बेटियाँ धान के पौधे की तरह होती हैं
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बेटियाँ धान के पौधे की तरह होती हैं
ललन चतुर्वेदी
यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
कण्ठः स्तम्बितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः ॥
-कालिदास (अभिज्ञानशाकुन्तलम्)
Today Shakuntala will leave for her in-laws place so my heart is filled with anxiety of separation, my throat is choked with emotion and vision becomes blurred due to flow of tears, if this is the condition of a recluse on the separation of his adopted daughter then you can imagine the plight of the common people living in their domestic world as to how they should be feeling at the departure of their beloved daughter!!
यादें सावन की घटा की तरह छा जाती हैं। सुबह ध्यान कन्यादान के पारंपरिक गीतों की ओर चला गया। आधुनिकता के भौंडे प्रदर्शन के बीच क्षेत्रीय भाषाओं के गीत मुझे बहुत प्रिय हैं और जब-तब मेरा मन अतीत की वीथियों में विचरते हुए अपार तृप्ति का अनुभव करता है। इन गीतों को सुनते हुए मैं दूसरी दुनिया में खो जाता हूँ। कभी हँसता हूँ तो कभी बहुत देर तक मेरे आँसू स्वतः झरने लगते है। इन गीतों की विशेषता यह कि एक गीत में पूरा का पूरा दृश्य आँखों में उतर जाता है। ऐसे में आँखों का भरना स्वाभाविक है।
बिहार के मिथिलांचल में बोली जाने वाली मैथिली एक प्यारी और मीठी भाषा है। इसके संस्कार गीतों में छुपा जीवन दर्शन अद्भुत है। इन गीतों में प्रेम, करुणा और विरह की रसधार बहती है। उत्तर भारत में बेटी के विवाह में कन्यादान एक अनिवार्य परम्परा है। इसे संस्कार कहना इसलिए सही है कि विवाह हमारे यहाँ संस्कार है और कन्यादान उसका अनिवार्य घटक है। इस पावन परम्परा के साथ ही विवाह की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। इस प्रसंग से संबंधित यह सवाल मन में एक बार अवश्य उठता है कि क्या कन्या कोई वस्तु है कि उसका दान किया जाए?
मैं अपना अनुभव कह रहा हूँ। बेटे के विवाह में वर पक्ष के खेमे में जो आनंद-उत्साह रहता है, ठीक वैसा ही परिवेश कन्या पक्ष के यहाँ नहीं होता। वहाँ पल-पल कर्तव्य बोध की अनुगूंज सुनाई देती है। कन्या-पक्ष के लोगों की व्यस्तता देखते ही बनती है। कन्या के पिता का तो हलक सूखा रहता है कि कहीं वर-पक्ष के लोग छोटी-सी त्रुटि के लिए नाराज न हो जाएँ। अपनी प्राणों से प्रिय बेटी के बिछोह का दृश्य उसकी आँखों में जब-जब उमड़ता है, आँखें सावन-भादो बन जाती हैं।
वह आधी रात के बाद का समय होता है जब पिता अपनी पत्नी के साथ मडवा (विवाह मंडप) में पीली धोती पहन कर कन्यादान के लिए बैठता है। पंडित के मंत्रोच्चार के बीच अग्नि को साक्षी बनाया जाता है और स्त्रियाँ गीत गाना शुरू करती हैं। प्रसंगवश इस मैथिली गीत के कुछ अंश को उद्धृत करना इसलिए आवश्यक है ताकि आप इसकी करुणासिक्त संवेदना से जुड़ सकें-
मरवा के बीच बइसी कनई धिया के पापा
कोना करब धिया दान हे
धन-संपत्ति नाहीं मांगलक निरमोहिया
मांगी लेलक धिया केर हाथ हे
धन-संपत्ति दान हँसी के हम करतिओं
धिया मोर अइछ प्राण हे
