का जीवन दोनों ही जगह नरक बना हुआ है। सविता पाठक इन दोनों नरकों के बीच एक पुल बनाने की कोशिश कर रही हैं, इस उपन्यास के जरिए या वे आपको दोनों नरकों को दिखा रही हैं। सविता पाठक ने दिल्ली के अभिजात्य से लेकर पुरानी गरीब बस्तियों की नारकीय स्थितियों को, रेलवे पुलों, फ्लाईओवरों के नीचे या कचरे के पहाड़ों के बीच जीवन गुजारते देखा है, इनका साक्षात अनुभव किया है। इन दृश्यों के वर्णन से ही पता चलता है कि ये उधार के अनुभव नहीं हैं। गाँव से शहर आया मुनीश है जो सड़क पर लावारिस लाश-सा पड़ा हुआ है। ठंड और भूख के बीच वह चेतन-अवचेतन में भटकता रहता है। उसके पास माँ की स्मृतियाँ हैं, कोल्हू का बैल है, उससे लगातार खेलता एक बच्चा है। उपन्यास में बहुत से किरदार हैं–राधेश्वरी देवी, नन्दा, अमृता, उसके गुम हो गए पिता, बड़ेलाल और सुधा। लेकिन इन सबके साथ कोल्हू और महुआ का पेड़ भी है, जो किसी भी अन्य किरदार से कम महत्वपूर्ण नहीं है। सविता पाठक पूँजीवादी समय, सत्तालोलुप समाज और संवेदनशून्य व्यवस्था पर चोट करती हैं। वह इसलिए भी चोट करती हैं क्योंकि निरीह होते मनुष्य की कातर पुकार आज कोई नहीं सुन रहा है। इस उपन्यास की सबसे खूबसूरत बात इसकी भाषा और इसका शिल्प है। यह उपन्यास कथ्य और परिवेश को सही ढँग से सिन्क्रोनाइज करता है, इसीलिए महत्वपूर्ण है।
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सुधांशु गुप्त वरिष्ठ कथाकार-आलोचक हैं। चार कहानी संग्रह ‘खाली कॉफ़ी हाउस’, ‘उसके साथ चाय का आख़िरी कप’, ‘स्माइल प्लीज़’ और ‘तेरहवाँ महीना’ प्रकाशित। योगेश गुप्त समग्र (चार खण्डों में) का वरिष्ठ साहित्यकार महेश दर्पण के साथ सम्पादन। ‘कुछ किताबें कुछ बातें―नेपथ्य में विमर्श'-आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित।
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