प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते)
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प्रेमचंद से संवाद (यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते)
हिमांशु विश्वकर्मा
यदि प्रेमचंद आज हमारे बीच होते, तो वे भारत से क्या कहते और हम उनसे क्या पूछते?
यदि सचमुच मुझे आज प्रेमचंद से मिलने का अवसर मिलता, तो शायद सबसे पहले मैं उनसे यही पूछता-
“प्रेमचंद जी, आज का भारत देखकर आपको कैसा लगता है?”
वे संभवतः मुस्कुराकर कहते- “भारत बदला है, और बहुत बदला है। विज्ञान आगे बढ़ा है, लोकतंत्र मजबूत हुआ है, शिक्षा का विस्तार हुआ है, तकनीक ने जीवन को नई गति दी है। इन उपलब्धियों पर प्रसन्न होना चाहिए। लेकिन हर परिवर्तन के साथ यह प्रश्न पूछना भी आवश्यक है कि उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचा या नहीं। विकास तभी सार्थक है जब वह मनुष्य की गरिमा को भी साथ लेकर चले।”
मैं संवाद को आगे बढ़ाते हुए उनसे गोदान की बात करता, फिर उनसे पूछता- “प्रेमचंद जी, क्या होरी आज भी जीवित है?”
वे मुस्कुराते फिर हल्की सी मुस्कान के साथ कहते- “यदि तुम होरी को केवल एक किसान समझते हो, तो शायद वह इतिहास बन चुका है। लेकिन यदि तुम उसे उस मनुष्य के रूप में देखते हो जो श्रम, परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा और अपने आत्मसम्मान के बीच निरंतर संघर्ष करता है, तो होरी आज भी हमारे बीच है। वह हर उस व्यक्ति में जीवित है जो अपने परिवार की गरिमा और अपने श्रम की प्रतिष्ठा बचाने के लिए कठिनाइयों का सामना करता है।”
मैं फिर पूछता- “लेकिन प्रेमचंद जी, होरी की ‘मरजाद’ ही तो उसके जीवन का सबसे बड़ा संकट बन गई थी। उसी मरजाद के कारण उसने क़र्ज़ पर क़र्ज़ लिया, बेटी रूपा का अनमेल विवाह कराया, गोबर के नए विचारों को स्वीकार नहीं कर पाया और जीवन भर सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए संघर्ष करता रहा। क्या आज भी मनुष्य के जीवन में मरजाद इतनी ही बड़ी है?”
प्रेमचंद कुछ देर मौन रहते। जैसे कि होरी फिर से उनके सामने खड़ा हो। तब वे कहते- “होरी की मरजाद उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी थी और सबसे बड़ी विडंबना भी। उसने उसे समाज से जोड़े रखा, लेकिन उसी ने उसे अनेक बार विवश भी किया। वह जानता था कि क़र्ज़ उसे तोड़ रहा है, फिर भी वह उस सामाजिक व्यवस्था से बाहर निकलने का साहस नहीं जुटा पाया जिसमें उसकी पूरी पहचान बसती थी। होरी की त्रासदी यह नहीं थी कि वह ग़रीब था; उसकी त्रासदी यह थी कि वह अपने समय की मर्यादाओं का बंदी था।”
मैं उनसे पूछता- "तो क्या आज की मरजाद भी मनुष्य को उसी तरह बाँध रही है?”
वे बोलते- “हर युग की अपनी मरजाद होती है। पहले बिरादरी का भय था। आज प्रतिष्ठा, उपभोग, सामाजिक छवि और सफलता का दबाव है। यदि मनुष्य अपनी सामर्थ्य से अधिक केवल समाज को दिखाने के लिए जी रहा है, यदि वह सम्मान के नाम पर स्वयं को क़र्ज़, चिंता और दिखावे में डुबो रहा है, तो समझो कि होरी आज भी हमारे बीच जीवित है। केवल परिस्थितियाँ बदली हैं, उसकी पीड़ा नहीं।”
मैं अगला प्रश्न करता-“तो आज हमें होरी से क्या सीखना चाहिए?”
