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अंधेरा विलो, सोती हुई औरत

8 minutes ago
24 min read
Photograph by Richard Dumas / Agence VU / Redux

मूल कहानी : हारुकी मुराकामी
अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुमन शेखर 

जब मैंने अपनी आँखें बंद कीं, तो हवा की सुगंध मुझ तक पहुँची। मई की हवा, एक फल की तरह फूलती हुई, जिसकी बाहरी परत खुरदरी, गूदा चिपचिपा और दर्जनों बीज थे। गूदा हवा में ही फट गया, और बीज हल्के छरों की तरह मेरी बाँहों की नंगी त्वचा पर छिटक गए, जिससे हल्का दर्द हुआ।   

     

“कितने बजे हैं?” मेरे चचेरे भाई ने मुझसे पूछा। मुझसे लगभग आठ इंच छोटा होने के कारण, उसे बोलते समय ऊपर देखना पड़ता था।


मैंने अपनी घड़ी पर नजर डाली। दस बजकर बीस मिनट।


“क्या यह घड़ी सही समय बताती है?”


“हाँ मुझे लगता है।”


मेरे चचेरे भाई ने घड़ी देखने के लिए मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पतली, चिकनी उंगलियाँ आश्चर्यजनक रूप से मजबूत थीं। “क्या यह बहुत महँगी है?”


“नहीं, यह काफी सस्ती है।” मैंने घड़ी की सुइयों पर दोबारा नजर डालते हुए कहा। कोई जबाव नहीं।


मेरा चचेरा भाई भ्रमित लग रहा था। उसके होंठों के बीच के सफेद दांत ऐसे दिख रहे थे मानो हड्डियां सिकुड़ गई हों।


मैंने उसकी ओर देखते हुए, शब्दों को सावधानीपूर्वक दोहराते हुए कहा, “यह घड़ी काफी सस्ती है। यह काफी सस्ती तो है, लेकिन समय भी सही बताती है।”


मेरे चचेरे भाई ने चुपचाप सिर हिलाया।


*****


मेरे चचेरे भाई को अपने दाहिने कान से ठीक से सुनाई नहीं देता। प्राथमिक विद्यालय में दाखिला लेने के कुछ ही समय बाद उसके कान में बेसबॉल लग गई, जिससे उसकी सुनने की क्षमता खराब हो गई। हालांकि, इससे उसके रोजमर्रा के कामों पर कोई असर नहीं पड़ता। वह नियमित स्कूल जाता है और एक सामान्य जीवन जीता है। कक्षा में वह हमेशा आगे की पंक्ति में दाहिनी ओर बैठता है, ताकि उसका बायां कान शिक्षक की ओर रहे। उसके अंक भी ठीक-ठाक हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि कभी-कभी उसे आवाजें अच्छी तरह सुनाई देती हैं, और कभी-कभी बिल्कुल भी नहीं। यह ज्वार-भाटे की तरह चक्रीय है। और कभी-कभी, शायद साल में दो बार, उसे दोनों कानों से लगभग कुछ भी सुनाई नहीं देता। ऐसा लगता है जैसे उसके दाहिने कान में सन्नाटा इतना गहरा हो जाता है कि बाएँ कान की कोई भी आवाज सुनाई नहीं देती। जब ऐसा होता है, तो उसका सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और उसे स्कूल से छुट्टी लेनी पड़ती है। डॉक्टर भी इस समस्या को लेकर असमंजस में हैं। उन्होंने ऐसा मामला पहले कभी नहीं देखा, इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते।


“सिर्फ इसलिए कि घड़ी महँगी है, इसका मतलब यह नहीं कि वह सही समय बताएगी।” मेरे चचेरे भाई ने खुद को समझाने की कोशिश करते हुए कहा।

मेरे पास एक महँगी घड़ी हुआ करती थी, लेकिन वह हमेशा गलत समय बताती थी। मैंने उसे तब खरीदा था जब मैंने जूनियर हाई स्कूल में दाखिला लिया था, लेकिन एक साल बाद ही वह मुझसे खो गई। तब से मेरे पास घड़ी नहीं है। वे मुझे नई घड़ी नहीं दिलाएगे।


मैंने कहा, “इसके बिना काम चलाना मुश्किल होगा।”


“क्या?” उसने पूछा।


“घड़ी के बिना काम चलाना कितना मुश्किल होता है?” मैंने उसकी ओर देखते हुए दोहराया।


“नहीं, ऐसा नहीं है” उसने सिर हिलाते हुए जवाब दिया। “ऐसा तो है नहीं कि मैं पहाड़ों में कहीं दूर रहता हूँ। अगर मुझे समय जानना होता है तो मैं किसी से भी पूछ लेता हूँ।”


“बिल्कुल सही।” मैंने कहा।


हम कुछ देर के लिए फिर चुप हो गए।


मुझे पता था कि मुझे कुछ और कहना चाहिए, उसके प्रति दया दिखानी चाहिए, अस्पताल पहुँचने तक उसे थोड़ा शांत करने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन उसे देखे हुए पाँच साल हो गए थे। इस बीच वह नौ से चौदह साल का हो गया था, और मैं बीस से पच्चीस साल का हो गया। और समय के इस अंतराल ने हमारे बीच एक ऐसी धुँधली दीवार खड़ी कर दी थी जिसे पार करना मुश्किल था। यहाँ तक कि जब मुझे कुछ कहना होता था, तो सही शब्द मुँह से नहीं निकलते थे। हर बार जब मैं हिचकिचाता, हर बार जब मैं कुछ कहने से पहले ही अपने मन में बात को रोक लेता, तो मेरा चचेरा भाई मुझे थोड़े उलझन भरे भाव से देखता। तब उसका बायाँ कान थोड़ा-सा मेरी तरफ झुक जाता।


“अभी कितना समय हुआ है?” उसने मुझसे पूछा।


मैंने उत्तर दिया, “दस बजकर उनतीस मिनट।”


