top of page

इस दुनिया को बचाने के लिए

  • 13 minutes ago
  • 11 min read

इस दुनिया को बचाने के लिए
कहानी : रमेश शर्मा 

      

ग्राउंड फ्लोर पर घर के भीतर जो एक बड़ा-सा हॉल था, वह तीन कमरों से घिरा हुआ था। उस हॉल के भीतर कोने में रखे गए एक्वेरियम के भीतर पानी में तैरती हुई रंगीन मछलियाँ यूँ दिखाई पड़ती थीं जैसे कि वे चौबीसों घण्टे अपनी ड्यूटी निभा रही हों। मछलियों से लेकर घर के पेट्स तक के लिए हॉल में थोड़ी-थोड़ी जगहें तय थीं। हॉल के भीतर का दृश्य बहुत सुन्दर लगता था। “हॉल के दृश्य इतने सुंदर क्यों लगते हैं?” जब एक बार किसी काम से वहाँ मैं गया था तो यह सवाल मेरे भीतर उठा था। एक छोटे से घर में जब सबके रहने-बसने की जगहें तय हो सकती हैं तो इतने बड़े देश में क्या सबके रहने-बसने की जगहें तय नहीं हो सकतीं? अचानक इस सवाल के आते ही उस दिन देश के दृश्य और असुंदर लगने लगे थे मुझे। मन में उठ रहे प्रश्न ऐसे थे कि उनके साथ उनके जवाब भी चिपके हुए लग रहे थे, मानों किसी ग्लू से चिपककर दो वस्तुएँ एक साथ लिथड़ी हुई हों।


जब से यह घर बना था, तब से पूर्व की ओर हॉल की जो दीवार थी उससे सटकर एक पलंग रखा हुआ था। जब घर में बच्चे थे तब से इस पलंग की जगह यहीं तय थी और अब जबकि बच्चे घर से विदा हो चुके हैं, तब भी इसकी जगह कभी बदली नहीं गयी। इसके ठीक बग़ल में एक डायनिंग टेबल आज भी लगा था जहाँ भोजन के लिए घर में बचे रह गए अधेड़ बंसल दंपत्ति अक्सर आकर बैठते। उनका उठना-बैठना उस तरह अब नहीं रह गया था जैसे कभी बच्चों वाले घर में हुआ करता था। वे बैठकर अब थोड़ी दुनियादारी की बातें करते, थोड़ी स्मृतियों में लौटते और फिर थक-हारकर सोने चले जाते। उनकी दिनचर्या में अब कोई नयापन नहीं था। उन्हें देखकर लगता कि किसी नए उत्साह से भी उनका अब कोई वास्ता नहीं रह गया था।


इस घर के पेट (pet) का नाम टोक्यो था।


जापान एक सुंदर देश है और उसका केपिटल उससे भी सुंदर एक आकर्षक शहर! इसी सुंदर शहर से प्रभावित होकर घर की छोटी बेटी ने उसका नाम टोक्यो रख दिया था।


छोटी बेटी ने इस फीमेल डॉग को लाकर जब इस घर का नया सदस्य बनाया था तो वह मात्र 27 दिनों की थी। असुंदर और अपवित्र कहे जाने वाले जीव भी किसी घर को सुन्दर बना सकते हैं, यह बात इस घर में बचे रह गए अधेड़ बंसल दम्पत्ति को लम्बे अरसे बाद अब जाकर महसूस होने लगी थी। हॉल में बिछे पलंग की दीवार से सटकर चारों पैर को ऊपर ताने आजकल अक्सर टोक्यो सोई हुई दिखाई पड़ती। यह जगह उसके लिए सबसे मुफ़ीद जगह थी। एक तो उसको वहाँ से हटाने वाला कोई नहीं था और यहाँ पड़े रहने से हर समय खाने-पीने की चीजों के मिल जाने की संभावनाएँ हमेशा बनी रहती थीं उसके लिए।


दंपत्ति को लगता कि घड़ी-घड़ी अकेलेपन को जन्म देने वाले इस समय में भीतरी दुनिया की खाली जगहों के भरे जाने की गुँजाइशें बहुत कम हो चुकीं। जब से बेटियाँ इस घर से विदा होकर अपनी दुनिया में गईं थीं, उनकी जगहें इस घर में खाली होती गईं थीं। उन खाली होती जगहों के कारण जो निर्वात उत्पन्न हुआ था, वहाँ धीरे-धीरे टोक्यो का समय भरता चला गया। इस घर के भीतर जहाँ-जहाँ प्यार और दुलार के बचे-खुचे स्त्रोत रह गए थे, उसकी वारिस अब टोक्यो बन गयी थी। स्वीट्स उसके लिए नुकसानदायक थे, फिर भी उनका स्वाद चखने के अवसर टोक्यो के जीवन में बढ़ गए थे। वह खाने-पीने की इतनी शौकीन होती गयी कि कई बार ओवरडोज की वजह से उसे उल्टियाँ भी होने लगती थीं। उसकी हर उल्टी के बाद अधेड़ दंपत्ति थोड़ी चिंता में डूबते हुए नजर आने लगते थे। उसे कभी स्वीट्स न देने की वे कसमें खाते पर कसमों के टूटने का क्रम कभी टूट नहीं पाया।


