बेहतर दुनिया के लिए छोटे-छोटे स्वप्नों की पोटली

बेहतर दुनिया के लिए छोटे-छोटे स्वप्नों की पोटली
(समीक्षा)
अशोक कुमार
आलोक की कविताएँ विरोध की उग्र ध्वनियों के बरक्स उन जरूरी सवालों की ओर लौटती हैं जिन्हें समय ने धीरे-धीरे हमारी स्मृति के हाशिए पर धकेल दिया है। वे सहजीविता को केवल एक भावुक आदर्श की तरह नहीं, बल्कि तर्क और मनुष्यता की कसौटी पर परखती हैं। उनकी कविता एक साथ तीन काम करती दिखाई देती है : जो मूल्य मनुष्य होने के लिए जरूरी हैं, उन्हें बचाती है; जो अनावश्यक और जड़ हो चुका है, उसे छोड़ने का साहस देती है; और जो नए मूल्य हमारे समय को चाहिए, उन्हें गढ़ने की कोशिश करती है।
आधुनिकता की तेज़ रफ़्तार में जब भाषा भी लगातार अपना चेहरा बदल रही है, ऐसे समय में आलोक की कविताएँ उस लोकभाषा और ग्रामीण संवेदना को आवाज़ देती हैं जिन्हें आधुनिक समय ने धीरे-धीरे नेपथ्य में धकेल दिया है।
उनकी कविता में गाँव केवल एक भौगोलिक जगह नहीं है; वह स्मृति है, संस्कृति है, रिश्तों की गर्माहट है और उस जीवन दृष्टि का आखिरी सिरा है जिसे महानगरों की चमक लगातार धुँधला कर रही है। इसीलिए ये कविताएँ रूढ़ परंपराओं के विरुद्ध किसी आक्रामक घोषणा की तरह नहीं आतीं, वे चुपचाप प्रवेश करती हैं, भीतर जगह बनाती हैं और फिर उन जड़ताओं की दीवार में एक खिड़की खोल देती हैं। उनका प्रतिरोध शोर नहीं करता, सवाल करता है।
आलोक की औपचारिक ट्रेनिंग साहित्य या भाषा की नहीं, राजनीतिक विज्ञान की है। शायद यही कारण है कि उनकी कविता में भाषाई चमत्कार पैदा करने की कोई बेचैनी नहीं दिखाई देती। वे शब्दों की चालबाजियाँ नहीं करते, बल्कि उन्हें जीवन के अनुभवों के रंगों में रंगकर इस्तेमाल करते हैं। उनकी भाषा जितनी सहज दिखाई देती है, उसके भीतर समाज की रूढ़ियों, भेदभावों और संकटों के उतने ही महीन तंतु खुलते चले जाते हैं।
आलोक की कविताओं की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनके बिंब कहीं से आयातित नहीं हैं। वे हमारे आसपास के जीवन से उठते हैं—घर से, गली से, गाँव से, रिश्तों से, बाजार से, राजनीति से और उन छोटी-छोटी चीजों से जिन्हें हम रोज़ देखते तो हैं, लेकिन अक्सर देख नहीं पाते। शायद इसलिए इन कविताओं से गुजरते हुए पाठक को किसी कठिन व्याख्या की जरूरत नहीं पड़ती। ये कविताएँ व्याख्या से अधिक संवाद चाहती हैं। ऐसा लगता है जैसे वे सामने बैठकर आपसे बात कर रही हों, कभी शिकायत कर रही हों, कभी आपको कटघरे में खड़ा कर रही हों और कभी समाधान की जिम्मेदारी भी आपके कंधों पर रख रही हों।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जब जीवन के संघर्षों का अनुभव, उन्हें देखने वाली सूक्ष्म दृष्टि, उन्हें भीतर तक महसूस करने वाली संवेदना और उन्हें अभिव्यक्त करने वाली सधी हुई भाषा एक जगह आ मिलती है, तभी ‛पोटली के दाने’ जैसा संग्रह संभव होता है।