जब बस आखिरकार नजर आई, तब दस बजकर बत्तीस मिनट हो चुके थे।


******


जो बस आई, वह एक नए प्रकार की थी, वैसी नहीं जैसी मैं हाई स्कूल जाने के लिए इस्तेमाल करता था। ड्राइवर के सामने का विंडशील्ड बहुत बड़ा था, पूरी गाड़ी किसी विशालकाय बम-वर्षक विमान जैसी लग रही थी, बस उसमें पंख नहीं थे। बस मेरी कल्पना से कहीं ज्यादा भरी हुई थी। गलियारे में कोई खड़ा नहीं था, लेकिन हम साथ-साथ नहीं बैठ सकते थे। हमें ज्यादा दूर नहीं जाना था, इसलिए हम पीछे के दरवाजे के पास खड़े हो गए। दिन के इस समय बस इतनी भरी क्यों थी, यह मेरी समझ से परे था। बस का रूट एक निजी रेलवे स्टेशन से शुरू होता था, पहाड़ियों में एक रिहायशी इलाके में जाता था, फिर घूमकर वापस स्टेशन पर आ जाता था, बीच रास्ते में कोई पर्यटक स्थल नहीं था। रूट पर कुछ स्कूल होने के कारण जब बच्चे स्कूल जाते थे तो बसें भरी रहती थीं, लेकिन दिन के इस समय बस खाली होनी चाहिए थी।


मैं और मेरा चचेरा भाई पट्टियों और खंभों को कसकर पकड़े हुए थे। बस एकदम नई थी, सीधे कारखाने से आई थी, सतहें इतनी चमकदार थीं कि उनमें आपका चेहरा बिल्कुल साफ दिखाई दे जाए। सीटों का रोआं एकदम मुलायम था, और यहाँ तक कि छोटे से छोटे पेंच में भी वह गर्व और उम्मीद भरी अनुभूति थी जो केवल नई मशीनरी में ही होती है।


नई बस और उसमें अप्रत्याशित भीड़ देखकर मैं थोड़ा घबरा गया। शायद पिछली बार जब मैंने इस बस में सफर किया था, तब से इसका रूट बदल गया था। मैंने बस के चारों ओर ध्यान से देखा और बाहर भी नजर डाली। बाहर वही पुराना शांत रिहायशी इलाका दिख रहा था, जो मुझे अच्छी तरह याद था।


“यही सही बस है ना?” मेरे चचेरे भाई ने चिंता से पूछा। बस में चढ़ने के बाद से ही मेरे चेहरे पर उलझन का भाव था।


मैंने खुद को और उसे आश्वस्त करने की कोशिश करते हुए कहा, “चिंता मत करो। यहाँ से केवल एक ही बस रूट गुजरता है, इसलिए यही रूट होना चाहिए।“


“क्या आप हाई स्कूल जाते समय इस बस से यात्रा करते थे?” मेरे चचेरे भाई ने पूछा।


“हाँ।”


“क्या आपको स्कूल पसंद था?”


मैंने कहा, “खास तौर पर नहीं। लेकिन मैं वहां अपने दोस्तों से मिल सकता था, और यह कोई बहुत लंबी यात्रा भी नहीं थी।”


मेरे चचेरे भाई ने मेरी कही हुई बातों पर विचार किया।


“क्या आप उनसे अभी भी मिलते हैं?”




“नहीं, काफी समय से नहीं मिला हूँ” मैंने सोच-समझकर शब्दों का चयन करते हुए कहा।


“क्यों नहीं? आप उनसे क्यों नहीं मिलते?”


“क्योंकि हम एक दूसरे से बहुत दूर रहते हैं।” यह कारण नहीं था, लेकिन मुझे इसे समझाने का कोई और तरीका नहीं सूझा।


मेरे ठीक बगल में बूढ़े लोगों का एक समूह बैठा था। लगभग पंद्रह लोग रहे होंगे। अचानक मुझे एहसास हुआ कि बस में इतनी भीड़ का कारण यही लोग थे। वे सभी धूप में तपे हुए थे, यहाँ तक कि उनकी गर्दन के पीछे का हिस्सा भी काला पड़ गया था। वे सभी दुबले-पतले थे। ज्यादातर पुरुषों ने पहाड़ चढ़ने वाली मोटी कमीजें पहनी हुई थीं, महिलाओं ने सादे, बिना किसी सजावट वाले ब्लाउज। उन सभी की गोद में छोटे-छोटे बैग थे, जैसे पहाड़ों पर छोटी-मोटी पैदल यात्राओं के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वे कितने एक जैसे दिखते थे। जैसे किसी दराज में किसी चीज के नमूने करीने से रखे हों। लेकिन अजीब बात यह थी कि इस बस रूट पर पहाड़ चढ़ने का कोई रास्ता नहीं था। तो आखिर वे कहाँ जा रहे होंगे? मैं वहाँ खड़े-खड़े बस की सीट बेल्ट पकड़े इस बारे में सोचता रहा, लेकिन कोई तर्कसंगत कारण समझ में नहीं आया।


“मुझे आश्चर्य है कि क्या इस बार इलाज में दर्द होगा?” मेरी चचेरे भाई ने मुझसे पूछा।


मैंने कहा, “मुझे नहीं पता। मेरे पास कोई जानकारी नहीं है।”


“क्या आप कभी कान के डॉक्टर के पास गए हैं?”


मैंने अपना सिर हिलाया। मैं अपनी पूरी जिंदगी में कभी कान के डॉक्टर के पास नहीं गया था।


मैंने पूछा, “क्या पहले भी दर्द हुआ था?”


“नहीं, ऐसा नहीं है,” मेरे चचेरे भाई ने उदास स्वर में कहा। “यह पूरी तरह से दर्द रहित तो नहीं था; कभी-कभी थोड़ा दर्द होता था। लेकिन कुछ ज्यादा नहीं।”


“शायद इस बार भी ऐसा ही होगा। तुम्हारी माँ ने कहा कि वे हमेशा की तरह कुछ खास अलग नहीं करने वाले हैं।”


लेकिन अगर वे हमेशा की तरह ही करते रहे तो इससे क्या फायदा होगा? खैर, कुछ भी हो सकता है। कभी-कभी अप्रत्याशित घटनाएँ घटित हो जाती हैं।


“तुम्हारा मतलब है जैसे किसी चीज का कॉर्क निकालना?” मेरे चचेरे भाई ने कहा। मैंने उसकी तरफ देखा, लेकिन मुझे उसमें कोई व्यंग्य नहीं दिखा।


“नए डॉक्टर से इलाज करवाना एक अलग अनुभव होगा, और कभी-कभी प्रक्रिया में थोड़ा सा बदलाव भी बहुत फर्क ला सकता है।”


“मैं इतनी आसानी से हार नहीं मानूंगा। मैं हार नहीं मानूंगा,” मेरे चचेरे भाई ने कहा।


“लेकिन तुम इससे ऊब चुके हो?”