जब से उन्होंने डॉक्टर से टोक्यो को हुई नई बीमारी के बारे में सुना था, उनके भीतर दुःख शनैः शनैः प्रवेश करने लगा था। उसे चार-छः माह में मिर्गी जैसे झटके आने लगे थे। हर झटके के बाद कुछ समय के लिए वह बेहाल होने लगती थी। डॉक्टर ने बीमारी का नाम केनिन डिस्टेम्पर बताया था। जब से दंपत्ति ने जाना कि यह पूरी तरह ठीक न होने वाली बीमारी है, तब से घर की हर दीवार पर एक उदासी चस्पा होने लगी थी। उस उदासी की नमी सीधे उन्हें दिल में महसूस होती थी।


पलंग से चिपकी दीवार जो पूर्व की ओर थी, उस पर धीरे-धीरे चिपकती जा रही उदासी कुछ ज़्यादा ही महसूस होने लगी थी इन दिनों। “टोक्यो भी किसी दिन चली गयी तो?” यह सवाल उनके भीतर एक उदासी का तूफान लेकर आता था और फिर धीरे से थम जाता था। 12 में से अपनी उम्र के 5 साल बिता चुकी टोक्यो को इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता था। उसे नहीं पता था कि उसकी उम्र कम हो जाने वाली थी। वह उतना ही खुश रहती थी जितना कि एक बच्चे को होना चाहिए होता था।


उसकी खुशी में थोड़ा और इजाफा तब देखा गया जब मृदुल इस घर में आया था।


मृदुल उम्र में टोक्यो से एक साल छोटा था पर उसकी चुहलबाजियाँ उसे कई गुना उम्रदराज बनाती थीं।


मृदुल और टोक्यो की जुगलबंदी से बड़े दिनों बाद घर में रौनक लौटी थी और घर गुलाब की पंखुड़ियों की तरह एकाएक खिल उठा था। कुछ दिनों के लिए टोक्यो की बीमारी भी छू मंतर हो गयी थी।


‘नानू, तू आ गया। नानू, कितनी प्यारी डॉगी है न।‘ चार साल के बच्चे की बातचीत इस तरह घर में गूँजती कि बच्चे के उधम से उपजी अशांति भी मन में सुकून पैदा करने लगती थी।


अप्रेल का महीना बीतने को था। दूसरे पखवाड़े की भीषण गर्मी में स्कूल बंद हो चुके थे। गरमी खूब पड़ने लगी थी। घर के भीतर बच्चों का एक ही काम रह गया था... उधम मचाना। मृदुल और टोक्यो के उधम का शोर हॉल के भीतर सुर-ताल के साथ गूँजने लगा था।


अप्रेल की भरी दुपहरियों में बाहर लू चलने लगी थी पर घर के अन्दर की आबोहवा में अभी भी ठंडक थी। अधेड़ दम्पत्ति में से पुरुष की उम्र ज्यों ज्यों साठ के नजदीक पहुँच रही थी, नौकरी से फारिग हो जाने की उमंग उसके भीतर बढ़ने लगी थी। ‘अब दो वर्षों के बाद मैं इस नौकरी से आजाद हो जाऊँगा’- साठ के नजदीक पहुँचते-पहुँचते जीवन में स्वतंत्रता का मूल्य उसे अब बेशकीमती लगने लगा था।


इन दिनों पलंग पर लेटे-लेटे उससे सटी दीवार को वह एकटक देखने लगता और उसे दीवार पर काले-काले निशान दिखाई पड़ते। उसे देखकर उसका मन उदासी से भर उठता था।


पिछली दीवाली जब घर की रंगाई-पुताई हुई थी, तब यह दीवार एकदम उजली थी। उजली होते हुए भी उसने इस दीवार को कभी उस नज़र से देखा नहीं था जैसे इन दिनों देख रहा था।