प्रेमचंद मुस्कुराते और बोलते- “मरजाद मनुष्य को ऊँचा उठाए, उसे तोड़े नहीं। ऐसी मर्यादा, जो सत्य, न्याय, करुणा और आत्मसम्मान की रक्षा करे, वही सच्ची मरजाद है। लेकिन यदि मरजाद मनुष्य को विवश कर दे, उसे क़र्ज़, भय और अन्याय का क़ैदी बना दे, तो उसे बदलने का साहस भी समाज में होना चाहिए। यही होरी की कथा का सबसे बड़ा संदेश है।”
मैं फिर पूछता- “क्या घीसू और माधव आज भी हमारे समाज में मिलेंगे?”
वे कुछ क्षण मौन रहते और फिर कहते- “जहाँ भूख मनुष्य की संवेदना को कुंद कर दे, जहाँ श्रम का सम्मान न बचे और जहाँ अभाव मनुष्यता पर भारी पड़ जाए, वहाँ घीसू और माधव बार-बार जन्म लेते रहेंगे। किसी पात्र को दोष देने से पहले उस समाज को देखो जिसने उसे ऐसी परिस्थिति में पहुँचा दिया।”
मैं उनसे अगला प्रश्न करता- “प्रेमचंद जी, क्या घीसू और माधव की स्थिति आज के समाज में बदल गई है?”
प्रेमचंद मेरी ओर देखते और पूछते- “पहले तुम बताओ... क्या भूख केवल रोटी की होती है? क्या अभाव केवल धन का होता है?”
मैं कुछ क्षण मौन रहता।
वे आगे बोलते- “घीसू और माधव को केवल आलसी कह देना आसान है, लेकिन मैंने उन्हें इसलिए लिखा था कि समाज उस व्यवस्था को देखे जिसने मनुष्य से श्रम का विश्वास और जीवन की आशा दोनों छीन ली थीं। जहाँ वर्षों के परिश्रम के बाद भी मनुष्य को सम्मान और सुरक्षा न मिले, वहाँ निराशा भी जन्म लेती है।”
मैं फिर उनसे पूछता- “लेकिन आज तो सरकार की अनेक योजनाएँ हैं, शिक्षा का विस्तार हुआ है, रोज़गार के नए अवसर हैं। क्या फिर भी घीसू और माधव हमारे बीच हैं?”
प्रेमचंद उत्तर देते- “समय अवश्य बदला है और समाज ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। बहुत से लोगों का जीवन पहले से बेहतर हुआ है। किंतु यदि आज भी कोई मनुष्य गरीबी, बेरोज़गारी, सामाजिक उपेक्षा या अवसरों की कमी के कारण अपने भविष्य से निराश हो जाता है, यदि श्रम करने के बाद भी उसे सम्मानजनक जीवन नहीं मिलता, तो समझना कि घीसू और माधव पूरी तरह विदा नहीं हुए हैं। उनके चेहरे बदल गए हैं, पर प्रश्न अभी भी शेष है।”
फिर मैं कुछ मुस्कुराते हुए हुए उनसे एक कठिन प्रश्न करता- “प्रेमचंद जी, यदि घीसू और माधव सवर्ण होते, तो क्या उनकी भूख भी यही होती? क्या उनका जीवन भी इतना ही अभावग्रस्त होता?”
प्रेमचंद कुछ क्षण शांत हो जाते। फिर बोलते- “भूख का कोई धर्म या जाति नहीं होती, लेकिन यह भी सच है कि समाज में भूख का वितरण हमेशा समान नहीं रहा। कुछ समुदायों ने सदियों से अधिक अभाव, कहीं अधिक अपमान और कम अवसर पाए हैं। इसलिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि घीसू और माधव भूखे क्यों थे; यह भी पूछना चाहिए कि किन सामाजिक परिस्थितियों ने उनकी भूख को इतना गहरा बना दिया।”
मैं फिर पूछता- “तो क्या ‘कफ़न’ केवल ग़रीबी की कहानी नहीं है?”