“शायद,” उसने कहा और आह भरी। “डर ही सबसे बुरी चीज है। जिस दर्द की मैं कल्पना करता हूँ, वह असल दर्द से कहीं ज्यादा बुरा होता है। समझ रहे हैं ना?”


“हाँ, समझ रहा हूँ।”


******


उस बसंत में बहुत कुछ घटित हुआ था। काम पर एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि मुझे टोक्यो की एक छोटी सी विज्ञापन कंपनी में अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी, जहाँ मैं दो साल से काम कर रहा था। लगभग उसी समय मेरा अपनी प्रेमिका से भी ब्रेकअप हो गया। हम कॉलेज के समय से ही एक-दूसरे को जानते थे। उसके एक महीने बाद मेरी दादी का आंतों के कैंसर से निधन हो गया, और पाँच साल में पहली बार मैं अपने छोटे से सूटकेस के साथ इस शहर में वापस आया। मेरा पुराना कमरा बिल्कुल वैसा ही था जैसा मैंने छोड़ा था। जो किताबें मैंने पढ़ी थीं, वे अभी भी शेल्फ पर थीं, मेरा बिस्तर, मेरी मेज और वे सभी पुराने रिकॉर्ड जो मैं सुना करता था, सब वहीं थे। लेकिन कमरे में सब कुछ सूख चुका था, उसका रंग और गंध बहुत पहले ही गायब हो चुका था। मानो समय थम सा गया था।


मैंने अपनी दादी के अंतिम संस्कार के कुछ दिनों बाद टोक्यो वापस जाने की योजना बनाई थी ताकि नई नौकरी के लिए कुछ संभावित अवसरों की तलाश कर सकूँ। मैं एक नए अपार्टमेंट में शिफ्ट होने की भी सोच रहा था; मुझे माहौल में बदलाव की जरूरत थी। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुझे लगा कि उठकर कुछ करना बहुत मुश्किल काम है। सीधे शब्दों में कहूँ तो, अगर मैं उठकर कुछ करना भी चाहता, तो भी नहीं कर पाता। मैंने अपना समय अपने पुराने कमरे में बंद रहकर, उन रिकॉर्डस को सुनते हुए, पुरानी किताबें दोबारा पढ़ते हुए और कभी-कभार बगीचे में थोड़ी-बहुत काट-छाँट करते हुए बिताया। मैं किसी से नहीं मिला, और जिन लोगों से मैंने बात की, वे सिर्फ मेरे परिवार के सदस्य थे।


एक दिन मेरी चाची अचानक आईं और मुझसे मेरे चचेरे भाई को नए अस्पताल ले जाने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि उन्हें खुद उसे ले जाना चाहिए था, लेकिन अपॉइंटमेंट वाले दिन कुछ काम आ गया था इसलिए वे नहीं जा सकीं। अस्पताल मेरे पुराने हाई स्कूल के पास ही था, इसलिए मुझे पता था कि वह कहाँ है, और चूँकि मेरे पास और कोई काम नहीं था, इसलिए मैं मना भी नहीं कर सकता था। मेरी चाची ने मुझे एक लिफाफा दिया जिसमें कुछ पैसे थे, जिन्हें हम दोपहर के भोजन के लिए इस्तेमाल कर सकते थे।


उसे नए अस्पताल में इसलिए भेजा गया क्योंकि पुराने अस्पताल में जो इलाज चल रहा था उससे कोई फायदा नहीं हो रहा था। बल्कि उसकी हालत पहले से भी बदतर हो गई थी। जब मेरी चाची ने अस्पताल के प्रभारी डॉक्टर से शिकायत की, तो उन्होंने सुझाव दिया कि समस्या का संबंध चिकित्सा से ज्यादा लड़के के घर के माहौल से है, और फिर दोनों ने इस पर चर्चा की। वैसे तो किसी को भी अस्पताल बदलने से उसकी सुनने की क्षमता में तुरंत सुधार की उम्मीद नहीं थी। किसी ने खुलकर ऐसा नहीं कहा, लेकिन सबने लगभग उम्मीद ही छोड़ दी थी कि उसकी हालत में कभी सुधार होगा।


मेरा चचेरा भाई पास में ही रहता था, लेकिन मैं उससे उम्र में लगभग दस साल बड़ा था और हम कभी इतने करीबी नहीं थे। जब रिश्तेदार इकट्ठा होते थे, तो मैं उसे कहीं ले जाता या उसके साथ खेलता, बस इतना ही। फिर भी, कुछ ही समय में सब लोग मुझे और मेरे चचेरे भाई को एक जोड़ी की तरह देखने लगे, यह सोचकर कि वह मुझसे बहुत जुड़ा हुआ है और मेरा लाड़ला है। लंबे समय तक मुझे समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों था। लेकिन अब, जिस तरह से वह अपना सिर झुकाता था, उसका बायाँ कान मेरी तरफ होता था, उसे देखकर मुझे अजीब-सा सुकून मिला। जैसे बहुत पहले सुनी बारिश की आवाज, उसकी झिझक मेरे दिल को छू गई। और मुझे धीरे-धीरे समझ आने लगा कि हमारे रिश्तेदार हमें क्यों मिलाना चाहते थे।


******


बस सात-आठ बस स्टॉप पार कर चुकी थी कि मेरी चचेरे भाई ने फिर से चिंता से मेरी तरफ देखा।


“क्या यह बहुत दूर है?”


“हाँ, अभी काफी समय है। यह एक बड़ा भी अस्पताल है, इसलिए हमारी नजर से नहीं चूकेगा।”


खुली खिड़की से आती हवा बुजुर्गों की टोपियों के किनारों और उनके गले में लिपटे दुपट्टों को धीरे-धीरे हिला रही थी, मैं यूँ ही देख रहा था। ये लोग कौन थे? और कहाँ जा रहे होंगे?


“क्या आप मेरे पिताजी की कंपनी में काम करने जा रहे हैं?” मेरे चचेरे भाई ने पूछा।

मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा। उसके पिता, मेरे चाचा, कोबे में एक बड़ी प्रिंटिंग कंपनी चलाते थे। मैंने इस बारे में कभी सोचा भी नहीं था, और किसी ने कभी इसका संकेत भी नहीं दिया था।


“इस बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा है।” मैंने कहा―“तुम क्यों पूछ रहे हो?”