उसकी पत्नी जो 55 के उस पार पहुँच रही थी, उसे महसूस होता कि आजकल वह इन दीवारों से बतियाने भी लगा है। उसमें आ रहे बदलाव उसे अचंभित करते। उसे देखकर उसकी नजरों में एक ऐसे आदमी की तस्वीर उभरती जो बाहर से ज़्यादा अपने भीतर ही खोया हुआ रहता है। वह उसे अपने हाल पर छोड़ देती, कुछ कहकर उसे वह परेशान नहीं करना चाहती थी। स्त्री को मंदिर जाना पसंद था। वह सुबह-शाम मंदिर जाती और वहाँ कृष्ण नाम का जाप करती। बदले में ईश्वर से वह कुछ नहीं माँगती थी। उसकी मान्यता थी कि ईश्वर को सब कुछ पता है कि उसे क्या चाहिए, देना होगा तो वह उसे बिन मांगे भी दे देगा। उसे कृष्ण का बाल रूप भाता था। कई बार वह कृष्ण की मूर्ति में मृदुल को भी देख लेती थी। इस देखने में उसे जो खुशी मिलती थी शायद वह खुशी ईश्वर की ही देन थी जो बिन मांगे उसे मिल जाती थी। उसकी दिनचर्या में कहीं खोये रहने के विकल्प बहुत कम थे। पुरुष अपनी नौकरी से लौटकर हॉल में बिछे इसी पलंग पर लेटा रहता। लेटने के बाद पुरुष के भीतर स्मृतियों में लौटने के अनगिनत विकल्प होते थे। काले-काले चिह्नों को देखकर स्मृतियाँ उसे कहीं खो जाने के रास्तों में लेकर जाने लगतीं थीं। बाहर निर्मित इन छवियों को स्त्री अपने भीतर की आँखों में उतारती। पुरुष की दिनचर्या से जुड़ी जो बाह्य छवियाँ थीं, उसे देखने-परखने के विकल्प केवल स्त्री के पास थे।

अपनी-अपनी दुनिया में रहकर भीतर-बाहर की दुनिया को देखना, यह सब अब उनकी दिनचर्या के हिस्से थे।


पुरूष की स्मृतियों में इन दिनों उसी बच्चे की तस्वीर रह, रहकर उभरती थी।


उसे अक्सर लगता जैसे कि बच्चा कह रहा हो “नानू, तू आ गया।”


उसे यह बात रह रहकर परेशान करती थी कि हर घर शुरू में बच्चों वाला घर होता है, फिर धीरे-धीरे बिना बच्चों वाले घर में बदल जाता है। बच्चे बड़े होकर एक नए घर की तलाश में बाहर निकल जाते हैं जहाँ वे अपने खोए हुए बचपन को इत्मीनान से याद कर अपने भीतर जन्मे दु:ख को महसूस कर सकें। यह जीवन की एक नियति है। जीवन का एक निर्धारित क्रम।


दंपत्ति के भीतर आदम इच्छाएँ जागतीं कि उन्हें फिर से बच्चे मिलें जिससे घर की रौनक दोबारा लौट सके। अधेड़ पुरुष बंसल जी को लगता कि घर को घर की तरह होने के लिए घर में बच्चों का होना कितना जरुरी है।


“घर तो एक जगह ठहरा हुआ रहता है पर घर के भीतर का बचपन उसे छोड़कर कहीं दूर चला जाता है। घर के हिस्से हमेशा उम्रदराज लोग आते हैं।” वे इस बात को सोच, सोचकर दुःखी होते कि इस उम्र में वे अब कहाँ जाएंगे? उनकी यात्रा तो अब थम चुकी! उन्हें तो अब यहीं रहना है, इसी घर में, जहाँ अब किसी बचपन की मौजूदगी शेष नहीं थी। जो शेष थी उसके भी छीने जाने का भय उनके साथ चलने लगा था।

वह बच्चा भी कुछ दिनों पहले ही आया था अपनी माँ के साथ, जो किसी समय इसी घर की बच्ची थी और उसके होने से यह घर, घर की तरह लगता था।


अब वह बड़ी होकर एक नए घर में रहती थी अपने इसी बच्चे और पति के साथ। उसका वही बच्चा जो कुछ दिनों पहले यहाँ आकर अब यहाँ से जा चुका था।


दीवार पर काले-काले निशानों को देखकर अधेड़ उम्र के व्यक्ति के मन के भीतर इस बच्चे की कई कई तस्वीरें उभरतीं थीं।