वे उत्तर देते- “नहीं। ‘कफ़न’ केवल दो व्यक्तियों की कहानी नहीं है। वह उस समाज का दर्पण है जहाँ आर्थिक विषमता, सामाजिक पदानुक्रम और श्रम के अवमूल्यन ने मिलकर कुछ लोगों का जीवन दूसरों की तुलना में कहीं अधिक कठिन बना दिया। यदि कोई यह कहे कि इसमें केवल जाति है, तो उसने इसे अधूरा पढ़ा है; यदि कोई यह कहे कि इसमें जाति का कोई स्थान ही नहीं है, तब भी वह इसे अधूरा पढ़ेगा।”
मैं प्रेमचंद से पूछता- “हम घीसू और माधव की बहुत चर्चा करते हैं, पर बुधिया की नहीं। क्या यह अन्याय नहीं है?”
प्रेमचंद गंभीर हो उठते और कहते- “सबसे अधिक श्रम वही करती है, सबसे अधिक पीड़ा वही सहती है, और सबसे कम बोल पाती है। इसलिए कहानी की सबसे बड़ी आवाज़ उसी का मौन है। यही हमें कफ़न को स्त्री-विमर्श के दृष्टिकोण से भी पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। बुधिया प्रसव-वेदना से तड़प रही है। वह श्रम करती है, परिवार का भार उठाती है, किंतु उसकी पीड़ा घर की दीवारों के भीतर ही दब जाती है। उसकी मृत्यु केवल एक स्त्री की मृत्यु नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का प्रतीक है जहाँ स्त्री का श्रम अदृश्य बना दिया जाता है।”
मैं इस संदर्भ अंतिम प्रश्न करता- “तो आज हमें ‘कफ़न’ पढ़ते समय किस बात का ध्यान रखना चाहिए?”
वे मुस्कुराते और जवाब देते- “किसी भी पात्र को उसकी जाति या उसकी ग़रीबी में सीमित मत कर दो। उसे मनुष्य की तरह पढ़ो, लेकिन उस समाज को भी मत भूलो जिसने उसके जीवन की परिस्थितियाँ निर्मित कीं। साहित्य का काम किसी एक कारण की घोषणा करना नहीं, बल्कि मनुष्य के दुख की पूरी जटिलता को हमारे सामने रखना है।”
मैं उनसे पूछता- “प्रेमचंद जी, भारत को स्वतंत्र हुए लगभग आठ दशक हो चुके हैं। संविधान ने समानता का अधिकार दिया, अस्पृश्यता को समाप्त घोषित किया और सामाजिक न्याय के लिए अनेक संवैधानिक प्रावधान किए। आज जब समाज में यह बहस चलती है कि क्या आरक्षण की आवश्यकता अब भी है, तो मुझे आपकी कहानी ‘ठाकुर का कुआँ’ याद आती है। बताइए, क्या ठाकुर ने अपनी जाति की श्रेष्ठता का अहंकार छोड़ दिया है? क्या गंगी आज बिना किसी भय और अपमान के अपना घड़ा भरकर लौट सकती है?”
प्रेमचंद कुछ देर मौन रहते। फिर बोलते- “मुझे यह देखकर प्रसन्नता है कि भारत ने समानता की दिशा में लंबी यात्रा की है। संविधान ने उस परिवर्तन की आधारशिला रखी जिसकी कल्पना मेरे समय में कठिन थी। परंतु किसी समाज की वास्तविक परीक्षा केवल कानूनों से नहीं, उसके व्यवहार से होती है। यदि हर व्यक्ति को बिना भय, बिना भेदभाव और बिना अपमान के समान अवसर और सम्मान मिल रहा है, तो समझो कि गंगी सचमुच अपने घड़े में पानी भरकर लौट आई है। यदि ऐसा अभी भी हर जगह नहीं हो पाया, तो समाज को आत्ममंथन करते रहना चाहिए।”
मैं फिर पूछता- “तो क्या आज की बहस आरक्षण की होनी चाहिए या सामाजिक समानता की?”