मेरे चचेरे भाई का मुँह चमक गया। उसने कहा, “मुझे लगा था कि शायद आप ऐसा करेंगे। लेकिन क्यों नहीं? आपको बाहर जाना भी नहीं पड़ेगा। और यहाँ सब लोग खुश भी रहेंगे।”


रिकॉर्ड किए गए संदेश में अगले स्टॉप की घोषणा की गई, लेकिन किसी ने भी उतरने के लिए बटन नहीं दबाया। बस स्टॉप पर चढ़ने के लिए भी कोई इंतजार नहीं कर रहा था।


“लेकिन मुझे कुछ काम निपटाने हैं, इसलिए मुझे टोक्यो वापस जाना होगा।” मैंने कहा।

मेरे चचेरे भाई ने चुपचाप सिर हिलाया।


मेरे पास वहाँ करने को कुछ खास नहीं था। लेकिन मैं यहाँ भी ठीक से रह नहीं सकता था।


जैसे-जैसे बस पहाड़ी ढलान पर चढ़ती गई, घरों की संख्या कम होती गई। घनी शाखाओं की छाया सड़क पर पड़ने लगी। हम कुछ विदेशी शैली के, रंगे हुए, नीची दीवारों वाले घरों के पास से गुजरे। ठंडी हवा सुखद लग रही थी। हर मोड़ पर जब बस मुड़ती, नीचे समुद्र दिखाई देता, फिर गायब हो जाता। जब तक बस अस्पताल के पास नहीं रुकी, मैं और मेरा चचेरा भाई बस वहीं खड़े रहे और नजारे देखते रहे।


“जाँच में थोड़ा समय लगेगा और मैं इसे अकेले संभाल लूंगा,” मेरे चचेरे भाई ने कहा, “तो आप कहीं बाहर जाकर मेरा इंतजार क्यों नहीं करते?” डॉक्टर को जल्दी से नमस्कार करके मैं जाँच कक्ष से बाहर निकला और कैंटीन चला गया। मैंने नाश्ते में बस थोड़ा सा ही खाया था और मुझे बहुत भूख लगी थी, लेकिन मेन्यू में कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे मेरी भूख बढ़े। मैंने एक कप कॉफी से ही काम चला लिया।


सप्ताह मध्य की सुबह थी। सामने एक छोटा सा परिवार बैठा था। पिता लगभग चालीस वर्ष के थे, उन्होंने गहरे नीले रंग का धारीदार पाजामा और प्लास्टिक की चप्पलें पहनी हुई थीं। माँ और उनकी जुड़वाँ बेटियाँ उनसे मिलने आई थीं। दोनों बेटियों ने एक जैसी सफेद पोशाक पहनी हुई थी और मेज पर झुकी हुई थीं, उनके चेहरे पर गंभीर भाव थे और वे संतरे का रस पी रही थीं। पिता की चोट या बीमारी ज्यादा गंभीर नहीं लग रही थी और माता-पिता और बच्चे दोनों ही ऊबे हुए लग रहे थे।


खिड़की के बाहर एक लॉन था। एक स्प्रिंकलर घूमता हुआ टिक-टिक कर रहा था, जिससे घास पर चाँदी जैसी फुहार पड़ रही थी। दो तेज आवाज वाले, लंबी पूँछ वाले पक्षी स्प्रिंकलर के ठीक ऊपर से उड़े और नजर से ओझल हो गए। लॉन के आगे कुछ सुनसान टेनिस कोर्ट थे, जिन पर नेट नहीं लगे थे। टेनिस कोर्ट के आगे जेलकोवा के पेड़ों की एक कतार थी, और उनकी शाखाओं के बीच से समुद्र की झलक दिखाई दे रही थी। गर्मियों की शुरुआत की धूप छोटी-छोटी लहरों पर कहीं-कहीं चमक रही थी। हवा जेलकोवा के नए पत्तों को सरसरा रही थी, जिससे स्प्रिंकलर से गिरती फुहार हल्की सी झुक रही थी।


मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने यह दृश्य कई साल पहले देखा हो। घास का एक विशाल मैदान, जुड़वाँ लड़कियाँ संतरे का रस पी रही थीं, लंबी पूंछ वाले पक्षी न जाने कहाँ उड़ रहे थे, सुनसान टेनिस कोर्ट, दूर समुद्र... लेकिन यह एक भ्रम था। यह दृश्य काफी सजीव था, इसमें वास्तविकता का तीव्र एहसास था, लेकिन फिर भी एक भ्रम ही था। मैं अपने जीवन में कभी इस अस्पताल में नहीं आया था।


मैंने अपने पैर सामने वाली सीट पर फैलाए, गहरी साँस ली और आँखें बंद कर लीं। अँधेरे में मुझे सफेद रंग कीएक गांठ दिखाई दी। चुपचाप वह फैलती गई, फिर सिकुड़ती गई, जैसे सूक्ष्मदर्शी के नीचे कोई सूक्ष्मजीव। रूप बदलती, फैलती, टूटती, फिर से बनती हुई।


आठ साल पहले की बात है, मैं दूसरे अस्पताल में गया था। समुद्र किनारे एक छोटा सा अस्पताल। खिड़की से बस कुछ कनेर के फूल ही दिखते थे। अस्पताल था, और वहाँ बारिश की महक आती थी। मेरे दोस्त की प्रेमिका का वहाँ सीने का ऑपरेशन हुआ था, और हम दोनों उसका हालचाल जानने गए थे। यह हाई स्कूल में जूनियर वर्ष की गर्मी की बात है।


दरअसल, यह कोई बड़ा ऑपरेशन नहीं था, बस उसकी एक पसली की अंदर की ओर मुड़ी हुई स्थिति को ठीक करने के लिए किया गया था। यह कोई आपातकालीन प्रक्रिया नहीं थी, बस ऐसी चीज थी जो आखिरकार करनी ही पड़ती, इसलिए उसने सोचा कि क्यों न इसे अभी ही करवा लिया जाए। ऑपरेशन तो जल्दी ही हो गया, लेकिन वे चाहते थे कि उसे आराम करने के लिए समय मिले, इसलिए वह दस दिन अस्पताल में रही। मैं और मेरा दोस्त 125cc यामाहा मोटरसाइकिल पर साथ-साथ वहाँ गए। जाते समय उसने मोटरसाइकिल चलाई, वापस आते समय मैंने। उसने मुझे साथ आने के लिए कहा था। उसने कहा था―“मैं अकेले अस्पताल नहीं जा सकता।”