नानी ने च्यवनप्राश खाने को उसे इसलिए दिया होगा कि उसका शरीर थोड़ा और मजबूत हो सके, पर उसे खाए बिना बच्चे ने दीवारों पर उसे लेप दिया था। उन तस्वीरों को देखकर यूँ लगता जैसे बच्चे ने जीवन की तस्वीरें उकेर दी हों। दीवारों पर उकेरे गए काले काले चिह्न यूँ लगते जैसे वे प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्र हों। कभी-कभी अधेड़ पुरुष बंसल जी को लगता कि उस बच्चे के भीतर एक चित्रकार बैठा है जो पुरानी सभ्यता को खींचकर दोबारा लाना चाहता है। जैसे वह दुनिया को अपनी नजर से थोड़ा सुन्दर बनाना चाहता है जो लगातार बदरंग होती जा रही थी।


द्वेष से भरी दुनिया। लूटपाट और हिंसा की खबरों से भरी दुनिया। धर्म के नाम पर दंगे फसाद। उफ्फ....! राजनीति ने दुनिया का कैसा चित्र बनाना सिखाया था लोगों को। कम से कम उस दुनिया से इस बच्चे का वास्ता नहीं था। घर इन बच्चों से दूर होकर राजनीतिक दुनिया की सिखाई तस्वीरों से भरते जा रहे थे। अधेड़ व्यक्ति को लगता कि दीवार पर च्यवनप्राश के लेप से बनाई गई बच्चे की तस्वीर उस बदरंग होती दुनिया के खिलाफ विरोध दर्ज करने जैसी कोई घटना है।


उस बच्चे की याद अधेड़ व्यक्ति को रह, रहकर आती थी। उसकी जिद याद आती थी -


‘मम्मा मुझे ब्लैक कलर की कार चाहिए, मम्मा मुझे येल्लो कलर का ऑटो चाहिए।’ हर बार बच्चे को नए खिलौने चाहिए होते थे और हर बार उसकी माँ जो कभी इस घर की बच्ची थी, अपने बच्चे के लिए नए नए खिलौने लाकर देती थी। शायद बच्चे को नए, नए खिलौने लाकर देना उसे अच्छा लगता होगा। वह जानती थी कि यह बड़ा होकर खिलौने नहीं मांगेगा जबकि खिलौने मांगना बचपन के बचे होने का संकेत था जिसमें जीवन की उम्मीदें हर समय बची होती थीं।


“घर और बचपन का कितना गहरा नाता है” संभव है इस नाते के खत्म होने की संभावना को सोचकर वह भी परेशान होती हो। विचार भी तय समय के पहले नहीं आते। समय के भूगोल में उनके आने की जगहें भी तय होती हैं। उसका बेटा एक दिन जब खिलौने मांगना बंद कर देगा तब उसे लगेगा कि वह अब बड़ा हो गया है। तब शायद उसके भीतर विचारों का एक रेला उठेगा और वह एकाएक उदास हो उठेगी। एक बच्चे द्वारा खिलौना मांगने के क्रम का टूट जाना दुनिया रूपी घर की खूबसूरती को किस तरह अचानक कम कर देता है इस बात को एक मां या एक पिता से बेहतर कौन समझ सकता है।


हॉल के भीतर इस पलंग पर लेटे-लेटे मिस्टर बंसल के मन में अनगिनत स्मृतियाँ आती-जाती रहती थीं।


वे एकटक दीवार पर बने उन काले काले चिह्नों को देखते रहते थे जिनसे उस बच्चे का गहरा नाता था। उसकी याद मन से जाने का नाम ही नहीं लेती थी। उसके उधम से उत्पन्न तत्कालीन समय की बेचैनियाँ अब उन्हें मीठे सपनों की तरह लगती थीं।


उन्हें उस बच्चे की मां (जो उनकी बेटी है) के बचपन के दिन याद आते जो किसी समय साइकिल के सामने लगे घारी (बास्केट) में बैठकर उनके साथ गाँव से शहर घूमने जाती थी। उसके पाँव इतने छोटे थे कि वह घारी के अगल-बगल बड़ी आसानी से अपने पांवों को घुसा कर आराम से बैठ जाती थी। बचपन में वह कभी कभी कोई गीत गुनगुनाती जिसे सुनकर उनका मन भर आता था। भले वह कोई खिलौना नहीं मांगती थी पर उसे घूमने का शौक था। उन्हें वह स्वयं एक खिलौने की तरह लगती थी। तुम क्या बनोगी, पूछने पर वह धीरे से कहती- “डॉक्टर”। बाल हठ उसमें कूट, कूटकर भरा था। लाख बोलने के बावजूद वह बैठकर कभी खाना नहीं खाती थी। उसे खड़े-खड़े भोजन करना पसंद था। इन बाल सुलभ गुणों के माध्यम से उसका बचपन उनकी स्मृतियों में बार-बार लौटकर आता था।


