हैडमास्टर हृदयराम
- Jun 23
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Updated: Jun 30

मूल कहानी : भगवती प्रसाद जोशी 'हिमवंतवासी'
गढ़वाली से अनुवाद : कान्ता घिल्डियाल
प्राइमरी पाठशाला हैड़ाखाल। जहां हैड मास्टर हैं, हृदय राम हरबोला। एक शरीर, एक आत्मा। छड़ी जैसे छरहरे, रोबदार मूंछे, तना हुआ सीना और हर वक्त चढ़ी हुई आंखें! जैसे परशुराम के कंधे में फरसा, वैसे ही हृदय राम जी के हाथ में डंडा। इसी छवि को देखकर नौनिहालों ने उनका अच्छा-खासा नाम बिगाड़कर निर्दय राम बमबोला कर दिया। बच्चों के मन में उनका इतना खौफ था कि अगर मास्टर जी कहीं रास्ते या गली मुहल्ले में दिख जाएं तो वह गुफाओं या घरों में दुबक जाते। माहौल में ऐसी अफरा-तफरी छा जाती, जैसे बकरियों के रौखड़ में बाघ घुस आया हो। बचने का कहीं कोई रास्ता न दिखता। स्कूल जाओ तो डंडा, ना जाओ तो डंडा। विद्यार्थी डंडे को डंडा ना बोलकर शुद्ध संस्कृत में दंडिका बोलते। पर नाम बदलने से क्या होता? जैसे नागनाथ, वैसे ही सांपनाथ। जैसे डंडा, वैसे ही दंडिका।
हैडमास्टर हृदय राम का प्रिय विषय चाणक्य नीति था। वे अक्सर कहते- “अरे भई ! बच्चों से पांच वर्ष तक ही लाड़ जताना चाहिए और फिर दस वर्ष तक सख्ताई बरतनी चाहिए। प्राइमरी पाठशाला का सही नाम ताड़नशाला होना चाहिए।” खेलकूद के बारे में उनका कहना था कि अगर खेलना है तो अच्छा खेल खेलो। पर जब इन खंडहरनुमा स्कूलों में बैठने के लिए टाट-पट्टी और लिखने के लिए ब्लैकबोर्ड तक नहीं है तो फिर हॉकी-फुटबॉल कहां से लाएंगे? इसीलिए शाम को कबड्डी खेलो पर छीना-झपटी कर किसी के कपड़े मत फाड़ो। गुल्ली-डंडा भी खेलो पर किसी की आंखें मत फोड़ो। और जिस किसी बच्चे को गुच्छी खेलनी हो तो उसके लिए हैड़ाखाल स्कूल में कोई जगह ही नहीं है।
गुरूजी से आतंकित गांव पट्टी के बच्चों का बस चले तो अपने मां-बाप को कच्चा चबा जाएं।
अरे स्कूल भेजना ही है तो हैड़ाखाल ही क्यों? आरूखाल क्यों नहीं? दूर है तो क्या हुआ? पैर तो उनके थकेंगे न। आखिर इन कमबख्तों का घिसता ही क्या है? न हींग, न फिटकरी।
कहां हैड़ाखाल का मरखन्ना मास्टर हृदय राम और कहां आरूखाल का हैड मास्टर हरक मणि! एक दानव तो एक देवता। वैसे झूठ क्यों बोलें, श्री हरक मणि का असली नाम सरकमणि पड़ गया था क्योंकि हफ्ते में पांच दिन वह अपने घर की तरफ सरक जाते थे। अरे साहब क्या करें फिर? एक तो घर के अकेले काम करने वाले और उस पर भी पुरोहिताई वाले पंडित। नवरात्रि या सोलह श्राद्ध पूरे करें कि स्कूल में हाजिरी दें?
वहां एक छोटे मास्टर साहब भी तो थे। पर भैया बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभान अल्लाह होते ही हैं। जब हैडमास्टर साहब ही लापरवाह हैं तो उन्हें भी क्या गरज पड़ी है? फिर कानून है तो सबके लिए है, सिर्फ छोटे गुरूजी के लिए नहीं। स्कूल में रोज ही सरका-सरकी का माहौल बना रहता तो नौनिहाल भी बेखौफ आजाद घूमते रहते। वे अपनी-अपनी मनमर्जी के अनुसार कभी गुच्छी खेलते कभी गुल्ली-डंडा खेलते तो कभी कंचा-गोली। समय ही तो काटना था। अब चाहे पढ़ाई करते हुए काटो या खेल खेलते हुए। इसी कारण आरूखाल स्कूल के बच्चों के बस्तों में किताबें तो कम मिलतीं पर गुल्ली-डंडा और कंचे-गोलियां बहुतायत मात्रा में होते। अहा! कितने गुणी थे सरक मणि मास्टर जी! एक वो हैड़ाखाल वाला निर्दयराम। न खुद कहीं सरकता है न किसी और को ही सरकने देता है। छी: छी:, धिक्कार है उसे! एक तो स्कूल में पढ़ाई का बवाल, फिर घर के लिए सवाल और अगर जरा ऊंच-नीच हुई तो हथेली भी समझो लाल!