मेरे दोस्त ने स्टेशन के पास एक मिठाई की दुकान पर रुककर चॉकलेट का एक डिब्बा खरीदा। मैंने एक हाथ से उसकी बेल्ट पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से चॉकलेट का डिब्बा कसकर पकड़े हुए था। दिन बहुत गर्म था और हमारी कमीजें बार-बार भीग रही थीं, फिर हवा में सूख रही थीं। गाड़ी चलाते हुए मेरा दोस्त बेसुरी आवाज में कोई बेमतलब का गाना गा रहा था। मुझे आज भी उसके पसीने की गंध याद है। उसके कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।


******


उसकी प्रेमिका ने नीले रंग का पाजामा और घुटनों तक आने वाला पतला गाउन जैसा कुछ पहना हुआ था। हम तीनों कैंटीन की एक मेज पर बैठे, शॉर्ट होप सिगरेट पी, कोक पी और आइसक्रीम खाई। उसे बहुत भूख लगी थी, इसलिए उसने चीनी से ढँके दो डोनट्स खाए और ढेर सारी क्रीम वाला कोकोआ पिया। फिर भी उसे भूख लगी रही।


“जब तक तुम यहाँ से निकलोगी, तब तक तुम एक बिल्कुल गुब्बारे जैसे बन चुकी होगी।” मेरे दोस्त ने कुछ घृणा भरे लहजे में कहा।


“कोई बात नहीं, मैं ठीक हो रही हूँ।” उसने डोनट्स से लगे तेल से सने अपनी उँगलियों के सिरों को पोंछते हुए जवाब दिया।


जब वे बातें कर रहे थे, मैंने खिड़की से बाहर ओलियंडर के पौधों पर नजर डाली। वे विशाल थे, मानो अपने आप में एक जंगल हों। मुझे लहरों की आवाज भी सुनाई दे रही थी। खिड़की के बगल वाली रेलिंग लगातार चलने वाली हवा के कारण पूरी तरह से जंग खा चुकी थी। एक पुराने जमाने का दिखने वाला सीलिंग फैन कमरे में गर्म, चिपचिपी हवा को इधर-उधर घुमा रहा था। कैफेटेरिया में अस्पताल जैसी गंध आ रही थी। यहाँ तक कि खाने-पीने की चीजों में भी वही अस्पताल वाली गंध थी। प्रेमिका के ऊपरी कपड़े में दो जेबें थीं, जिनमें से एक में एक छोटा सा सुनहरे रंग का पेन था। जब भी वह आगे झुकती, मुझे उसके छोटे, सफेद स्तन वी-नेक कॉलर से झाँकते हुए दिखाई देते।


******


यादें वहीं रुक गईं। मैंने याद करने की कोशिश की कि उसके बाद क्या हुआ था। मैंने एक कोक पी, ओलियंडर के फूलों को निहारा, उसकी छातियों पर एक नजर डाली, और फिर क्या? मैं प्लास्टिक की कुर्सी पर थोड़ा हिल-डुल कर बैठा और अपने हाथों में सिर रखकर यादों की परतों में और गहराई तक जाने की कोशिश करने लगा। जैसे किसी पतले धार वाले चाकू की नोक से कॉर्क को निकालने की कोशिश कर रहा हो।


मैंने एक तरफ देखा और कल्पना करने की कोशिश की कि डॉक्टर उसकी छाती को चीरकर, रबर के दस्ताने पहने हाथों से उसकी टेढ़ी पसली को सीधा कर रहे हैं। लेकिन यह सब कुछ बहुत ही अवास्तविक लग रहा था, मानो कोई प्रतीकात्मक कहानी हो।


हाँ, याद आया। उसके बाद हमने सेक्स के बारे में बात की। कम से कम मेरे दोस्त ने तो की ही। पर उसने क्या कहा? मेरे बारे में ही कहा होगा, इसमें कोई शक नहीं। कि मैंने एक लड़की के साथ संबंध बनाने की कोशिश की थी, लेकिन नाकाम रहा था। कोई बहुत बड़ी कहानी तो नहीं थी, लेकिन जिस तरह से उसने उसे सुनाया, हर बात को बढ़ा-चढ़ाकर, उससे उसकी गर्लफ्रेंड जोर से हँस पड़ी। मुझे भी हँसी आ गई। वह लड़का वाकई कहानी सुनाने में माहिर था।


“कृपया मुझे हँसाओ मत” उसने थोड़ी तकलीफ भरी आवाज में कहा। “हँसने पर मेरे सीने में दर्द होता है।”


“दर्द कहाँ हो रहा है?” मेरे दोस्त ने पूछा।


उसने अपने पायजामे (ऊपरी कपड़े) पर, दिल के ठीक ऊपर, बाएं स्तन के दाहिनी ओर एक जगह दबाई। उसने इस पर कोई मजाक किया, और वह फिर हँस पड़ी।


******


मैंने अपनी घड़ी देखी। ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट हो चुके थे, लेकिन मेरा चचेरा भाई अभी तक वापस नहीं आया था। दोपहर के भोजन का समय नजदीक आ रहा था और कैंटीन में भीड़ बढ़ने लगी थी। तरह-तरह की आवाजें और स्वर आपस में मिलकर कमरे को धुएँ की तरह घेर रहे थे। मैं एक बार फिर यादों की दुनिया में लौट गया। उस छोटी सी सोने की कलम में, जो उसके सीने की तरफ वाली जेब में थी।


अब मुझे याद आया। उसने उस पेन से एक कागज के नैपकिन पर कुछ लिखा था।


वह एक चित्र बना रही थी। नैपकिन बहुत नरम था और उसकी कलम की नोक बार-बार अटक रही थी। फिर भी, उसने एक पहाड़ी बना ली। और पहाड़ी की चोटी पर एक छोटा सा घर। घर में एक महिला सो रही थी। घर के चारों ओर घने अंधेरे विलो वृक्ष थे। उन्हीं घने अँधेरे विलो वृक्षों ने उसे सुला दिया था।


“ब्लाइंड विलो आखिर क्या होता है?” मेरे दोस्त ने पूछा।


“उस तरह का एक पेड़ होता है।”


“खैर, मैंने इसके बारे में कभी नहीं सुना।”


“ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैंने ही इसे बनाया है।” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “घने विलो पेड़ों में बहुत सारा पराग होता है, और उस पराग से ढँकी छोटी-छोटी मक्खियाँ उसके कान के अंदर घुस गईं और उस महिला को सुला दिया।”


