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कंचन बुटोला की कविताएँ

  • 5 days ago
  • 3 min read


जलाती आग


जंगलों में धधकती आग

युद्ध के गोला-बारूद की आग

एक ही प्रतीत होती है

दोनों में मनुष्य की नासमझी

विकृत मस्तिष्क से उभरे

कर्मों की ज्वाला फैलती जा रही है

निगल रही है निर्ममता से

धरती की कोमलता को

धरती की सृजनता को

इसकी गोद में पल रहे

सांस लेते जीवन को।



चाँद 


आज चाँद देर से आया 

पर पूरा आया

धीमे-धीमे 

पहाड़ के पीछे से 

जगमगाते हुए 

रोशनी की चाशनी में 

डूबा हुआ 

गहरे अँधेरे को 

शांत उजाले से रूबरू कराते हुए 

आसमां में तैरते-तैरते 

ज़मीं को निहारते हुए 

रंगों की दुनिया को 

एक रंग में ढलते हुए 

चाँद मुस्करा रहा है 

पूर्णिमा में टहलते हुए।



भीड़ 


भीड़ मुझे थका देती है,

क़दमों के शोर से,

क़िस्सों का हिस्सा बनने से


आँखें खो जाती हैं

चेहरों की भूल-भुलैया में,

जहाँ न समय अपना है,

न किसी उद्देश्य की कड़ी,

जो जोड़ती हो

धीमी गति की चहलकदमी को


पहाड़ के उस पार

मन घुलने-मिलने की कोशिश में

इंतज़ार करता रहता है

अपने साथ रहने के लिए,

जैसे दरवाज़े पर खड़ा बच्चा

माँ को घर आते देख रहा हो


आँखें खोजती हैं वह कोना

जिसमें समय थम जाता हो,

मेरे सुकून को गहरा करने के लिए,

भीड़ की आपाधापी से

थकान को अलग कर,

अकेलेपन की शांति के लिए।



जड़ें


पतझड़ और सर्दी की मार

पड़ी कुछ ऐसी,

कि खिलते फूल छोड़ गए साथ।


बगिया में रंग

रंगों से खिलखिलाती पंखुड़ियाँ

सबसे पहले मुरझा गईं।


पत्तों का भी धीरे-धीरे

हरियाली खोना,

पीला पड़ना,

फिर टहनियों से छिटक जाना।


पौधा बस बेबसी में खड़ा रहा,

पर महसूस हुआ

वह अकेला नहीं

उसकी जड़ें मिट्टी को पकड़े हुए हैं।



पतझड़ के बाद 


पतझड़ की कठोरता से 

सूखी पत्तियों का ढेर 

ऊपर टहनियों का‌ ढांचा

पेड़ की सृजनता का धीमा होना 

पक्षी के बैठने लायक न लगे

पर जड़ों की शिराओं में लिपटी मिट्टी

मिट्टी में पलता जीवन जानता है 

टहनियों पर नया जीवन मिलेगा

पेड़ अपनी पत्तियों के साथ 

सौंधी हवाओं के रुख में 

फिर से झूमेगा

पक्षियों का घर बनकर

फिर से चहक उठेगा 

उन आँखों के लिए 

जिन्हें लगता है 

पेड़ सूख गया है।



दुनिया की युक्ति 


आधा दुःख इस बात का है 

हमें आधी बात पता है

झूठ मुखोटा पहने खड़ा है

रंगों की दुनिया, बेरंग है 

संग चाहे कोई भी हो

हमें तो प्रेम पसंद है 

बिना जाने

बिना पहचाने

हमारे लिए छलावे में जीना 

सपनों में खोना 

प्रेम से दूर भागते रहना सहज है।

हमें झूठी सहज दुनिया भाती है,

गहराइयों का अँधेरा डराता है।

सच की चमक आँखों को चुभती है

प्रेम से अछूते रहना ही

दुनिया की युक्ति है।



बर्फ़ की चादर


बर्फ़ की सफ़ेद चादर ओढ़ते,

बसंत का अभिवादन करते,

पहाड़ पतझड़ के रूखेपन को

अलविदा कह, खिल उठते।


बूंदों की सरसराहट से

संगीत पिरोता पतझड़,

सूखे पत्तों की चादर पर

हिमपात की चली लहर।


जलते जंगल की राख बेख़बर,

अंगारों पर पड़ती बर्फ पिघलकर;

हिम काली परत ढकने को आतुर,

मिट्टी की अटकी साँसें भरकर।


उड़ती बूँदों के पंख देखकर,

सूखी धरती हँसी का ठहाका लगाकर;

सफेद होते ऊँचे देवदार,

चहचहा रहा है

चिड़ियों का अंबार।


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कंचन बुटोला अभी अपनी कविताओं के प्रकाशन के शुरुआती दौर में हैं। हिंदवी पर उनकी कुछ कविताएँ उपलब्ध हैं। ईमेल : kanchanbutola1999@gmail.com 




1 Comment


ललन चतुर्वेदी
5 days ago

दुनिया की युक्ति वाली कविता अच्छी लगी।

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