जुलाई महीना शुरू होते ही बच्चे अपनी-अपनी ममतामयी माताओं के सामने मेमनों की भांति मिमियाने लगते ,"माँ हमें हैड़ाखाल में भर्ती मत करना। वहाँ मरखन्ना निर्दय राम हैडमास्टर है। हम वहां नहीं जाएंगे। हम तो आरूखाल ही जाएंगे।”
मां अपने लाडलों की कोमल हथेलियां निहारती। उनकी कोमलता देखकर वह पसीज जाती कि बच्चों की इतनी मुलायम हथेलियां कैसे मास्टर जी के डंडे की मार सहेंगी?
वह परेशान होकर कहती, “गुड्डू के पापा ! सुना तुमने? इसे इस साल स्कूल में भर्ती करवाना है तो आरूखाल में ही करवाना। यह कह रहा है कि स्कूल बढ़िया है।”
पर कौन सुने? पापा तो बच्चों को आंखें तरेर कर झिड़कने लगते। पढ़ना है तो हैड़ाखाल जाओ, नहीं तो बकरियां चराओ बकरियां। तुम्हें क्लास पास करनी है या गुल्ली-डंडा?
गांव पट्टी में यह बात खूब प्रसिद्ध थी कि हैडमास्टर हृदय राम की दंडिका पूत-कुपूत की पहचान करवा देती है। जो काबिल होगा, वह टिक जाएगा और लंपट तो भाग ही जाएगा। उनकी दंडिका बिल्कुल हंस न्याय करती। दूध अलग और पानी अलग। उनकी दंडिका सूप की तरह कूड़ा करकट बाहर फेंकती और असल तत्व बचाकर रखती।
जुलाई का महीना गाड-गधेरों में मेंढकों की टरटराहट और हैड़ाखाल जाते बच्चों के सामूहिक क्रंदन से गूंजता रहता। लोग अपने बच्चों को सड़क पर यूँ घसीट-घसीट कर ले जाते मानो वे बच्चों को नहीं, मेमनों को कसाई को सौंपने जा रहे हों।
स्कूल पहुंचते ही स्कूल की दूसरी हस्ती शेरू मॉनिटर से भेंट होती। वह बुरांसी गांव के भाग सिंह भड़का लड़का है। कहते भी हैं, जैसा बीज वैसा फल। अपने बाप जितना ही लम्बा-चौड़ा, और फुटबॉल की भांति मोटा गोल। शरीर से स्वस्थ पर दिमाग से चौपट। हृदय राम जी ने मार मार के उसकी हड्डी-पसली एक कर दी। दर्जनों डंडे उसके मोटे-मोटे हाथों पर मार कर टूट गये पर उस मर्द के बच्चे ने उफ तक न की और न ही स्कूल छोड़ा। हृदय राम जी की दंडिका रूपी नागिन का जहर पचाकर कर वह नीलकंठ बन गया। और दंडिका उसके लिए साक्षात चुनौती। एक ही कक्षा में दो-दो साल लगाकर वह अपने मास्टर हृदय राम जी की कीर्ति ध्वजा पर एक बदनुमा पैबंद की तरह चिपका था। फिर भी मास्टर जी का वह चहेता शिष्य मॉनिटर बन गया था। उसका काम था स्कूल की घंटी बजाना और भोटिया कुत्ते की तरह दिन भर मेमने जैसे बच्चों को घेरे रखना और मास्टर जी की दंडिका को ठीक-ठाक रखना।
स्कूल खुलते ही मास्टर जी की पहली कड़क पुकार होती, “अरे शेरू!”
