जतिन कुमार की कविताएँ
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धुंध से उठती धुन
धुंध से उठ रही है
कितनी मधुर धुन
मेरे चारों ओर
ऐसा लग रहा है मानो
अभी, इसी वक़्त
कोई आ बैठेगा मेरे बग़ल
शुरू करेगा, बातचीत मुझसे
बिना कारण, और बिना किसी झिझक
पूछ लेगा, मेरी उदासी की वजह मुझसे
मैं उसे क्या बतलाऊंगा?
कोई भी तो वजह नहीं मेरी उदासी की
कि मैं तो बस धुंध से उठ रही धुन
सुनने आया था बालकनी में,
उदासी इस धुन से उठी है
मेरे भीतर
दरवाज़ा बंद कर देता हूँ
धुन का उठना भी बंद हो जाएगा
और उदासी भी कुछ कम हो जाएगी
दरवाज़ा बंद है, धुंध छाई हुई है हवा में
धुन भी कहीं मेरे भीतर उठ रही है
बहुत धीरे-से।
प्यार और दया
एक छोटा बच्चा
कुछ चार-छः साल का
बाल जिसके बिखरे हुए हैं
मुँह पूरा सना हुआ है,
पेंसिल पकड़ने की उम्र में
पेन हाथ में लिए हुए है।
दृश्य में कुछ भी भयावह नहीं है
भयानक तो यह तब होता
जब यह छोटा बच्चा पार्क में नहीं
होता किसी मेट्रो स्टेशन
या ट्रैफिक सिग्नल पर
भीख माँगता हुआ
लेकिन जगह बदल जाने से
इसकी मासूमियत नहीं बदलती
यह उतना ही मधुर और सुंदर
मुझे नज़र आता,
जितना कि अब मुझे लग रहा है
पर, तब प्यार से ज्यादा मुझे इस पर दया आती
ऐसी अवस्था में दया आना लाज़मी है
साथ ही दया दिखाने की स्थिति से मुकरना भी
लाज़मी।
घर में तो चैन होता है
एक कमरानुमा घर से निकलकर
कुछ ही दूर चलकर
घर लौटने की इच्छा होती है
करने को कुछ भी नहीं है,
हर तरीके से खालीपन ही है बस।
हिलते-ढुलते बेड की चादर भी
अब उबाऊ हो चुकी है
फिर भी उसे बदलने का विचार
अभी बहुत दूर है।
नीले रंग का सूती खोल
पैरों से होते हुए पेट तक
अपने-आप खिंचा चला आता है
कुछ पंद्रह मिनट बीत जाने के बाद
वह गर्माहट देता है
चारों ओर नज़रें घुमाकर देखने पर
यह कमरा, कमरा ही लगता है
घर इसे किसी भी हालत में
करार नहीं किया जा सकता।
घर में तो चैन होता है,
नींद होती है,
बेबसी, बेखुदी और बेरुखी नहीं।
बचाई गई धूप
बचाकर रख लेनी चाहिए
अपने हिस्से की धूप,
मुश्किल दिनों के लिए
कि जब बादल छाए हुए हों
तब कहीं काम आए
बचाई गई धूप।
रिक्तता
जब कभी चाय की दुकानें
अपनी जगह से हट जाएंगी
उधर बैठकी लगाते लोग भी
अपनी जगह से हट जाएंगे
वहाँ नहीं दिखेंगे, तो वे कहाँ जाएंगे?
कभी किसी ने सोचा है?
विरह
वह चली गई
एक हाथ छोड़कर
एक साथ छोड़कर,
वह चली गई।
उसे जाना ही था शायद
सो वह चली गई
एक बात छोड़कर।
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जतिन कुमार हिंदी की नई पीढ़ी के कवि हैं। इससे पहले उनकी रचनाएँ सदानीरा और इंद्रधनुष में प्रकाशित हुई हैं। ईमेल : jatinkumar00637@gmail.com
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