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विशाल प्रभु की कविताएँ

  • 20 hours ago
  • 2 min read


सरफ़रोशी 


अपने फलों के

कोई दाम नहीं

मिलने पर पेड़ का 

अस्तित्व ख़त्म नहीं होता


वह मुक्त हो जाता है 

हमेशा हमेशा के लिए 

लेन-देन के घेरे से


और बह निकलता है

एक अनोखी हवा में 

जो उसके पत्तों ने 

जीवंत होने के सबूत में 

पैदा की होती है।



क़बूलनामा 


मैं बार बार जेबें 

और हाथ खाली करके,

सारे चोले उतारकर 

फेंक देता हूँ


आख़िर में भाषा 

का भी चोला उतार देता हूँ


बस अँधेरे का एक

तालाब बना रहता हूँ

जो सुबह के किसी

तट तक पहुँचने का

इच्छुक न हो।



आह के पार


पेड़ों में चलती

रात की हवा

कोना बनाती है 

ख़ुद के ठहर जाने का


उन सभी जगहों,

सभी वाकयों में


जब करने के लिए 

कुछ नहीं बचा रहता।



शायद


शायद हमने कर्म         

के सही पैमाने              

जाने ही नहीं 

                                       

अब तक सिर्फ़              

पेट पालने के लिए       

हाथ-पैर चलाते रहे,

और जो भी इसके        

विपरीत गया

उसको किनारे     

करना भी होता रहा                                  

                                        

जबकि आसमान 

पर खिंची एक

पुरानी पपड़ी के पार

बहुत देर बैठे

रहना ज़रूरी था


बस हाथ झटक कर

चलते-फिरते रहना—

एक अण्डे समान

सुनहरे इंतज़ार को

हाथों के बीच

हँसी में ढालना


एक बार और 

फिर एक बार...।



बहुरूपिया 


औरों की नज़दीकी       

चोला पहनाती है           

खुले मन को                    

                                  

वह जैसे 

बढ़ती जाती है 

बढ़ने लगते हैं चोले 

और पहनाने की ज़िद                  

                                          

इसलिए चोलों की       

सबसे बड़ी और            

शानदार दुकान है

शहर,                                                             

जिसके तागों से

कभी रिहा ही

नहीं होता इन्सान 


बस बहुत पर्दों

वाले एक बहुकोणीय

रंगमंच पर अपना 

अभिनय करता रहता है

जब तक किसी 

पर्दे के किसी फटे

हुए हिस्से से 

झाँकता हुआ

आसमान

रूबरू नहीं कराता

उसको ख़ुद से...।



युगीन


चीज़ों के अंत तक 

शायद ही कोई राह 

पहुँचती है अब…


और जो राह 

पहुँचने की इच्छुक हो

वह काट दी जाती है

जब तक उसके 

पैरों तले की ज़मीन 

भी न बची रहे


एक अंतहीन चीज़ 

बन जाए उसकी राह भी।



यूँ तो…


फल खाने का समय

शायद अब तक

आया ही नहीं...


मिट्टी को तैयार करने

और बीज बोने के 

बीच की छटपटाहट 

को ही हम 

कटाई की घड़ी 

बनाने पर

आमादा रहे हैं


इससे पृथ्वी और 

मानव जीवन

की कविता 

बराबर अधपकी रही है।



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विशाल प्रभु द्विभाषी कवि हैं। हिंदी और अंग्रेज़ी की कुछ पत्रिकाओं और किताबों में उनकी कविताएँ शामिल हुई हैं। ईमेल : vishalvprabhu.80@gmail.com

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