“जी मास्साब!!” कहते हुए शेरू भागकर उनकी दंडिका मेज पर रख देता। रोज-रोज की इस डरावनी दिनचर्या से बच्चों के पेट में बल पड़ने लगते। वे बहुत कोशिश करते कि कोई गलती न हो लेकिन गलती हो ही जाती। कभी पहाड़े पूरे रटते तो गृहकार्य अधूरा रह जाता, कभी भूगोल में गोल तो कभी हिंदी में बिंदी आ जाती। कभी हिसाब में हीरो पर अंग्रेजी में जीरो आ जाता। कुल मिलाकर ‘बकरे की मां कब तक खैर मनाए’ वाला हिसाब था तो चुपचाप सुनते और हाथ आगे बढ़ाते। घर जाकर माँ-बाप से शिकायत करते तो कमबख्त उल्टी राय मिलती- “अरे मार सह लो। हृदय राम मास्टर जी की मार आंवले के स्वाद जैसी है जो बाद में याद आता है।” और बात भी सच्ची ही थी। हैड़ाखाल से आज तक जितने भी बच्चे पास हुए, वे फर्स्ट डिवीजन में ही पास हुए।
इस स्कूल की तीसरी पर निरापद हस्ती थे मास्टर किताब सिंह जी। बिल्कुल गऊ जैसे। उनके पास आज तक कभी भी कोई स्थाई दंडिका नहीं रही। कभी मन करता तो रख भी लेते लेकिन ज्यादातर वह निहत्थे ही रहते। अपनी कुर्सी पर बैठकर वह बच्चों को सम्बोधित कर मेज पर एक खास किस्म की ताल बजाते- “किताब पढ़ो रे” और फिर चुटकी बजाते हुए जम्हाई लेते-लेते कुर्सी पर निढाल हो जाते। रात-रात भर ताश पत्ती के शौकीन मास्टर जी आखिर दिन भर कैसे जगे रहते? इसलिए रात भर के उनींदे वे दिन में ही आराम फरमाते। कभी-कभी नींद में उनके हाथ मेज के ऊपर यूँ आते, मानो पत्ते बांट रहे हों। “पढो रे किताब!” उनका तकिया-कलाम हो गया था इसलिए नौनिहालों ने अपने आदरणीय गुरुजी का नाम सिताब सिंह की जगह किताब सिंह रख दिया।
उस दिन हृदय राम जी ने आधा दर्जन बच्चों को दंडिका परेड के लिए लाइन में खड़ा किया ही था कि तभी चतरू पोस्टमास्टर ने एक लिफाफा उनकी मेज पर रखा। चिट्ठी पढ़ते ही उनकी आंखों में एक चमक सी आ गई। उन्होंने दंडिका मेज पर रखकर बच्चों को बैठने का इशारा किया। और शेरु को नायाब मास्टर जी को बुलाने भेजा गया।
"क्या बात है सर? कैसे याद किया?" सिताब सिंह जी ने लंबी जम्हाई लेते हुए बोला, "आजकल तो वैसे ही मेरी तबीयत खराब चल रही है।"
"बस, बस जरा इस चिट्ठी को पढ़ लीजिए और फिर आराम फरमा लीजिए।" हृदय राम जी ने कहा।
"बधाई हो सर बधाई। जूनियर हाई स्कूल के हैडमास्टर की पोस्ट के लिए आपका इंटरव्यू है। बस आप एक कनस्तर घी का इंतजाम कीजिए और एक खुशखबरी और....।" चिट्ठी पढ़ते ही सिताब सिंह जी खुशी से नाचने लगे।
“आपने शिक्षा अधिकारी का नाम भी पढ़ा?" हृदय राम जी ने पूछा।
"अरे साहब नाम तो सिर्फ पांडे लिखा है। वैसे वह आपका प्रिय शिष्य नीलांबर पांडे है। कुखड़ गांव के पीतांबर पांडे जी का बेटा। जिसके हाथ पर शायद अभी भी आपकी दारुण दंडिका के निशान मौजूद हों।"
"सच्ची? वो नीलू? वो शिक्षा अधिकारी बन गया?" हृदय राम जी ने विस्मित होकर कहा।
"अरे सर, वह शिक्षा अधिकारी क्या बन गया, समझो आपका काम भी बन गया। अब तो बिना घी के कनस्तर के ही आपका इंटरव्यू सफल हो गया समझो।" फिर एक लम्बी जम्हाई लेकर सिताब सिंह जी शांत हो गए। भरी दुपहरी में उनकी आंखें नींद से बोझिल होने लगी।
"अच्छा साहब, अब आप आराम कर लीजिए। बच्चों को मैं देख लूंगा।" कहकर हृदय राम जी ने पत्र हाथ में लिया और भारी दुविधा में पड़ गए। बचपन में एक नंबर का शैतान वह नीलू? गांव भर की ककड़ी-मुंगरी चुराने वाला, एक नंबर का लम्पट लड़का शिक्षा अधिकारी बन गया?
