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ख़बरों से बाहर ग़ज़ा (पुस्तक समीक्षा)
शरणार्थी होना केवल अपना भूगोल खो देना नहीं है। यह धीरे-धीरे अपनी रोज़मर्रा की स्वायत्तता खो देना भी है। खाना कब मिलेगा, राशन कब बँटेगा, काम मिलेगा या नहीं, बच्चे के लिए कपड़ा आएगा या नहीं—जीवन के सबसे साधारण निर्णय भी किसी दूसरी व्यवस्था की अनुमति पर टिक जाते हैं।


दो फिलिस्तीनी कहानियां
उसे जब कुछ नहीं समझ आया तो उसने बोतल का ढक्कन हटाया और अंदाज़ से उस जमीन पर पूरा दूध उड़ेल दिया जहाँ वह अपने बच्चे को छोड़कर गई थी


महमूद दरवेश की कविताएँ
हम भी होते अंजीर के वृक्ष की पत्तियां, अथवा एक उपेक्षित मैदान के पौधे ताकि महसूस कर पाते मौसम का बदलना


फिलिस्तीनी बच्चे : कुछ कविताएँ
हम यहाँ रहते हैं, अपने ही मुल्क के अंदर लेकिन मुल्क से निष्कासित
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