प्रेमचंद मुस्कुराते और बोलते- “मेरे लिए प्रश्न किसी एक नीति का नहीं, मनुष्य की गरिमा का है। जिस दिन समाज इस स्थिति में पहुँच जाएगा कि किसी व्यक्ति की जाति उसके अवसर, सम्मान और जीवन की दिशा निर्धारित न करे, उस दिन ऐसी बहसें भी नए अर्थ ग्रहण करेंगी। लेकिन जब तक समाज में असमानता का अनुभव अलग-अलग लोगों के लिए अलग है, तब तक सबसे पहले ईमानदारी से यह पूछना चाहिए कि क्या गंगी सचमुच निर्भय होकर अपना घड़ा भर सकती है या नहीं?”
आगे मैं उनसे पूछता- “क्या गंगी का घड़ा कभी भर सकेगा?”
वे उत्तर देते- “जिस दिन किसी मनुष्य को उसके जन्म, जाति, वर्ग, लिंग या किसी अन्य पहचान के कारण अपने अधिकारों से वंचित न होना पड़े, उसी दिन समझना कि गंगी का घड़ा सचमुच भर जायेगा। आज कुएँ बदल गए हैं। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, रोजगार और अवसर के रूप में हमारे सामने हैं। प्रश्न वही है कि क्या सबकी पहुँच उन तक समान रूप से है।”
मैं प्रेमचंद जी से आगे पूछता- “प्रेमचंद जी, क्या अब तोताराम ने अपनी निर्मला पर विश्वास करना सीख लिया होगा?”
प्रेमचंद गंभीर होकर कहते- “तोताराम केवल एक व्यक्ति नहीं, एक मानसिकता का प्रतिनिधि था। उसका संदेह निर्मला के चरित्र से नहीं, उसके अपने भय और असुरक्षा से जन्मा था। समय बदला है, शिक्षा बढ़ी है, स्त्रियाँ जीवन के हर क्षेत्र में आगे आई हैं; पर यदि आज भी किसी पत्नी की शिक्षा, मित्रता, कार्यक्षेत्र या स्वतंत्रता को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, तो समझना कि तोताराम अभी पूरी तरह बदला नहीं है। विश्वास के बिना कोई भी संबंध सुरक्षित नहीं रह सकता।”
प्रेमचंद गहरी साँस लेते और कहते- “निर्मला केवल एक स्त्री नहीं थी; वह उस समाज की पीड़ा थी जिसने स्त्री को मनुष्य से पहले किसी की पत्नी, बहू या बेटी माना। उसका सबसे बड़ा अपराध कुछ भी नहीं था—वह केवल युवा थी, संवेदनशील थी और जीना चाहती थी। लेकिन उसके चारों ओर ऐसा वातावरण बना दिया गया जहाँ विश्वास की जगह संदेह ने ले ली।”
मैं फिर पूछता- “तो क्या अब तोताराम ने बदलना सीख लिया है? क्या अब पति अपनी पत्नी को समझने का प्रयास करता है? क्या वह उसके सपनों को प्रोत्साहित करता है, या अब भी उसे नियंत्रित करना ही अपना अधिकार समझता है?”
प्रेमचंद कुछ क्षण मौन रह कर फिर बोलते- “समय बदला है और अनेक घरों में स्त्री शिक्षा, आत्मनिर्भरता और समान सहभागिता को सम्मान मिला है। यह समाज की बड़ी उपलब्धि है। पर यदि आज भी किसी स्त्री की स्वतंत्रता पर संदेह किया जाता है, यदि उसके मित्र, उसकी शिक्षा, उसका काम या उसके निर्णय अविश्वास का कारण बन जाते हैं, यदि पति उसे समझने के बजाय उस पर अधिकार जताने को ही प्रेम समझता है, तो समझो कि तोताराम अभी पूरी तरह बदला नहीं है।”
मैं इस संदर्भ में अंतिम प्रश्न करता- “तो ‘निर्मला’ आज हमें क्या सिखाती है?”