उनकी स्मृति में वह दिन घूम गया जब उन्होंने दिन-दोपहरी में नीलू को आरूखाल के बच्चों के साथ गुल्ली-डंडा खेलते हुए पकड़ा था। तब उन्होंने उसके हाथ से डंडा छीनकर मार-मार कर उसका बुरा हाल किया था। एक डंडा उसके बाएं हाथ पर इतनी जोर से पड़ा कि उसकी चमड़ी उधड़ गयी। इतना खून निकला कि कुछ दिन बाद उसके हाथ पर हमेशा के लिए एक पक्का निशान पड़ गया। नीलू चुपचाप उस दर्द और अपमान को सहन कर गया और उस दिन के बाद स्कूल छोड़ने के आखिरी दिन तक दत्तचित्त होकर पढ़ाई करने लगा। उसने कड़ी मेहनत कर सालाना परीक्षा में पहला स्थान प्राप्त किया और आज परिणामस्वरूप बड़ा अफसर बन गया। क्या सोचता होगा वह उनके बारे में?
कहीं पिटाई वाले दिनों को याद कर वह इंटरव्यू के वक्त उनकी बेइज्जती न कर दे। हृदय राम जी के मन में हर समय यह द्वंद्व चलता रहा कि कहीं वह ऐसा न कर दे, वैसा ना कर दे। वे तय नहीं कर पा रहे थे कि इंटरव्यू देने जाएं या न जाएं। जैसे-जैसे इंटरव्यू की तारीख नजदीक आती, अन्य स्कूलों के मास्टरों की आपाधापी की खबरें भी बढ़तीं जातीं।
"अरे साहब! क्या कर रहे हैं आप?" सिताब सिंह जी अपनी नींद खराब करके हृदय राम जी को कचोटते रहते, "सुनने में आ रहा है कि वो सरक मणि मंत्री जी की चिट्ठी ले आया और औतरू एमपी साहब के जिला दफ्तर के चक्कर काट रहा है। एक आप हैं कि मन ही मन मंथन कर रहे हैं कि जाऊं या ना जाऊं।"
अंततः उन्होंने निश्चय किया कि वे इंटरव्यू देने जाएंगे क्योंकि जब तक नौकरी करनी है, तब तक आदेश का पालन करना जरूरी है। अनुशासन भी तो आखिर कोई चीज होती है।
अलसुबह शेरू ने उठकर भड्डू गर्म कर मास्टर जी के कपड़ों पर इस्तरी कर दी। तेल के साथ तवे की कालिख मिलाकर उनके जूते पॉलिश किये गये। और जल्दबाजी में सिताब सिंह जी के पुराने कुंद ब्लेड से रूखी दाढ़ी के खूंटे उखाड़कर हृदय राम जी ने सुबह की बस पकड़ी और शिक्षा अधिकारी के ऑफिस में पहुंच गए। इंटरव्यू की प्रक्रिया चालू थी। बाहर बैठे अभ्यर्थियों में खुसर-फुसर चल रही थी। एक मास्टर जी इंटरव्यू देकर बाहर आए तो सब ने उन्हें मधुमक्खियों की तरह घेर लिया,
"गुमान सिंह जी, आपसे क्या पूछा?”
"अरे साहब, मुझसे पूछा कि चमड़े का सिक्का किसने चलाया था? मैंने जवाब दिया-एक भिश्ती ने। फिर उन्होंने पूछा क्या नाम था उसका? मैंने जवाब दिया हुमायूं।"
"हैं! हुमायूं कहा आपने? फिर तो आप फेल हो गए।" एक बुजुर्ग ने साफ कह दिया।
फिर एक अन्य मास्टर जी ने बाहर आकर कहा, "अरे भाई, मुझसे तो उन्होंने एक सरल सवाल पूछा कि एक पेड़ पर दस चिड़ियां बैठी थीं। शिकारी ने फायर कर दिया तो दो मर गयीं। तो पेड़ पर और कितनी शेष रह गयीं?"
"तो आपने क्या उत्तर दिया?", एक सज्जन ने पूछा
"अरे साहब मैंने उत्तर दिया आठ।"
"तो आप भी फेल। अजी साहब आपने गणित लगायी पर दिमाग नहीं लगाया। इसका उत्तर तो जीरो होना था। जब शिकारी ने फायर किया होगा तो पेड़ पर कोई भी चिड़िया क्यों बैठी रहेगी? सारी उड़ जाएंगी न।" पसीने से तरबतर एक मास्टर जी ने चेहरा पोंछते हुए बोला।
तभी एक चौड़े पाजामे वाले मास्टर जी दौड़ते हुए बाहर आए, "लो मुझे भी उन्होंने एक पहेली ही पूछी कि तीतर के आगे तीतर, तीतर के पीछे तीतर, बताओ कितने तीतर?"