आलोक के कवि को खास बनाता है अपने आसपास घट रही घटनाओं को देखने का वह नैतिक बोध, जो केवल दूसरों के दुख को देखने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उस दुख के बीच अपनी सुरक्षित स्थिति पर भी सवाल उठाता है। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा असुरक्षित महसूस कर रहा हो, तब अपनी सुरक्षा भी उन्हें सहज नहीं रहने देती। वह सुरक्षा उनके भीतर सुविधा नहीं, बल्कि अपराध-बोध पैदा करती है–
“सुरक्षाएँ पैदा कर रही हैं अपराध-बोध
धकेल रहा है किसी अंधेरी खाई में
यह श्रेष्ठता का दंभ
बज रहा है सम्मान मन में
बरसों से जमा हुए मवाद की तरह
चहुँओर पसरा अपनापन भी डरा रहा है अब
मेरे स्वधर्मियो, स्वजातियो, स्वलिंगियो
बख्श दो मुझे”
कवि का यह अपराध-बोध अपने सुरक्षित होने को उपलब्धि की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रश्न की तरह देखता है जिसका उत्तर उसे लगातार देते रहना है।
जब क्षमा और दया जैसे सदियों से मानवीय माने जाने वाले शब्द सत्ता और नियंत्रण की तकनीकों में बदल जाते हैं, तब आलोक की कविता इसी विडंबना को पकड़ती है जहाँ करुणा का चेहरा पहनकर भी हिंसा की जा सकती है और क्षमा के नाम पर प्रतिरोध को कुंद किया जा सकता है। आलोक लिखते हैं–
“ऐसे समय में जब
धार्मिकों की एक भीड़ लहराते हुए हथियार
और लगाते हुए भड़काऊ नारे
निकाल रही है मेरे ही पड़ोस में एक अशोभनीय शोभायात्रा
मैं लिख रहा हूँ कविता”
यहाँ कविता लिखना किसी निजी भावुकता का अभ्यास नहीं रह जाता। यह सामूहिक लाचारी का दस्तावेज बन जाता है।
आलोक की कविताएँ राजनीतिक चेतना से लैस हैं, सामाजिक समझ से संपन्न हैं और प्रतिरोध की एक विनम्र अभिव्यक्ति की तरह सामने आती हैं, लेकिन उनका संसार केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। वहाँ प्रेम है, पीड़ा है, विस्थापन है, स्मृति है, पारिवारिक दूरी है, बेरोजगारी है और रोजमर्रा के जीवन की वे छोटी-छोटी खुशियाँ भी हैं जिनसे मनुष्य अपने भीतर का मनुष्य बचाए रखता है।
“मेरे पिता कभी नहीं खुले मुझसे
एक अजीब-सी दूरी रही है
हमारे दरमियाँ
हम साथ रहे पर नदी के किनारों
और रेल की पटरियों की तरह समानांतर
कभी मिले भी तो न मिलने की तरह”
इन पंक्तियों में भारतीय पुरुष परवरिश की वह पूरी संरचना यहाँ दिखाई देती है, जिसने पुरुषों को बाहरी दुनिया के सामने कठोर रहना तो सिखाया, लेकिन अपने ही लोगों से प्रेम व्यक्त करने की भाषा नहीं दी।
इस संग्रह की सबसे खास बातों में से एक यह है कि इसकी शुरुआत ही ऐसी कविता से होती है जो दुनिया के भीतर मौजूद सूक्ष्म अंतर्विरोधों पर किसी मुखर नारे से नहीं, बल्कि एक सहज-सी शुभकामना के बहाने बहुत गहरी चोट करती है’–
“उस शहर में रहना चाहता हूँ
