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कॉटन कैंडी

  • Jun 7
  • 8 min read

कॉटन कैंडी
कहानी : मनीष वैद्य

उस लड़के की आँखों में गुलाबी आसमान तैर गया। नीले आसमान से झाँकते सफ़ेद बादलों के बीच गुलाबी फाहों का एक टुकड़ा उसकी आँखों की पुतलियों में फैल गया। लड़का जहाँ खड़ा था, उसके आसपास तीखी धूप थी लेकिन रूई के उस गुलाबी बादलों वाले हिस्से की छाया में होने से उस पर धूप सीधी नहीं पड़ रही थी। गुलाबी टुकड़े के धूप-छाँही चंदोबे से धूप की शहतीरें फूट रही थीं। उनकी सुनहरी चमक से लड़के का चेहरा दिपदिपा रहा था। इसकी एक किरच उसकी आँखों में किसी बीज की तरह धँस गई और भीतर सपने की तरह उगने लगी थी।


कुछ देर तक वह उस छाया, चमक और सपने में रहा फिर अनायास उसने अपनी निगाहें नीची कीं। नज़रें फेरते ही गुलाबी बादल और धूप की शहतीरों के साथ उसकी आँखों की चमक भी खो गई। उसके ठीक सामने चारकोल की जलती हुई चौड़ी सड़क थी। सड़क के दोनों तरफ़ बड़ी और चमकदार दुकानें सजी हुई थीं। वे आदमकद शीशों से ढँकी हुई थीं। उनकी कोई छाया नहीं थी। पेड़ तो बाज़ार सजने से पहले ही काटे जा चुके थे। बिना किसी छाया में दोनों तरफ़ के फुटपाथ फेरी वालों और छोटी-छोटी दुकानों ने लगभग घेर रखे थे। गर्मियों के दिनों में अक्सर सुबह-शाम ही धंधा चलता है। आज भी दोपहर के ताप और धूप का असर सड़क की आवाजाही पर साफ़ नज़र आ रहा था। आम दिनों में ख़ूब चहल-पहल और ख़रीदारों से गुलज़ार यह बाज़ार इस वक़्त सुस्ता रहा था। जैसे दोपहरी की झपकी ले रहा हो।   


अभी कुछ देर पहले जब वह गुलाबी आसमान को निहार रहा था तो उसे बड़ा अच्छा लग रहा था। गर्मी और धूप के बावजूद उसकी आँखों को ठंडक मिल रही थी। आँखों के रास्ते यह ठंडक भीतर तक उतर रही थी लेकिन जैसे ही उसने जलती हुई सड़क को देखा तो उसे उमस, धूप और गर्मी एक साथ महसूस होने लगी। सनसनाती लू का झोंका उसके कलेजे के आर-पार होता लगा। उसे मालूम था कि इधर कोई छाया नहीं फिर भी उसकी नज़रें आसपास कहीं छाया की उम्मीद में घूम गईं। पानी के लिए हलक सूखने लगा।


उसने अपने घर से लाई पानी की बोतल खोली। बोतल आधी से भी कम बची थी। उसे लगा कि आज उसने कुछ ज़्यादा ही पानी पी लिया है। अभी तो शाम तक इसे चलाना है। शाम से पहले ख़त्म हो गया तो उसे घर पहुँचने तक प्यासा ही रहना पड़ेगा। दुकान से पानी ख़रीदना उसकी जेब के बस में नहीं। पिछले साल तक इस कोने पर एक प्याऊ हुआ करती थी। वह कभी-कभार वहाँ से पानी ले लेता था पर अब उस जगह एक होटल खुल गई है। उस पर बीस रूपए में पानी बिकता है।


पानी पीने के बाद उसने होंठों पर ढुलक आई बूँदों को अपने बाएँ हाथ से समेटा और बोतल का ढक्कन कसकर लगा दिया। ढक्कन कसे जाने में बचे हुए पानी को सहेजने का जतन भी शामिल है। बोतल को उसने किसी ख़ज़ाने की तरह अपने कंधे पर टँगे झोले में रख लिया और फिर उसी तरह खड़ा हो गया जैसा पानी पीने के पहले खड़ा था। दाएँ हाथ में बाँस पकड़ कर वहाँ से गुज़रते इक्का-दुक्का ग्राहकों को गौर से चीन्हते हुए…