वह बड़ी हुई तो यह घर उससे छूट गया। घर अपनी जगह रह गया था पर उसकी अपनी जगह बदल गयी थी। अब वह आती भी है तो फिर चले जाने के लिए आती है। बचपन के विदा हो जाने से घरों के छूट जाने का जो अनुभव है उसे मिस्टर बंसल ने अपनी बेटी के जरिये पहली बार जाना था जब वह ससुराल चली गयी थी।


इस बार जब वह आई तो लगभग पंद्रह दिन इस घर के साथ रही। उसके बेटे के स्कूल की छुट्टियों ने उसे यह अवसर दिया था या इस घर से मिलने की इच्छा ने, कुछ कहा नहीं जा सकता था।


अपने बेटे के साथ जब वह आई तो मिस्टर बंसल को लगा जैसे बेटी का बचपन फिर से इस घर में लौट आया है। इस एहसास के जन्म लेने से उनके पंद्रह दिन बड़े आराम से इस घर में बीते। टोक्यो को भी बच्चे की संगत भली लगने लगी थी। वह उसे तंग करता तब भी वह उसका साथ नहीं छोड़ती थी। उसके साथ रहने से उसे चॉकलेट और बिस्किट खाने को मिलते थे। वह अपने लिए जिद कर मां से चॉकलेट मांगता और चुपके से टोक्यो को खिला देता था। दूसरे बच्चों की तरह बांट कर खाना उसकी आदत में शामिल था। शाम को जब नानी के साथ वह अपनी साइकिल लेकर कॉलोनी के मंदिर परिसर में जाता तो कई बच्चों से उसकी दोस्ती उस साइकिल की वजह से हुई थी। कॉलोनी के भीतर काम कर रहे मजदूरों के बच्चे भी मंदिर परिसर में आरती के समय शाम को प्रसाद ग्रहण करने आते। उनसे भी उसकी दोस्ती हो गयी थी। एक मजदूर का बच्चा मृदुल की साइकिल चलाता और मृदुल पीछे कैरियर पर बैठकर उसके साथ हो लेता। वे कॉलोनी की सड़कों पर साइकिल की सवारी करते और बाकी बच्चे उनके पीछे भागते थे। यह दृश्य बहुत सुंदर लगता था जो बच्चों की निर्दोष कल्पनाओं में ही शेष रह गया था।


अपने बचे हुए समय में दंपत्ति को अफसोस होता कि बचपन से उपजे इन दृश्यों के बिना घर अब बेनूर हो रहे हैं। इनके बिना दुनिया की खूबसूरती धीरे-धीरे खत्म हो रही है।


वे अक्सर सोचते कि मन के भीतर की उम्मीद आखिर तक बची रहनी चाहिए। संभव है यह दुनिया जो एक घर की तरह है, उसके भीतर का बचपन एक दिन लौटकर आए और इस घर से दूर चले गए बच्चे भी लौटकर आएं और इसे फिर से बचा लें। इस कल्पना के मन में जन्म लेते ही उनके दिन सुंदर होने लगते थे। यह दुनिया जो अब रहने लायक नहीं रह गयी थी, एक सुंदर कल्पना मात्र से उन्हें सुंदर दिखाई देने लगती थी। किसी ईश्वरीय चमत्कार से उनका अब तक कोई सामना तो नहीं हुआ था पर उन्होंने सुना था कि ईश्वरीय चमत्कार के कई जीवित प्रमाण इस दुनिया में मौजूद हैं।


उन्हें अब भी लगता कि बच्चे लौटेंगे एक दिन। टोक्यो जो इस घर में उनके आखिरी बच्चे की तरह थी, वह भी पूरी तरह स्वस्थ होकर इस घर को संभाले रखेगी जो अब उनसे नहीं संभल रहा था। उन सबके साथ मनुष्य के भीतर का खोया हुआ बचपन भी लौटेगा जिसके गुम होने से घरों की खूबसूरती भी गुम हो रही। कल्पनाएं एक दिन हकीकत में तब्दील होंगी। बच्चे लौटेंगे एक दिन जरूर इस दुनिया को बचाने के लिए। दम्पति को बस उस दिन का इन्तजार था। यह इन्तजार ही अब उनके जीवन की आखिरी उम्मीद बनकर उनके साथ चल रहा था।


गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :



रमेश शर्मा वरिष्ठ कथाकार-कवि हैं।‌ कहानी संग्रह : मुक्ति, एक मरती हुई आवाज, उस घर की आँखों से,  पैबंद लगी कमीज। कविता संग्रह : वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम। ईमेल‌ : rameshbaba.2010@gmail.com












Comments


bottom of page