जहाँ साइकिल देखकर
रुक जाती हैं मोटर गाड़ियाँ अदब से”
सिर्फ दो पंक्तियों में पूरा सामाजिक-आर्थिक ढाँचा हमारे सामने आ खड़ा होता है। साइकिल और मोटरगाड़ी यहाँ केवल यातायात के साधन नहीं रह जाते—वे वर्ग, हैसियत और सत्ता के प्रतीक बन जाते हैं।
संग्रह की दूसरी ही कविता में आलोक अपनी पूर्व प्रेमिकाओं के बहाने ग्रामीण अंचल की लड़कियों से लेकर शहर की आधुनिक लड़कियों तक की बदलती सामाजिक स्थितियों को एक सूत्र में पिरोते हैं और अंततः अपनी पत्नी में उन तमाम स्त्रियों की कोई न कोई छवि खोज लेते हैं।
“मेरी पहली प्रेमिका बकरियाँ चरती थी
वैसे वह भी लगती थी किसी नवजात बकरी सी ही
दस-दस बकरियों की रस्सी थामे
वह घिसटती रहती थी कई-कई दिशाओं में
जिधर बकरियाँ, उधर वो
उन दिशाओं में
मेरे प्रेम की भी हो सकती थी एक दिशा”
यह कविता केवल प्रेम की स्मृति नहीं है। इसके भीतर स्त्री के जीवन की वे दिशाएँ भी छिपी हैं जिन्हें अक्सर समाज उसके लिए पहले ही तय कर देता है। प्रेम यहाँ व्यक्तिगत अनुभव से निकलकर सामाजिक अनुभव का रूप ले लेता है।
“जवान बेरोजगार संतानों के बूढ़े पिता
कुछ ज्यादा ही पिता होते हैं”
इन पंक्तियों में बेरोजगारी की पूरी त्रासदी किसी सरकारी आँकड़े की तरह नहीं, बल्कि एक घर के भीतर उतरती है, और कवि उसे आँकड़ों में नहीं, रिश्तों में दर्ज करता है।
राजेश जोशी जी की कविता ‛पीठ की खुजली’ पढ़ते हुए यह सवाल मन में उठता है कि क्या इतने साधारण और लगभग उपेक्षित विषयों पर भी इतनी खूबसूरत कविता संभव है? आलोक के संग्रह में ‛माँ के खर्राटे’ पढ़ते हुए वही आश्चर्य फिर से होता है–
“दूसरे कमरे में
माँ ले रही है खर्राटे
इधर इस कमरे में
मैं लबालब भर रहा हूँ सुकून से
मेरी आत्मा को छू रही है चैन की पुरवाई
लगता है नींद
सबसे सुंदर लिबास में उतरी है मेरे घर”
कविता की खूबसूरती कई बार उसके विषय की असाधारणता में नहीं, बल्कि साधारण को देखने वाली असाधारण दृष्टि में होती है और इसमें कोई संदेह नहीं कि आलोक के पास यह दृष्टि है।
अनुभव, संघर्ष और भाषा के साथ कवि के भीतर अपने समय के प्रति एक सजग नागरिक-बोध भी होना चाहिए। दुनिया में घट रही घटनाएँ जब मनुष्य की नींद छीनती हैं, तो कविता में भी उनका प्रवेश स्वाभाविक है–
“कितना अच्छा हो कि
आज रात सोऊँ और उठूँ कल सुबह
तो मेरे साथ ही आँखें मलते उठें अपने बिस्तरों से
यूक्रेन के भी बच्चे
फिलिस्तीन के भी बच्चे
आर्मेनिया, सोमालिया, कोसोवो के भी बच्चे
बल्कि सारी दुनिया के बच्चे
उन्हें उठते ही हड़बड़ी हो स्कूल जाने”
युद्ध के भूगोल को बच्चों की नींद और स्कूल जाने की हड़बड़ी में बदल देना कविता की सबसे बड़ी मानवीय शक्ति है। कवि युद्ध की रणनीति नहीं पूछता; वह यह पूछता है कि बच्चों को अगली सुबह सुरक्षित उठने का अधिकार कब मिलेगा?