अब वह अपने ग्राहकों को पहचानने लगा है। कौन उससे खरीदेगा और कौन नहीं। उसे पता है कि बड़ी उम्र के आदमी-औरत उसके काम के नहीं हैं। उसकी नज़र तो बच्चों पर रहती है। सही मायनों में वे ही उसके लिए ख़ास हैं। उसकी बोहनी तो उनके ही हाथों से होती है। उसके मुकद्दर में उनकी ही कमाई लिखी है। शुरुआत के दिनों में जब उससे ख़रीदकर बच्चे वहीं खाने लगते तो उसका मन भी ललचाने लगता था। कॉटन कैंडी का रेशा-रेशा स्वाद उसकी जीभ पर मचलने लगता। मुँह में पानी आ जाता। उसकी मिठास भीतर तक घुल जाती। उसे लगता कि वह भी कैंडी खा ले पर फिर मन को कड़ा कर लेता। लेकिन अब तो उसका मन ही नहीं करता। कैंडी की जगह अब रूपए का स्वाद उस पर चढ़ गया था।


इसे खाने पर बच्चों की जीभ गहरी गुलाबी हो जाती जैसे बरसात के दिनों में जामुन खाने से जीभ नीली-नीली हो जाती है। जब वह छोटा था तो पिता इस मिठाई को उसे जादू की तरह दिखाते। फिर कहते-“यह हवा मिठाई है। मुँह में रखते ही घुल जाती है। हवा की तरह सिर्फ़ महसूस होती है।”


उसने बाँस के ऊपर की तरफ़ नज़रें घुमाईं तो आसमान का गुलाबी टुकड़ा फिर उसकी आँखों में उसी तरह नमूदार हुआ। बाँस के ऊपर पारदर्शी पन्नियों में गुलाबी रंग की कई कॉटन कैंडी लगी हुई थीं। पन्नियाँ धूप में चमकती थीं। माँ ने उन्हें कुछ इस तरह लगा दिया था कि लड़के के ऊपर इस तीखी धूप में भी छप्पर जैसा लगता था। यह छप्पर उसे कितने दिनों तक धूप से बचाएगा। बाँस के ठीक नीचे से देखने पर लगता कि इस हिस्से का आसमान ही गुलाबी हो गया है। गुलाबी रंग की आब उसके चेहरे पर भी झलक रही थी। लड़के की माँ कॉटन कैंडी फैक्ट्री में काम करती। वहीं से कुछ अपने लिए ले लेतीं और वह उन्हें इस चौक में घूम-घूम कर बेचता है।


लड़के की उम्र ज़्यादा नहीं है। यही कोई बारह-चौदह के बीच की रही होगी। मूँछ की रेख अभी फूटी नहीं है। छरहरा बदन, साँवला गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें, मोटे गुलाबी होंठ, करीने से कढ़े हुए बाल। पुरानी पेंट पर साधारण-सी बदरंग टीशर्ट और पैरों में चप्पलें। अपने दाएँ हाथ में हमेशा वह कॉटन कैंडी का बाँस पकड़े रहता है। जब कभी जेब में पैसे रखना हो, ग्राहक को पैसे वापस देना हो या कॉटन कैंडी निकालकर देना हो तो वह उसे अपनी दायीं कोहनी में समेट लेता है। यह हुनर उसने अपने पिता से सीखा होगा या इस चौक ने उसे सिखाया होगा, पता नहीं। उसे कोहनी में दबाए वह लघुशंका भी कर लेता है। घर से यहाँ तक आना-जाना भी। शुरुआत में एक-दो बार बाँस फिसला भी होगा। कुछ कॉटन कैंडी गिरी भी होंगी पर अब बाँस को साधना वह अच्छी तरह से सीख गया था। माँ कहती कि बाँस को साधना सरल है पर ज़िंदगी को साधने का हुनर बड़ा कठिन है। हालाँकि यह बात उसके समझ में कभी नहीं आई। 


माँ की कई बातें उसे समझ नहीं आती पर उसे यह समझ आ गया था कि इसी बाँस के सहारे उसके घर का चूल्हा साबुत है। वह कहती कि जब से शादी होकर इस घर में आई है, तब से इसी बाँस ने चूल्हे की आग को बचाए रखा है। पिता होश सँभालते ही फैक्ट्री में मज़दूरी करने लगे थे पर कुछ सालों बाद फैक्ट्री बंद हो गई और घर का चूल्हा ठंडा पड़ने लगा तो उन्होंने यह बाँस साधना शुरू किया।


