दिव्या श्री की कविताएँ
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आदमी होने की ज़हमत
एक दिन सभ्यताओं के नाम पर बचेंगे
खंडहर, संग्रहालय और धूल फाँकता हुआ इतिहास
खंडहर, जिसकी नग्नता में दिखेगा ख़ून
संग्रहालय, जहाँ मनुष्य के अतिरिक्त होगा सब कुछ
इतिहास, जिसके शब्द ओढ़े होंगे धूल की मोटी चादर
शहरों की चमक धीरे-धीरे धूसरित होती जाएगी
नदियों में नहीं बचेगा पानी
गाँव की सड़कें बदल जाएँगी खेत-खलिहान में
महलों पर महल होंगे
नहीं बचेगा कोई आदमी
भाषाएँ थककर हो जाएँगी गूंगी
समय चक्कर काटता हुआ
आख़िरकार इतिहास की गोद में सो जाएगा
और हम फिर भी आदमी होने की ज़हमत नहीं उठाएंगे
बच्चों की हँसी बदल रही है सफ़ेद कफ़न में
लाल रंग की ख़ूबसूरती व्यंग्य भरी निगाहों से टोक रही है हमें
बस्ते फुटबॉल की तरह मैदान में पड़े हैं हरी घास पर
प्रार्थना बदल गई है शोकगीत में
बम, बारूद की ख़बरें छप रही हैं शीर्ष पर
और नेता आगामी योजना की तैयारियों में जुटे हैं
देहें बिखरी पड़ी हैं सड़क पर
और आँखें गिन रही हैं अपनों की लाशें
दुनिया याद रखेगी
किस तरह इतिहास लिखा गया लाशों की क़ब्रों पर
जिसके शब्द रक्तरंजित हैं
जिसकी शुरुआत हुई थी बच्चों की हत्या से
तानाशाहो, यह युद्ध तुम्हारी सबसे बड़ी हार है
इतिहास तुम्हें विजेता नहीं, हत्यारा लिखेगा
सारे खंडहर गवाही देंगे तुम्हारी हार की
और सभ्यता के नाम पर तुम्हारी बर्बरता
हमेशा याद रखी जाएगी।
'ख' से ख़ून
हर तरफ़ से आ रही है किच-किच की आवाज़
इशारे करती उँगलियों से टपक रहा है ख़ून
युद्ध में बचे लोग
ख़ुद को कोस-कोस कर मार रहे हैं
सबसे अधिक घायल हैं वे माँएँ
जिनकी नींद में है बारूद
और सपनों में बच्चों की चीख़
उन्हें नक्शे में देश कम
क़ब्रगाहें अधिक दिख रही हैं
जब देश बारूद की महक में डूब गया हो
तो सबसे पहले मुरझाते हैं फूल
जिनके काँटे चुभते हैं वर्षों बाद भी
स्मृतियों में लहू बनकर
तितलियाँ उड़ जाती हैं अपने तमाम रंग लेकर
दिशाएँ बदलने पर मजबूर हो जाते हैं पंछी
पेड़ अपनी छाल में दर्ज करते जाते हैं धमाके
यही इतिहास है आने वाले बच्चों के लिए
जो पढ़ेंगे
कितने बच्चे पढ़ते हुए मारे गए थे
सबसे सुरक्षित जगहों पर
पन्नों पर लिखा हुआ इतिहास क़ब्र तक जाएगा
वे देखेंगे ख़ून से रंगे बस्ते की तस्वीर
'ख' से ‘ख़रगोश’ की जगह पढ़ेंगे ‘ख़ून’
युद्ध उनकी भाषा का मुँह-बोला शब्द होगा।
एक आख़िरी कविता
एक समय के बाद धीरे-धीरे ख़त्म होते जाते हैं
इंतज़ार और आँसू
ख़त के शब्द ऊबकर पड़ जाते हैं पीले
उदासी बदल लेती है अपना स्वरूप
प्रेम परिवर्तित होता जाता है अकेलेपन में
और हम फूलों की सुगंध और तितलियों के रंग में
ढूँढते रह जाते हैं अपना बीता हुआ कल
जहाँ न सुगंध होती है, न ही कोई रंग
अधूरापन एक शब्द नहीं
प्रेम से रिक्त हो चुका जीवन है
जहाँ उम्मीद की परिभाषा