"तो क्या कहा आपने?" एक तिरछी टोपी वाले अभ्यर्थी ने पूछा
"मैंने कहा तीन तीतर।"
"गलत कहा आपने। जवाब साफ था- दो तीतर।" लंबी मूछों वाले एक मास्टर साहब बोले।
"ऐसे में तो लग रहा है कि शायद ही हम में से कोई पास हो। सवाल देखो तो इनके! पर भाई लोगो, डूब मरने की बात है कि एक अध्यापक से बेवकूफ अधिकारी इस तरह के बेहूदा सवाल पूछ रहे हैं। मेरी मानो तो हमें इस दफ्तर से वाकआउट कर देना चाहिए।" गुस्से से लाल-पीले खद्दरधारी एक मास्टर साहब ने कहा।
"अरे नेताजी! यह सरकारी दफ्तर है। विधानसभा नहीं कि वाकआउट कर दें।” एक सौम्य मुखाकृति वाले मास्टर साहब ने टोका, "यह इंटरव्यू नौकरी के लिए है। प्रश्नकर्ता कुछ भी पूछ सकते हैं। और फिर प्रमोशन चाहिए तो जवाब भी देना ही पड़ेगा, वरना मनमर्जी करनी है तो घर जाकर बैठिए।"
नदी किनारे के पत्थर की तरह गोल-मटोल एक मास्टर जी तो जैसे गुस्से में भाषण ही झाड़ने लगे, "भाई -बंधुओं ! यह इंटरव्यू तो उनके लिए है जिन्होंने तोहफे में बढ़िया घी का कनस्तर दिया हो या जिनके पास मंत्री जी, एमपी साहब या एमएलए साहब की सिफारिशी चिट्ठी हो। हमारे पास तो भैया प्रधान तक की चिट्ठी नहीं है! सब दिखावा है भाई दिखावा। सुना है चयनित लोगों की तो लिस्ट भी पहले ही टाइप हो गई। पर चलो, जैसा सबका होगा, वैसा हमारा भी होगा।"
अभ्यर्थी आपस में कयास लगा ही रहे थे कि तभी दरवाजे के बाहर आकर चपरासी ने आवाज दी- "हृदय राम जी हैं ? हैड़ाखाल वाले?"
कंधे पर लटकते लाल अंगोछे से चेहरे पर ढुलक आए पसीने को पोंछते हुए हृदयराम जी जल्दी से आगे बढ़े तो अंदर कोई हंस-हंस कर बता रहा था , "अरे साब ये हैं निर्दय राम जी बमबोला !" फिर सामूहिक हंसी का खिलंदड़ स्वर कानों में गूंजा। कुछ देर के लिए उनके पैर थम से गये। पर अंततः वह पर्दा खिसका कर भीतर पहुंच ही गये।
कमरे में एक बड़ी मेज के सामने तीन अफसर बैठे थे। बीच वाले ने उठकर दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, "गुरुजी प्रणाम, बैठिए। उस ऑफिसर के बाएं हाथ के ऊपर चोट का निशान साफ नजर आ रहा था। हृदय राम जी अपने शिष्य नीलू को पहचान गए।
हृदय राम जी बैठे ही थे कि दायीं तरफ बैठे अधिकारी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “गुरुजी, आप तो संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं। बताइए यदि खंड से खंडिका, चंड से चंडिका तो दंड से?”