वे आसपास के गाँवों में फेरी लगा दिया करते। सायकिल के कैरियर पर काँच के डिब्बों से झाँकती कपास के फूलों की तरह की यह गुलाबी मिठाई बच्चों को ख़ूब भाती थी। गाँव में उनकी आवाज़ गूँजती-“बुढ़िया के बाल वालाsss ... गुड़िया के बाल वालाsss…” तो बच्चे उनके आसपास मँडराने लगते। ललचाई नज़रों से देखते रहते। जिनके पास थोड़े पैसे या घर में अतिरिक्त अनाज होता तो उसे तौलकर उसके बदले मिठाई का गोला लेकर वे वहीं खाते और बाक़ी उन्हें खाते हुए देखते रहते। मिठाई न चख पाने का मलाल उनके चेहरे पर साफ़ नज़र आता। कभी-कभार पिता उन्हें कम दाम या बिना कोई पैसे लिए भी दे देते थे पर वे भी कब तक और किस-किस को देते। बाक़ी रह जाने वाले बच्चों की संख्या हमेशा ख़रीद कर खाने वालों से ज़्यादा ही रहा करती थी।

  

बाद के दिनों में जब सायकिल बूढ़ी होने लगी तो पिता ने गाँवों तक जाना धीरे-धीरे कम करते हुए एक दिन बंद कर दिया। शायद गाँव को भी उनकी ज़रूरत नहीं रह गई थी। वहाँ की दुकानों में अब चमकदार पन्नियों में लिपटे टॉफी-चाकलेट, वेफर्स, कुरकुरे और तमाम तरह की खाने-पीने के सामान बिकने लगे हैं। सायकिल ने साथ छोड़ा तो उन्होंने बाँस साधकर इसी चौक को अपना स्थायी पता बना लिया। बारह सालों तक इसी कोने पर खड़े रहते हुए उन्होंने सर्दी, गर्मी और बारिशों का सामना किया।


फिर एक काली रात जब वह सुकून से सो रहा था तो माँ ने उसे झिंझोड़ कर उठाया था। पिता अपने बाएँ हाथ और पैर को उठाने की कोशिश कर रहे थे पर वह उठ ही नहीं पा रहा था। माँ ने पूरी रात सिंकाई की। भेड़ के दूध की मालिश की पर कोई असर नहीं हुआ। सुबह डॉक्टर ने बताया कि उन्हें लकवा मार गया था। लकवा उनके बाएँ धड़ को ही नहीं, पूरे घर को मार गया था। माँ उस लकवे से अकेली लड़ती रही। फिर उसने भी स्कूल छोड़कर बाँस पकड़ लिया। चौक के उस उदास कोने में गुलाबी बादलों का एक टुकड़ा फिर से तैर आया था। हालाँकि अपनी रंगीनियों में डूबे सुर्ख़ दमकते बाज़ार की चहल-पहल में एक पल को भी किसी ने उस सूने कोने की तरफ़ नहीं देखा था और न कभी उसकी उदासी को पहचाना था।


कुछ ग्राहक कभी-कभी पूछ लेते हैं, “क्यों छोटू स्कूल नहीं जाते?” तो वह अचकचा जाता है। ऐसे मौकों के लिए उसने एक पंक्ति लगभग कंठस्थ कर ली है-“जाता हूँ न सर, बस आज नहीं गया।” ज़्यादातर मान भी लेते हैं पर कुछ लोगों को उसकी इस बात पर भरोसा नहीं होता तो वे उसकी आँखों में झाँकने लगते हैं। वह इससे असहज हो उठता है। उनकी तरफ़ से मुँह फेर लेना चाहता है। क्या करे। कैसे कहे कि उसके लिए स्कूल जाने से ज़रूरी काम पर रहना है। काम करने से शाम तक घर में चालीस-पचास रूपए पहुँचेंगे। स्कूल जाकर दो किताबें पढ़ना सीखे या ज़िंदगी का यह सबक सीखे। उसे कौन-सी कलेट्टरी मिल जाएगी। सालों तक स्कूल जाने के बाद एक दिन रुपए कमाने ही तो निकलना पड़ेगा। आना तो इसी चौक में पड़ेगा। फिर क्या फ़ायदा ऐसी पढ़ाई-लिखाई का।


