गौरव अरण्य की कविताएँ
- 2 days ago
- 6 min read

अमरता
स्टेशन की भीड़ में
एक बौद्ध भिक्षु को देखा
भीड़ उससे टकराकर आगे बढ़ रही थी
जैसे वह वहाँ था ही नहीं
चेहरे पर झुर्रियाँ
धीरे-धीरे उतर आई थीं
आँखों में एक थकान थी
जो समय से भी पुरानी लगती थी
उसे देखकर
अचानक मन में एक प्रश्न उठा—
क्या मिला इसे
स्वयं को ईश्वर को सौंपकर?
समय जैसे फूलों को मुरझा देता है
वैसे ही यह भी मुरझा रहा है
भला देवताओं पर चढ़े
फूलों की उम्र बढ़ती है?
वे भी तो तोड़े जाते हैं
और असमय मर जाते हैं
फिर अमरता कैसे प्राप्त होगी?
वह तरकीब क्या है?
इस प्रश्न पर
एक और प्रश्न खड़ा हो गया
अमरता किस तरह की?
स-शरीर जीवित
अश्वत्थामा की तरह
या व्याध के तीर से गिरे
कृष्ण की तरह?
बसंत,
जिसे कवियों ने
हमेशा उत्सव की तरह लिखा
वह भी शायद
एक धीमी मृत्यु ही है
जहाँ नए पत्तों के लिए
बूढ़े हो चले पत्ते
चुपचाप गिर जाते हैं
जैसे आत्मा एक दिन
शरीर को छोड़ जाती है
पत्ते लौटते नहीं
पर हरियाली लौट आती है
नई ऊर्जा के साथ
और यहीं कहीं
मन ठहर जाता है
उन पुजारियों, साधुओं
और उन सब में
जो स्वयं को
किसी बड़े सत्य में खो देते हैं
मदर टेरेसा के हाथ भी काँपे होंगे
स्वामी विवेकानंद की दृष्टि भी थकी होगी
पर कुछ था
जो उनके जाने के बाद भी
मर नहीं पाया
शायद,
मुक्ति मृत्यु से नहीं
उसी से होकर थी
क्योंकि मरना
एक घटना नहीं,
सृष्टि का चक्र है—
एक निरंतर प्रक्रिया
जो हर क्षण
पूरी होती रहती है—
पत्तों में,
शरीर में,
स्मृतियों में
और अमरता,
न पत्तों में है,
न पेड़ में,
वह उस प्रवाह में है
जो हर क्षण
कुछ ख़त्म करता हुआ
आगे चलता रहता है।
गणित
गणित के बुनियादी कौशल—
जोड़, घटाव, गुणा और भाग
फिर आगे
भिन्न, दशमलव, प्रतिशत
और सूत्रों की एक लंबी दुनिया
हमें सिखाया गया
हर चीज़ का एक नियम होता है
हर प्रश्न का एक सही उत्तर
पर असल में
ये सब
सिर्फ़ रूपक हैं
गणित क्या है?
दो और दो चार होते हैं,
जैसे स्लेट पर खींची गई
एक सीधी रेखा
पर गणित इतना आसान भी नहीं
जितना दिखाई देता है
वह अक्सर
तपती धूप में
पड़े मोम की तरह
धीरे-धीरे पिघल जाता है
असल गणित तो
वहीं शुरू होता है
जहाँ उत्तर बदल दिए जाते हैं
जैसे मंदिर का भगवान
पुजारी की जेब में रखा
एक चमकता हुआ सिक्का
यहाँ जोड़-घटाव नहीं,
पहचान और पहुँच का गुणा होता है
और आस्था को भाग दिया जाता है
कौन, कब, कैसे दर्शन करेगा
यह तय होता है
लाइन की लंबाई से नहीं
जेब की गहराई से
और उसी लाइन में
एक बूढ़ी औरत खड़ी है
हाथ में मुरझाए फूल
आँखों में बचा हुआ विश्वास
वह रुक-रुक कर
आगे सरकती है
जैसे उम्मीद
क़दम-क़दम चलती हो
पर उसके आगे
अचानक कुछ लोग
सीधे भीतर चले जाते हैं
बिना रुके, बिना झिझके
जैसे गणित ने
उसे गिनना ही छोड़ दिया हो
और यहीं गणित
अपना रूप बदल लेता है
दो और दो चार नहीं रहते
कभी तीन, कभी पाँच
और कभी किसी एक को
पूरी तरह मिटा देते हैं
वहाँ क्रम नहीं चलता
चलता है एक अदृश्य फाॅर्मूला
जैसे धुएँ में लिखी संख्या
जो हर क्षण बदलती जाती है
इसे ही कहते हैं गणित
बाक़ी जो है
वह तो बस जोड़-घटाव है
जैसे बच्चों के लिए बचाकर रखी गई
एक आसान-सी दुनिया।
थकी हुई पृथ्वी
नहीं,
वह सोलह की नहीं थी
उसे देख
कविता लिखने का विचार भी नहीं आया था,
भला साठ पर
कौन लिखता है कविता?