आज की कविता में लैंगिक विमर्श जिस तरह उपस्थित है, आलोक की कविताएँ उसमें भी अपना एक अलग रास्ता बनाती हैं। वे लैंगिक असमानता और शोषण के सवाल को केवल स्त्री तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसका दायरा बढ़ाकर ट्रांसजेंडर समुदाय के अनुभवों और संघर्षों तक ले जाते हैं।
मेरे लिए ‛पोटली के दाने’ का एक और आकर्षण पूर्वांचल की उस ठेठ बोली से होकर गुजरना रहा, जिसमें शब्द केवल अर्थ नहीं देते, बल्कि अपने साथ पूरा भूगोल लेकर आते हैं। मिट्टी की गंध, लोक की स्मृति और जीवन का एक ऐसा रंग जिसे महानगरीय भाषा धीरे-धीरे विस्मृत करती जा रही है।
“चौका सैंतने, दीया बारने, चूल्हा फूँकने”
“बिन बयार पीपर का पात”
“बूढ़ी नाउनिया आजी”
जैसे ये शब्द और वाक्यांश कविता में केवल भाषा नहीं हैं; वे उस संसार के अवशेष हैं जिसे बचाना भी कविता की एक जिम्मेदारी है।
नरेश सक्सेना की कविता ‛गिरना’ पढ़ते हुए मनुष्य की स्थिति को लेकर हम जिस अवसाद में उतरते हैं, आलोक की ‛गिरना’ उसी क्रिया को एक बिल्कुल दूसरी रोशनी में देखने का अवसर देती है–
“गिर रहा है पेड़ से
एक सूखा पीला पत्ता
घूमते, नाचते, आराम-आराम से
गिर रहा है ऐसे
जैसे गिरता है रंगमंच पर कोई पर्दा
समेटे हुए पूरी कहानी
या फिर बाँधे हुए एक रवानी
अहा! क्या गिरते हुए भी हो सकता है कोई
इतना शांत, सहज, आनंदित
क्या गिरना भी हो सकता है?
इतना गरिमामयी, इतना शालीन”
यहाँ गिरना पराजय नहीं, जीवन की एक स्वाभाविक परिणति बन जाता है। एक सूखा पत्ता पेड़ से टूटते हुए भी अपनी गरिमा नहीं खोता।
आलोक की कविता ‛पोडियम पर खड़ी लड़की’ में पितृसत्ता की संरचना पर खड़ी होती हुई लड़की को देखती हैं; वे एक पिता की उस कल्पना को जगह देती हैं जो अपनी बेटी को केवल सुरक्षित नहीं, बल्कि प्रेम में पड़ते हुए भी देखना चाहता है। उनकी कविताओं में विस्थापन का दर्द बहुत ही गहराई से मौजूद है—कहीं ‛आग वाली औरतों’ में, कहीं ‛नामावली’ में, कहीं ‛ग़म-ए-मोहर्रम’ में और कहीं ‛चनपुरवा वाली काकी’ में।
आलोक की कविताओं का वितान बड़ा है। ये कविताएँ निजी जीवन के अनुभवों से होते हुए विमर्शों के मैदान में उपेक्षितों की आवाज़ बनती हैं। प्रेम वात्सल्य और उम्मीदों से सराबोर ये कविताएँ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बेबाक राय रखते हुए दुनिया भर के दमितों के प्रति एक बिरादराना संबंध स्थापित करने की कोशिश करती हैं।
अपनी बोली-बानी को बचाने की जद्दोजहद करती हुई यह कविताएँ प्रतिरोध की आँच में तपकर सत्ता और समाज के समक्ष तीखे प्रश्न बनाकर खड़ी होती हैं। आलोक की कविताएँ समकालीन कविताओं में अपना स्थान बनाएँगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
किताब : पोटली के दाने
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन, नोएडा
कवि : आलोक कुमार मिश्रा
वर्ष : 2026
पृष्ठ : 164
मूल्य : 249 रुपए
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समीक्षक अशोक कुमार युवा कवि हैं। प्रकाशित कविता संग्रह : मेरे पास तुम हो (2020),
रिक्तियों में पहाड़ (2025)। ईमेल : akgautama2@gmail.com
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