अपना अर्थ खोती हुई दिखती है
शब्द जब खोने लगें अपना अर्थ
समझना यह स्याही का अकेलापन है
अकेला मनुष्य अपना अकेलापन लेकर मरता है
और वैसी मृत्यु से घबराहट होती है मुझे
यक़ीन है जब मैं मृत्यु के दरवाज़े पर खड़ी होऊँगी
शब्दों को पुकारती हुई
मेरी देह पर उन शब्दों के दिए तमाम दाग़ होंगे
मेरी आत्मा भटकेगी प्रेम में
प्रेम जीवन नहीं, एक घटना है
जिसकी स्मृति छीन लेती है आगे का जीवन
बाद बचता है जो अकेलापन
उसका संवाद है एक अँधेरी कोठरी
जिसकी दीवारें मेरे आँसुओं से पुती हैं
मैं अकेलेपन से ऊबकर नहीं, हँसते हुए मरना चाहती हूँ
किसी दुःख पीड़िता की तरह नहीं
प्रेम में ख़त्म हुए जीवन की तरह जाना चाहती हूँ
मेरी देह पर शब्दों की चादर होगी
और होंठों पर प्रेम की एक आख़िरी कविता।
अकेलापन
अकेलापन पृथ्वी पर रेंगता हुआ साँप है
जो अपने ही फन से डसता हुआ
निगल जाता है पूरा का पूरा जीवन
अकेलेपन का विस्तार केवल अकेलापन है
जिसकी कोख में पलता है उसका अपना अकेलापन
भय जीवन की एक दुर्घटना है
जिसमें मारा जाता है अस्तित्व
चलते-फिरते मनुष्यों के रूप में
शेष जीवन वह रेल की पटरी पर पड़ा हुआ पत्थर है
अकेलापन वह घर है
जिसमें नहीं है कोई खिड़की
रोशनी काला धुआँ है, मटमैला है दृश्य
अकेलापन माँ के पेट में पलता हुआ वह बच्चा है
जो जन्म लेते ही मर जाता है
अकेलापन पिता की जन्मभूमि है
अकेलापन वह ज़हर है
जिससे नहीं होती किसी की मृत्यु
अकेलापन वह दृश्य है
जिसे भेदती हैं तमाम आँखें
पर नहीं जानतीं उसके दुःख
अकेलापन वह आवाज़ है
जिसकी अपनी ही प्रतिध्वनि लौट आती है वापस
मनुष्यों ने कहने से पहले छोड़ दी सुनने की परंपरा
आवाज़ भूले हुए पथिक की राह है
अकेलापन वह दुःख है
जिसने पृथ्वी की कोख को कर दिया है बंजर
अकेलापन रेगिस्तान में भटकता हुआ वह ऊँट है
जिसके ख़ून में नहीं है पानी
अकेलापन वह भाषा है
जिसके शब्दकोश में मनुष्यों की कतारें हैं
और शब्दों में मौन
अकेलापन वह कलम है
जिसमें नहीं बचती स्याही
अकेलापन ठूंठ पेड़ पर बैठी हुई चिड़िया है
जिसकी आँखें पत्थर है।
तेज़ाब का नाम प्रेम
नहीं हुई थी कभी
इससे पहले प्रेम और घृणा एक साथ
एक साथ इतनी ज़ोर की पीड़ा कभी नहीं हुई थी
जैसे टूटी हो मेरे दिल की हड्डी
जबकि होती नहीं है वह
मैं चिल्लाना चाहती थी बहुत ज़ोर से
पर शब्दों की उल्टियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं
मेरी देह से दुर्गंध आ रही थी
और आँखों के नमक ने जला दिया था मेरा चेहरा
तेज़ाब का नाम प्रेम था
जिसकी पारदर्शिता में छिप जाती है हर अनैतिकता
जहाँ वैधता के बहाने
आसानी से किए जा सकते हैं सारे अवैध काम
बिना सवालों की रोशनी में
किया जा सकता है कभी भी नंगा
प्रेम की पीड़ा से घायल देह
आँखों की प्रसव पीड़ा में छटपटाती
जन्म देती है अपनी ही देह पर हज़ारों आँखें
देह आँखों का एक्वेरियम है