उत्तर साफ था, दंड से दंडिका और यह भी साफ था कि यह प्रश्न हृदय राम जी पर व्यंग्य बाण था। उनका बदन अपमान की आंख से जलने लगा और चेहरा गुस्से से तिलमिला गया। तब उसी अफसर ने हंसते हुए कहा, “गुरुजी , आपको तो पता है, उत्तर सरल है। दंडिका, यानी आपका ब्रह्मास्त्र”
हृदय राम जी उठकर खड़े हो गये। गुस्से से उनकी आंखें और गर्दन तन गए। तभी कमरे में नीलांबर की आवाज गूंजी, "डिप्टी साहब कृपया ऐसे प्रश्न न पूछें। आप अपना प्रश्न वापस लीजिए। क्षमा करें गुरुजी, आपका इंटरव्यू हो गया। आप जा सकते हैं।"
हृदय राम जी ने कमरे से बाहर आकर तीर की तरह मोटर स्टेशन पहुंच कर बस पकड़ी और सीधे हैड़ाखाल चले आए। उनकी भूख-प्यास खत्म हो गई और पूरी देह आत्मग्लानि के पसीने में भीग गयी। वे चुपचाप पलंग पर पसर गये। उनके दिमाग में घूम-फिर कर इंटरव्यू के दौरान पूछा गया वही प्रश्न घूम रहा था– “चंड से चंडिका तो दंड से?” वे मन ही मन सोचने लगे, आखिरकार नीलू ने उनसे पिटाई का बदला ले ही लिया। इंटरव्यू के दौरान नीलू की अपनी साथियों को मीठी फटकार उन्हें घाव देने के बाद मरहम लगाने जैसा दिखावा ही लगी।
सिताब सिंह जी को शेरू से हृदय राम जी के खाट पकड़ने की खबर मिली तो उनको पक्का विश्वास हो गया कि हृदय राम जी का इंटरव्यू अच्छा नहीं हुआ। वे स्कूल की छुट्टी कर दिन भर बेफिक्र होकर सोते रहे। नींद पूरी होने से शरीर में ताजगी थी तो वे हृदयराम जी से मिलने चले गए।
जाते ही उनका भाषण शुरू हो गया, “अरे साहब, कैसा रहा आपका इंटरव्यू? और यह खाट क्यों पकड़ ली आपने? मैंने तो पहले ही कहा था कि कुछ माल-पानी की व्यवस्था करो, किसी नेता की सिफारिशी चिट्ठी लाओ पर आपने मेरी कहां सुनी? अब तो सरक मणि ही तरक्की करेंगे और हीरामणि किसी अंधेरे कोने में फेंके जाएंगे। और करो दूसरों के बच्चों पर मेहनत। निकालो उनको फर्स्ट! साहब अपना तो एक ही पक्का उसूल है– न किसी को फेल करो न किसी को पास, बस खाओ-पियो और खेलो ताश ! होता ही क्या है इस मास्टरगिरी में? पहले कहते थे– लीजिए साहब तन-खा ! और अब नाम दिया है– बे-तन।”
हृदय राम जी ने कुछ नहीं कहा। वह अपलक कमरे के कोने को निहारते रहे। पर सिताब सिंह जी का भाषण अविराम चलता रहा। वे किसी असंतुष्ट नेता की तरह कुछ ज्यादा ही मुखर हो गए थे, "हरबोला जी, हम तो सब खानदानी सहायक अध्यापक हैं। हमारे दादाजी सहायक अध्यापक थे, पिताजी भी सहायक अध्यापक थे और खुद हम भी (सिताब सिंह) नायब मास्टर ही हैं। न हम कभी हैड मास्टर बने और न ही हमने कभी बनने की कोशिश की। हमने सिर्फ ऋषि चार्वाक का नीति शास्त्र पढ़ा है कि भई जान है तो जहान है, जब तक जियो सुख से जियो, कर्ज ले लेकर घी पियो क्योंकि फिर एक दिन इसी देह को मिट्टी में मिल जाना है और कौन जाने फिर पुनर्जन्म का मौका मिले या न मिले !”
दूसरे दिन स्कूल खुलते ही हृदय राम जी की वही प्रताड़ना पुकार फिर से शुरू हो गई, “शेरू !”