उसने एक नया नैपकिन लिया और उस पर घने अंधे विलो का चित्र बनाया। अंधा विलो एक अजेलिया के आकार का पेड़ निकला। पेड़ पर फूल खिले हुए थे, फूल गहरे हरे पत्तों से घिरे हुए थे, मानो छिपकलियों की पूँछें एक गुच्छे में बंधी हों। अंधा विलो देखने में बिल्कुल भी विलो के पेड़ जैसा नहीं लग रहा था।


“तुम्हारे पास सिगरेट है?” मेरे दोस्त ने मुझसे पूछा। मैंने पसीने से भीगी हुई होप्स सिगरेट का एक पैकेट और कुछ माचिसें मेज के उस पार फेंक दीं।


“एक अंधा विलो पेड़ बाहर से छोटा दिखता है, लेकिन उसकी जड़ें अविश्वसनीय रूप से गहरी होती हैं।” उसने समझाया। “दरअसल, एक निश्चित बिंदु के बाद यह ऊपर की ओर बढ़ना बंद कर देता है और जमीन में और नीचे तक धंसता चला जाता है। मानो अँधेरा ही इसे पोषण देता हो।”


“और मक्खियाँ उस पराग को उसके कान तक ले जाती हैं, अंदर घुस जाती हैं और उसे सुला देती हैं,” मेरे दोस्त ने गीली माचिस से सिगरेट जलाने की कोशिश करते हुए कहा। “लेकिन मक्खियों का क्या होता है?”


“वे महिला के अंदर रहती हैं और उसका मांस खाती हैं, स्वाभाविक रूप से।” उसकी प्रेमिका ने कहा।


“इन्हें चट कर जाओ।” मेरे दोस्त ने कहा।


******


मुझे अब याद आया कि उस गर्मी में उसने अंधे विलो के बारे में एक लंबी कविता लिखी थी और हमें सब कुछ समझाया था। उस गर्मी में उसने बस यही एक होमवर्क किया था। उसने एक रात देखे सपने पर आधारित एक कहानी गढ़ी और एक हफ्ते तक बिस्तर पर लेटे-लेटे यह लंबी कविता लिखी। मेरे दोस्त ने कहा कि वह इसे पढ़ना चाहता है, लेकिन वह अभी भी इसमें सुधार कर रही थी, इसलिए उसने मना कर रख दिया। इसके बदले, उसने चित्र बनाए और कहानी का सारांश बताया।


एक युवक उस महिला को बचाने के लिए पहाड़ी पर चढ़ गया, जिसे अंधे विलो के पराग ने सुला दिया था।


“ये तो मैं ही हूँगा।” मेरे दोस्त ने कहा।


उसने सिर हिलाकर कहा, “नहीं, यह तुम नहीं हो।”


“क्या तुम्हें यकीन है?” उसने पूछा।


“मुझे यकीन है।” उसने गंभीर चेहरे के साथ कहा। “मुझे नहीं पता कि मुझे क्यों पता है। तुम नाराज तो नहीं हो न?”


“बिल्कुल, मैं हूँ।” मेरे दोस्त ने आधे मजाक में भौंहें चढ़ाते हुए कहा।


घने, घने विलो पेड़ों के बीच से रास्ता बनाते हुए, वह युवक धीरे-धीरे पहाड़ी पर चढ़ने लगा। घने विलो पेड़ों के छा जाने के बाद पहाड़ी पर चढ़ने वाला वह पहला व्यक्ति था। अपनी टोपी को आँखों पर खींचे हुए, अपने चारों ओर भिनभिना रही मक्खियों के झुंड को एक हाथ से हटाते हुए, वह युवक चढ़ता रहा। वह सोई हुई स्त्री को देखने के लिए चढ़ रहा था। उसे उसकी लंबी, गहरी नींद से जगाने के लिए चढ़ रहा था।


“लेकिन जब तक वह पहाड़ी की चोटी पर पहुँचा, तब तक उस महिला के शरीर को मक्खियों ने लगभग पूरी तरह से खा लिया था, है न?” मेरे दोस्त ने कहा।


“एक तरह से।” उसकी प्रेमिका ने जवाब दिया।


“एक तरह से देखा जाए तो मक्खियों द्वारा खाया जाना एक दुखद कहानी बन जाती है, है न?” मेरे दोस्त ने कहा।


“हाँ, मुझे लगता है ऐसा ही है।” उसने कुछ देर सोचने के बाद कहा। “तुम क्या सोचते हो?” उसने मुझसे पूछा।


मैंने जवाब दिया, “यह मुझे एक दुखद कहानी लगती है।”


******


बारह बजकर बीस मिनट हो गए थे जब मेरा चचेरा भाई बाहर आया। उसके हाथ में दवाइयों का एक छोटा सा थैला था और उसके चेहरे पर कुछ खोया-खोया सा भाव था। कैफेटेरिया के प्रवेश द्वार पर आते ही उसे मुझे देखने और मेरे पास आने में कुछ समय लग गया। वह लड़खड़ाते हुए चल रहा था, मानो संतुलन न बना पा रहा हो। वह मेरे सामने बैठ गया। और जैसे सांस लेना भूल गया हो, उसने एक गहरी सांस ली।


मैंने पूछा, “कैसा रहा?”


“हम्म” उसने कहा। मैंने उसके और कुछ कहने का इंतजार किया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।


मैंने पूछा, “क्या तुम्हें भूख लगी है?”


उसने चुपचाप सिर हिलाया।


“क्या तुम यहीं खाना खाना चाहते हो? या बस से शहर जाकर वहाँ खाना खाना चाहते हो?”