जहाँ मन के मर चुके सारे दृश्य
उपस्थित हैं अपनी हर खरोंच के साथ
और हर स्पर्श कीड़े की भांति
मेरी देह पर रेंगता है
मेरी देह
हर रोज़ धीरे-धीरे सड़ती जा रही है
लाश होगी बाद में।
नहीं होती यह उदासी
जब-जब रोने का मन हुआ
मैंने हँसने की पुरज़ोर कोशिश की
और दबा लिया अपना रोना
जब-जब मन हुआ तुमसे मिलने का
मैं गई नदी किनारे
जबकि नहीं थी वहाँ तुम्हारे साथ की कोई स्मृति
पानी में धोया अपना पैर
अंजुरी भर-भर ख़ूब उछाला
पेड़ पर बैठे जोड़े की उतार ली नज़र
तुम्हारी सलामती की दुआ की होते अज़ान
तुम, प्रेम और नदी
सबके पास रही मैं
मेरे पास नहीं था कोई
मेरे पास थे कुछ शब्द
कविता की कला नहीं थी मुझ में
मेरे पास थे मृत्यु जैसे शब्द
नहीं थी मृत्यु
मैं उदास थी
पर बताने को नहीं थी मेरे पास
उदासी की कोई ख़ास वजह
मैं यात्रा में थी
और भटकती रही मंजिल के आस-पास ही
जैसे करती रही तुमसे प्रेम
और लड़ती रही ख़ुद ही ख़ुद से
काश कि कह पाती तुमसे अपना प्रेम
कम से कम, न कह पाने की पीड़ा से तो हो जाती मुक्त
लिख देती तुम्हारे नाम एक ख़ूबसूरत ख़त
कह देती "तुमसे करती हूँ प्रेम”
तो आज आधी रात को नहीं लिख रही होती यह कविता
नहीं होती यह उदासी।
रो-टी
उसकी भाषा के तमाम शब्द
रात के अँधेरों में चमचमाते हुए
मेरी नींद में आते, कहते-
कविताएँ लिखो
बहुत ज़ोर की भूख लगी है
और "मैं तुम्हें प्यार करती हूँ" कहने में
कटने लगी है मेरी जिह्वा
शाम सड़क किनारे बेसुध पड़ा
फैला रहा था अपनी आँखें
उसके हाथ अनुपस्थित थे
मेरी कविताओं के पूर्ण विराम की तरह
मेरी कविताओं में शब्द तो थे
नहीं थी रोटी
जब भूख का शोर हो रहा था हर जगह
नेताओं के भाषणों में 'रोटी' रही उपलब्ध
मुख्य शब्द की तरह
और इस तरह लगता रहा पूर्ण विराम
उनके दिए तमाम भाषणों पर
उस दृश्य पर कविता लिखना मेरी अपंगता है
जिसकी आँखों में थी भूख
जो था रोटी के लिए नंगा
जिसके सपने बिखरे थे सड़क किनारे
मेरी कविताओं में आए 'रो-टी' की तरह
रोटी एक शब्द नहीं
पूरी दुनिया की वह भाषा है
जिसके बिना नहीं खुलते किसी के कंठ
जिह्वा जानती है उसकी भाषा के व्याकरण
जिसका अध्याय है किसान
जो उगाता है रोटी
और खाता है भूख
उस अध्याय के तमाम प्रश्न छूट जाते हैं अदेखे
कि उनके अँगूठे में दिखती हैं संभावनाएँ कम
या कि व्यवस्था की स्याही में डूबकर
मिट गई है उनकी पहचान।
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दिव्या श्री बेगूसराय (बिहार) में जन्मी युवा कवयित्री हैं। वे पटना में रहती है। उनका पहला कविता संग्रह ‘आँखों में मानचित्र’ मंत्रिमंडल, सचिवालय विभाग (राजभाषा) बिहार के अंशानुदान से वेरा प्रकाशन (जयपुर) से प्रकाशित हुआ है। दिव्या की कविताओं का अनुवाद अंग्रेज़ी और बांग्ला भाषाओं में हो चुका है। ईमेल : divyasri.sri12@gmail.com
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