सोना के पिंजरा बना दे रे सोनरा
राखब धिया के नुकाई हे
सब विधान हम विधना के तोड़ब
धिया के करब नहीं बिदाई हे
कुहुकि -कुहकि बोले बन के कोइलिया
जनि बाबा होइउ उदास हो
विधि के विधान आहाँ निभाइउ
हँसी-खुशी करू धिया दान हे।
(यह गीत श्रवण कुमार की रचना है जिसे प्रियंका मैथिल ने गाया है। प्रयास किया है कि मैथिली के सही शब्द और स्वराघात आ सके।)
इस गीत का भाव यह है कि मड़वा में बैठा कन्या का पिता रो रहा है कि वह अपनी प्राण-प्यारी बेटी का कैसे कन्यादान करे। यदि वर-पक्ष धन-संपत्ति मांग लेता तो वह राजी-खुशी सब कुछ दे देता लेकिन वह तो बड़ा निर्मोही निकला। वह प्राण-सम पुत्री का हाथ मांग रहा है। पिता सोनार से विनती कर रहा है कि मुझे सोने का पिंजरा बनाकर दो। मैं विधि के सारे विधान तोड़ दूँगा और बेटी की विदाई नहीं करूंगा। यह आश्चर्य की बात है कि इस गीत में बाग़ की कोयल पिता को समझा रही है और धीरज बंधा रही है कि आप विधि का विधान निभाएँ और हँसी-खुशी के साथ कन्यादान कीजिए। बेटी सचमुच घर की कोयल होती है और वह पिता के द्वारा निर्मित नीड़ में रहती है। जो खेती-किसानी से जुड़े होंगे, निदा फाजली का शेर उनके जेहन में ठीक से उतरेगा-
अपने घरों में गैरों की तरह होती हैं
बेटियाँ धान के पौधों की तरह होती हैं।
इस गीत को सुनते हुए न केवल वहां अगल-बगल बैठे नर-नारी अपितु पास-पड़ोस के लोगों की आँखें भी नम हो जाती है। इस करुणा की धारा में पाषाण-हृदय भी पिघल उठता है। इस कारुणिक प्रसंग को लोकगीतकारों ने अपने-अपने ढंग से शब्द दिया है और स्वरों से सजाया है। पिता के मन में विचारों की आँधी चलती रहती है कि जिस बेटी को पालने में झुलाया है, कन्धों पर बिठाकर राजकुमारी की तरह पाला है आज उसे एक अपरिचित हाथों में सौंपना है। यह जग की रीत है। सुनने मात्र से पिता का मन संतुष्ट नहीं होता। उसकी आँखें बार-बार भीगती हैं जिन्हें वह अंगोछे से पोंछता रहता है। कन्यादान करते हुए उसके हाथ काँप रहे हैं। विदा की इस बेला में बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी भी स्वयं को रोक नहीं पाते। उनकी आँखों से भी आँसू झरने लगते हैं। यहाँ तक कि राजा जनक भी स्वयं पर नियंत्रण नहीं पा सके। एक लोकगीत में वर्णन है कि सीता का हाथ थामे राजा जनक काँप रहे है। वे विदेह हो गए है। वे सुध-बुध खो चुके हैं। यहाँ उनका तत्वज्ञान निरीह महसूस कर रहा है-
धिया लेले काँपेलन राजा हो जनक ऋषि कैसे करब धिया दान।
सीता जब विदा होती हैं तो जनकपुर की स्त्रियाँ बारी-बारी से उन्हें गले लगाती हैं और कहारों को रोकती हैं कि जल्दबाजी मत करो, सबको मिलने दो। राजा जनक और ऋषि जनक का यहाँ भेद मिट गया है। वह दरवाजे पर खड़े रो रहे हैं। आँगन में माताएँ रो रही हैं। बहनें रो रही हैं। सहेलियां रो रही हैं। तृषित नेत्रों से सब सीता की ओर देख रहे हैं। दरवाजे पर बँधी धेनु गाय फेंकड़ रही है। बेटी की विदाई है। केवल राजा जनक की बेटी नहीं, मिथिला की बेटी। सारी प्रकृति रो रही है। जड़-चेतन सब का गला रुंध गया है।