कविता, ग़ज़ल, गीत
अक्सर सोलह की देह पर ही उतरते हैं
उसके बाल
जैसे समय ने ख़ुद
सफ़ेद राख मल दी हो
और हाथों की झुर्रियाँ
मानो किसी चित्रकार ने
त्वचा पर टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ खींच दी हों
एक बुढ़ापा होता, तो भी ठीक था
पर यहाँ तो ग़रीबी भी साथ थी
जैसे सूखी धरती पर
दरारें कम पड़ गई हों
एक हाथ में झोला,
दूसरे में मूँगफली की थैलियाँ—
“दस की मूँगफली ले लो…
दस की मूँगफली ले लो…”
गाते हुए वह आ रही थी
वह गा रही थी
या शायद अपनी साँसों को खींच रही थी
चलती ट्रेन में
देह को थामे रखना ही कठिन होता है
और वह
हर झटके के साथ
कुछ और बचाने की कोशिश में थी
और मैं
ट्रेन के दरवाज़े पर
बाक़ी यात्रियों के साथ
एक चक्रव्यूह बना खड़ा था
आरक्षित डिब्बे में
दरवाज़े पर खड़े रहना भी
एक अजीब-सा सामंजस्य है
लोग इसे कई नाम दे देते हैं—
ग़रीबी, जनसंख्या का बोझ,
नागरिक बोधहीनता, निरक्षरता…
पर असल में
यह उस देश का संतुलन है
जहाँ संसाधनों का बँटवारा असमान है
ताकि यात्रा भी चलती रहे
देश भी बढ़ता दिखे
और शिकायत
आदतों में दब जाए
कई बार दरवाज़ा छोड़ना
जीवन छोड़ने जैसा लगता है
और हम अपने-अपने वजूद को
कोहनियों से बचाते खड़े थे
लोग हमें धकेलते हुए ऐसे निकल रहे थे
जैसे वे तैरकर नदी पार कर रहे हों
और हम भीड़ नहीं, पानी हो चुके हों
तभी वह आई
किसी ने कहा,
“दादी को जाने दो…”
और हम अपने-अपने भीतर सिमट गए
जैसे दीवारें
ख़ुद को मोड़कर
एक दरार बना देती हैं
वह हमारे बीच से गुज़री
उल्का-पिंड की तरह नहीं
बल्कि एक थकी हुई पृथ्वी की तरह
जो अपने भार के साथ घूम रही है
मैंने उसका हाथ पकड़ा
वह हाथ मिट्टी-सा नरम था
पूछा,
“इतना भार उठाए चलती हो
दर्द नहीं होता?”
वह मुस्कुराई
जैसे जवाब नहीं,
बस एक स्वीकृति हो
और बोली,
“मजबूरी में क्या किया जाए…”
और उस एक वाक्य में
इतनी सदियाँ थीं
कि मैं चुप हो गया
हम भी तो,
कौन से शौक़ से
दरवाज़े पर खड़े थे
हम सब
अपनी-अपनी मजबूरियों के मजदूर थे
बस फ़र्क़ इतना था
वह उन्हें ढो रही थी
और हम
उन्हें छुपा रहे थे।
सपने में किया गया मज़ाक़
एक बार… मैं कोर्ट पहुँचा
मेरे गुनाह पर… सुनवाई थी
मामला था गंभीर
इसलिए जज साहब ने
ले लिया था स्वतः संज्ञान
साहब थे
मेरी कविता से नाराज़
कटघरे में जैसे ही पहुँचा
वकील की जगह
जज साहब ख़ुद
मुझसे जिरह करने लगे
और पूछ डाले
एक साँस में कई सवाल :
लोकतंत्र के चार स्तंभों में से
एक पर तुमने लिखीं
आपत्तिजनक टिप्पणियाँ?
तुमने उठाए प्रश्नचिन्ह?
न्यायाधीश पर ही सवाल क्यों?
क्या तुम प्रजातंत्र को
उखाड़ फेंकना चाहते हो?
न्यायालय की आलोचना
जज साहब ने अपनी समझ ली
अब यह लोकतंत्र, न्यायालय
या देश का प्रश्न नहीं रह गया था
बन गया था उनका निजी मामला
वह भड़क उठे
गुस्से में लाल
पर उन्हें कैसे बताऊँ
यह मैं नहीं
वह थी मेरी भीतर की आवाज़—
‘शब्दावली’
जो मेरे भीतर तैरती है
शब्द ढूँढती है
और प्रतिबिंब बना देती है
मन से मेरी जो बातें होती हैं
मेरे लिए तो आम हैं
जैसे ख़ुद से कहना
ख़ुद को सुनना
अगर यही बात
कर दूँ आम
तो लोग क्या कहेंगे?