शेरू ने भी तुरंत सुनते ही दंडिका मेज पर रखी कि हृदय राम जी आगबबूला हो गए।
उन्होंने गुस्से से काँपते हुए दोनों हाथों से दंडिका को पकड़ा और घुटने पर रखकर दो टुकड़े कर सड़क पर फेंक दिया। दंडिका के टुकड़ों के सड़क पर गिरने से इतनी तेज आवाज हुई कि कुछ देर के लिए बच्चे हतप्रभ रह गए। वे सब इस तरह से हक्के-बक्के रह गये जैसे सीता के स्वयंवर के समय धनुष भंग होने पर देश-विदेश के राजा महाराजा।
अचानक हुई आवाज सुनकर अपनी खाट में घोड़े बेचकर सोए मास्टर साहब सिताब सिंह जी भी एकदम बौखलाए से ऐसे खड़े हो गए जैसे धनुष भंग की ध्वनि सुनने पर परशुराम जी की तपस्या भंग हो गयी हो। वे झटपट बाहर आकर गरजने लगे। "अरे छोकरों ! हमारे मास्टर साहेब की दंडिका किसने तोड़ दी। बताओ किस अभागे ने किया है खंड-खंड मेरे गुरु का दंड?" वे साक्षात परशुराम की तरह गरजने लगे। उन्होंने बौखलाते हुए जब चारों तरफ चक्कर लगाया, तब उन्हें माजरा समझ में आया और वे दोबारा अपनी खाट पर पसरकर तंद्रालोक में पहुंच गये।
बस दंडिका का टूटना था कि उस दिन से हैड़ाखाल स्कूल का माहौल प्रचंड अग्नि पर तुषारापात जैसा हो गया। अनुशासन लगभग गायब हो गया। बच्चे पढें तो ठीक, न पढ़ें तो ठीक। शेरू का तो जैसे हौसला ही पस्त हो गया। पहले मास्टर साहब की एक आवाज पर वह उनके सामने यूँ दंडिका प्रस्तुत कर देता जैसे कोई हवलदार अपने थानेदार के हाथ में पिस्तौल रखता हो कि लीजिए साहेब, फायर कीजिए। पर अब यूँ लग रहा था मानो मास्टर जी की दंडिका नहीं, शेरू का दिल टूटा हो। पहले वह भारी-भरकम भालू जैसा दम रखता था, पर अब बच्चों के सामने कीचड़ में सने केंचुए जैसा दिखने लगा। सच कहें तो अब हैडमास्टर हृदय राम जी भी हाथ में बिना दंडिका के ऐसे लगते जैसे बिना फरसे के परशुराम। इसे ही कहते हैं पुनर्मूषिका भव:।
उधर मास्टर सिताब सिंह की अलग चिंता से चर्बी गली जा रही थी कि जब हृदय राम जैसा मेहनती इंसान सीढ़ी नहीं चढ़ पा रहा है तो उनके जैसे आलसी प्राणी की तो कभी भी खाट खड़ी हो सकती है। नौकरी तो पत्थर की जड़ होती है।
कुछ दिनों बाद दोबारा चतरू पोस्टमैन मेज पर एक चिट्ठी रख गया। उनमें से एक हृदय राम जी की व्यक्तिगत चिट्ठी थी और दूसरी सरकारी। पर हृदयराम जी चिट्ठी खोलने की हिम्मत नहीं जुटा सके। इसलिए उन्होंने सिताब सिंह जी को बुलवाकर चिट्ठी पढ़वाई। सिताब सिंह जी ने जम्हाई ले, लेकर चिट्ठी पढ़ी और खुशी के मारे नाचने लगे। "बधाई हो साहब ! बधाई हो ! पहले तो मुँह मीठा करवाइए। आज दिल खोलकर रख दीजिए। कुछ दावत-सावत का इंतजाम कीजिए। आपका जूनियर हाई-स्कूल बसंतपुर के हैडमास्टर पद के लिए प्रमोशन हो गया है। और खास खुशखबरी की बात यह है कि मेरिट लिस्ट में आपका पहला नंबर है। मैं तो पहले ही जानता था। आप ही बेकार दुविधा में घुलते रहे। अब देख लीजिए, दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। सरकमणि जी इस लिस्ट में भी सरके हुए हैं। इसे कहते हैं हंस-न्याय।
"और लीजिए नीलू की मेरे नाम लिखी चिट्ठी भी सुन लीजिए।" कहकर हृदय राम जी चिट्ठी पढ़ने लगे, 'पूजनीय गुरूजी, दंडवत प्रणाम। आपको पदोन्नति का आदेश मिल गया होगा। योग्यता सूची में आपका प्रथम स्थान है। इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है। आपके स्कूल के सदैव अच्छे परीक्षाफल और अनुशासन से प्रसन्न होकर सरकार ने न सिर्फ आपकी तरक्की की है, बल्कि यथासंभव आपको सम्मानस्वरूप स्वर्ण पदक प्रदान करने का भी निश्चय किया है। इंटरव्यू के समय गलत प्रश्न पूछने के लिए हमारे डिप्टी साहब आपको माफीनामा भेज रहे हैं। और मुझे तो अपने हाथ पर गुरु-कृपा की अमिट छाप देखकर रोज ही आपकी याद आती है। हां , सिताब सिंह मास्टर जी..……