अनायास उसका हाथ पेंट की जेब में चला गया। दस-दस के दो नोट और कुछ चिल्लर रखी थी। उसने सोचा कि शाम तक पचास का आँकड़ा पूरा हो जाए तो अच्छा... उसकी छोटी-सी जेब में समाते मुड़े-तुड़े थोड़े-से नोटों ने उसे बहुत कुछ सिखा दिया है। वह बचपन के खेलकूद को भूलता जा रहा है। अब यही उसका खेल है। वह अपने दोस्तों तक को याद तक नहीं करता। याद रखता है तो बस यही कि कल और ज़्यादा कॉटन कैंडी बेचना है। कमाना अब उसे किसी जादू की तरह रोमांचित करने लगा है। वह उसमें धँसता जा रहा है। 


उसी शाम की बात है। एक बड़ी-सी चमचमाती कार ठीक उसके सामने आकर रुकी। उसमें से पहले एक मोटा आदमी उतरा, फिर उसने पीछे का गेट खोला तो एक बच्चा और एक बच्ची उतरे। बच्चों की उम्र सात-आठ साल की रही होगी। मोटे आदमी ने उत्साह में भरकर उनसे कहा कि आज तुम्हें ऐसी मज़ेदार मिठाई खिलाएँगे जो हमें अपने बचपन में बहुत पसंद थी। मुँह में जाते ही इसके रेशे-रेशे की मिठास भीतर घुल जाती है। उसके चेहरे पर मुस्कान दौड़ रही थी। उसने बीस का कड़कड़ाता नोट उसकी तरफ़ बढाया और दो कॉटन कैंडी देने को कहा। वह दो कैंडी निकालकर उनकी तरफ़ बढ़ाने को ही था। तभी बच्ची बोल उठी-“नो पापा, हमारी मैडम कहती है कि अनहायजेनिक स्ट्रीट फ़ूड नहीं खाना चाहिए। हम यह नहीं खाएँगे।”


“कोई बात नहीं, बेटा...” कहते हुए मोटे आदमी ने वह बीस का कड़कड़ाता नोट फिर से अपनी जेब में डाल लिया और दोनों बच्चों की उँगली थामे वह सामने वाले सबसे बड़े और नामी ब्रांड के रेस्तरां की तरफ़ मुड़ गया।


एक पल को लगा कि लड़के की देह को लकवा मार गया है। वह जड़वत उन्हें जाते हुए ठगा-सा देखता रह गया। ठीक उसी वक़्त सूरज डूबा। शीशेदार दुकानें, शोरूम और रेस्तरां दूधिया रोशनी की जगर-मगर से नहा उठे। लड़का जहाँ खड़ा है, उसके आसपास का धुँधलका और गहरा गया।  


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सुपरिचित वरिष्ठ कथाकार मनीष वैद्य का जन्म धार (म.प्र.) में हुआ। 


कहानी संग्रह : वांग छी (2024), फुगाटी का जूता (2017), टुकड़े-टुकड़े धूप (2013), चयनित कहानियाँ (2024), गुलाबी इच्छाएँ (2025)।


उपन्यास : धूलकोट (2026)।


सम्मान‌ : वागीश्वरी सम्मान (2018), अमर उजाला शब्द छाप सम्मान (2018), शब्द साधक रचना सम्मान (2019). अंतर्राष्ट्रीय शिवना कथा सम्मान (2024), स्पंदन कृति सम्मान (2025), श्रेष्ठ कथा कुमुद टिक्कू सम्मान (2018 ), प्रतिलिपि सम्मान (2018), यशवंत अरगरे सकारात्मक पत्रकारिता सम्मान (2017)।


पंजाबी, बंगाली, मराठी और उड़िया में रचनाओं का अनुवाद। एक कहानी विश्वविद्यालय के स्नातक स्तर पर तथा एक स्कूली बच्चों के लिए पाठ्यक्रम में शामिल। पानी के नवाचारी कामों पर एक किताब ‘जमा रसीदें’, आकाशवाणी, दूरदर्शन  से भी प्रसारण। 

ईमेल : manishvaidya1970@gmail.com   



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