लोक के इस करुण प्रसंग का कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम में हृदयद्रावी वर्णन किया है जिसे इस लेख के प्रारम्भ में मैंने उद्धृत किया है। महर्षि कण्व शकुन्तला को विदा दे रहे हैं। वे फूट-फूट कर रो रहे हैं। आश्रम के फूल-पौधे और वन के पशु-पक्षी तक रो रहे हैं। उन फूलों को उदास होना ही था जिन्हें शकुन्तला ने अपने हाथों से सींचा था। वे पशु-पक्षी जो शकुन्तला के एक बुलावे पर आकर उनके पास खड़े हो जाते थे, आज उसे जाते हुए देखकर अपने को कैसे रोक सकते थे। सीता की विदाई के समय भी ऐसा ही दृश्य उपस्थित हुआ था। गौर करें, शकुन्तला और सीता दोनों अपनी बेटियां नहीं हैं। इसी सूक्ष्म बात को कालिदास पकड़ते हैं और कण्व के मुख से कहलवाते हैं कि शकुन्तला तो मेरी अपनी बेटी नहीं और मोह-माया से दूर तपस्वी होने के बावजूद मेरा हृदय फट रहा है,वे गृहस्थ स्वयं को कैसे सँभालते होंगे जिनकी अपनी बेटियाँ होती हैं। कहने के लिए बेटी किसी ख़ास व्यक्ति की होती है लेकिन वस्तुतः वह सब की बेटी होती है। मेरे यहाँ कहा जाता है कि बेटी तो पंच की होती है। लोक ने सदैव बेटियों को सम्मान दिया है।
दो पुत्रियों का पिता होने के नाते मैंने इसे इसे गंभीरता से महसूस किया है। मेरी बेटियों की माँ दुर्भाग्यवश पहले ही इस लौकिक संसार से विदा ले चुकी थी। इस नाते मुझे माँ की भी भूमिका निभानी थी। और इसे निभाने में बेटी ने बहुत सहयोग किया। सारी व्यवस्था हम दोनों ने मिलकर संभाली लेकिन ऐसा कोई पल नहीं रहा जब मुझे उसकी माँ की याद न आती रही। याद तो बेटी को भी आयी होगी लेकिन समय ने उसे स्वयं पर नियंत्रण करना सिखा दिया था। जब उसे विदा कर लौट रहा था तो लगा कि एक बार फिर मेरी दुनिया में विराट शून्य पसर गया है। एक तरफ इस गुरु दायित्व के निर्वहन की अपरिमित खुशी तो दूसरी तरफ सूने घर का वर्णनातीत दुःख। ईमानदारी की बात कहूँ तो ऐसा कोई पल नहीं होगा जब बेटियाँ मेरी स्मृति के दायरे से बाहर जाती हों। पत्नी भले तीज-त्योहारों में याद आएँ लेकिन बेटियों ने तो मन में डेरा बना रखा है। समय आँसुओं को सुखा देता है लेकिन एहसासों के बिरवे तब भी पनपते रहते हैं। न जाने उन्हें कहाँ से खाद-पानी मिलता रहता है। मेरे लिए तो यह शाश्वत सत्य जैसा है कि बेटी बाग की कोयल होती है और उसके विदा होते ही सन्नाटा पसर जाता है। यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि उसके जाने के बाद भी उसकी कूक सुनाई देती रहती है। बेटियाँ होती हैं तो लगता है कि घर में बसंत है। बेटी को विदा करते हुए एक पिता अपने दायित्व से थोड़ी देर के लिए ही मुक्त हो पाता है। उस समय उसे खुशी की अनुभूति होती है परन्तु जैसे ही दीवारों से बेटी की आवाज की प्रतिध्वनि गूंजती है उसका मन कलप उठता है। पिता को कंधे पर कोमल हथेलियों के स्पर्श का एहसास होता है, जैसे बेटी कह रही हो- "पापा, उदास नहीं होते, साल भर कहाँ रह पाता है बसंत।" पिता की आँखें एक बार फिर नम हो जाती हैं।
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ललन चतुर्वेदी सुपरिचित कवि हैं। प्रकाशित कृतियाँ : प्रश्नकाल का दौर (व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी तथा यह देवताओं का सोने का समय है (कविता संग्रह)। ईमेल: lalancsb@gmail.com
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