जज साहब भी
मुझे पागल ठहरा देंगे
मैंने कहा शब्दावली से :
संभल जाओ
पानी में रहकर
भला कोई मगरमच्छ से बैर करता है?
ढूँढ लाओ कुछ अच्छे शब्द
वरना तुम्हारा तो पता नहीं
मुझे हो जाएगी जेल
उसने लगाए गोते
और ढूँढ लाई कुछ शब्द
फिर बोली :
“मैं न्यायालय के ख़िलाफ़ लिखने का
सोच भी नहीं सकता
बस लोग ही अजीब हैं, मीलॉर्ड
अब न्याय के लिए
सीधे अदालत नहीं आते,
कविता और कहानियों में आते हैं”
‘कहानी’ और ‘कविता’ का नाम सुनते ही
जज साहब का पारा चढ़ गया
अब बस ज्वालामुखी
फटने ही वाला था
इधर मेरी शब्दावली
जैसे बीच बहस में
दिशा बदल लेती नदी
मुझे छोड़कर चुप हो गई
पर जज साहब ने
ख़ुद को संभाला
चेहरे पर वही अदालत की सख़्ती
और भीतर उबलता सवाल
फिर बोले,
“तुम खुद को लेकर गंभीर हो
या न्यायालय को
समझ रखा है एक मज़ाक़?”
मैंने कहा शब्दावली से,
अब तुम्हारे पास....
आख़िरी मौका है,
ग़लती सुधार लो
जहाँ सच तब तक मुँह नहीं खोलता
जब तक वह ख़ुद बाहुबली न हो
तुम यह ग़लती कैसे कर सकती हो?
जो ख़ुद छाए रहते हैं अख़बारों में
शब्दों की छाँव में
उन्हें ही तुम
अपना इल्म दिखा रही हो?
अब बंद करो
मुझ पर यह जुल्म
माँग लो उनसे मेरी ज़िंदगी
पता नहीं
इस बार शब्दावली ने
गोता लगाया या नहीं,
पर उसने धीरे से कहा,
“हालाँकि न्यायालय में
उनके साथ होता है मज़ाक़
लेकिन यहाँ खड़ा हर व्यक्ति
चाहे गीता हो, क़ुरान हो या बाइबिल
किसी भी धर्मग्रंथ पर हाथ रखकर
यह कह देगा कि
हाँ…हमने कभी सपने में भी
नहीं सोचा था कि न्यायालय में
हमारे साथ होगा मज़ाक़”
जवाब सुनते ही
ज्वालामुखी फट गया
और शब्दावली ने
लगा दी छलांग,
किसी डैम के ऊपर से
सीधे पानी में
अब मुझे शब्द भी नहीं मालूम…
कैसी होती है आवाज़
जब कोई इतनी ऊँचाई से कूदता है?
छपाक…?
डुबक…?
या फिर
सब कुछ
चुप हो जाता है?
जैसे बंद हो जाती है
उनकी आवाज़
जो न्याय की चहारदीवारियों में
छोटे रह जाते हैं…
जज साहब ने
न दी मोहलत
न मुक़र्रर किया कोई दिन
जैसा फ़िल्मों में होता है
बस सीधा सुना दिया फ़ैसला—
“तुम्हें सज़ा दी जाती है...
फाँसी, हैंग टिल डेथ”
और...
तोड़ दी अपनी कलम
मैं घबरा गया
दिल ज़ोर से धड़कने लगा
बदन काँपने लगा
और तभी,
आँख खुली
राहत मिली…
यह सच नहीं था,
सिर्फ़ एक सपना था
सुबह हो चुकी थी
पर दिल अब भी बैठा था
कहते हैं
सुबह का सपना सच हो जाता है…
इसलिए देश वालो,
सुन लो मेरी बात :
अगर कभी
मेरे साथ ऐसा हो जाए
तो शोक मत करना
न आँसू बहाना
बस मान लेना
मेरे साथ
सपने में हुआ… एक मज़ाक़।
गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :

गौरव अरण्य की कविताएँ विधिवत रूप से किसी साहित्य केंद्रित पत्रिका में पहली बार प्रकाशित हो रही हैं। इससे पहले इनका लेखन छिटपुट रूप से प्रकाशित हुआ है। वह डॉक्युमेंट्री लेखन एवं निर्देशन के क्षेत्र में रचनात्मक सहयोग दे चुके हैं। ईमेल : gaurav.aranya@gmail.com
%20(3).png)


Comments