उसने अनिश्चितता से कमरे में चारों ओर देखा, “यहाँ ठीक है।” उसने कहा।


मैंने लंच के टिकट खरीदे और हम दोनों के लिए सेट लंच ऑर्डर कर दिए। खाना आने तक मेरा चचेरा भाई चुपचाप खिड़की से बाहर उसी नजारे को देखता रहा जिसे मैं देख रहा था―समुद्र, जेलकोवा पेड़ों की कतार, और स्प्रिंकलर।


हमारे बगल वाली मेज पर, सलीके से कपड़े पहने एक अधेड़ उम्र का जोड़ा सैंडविच खा रहा था और अपने एक दोस्त के बारे में बातें कर रहे थे जिसे फेफड़े का कैंसर था। वे बता रहे थे कि कैसे उसने पाँच साल पहले सिगरेट पीना छोड़ दिया था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, और कैसे वह सुबह उठते ही खून की उल्टी करता था। पत्नी सवाल पूछ रही थी, पति जवाब दे रहा था। पति ने समझाया कि एक तरह से, किसी व्यक्ति को होने वाले कैंसर में उसके पूरे जीवन की झलक देखी जा सकती है।


हमारे दोपहर के भोजन में सैलिसबरी स्टेक और तली हुई सफेद मछली, सलाद और ब्रेड रोल शामिल थे। हम एक-दूसरे के सामने चुपचाप बैठे खाना खा रहे थे। पूरे समय हमारे बगल में बैठा जोड़ा लगातार इस बारे में बोलता रहा कि कैंसर कैसे शुरू होता है, कैंसर की दर क्यों बढ़ गई है, और इससे लड़ने के लिए कोई दवा क्यों नहीं है।


******


“तुम कहीं भी चले जाओ, हर जगह एक जैसा ही हाल होता है।” मेरे चचेरे भाई ने सपाट स्वर में अपने हाथों को देखते हुए कहा।


“वही पुराने सवाल, वही जाँच।”


हम अस्पताल के सामने एक बेंच पर बैठे बस का इंतजार कर रहे थे। बीच-बीच में हवा के झोंके से हमारे ऊपर हरी पत्तियां सरसरा उठती थीं।


मैंने उससे पूछा, “कभी-कभी तो तुम्हें कुछ भी सुनाई नहीं देता?”


“हाँ, बिल्कुल सही।” मेरे चचेरे भाई ने जवाब दिया। “मुझे कुछ भी सुनाई नहीं देता।”


“यह कैसा लगता है?”


उसने अपना सिर एक तरफ झुकाया और सोचने लगा। “अचानक से कुछ सुनाई देना बंद हो जाता है। लेकिन यह समझने में थोड़ा समय लगता है कि क्या हुआ है। तब तक आप कुछ भी नहीं सुन पाते। ऐसा लगता है जैसे आप समुद्र की गहराई में हों और कानों में इयरप्लग लगाए हों। यह सिलसिला कुछ देर तक चलता रहता है। उस समय आप कुछ भी नहीं सुन पाते, लेकिन यह सिर्फ आपके कानों की बात नहीं है। कुछ भी न सुन पाना तो बस इसका एक हिस्सा है।”


“क्या यह तुमको परेशान करता है?”


उसने अपना सिर हिलाया, एक छोटा, लेकिन स्पष्ट झटका। “मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन इससे मुझे ज्यादा परेशानी नहीं होती। हालांकि कुछ भी न सुन पाना, यह असुविधाजनक जरूर है।”


मैंने इस स्थिति की दिमाग में तस्वीर बनाने की कोशिश की, लेकिन तस्वीर नहीं बन पाई।


“क्या तुमने कभी जॉन फोर्ड की फिल्म फोर्ट अपाचे देखी है?” मेरे चचेरे भाई ने पूछा।


मैंने कहा, “बहुत समय पहले की बात है।”


“यह हाल ही में टीवी पर आई थी। यह वाकई एक अच्छी फिल्म है।”


“हम्म” मैंने पुष्टि की।


“फिल्म की शुरुआत में एक नया कर्नल पश्चिम में स्थित एक किले में आता है। उसके आने पर एक अनुभवी कप्तान उससे मिलने आता है। कप्तान का किरदार जॉन वेन ने निभाया है। कर्नल को पश्चिम के हालातों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। और किले के चारों ओर भारतीय विद्रोह चल रहा है।”


मेरे चचेरे भाई ने अपनी जेब से करीने से तह किया हुआ सफेद रुमाल निकाला और उससे अपना मुँह पोंछा।


“किले पर पहुँचते ही कर्नल जॉन वेन की ओर मुड़कर कहता है, मैंने यहाँ आते समय कुछ भारतीयों को देखा था। और जॉन वेन, अपने चेहरे पर शांत भाव लिए, जवाब देता है ‘चिंता मत करो। अगर तुम्हें कुछ इंडियन्स दिखाई दिए, तो इसका मतलब है कि वहाँ कोई इंडियन नहीं है।’ मुझे ठीक-ठीक शब्द याद नहीं हैं, लेकिन कुछ ऐसा ही हुआ था। क्या आप समझ रहे हैं कि उसका क्या मतलब था?”


मुझे फोर्ट अपाचे फिल्म के ऐसे कोई डायलॉग याद नहीं आ रहे थे। जॉन फोर्ड की फिल्म के हिसाब से ये थोड़े अटपटे लगे। खैर, फिल्म देखे हुए काफी समय हो गया था।


“मुझे लगता है इसका मतलब यह है कि जो कुछ भी कोई भी देख सकता है वह उतना महत्वपूर्ण नहीं है... मेरा अनुमान है।”


मेरे चचेरे भाई ने माथे पर शिकन डालते हुए कहा, “मुझे भी यह बात समझ नहीं आती, लेकिन जब भी कोई मेरे कानों को लेकर मुझसे सहानुभूति जताता है तो मुझे वही बात याद आ जाती है। ‘अगर तुम कुछ इंडियन्स को देख पा रहे हो, तो इसका मतलब है कि वहाँ कोई इंडियन नहीं है।’”


मैं हँस पड़ा।


“क्या यह अजीब है?” मेरे चचेरे भाई ने पूछा।


“हाँ” मैं हँसा, और वह भी हँस पड़ा। उसे हँसे हुए काफी समय हो गया था।


कुछ देर बाद मेरे चचेरे भाई ने मानो अपना बोझ हल्का करते हुए कहा–“क्या आप मेरे लिए मेरे कानों के अंदर देखेंगे?”


“तुम्हारे कानों के अंदर?” मैंने थोड़ा आश्चर्यचकित होकर पूछा।


“बस वही, जो बाहर से दिखाई देता हो।”


“ठीक है, लेकिन तुम मुझसे ऐसा क्यों करवाना चाहते हो?”