प्रेमचंद उत्तर देते- “दांपत्य का आधार अधिकार नहीं, विश्वास है; आयु नहीं, संवाद है; और संबंध का आधार संदेह नहीं, सम्मान है। जिस दिन पति-पत्नी एक-दूसरे के व्यक्तित्व को विकसित होने का अवसर देंगे, उसी दिन समझना कि निर्मला की त्रासदी सचमुच समाप्त होगी।”
तब मैं उनसे अलग प्रश्न करता- “आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और वैश्विक बाज़ार के युग में साहित्य का क्या दायित्व है?”
वे शांत स्वर में उत्तर देते- “तकनीक मनुष्य की क्षमता बढ़ा सकती है, पर उसकी संवेदना नहीं। साहित्य का धर्म है कि वह मनुष्य को मनुष्य बनाए रखे। जिस दिन सुविधा करुणा पर भारी पड़ जाएगी, उस दिन सभ्यता को फिर साहित्य की आवश्यकता होगी।”
मैं पूछता- “आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता मनुष्यों की तरह लिख रही है। चित्र बना रही है। संगीत रच रही है। क्या यह आपको चिंतित करता?”
प्रेमचंद मुस्कुराते- “मुझे मशीन से भय नहीं है। मुझे उस दिन से भय होगा जब मनुष्य अपनी संवेदना मशीन के हवाले कर देगा।”
मैं पूछता- “क्या मशीन भी, साहित्य लिख सकती है?”
वे उत्तर देते- “शब्द लिखे जा सकते हैं, अनुभव नहीं। भाषा बनाई जा सकती है, करुणा नहीं। शैली सीखी जा सकती है, जीवन नहीं। यह बात किसी तकनीकी का अस्वीकार नहीं, बल्कि साहित्य के मानवीय आधार की पुनः स्थापना की है।”
मैं फिर पूछता- "यदि आप आज होते, तो क्या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते?”
प्रेमचंद हँस पड़ते।
“क्यों नहीं? लेखक को पाठकों तक पहुँचना चाहिए।”
फिर उनका स्वर गंभीर हो जाता- “लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लेखक का लक्ष्य प्रसिद्ध होना नहीं, सत्य के अधिक निकट पहुँचना है। जिस दिन लोकप्रियता सत्य से बड़ी हो जाएगी, उसी दिन साहित्य अपना नैतिक साहस खो देगा।”
तब मेरे पास केवल एक अंतिम प्रश्न बचता- “प्रेमचंद जी, क्या आप फिर लौटेंगे?”
वे मुस्कुराकर कहते- “मैं गया ही कब था? जहाँ कोई विद्यार्थी साहित्य को जीवन से जोड़कर पढ़ेगा, जहाँ कोई लेखक अन्याय के विरुद्ध लिखने का साहस करेगा, जहाँ कोई पाठक होरी, गंगी, निर्मला या घीसू-माधव में अपने समाज का चेहरा देखेगा, वहाँ समझना, मैं वहीं हूँ।"
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उनके उत्तर सुनकर मुझे लगा कि इस पूरे संवाद का उद्देश्य प्रेमचंद से उत्तर प्राप्त करना नहीं था। वह तो मुझे उत्तर देने से अधिक प्रश्न पुछना सीख रहे थे। शायद यही उनके साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति रही है।
प्रेमचंद हमारे बीच इसलिए जीवित नहीं हैं कि हम उनकी जयंती मना सकें; वे इसलिए जीवित हैं क्योंकि उनका साहित्य आज भी हमें अपने समय से कठिन प्रश्न पूछने का साहस देता है। यही ‘प्रेमचंद से संवाद’ का वास्तविक अर्थ है।

हिमांशु विश्वकर्मा युवा कवि-लेखक हैं। उनकी रचनाएँ अनुनाद, सदानीरा, गोल चक्कर, हिंदवी, पाखी, मधुमती आदि प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। कहानी ‘बावर की वनकन्या’ के लिए उत्तराखंड भाषा संस्थान द्वारा ‘युवा कलमकार सम्मान (2025)’। ईमेल: heemanwave@gmail.com
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