“मुझे नहीं पता” मेरा चचेरे भाई शरमा गया। “मैं बस चाहता हूँ कि आप देखिए कि ये कैसे दिखते हैं।”


“ठीक है,” मैंने कहा। “मैं एक बार कोशिश करके देखता हूँ।”


मेरा चचेरा भाई मेरी तरफ पीठ करके बैठा था, और उसने अपना दाहिना कान मेरी ओर झुका रखा था। उसका कान सचमुच बहुत सुंदर था। छोटा तो था, लेकिन कान की लोब बिल्कुल फूली हुई थी, जैसे कोई ताजा बेक की हुई मेडेलिन हो। मैंने पहले कभी किसी के कान को इतने ध्यान से नहीं देखा था। एक बार जब आप इसे गौर से देखना शुरू करते हैं, तो इंसानी कान, इसकी संरचना काफी रहस्यमय लगती है। इसमें मौजूद ये सारी अजीबोगरीब घुमाव, उभार और गड्ढे। शायद क्रमागत विकास ने इस विचित्र आकार की चीज को ध्वनियों को इकट्ठा करने या अंदर मौजूद चीजों की रक्षा करने का सबसे अच्छा तरीका माना हो। इस असममित दीवार से घिरा हुआ, कान का छेद किसी अँधेरी, रहस्यमयी गुफा के प्रवेश द्वार की तरह खुला हुआ है।


मैंने अपने दोस्त की प्रेमिका की कल्पना की, जिसके कान में सूक्ष्म मक्खियाँ घोंसला बनाए हुए थीं। मीठा पराग उनके नन्हे पैरों से चिपका हुआ था, वे उसके अंदर के गर्म अंधेरे में घुसकर सारा रस चूस रही थीं और उसके मस्तिष्क में छोटे-छोटे अंडे दे रही थीं। लेकिन आप उन्हें देख नहीं सकते, न ही उनके पंखों की आवाज सुन सकते हैं।


“बस करो।” मेरे चचेरे भाई ने कहा।


वह घूमकर आगे की ओर मुँह करके बैठ गया और बेंच पर थोड़ा हिलने-डुलने लगा। “तो, क्या आपको कुछ असामान्य दिख रहा है?”


“जहाँ तक मैं देख सका, बाहर से देखने पर तो कुछ भी अलग नहीं लगा।”


“क्या सब ठीक है! आपको इसे देखते हुए कुछ महसूस हुआ, कोई भाव! या कुछ और।”


“मुझे तो तुम्हारा कान सामान्य ही लग रहा है।”


मेरा चचेरा भाई निराश लग रहा था। शायद मैंने कुछ गलत कह दिया था।


मैंने पूछा, “क्या इलाज में दर्द हुआ?”


“नहीं, ऐसा नहीं हुआ। हमेशा की तरह ही था। उन्होंने बस उसी पुरानी जगह पर इधर-उधर हाथ फेरा। ऐसा लगता है जैसे वे इसे घिस-घिस कर खराब कर देंगे। कभी-कभी तो ऐसा लगता ही नहीं कि ये मेरा अपना कान है।”


******


कुछ देर बाद मेरे चचेरे भाई ने मेरी ओर मुड़ते हुए कहा, “वो रही नंबर अट्ठाईस। वही हमारी बस है, है न?”


मैं सोच में डूबा हुआ था। जब उसने यह कहा तो मैंने ऊपर देखा और पाया कि ढलान पर चढ़ते हुए मोड़ पर बस धीमी हो रही थी। यह वैसी नई बस नहीं थी जिसमें हम आए थे, बल्कि पुरानी बसों में से एक थी जो मुझे याद थी। बस के आगे 28 नंबर का बोर्ड लगा हुआ था। मैंने बेंच से उठने की कोशिश की, लेकिन उठ नहीं पाया। जैसे मैं किसी तेज धारा में फँस गया हूँ, मेरे हाथ-पैर काम नहीं कर रहे थे।


मुझे चॉकलेट के उस डिब्बे की याद आ रही थी जो हम उस पुराने गर्मी के दिन दोपहर में अस्पताल जाते समय साथ ले गए थे। उस लड़की ने खुशी-खुशी डिब्बे का ढक्कन खोला तो देखा कि उसमें रखी एक दर्जन छोटी चॉकलेट पूरी तरह पिघल चुकी थीं, चॉकलेट कागज और ढक्कन से चिपकी हुई थीं। उस दिन अस्पताल जाते समय मैंने और मेरे दोस्त ने मोटरसाइकिल समुद्र किनारे खड़ी कर दी थी और बीच पर लेटकर बातें करते हुए समय बिता रहे थे। पूरे समय हमने चॉकलेट का वह डिब्बा अगस्त की तेज धूप में पड़ा रहने दिया था। हमारी लापरवाही, हमारा स्वार्थ, उन चॉकलेटों को बर्बाद कर गया था, उनका पूरा कबाड़ हो गया था। हमें समझ जाना चाहिए था कि क्या हो रहा है। हममें से किसी एक को, चाहे कोई भी हो, कुछ कहना चाहिए था। लेकिन उस दोपहर, हमें कुछ भी समझ नहीं आया, बस कुछ बेवकूफी भरे चुटकुले सुनाए और अलविदा कहा। और उस पहाड़ी को छोड़ दिया जो अब भी घने पेड़ों से ढकी हुई थी।


मेरे चचेरे भाई ने मेरी दाहिनी बाँह को कसकर पकड़ लिया।


“क्या आप ठीक हैं?” उसने मुझसे पूछा।


उसकी बातों ने मुझे वास्तविकता में वापस ला दिया, और मैं बेंच से उठ खड़ा हुआ। इस बार मुझे खड़े होने में कोई परेशानी नहीं हुई। एक बार फिर मैं अपनी त्वचा पर मई की मीठी हवा का स्पर्श महसूस कर सका। कुछ पलों के लिए मैं एक अजीब, धुंधली सी जगह में खड़ा रहा। जहाँ जो चीजें मुझे दिखाई दे रही थीं, वे अस्तित्व में नहीं थीं। जहाँ अदृश्य चीजें अस्तित्व में थीं। आखिरकार, असली नंबर 28 बस मेरे सामने आकर रुकी, और उसका असली दरवाजा खुल गया। मैं बस में चढ़ गया, और किसी दूसरी जगह की ओर चल पड़ा।


मैंने अपना हाथ अपने चचेरे भाई के कंधे पर रखा। मैंने उससे कहा, “मैं ठीक हूँ।”


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हारुकी मुराकामी (जन्म : 12 जनवरी 1949) हमारे समय के सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय लेखकों में से एक हैं। वह कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं। लंबे समय से वह नोबेल पुरस्कार के प्रबल दावेदार भी माने जाते रहे हैं। मुराकामी की किताबों की दुनिया भर में करोड़ों प्रतियों में बिक चुकी हैं।


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सुमन शेखर युवा कवि हैं।  लेखन के साथ रंगकर्म और अभिनय में निरत। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : सुमन शेखर



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