अचानक हृदय राम जी ने बीच में ही पत्र पढ़ना रोक दिया। बस सिताब सिंह फॉल-इन हो गए, "लीजिए साहब, मीठा तो गप्प मुँह में और कड़वा थू। क्या लिखा है मुझ अभागे के लिए? पढ़िए न। अरे भाई, कहीं ऐसा न हो कि दुश्मनों की शिकायत से एक कमबख्त की नायब मास्टरी पर तुरूप लग गया हो! आपके हाथ में तो तीन इक्कों की तिकड़ी फंस गई पर कहीं ऐसा न हो कि मेरा शो डाउन हो जाये।”
हृदयराम जी खिलखिलाने लगे, “तो लीजिए, आप भी मिठाई खिलाइए। नीलू ने लिखा है कि मास्साब सिताब सिंह जी तक भी मेरी बधाइयां पहुंचाइए। वे अब हैड़ाखाल में आपके स्थान पर हैडमास्टर के पद पर तैनात होंगे।”
“अजी साहब, क्यों मखौल करते हो श? आपको तो पता है, कौआ हंस की चाल चलेगा तो उसका क्या हश्र होगा। धन्यभाग हमारे कि भगवान हमें इसी नायब मास्टरी में रहने दे।”
हृदयराम जी ने लिस्ट वाला आदेश सिताब सिंह जी को पकड़ा दिया, "लीजिए, आपको चिट्ठी मजाक लग रही है तो यह आदेश पढ़ लीजिए।"
आदेश सच में आया था। सिताब सिंह जी की भी तरक्की हो गई थी। आदेश पढ़कर उनकी जम्हाइयां अंतर्ध्यान हो गईं, “धन्य हो साहब। आपकी तिकड़ी की वजह से अंधे के हाथ भी बटेर लग गई। आपकी सालों की मेहनत से स्कूल का नाम रौशन हुआ है। शिकार तो किया शेर ने और हिस्सा आलसी अजगर को भी मिल गया। आज तो हमारे कुल की आगे न खिसकने की परंपरा भी टूट गई और मास्टर के सिर में हैड का सींग भी जुड़ गया। हृदयराम बमबोला जी, नीलू को शिक्षा अधिकारी नीलांबर बनाने में और इस नायब मास्टर किताब सिंह को हैडमास्टर सिताब सिंह बनाने में आपका ही हाथ है।”
स्कूल के नौनिहालों ने दोगुनी खुश खबरी सुनी तो वे कलरव के साथ नाचने लगे। शोर सुनकर सिताब सिंह ने मेज पर जोर की थाप बजाई, "चुप रहो! शोर क्यों मचा रहे हो? किताब पढो।" बस फिर क्या था। स्कूल प्रांगण में बच्चों की हंसी गूंजने लगी और इसी खुशी में शेरू मोटे ने फुटबॉल की तरह उछलकर टन-टन घंटी बजा दी।
आखिर विदाई का दिन भी आ गया। स्कूली बच्चों के साथ गांव-पट्टी के सभी लोग स्कूल में इकट्ठे हुए। खूब पूरी-प्रसाद बना और बंटा। भाषणों का दौर भी चला और अंत में मास्टर जी का प्रिय शिष्य शेरू मॉनिटर भी बोलने के लिए खड़ा हो गया, “भाइयो एवं बहनो हमारे मास्टर साहब ने दंडिका को तो पहले ही विदा कर दिया और आज वह खुद ही हमसे विदा हो रहे हैं। सुन लो भाइयो! वह एक दंडिका नहीं बल्कि हम सबके लिए गुरु कृपा की फूलों भरी कंडिका थी। हमारे मास्टर साहब असली पारखी हैं। उन्होंने हम उद्दंड बछड़ों को साधकर हमें मेहनती बैल बनाया है। हमारे साथ के जो बछड़े आरूखाल गए, वे बछड़े ही रह गये और जो बैल बने भी हैं वे एक नंबर के निखट्टू। मैं भी इस साल नीलू पांडे की तरह केंद्र का रिकॉर्ड तोड़कर मास्टर साहब की सेवा में बसंतपुर पहुंच जाऊंगा।”
सभा में हर तरफ ठहाके गूंज रहे थे कि तभी बुरांसीखाल के मोड़ पर डाकगाड़ी का हॉर्न सुनायी दिया। हृदय राम जी का कुल अदद पांच नग सामान बच्चों ने झट-पट ढोकर सड़क किनारे रख दिया। एक निवाड़ की तीन पायों वाली खाट जिसका चौथा पाया पत्थर की टेक के सहारे खड़ा रहता। एक बिना ताले का पिचका हुआ मटमैला संदूक जिसके कब्जे पर ताले की जगह मक्की का खाली सूखा हुआ ठूंठ ठूंसा हुआ था। एक बिना हांडी की काली लालटेन, तवा, तसला। एक तेल से सनी फटी दरी के भीतर भीमल की रस्सी से बंधा हुआ बिस्तर और पांचवें खुद हैड मास्टर निर्दय राम जी बमबोला।
डाकगाड़ी बिल्कुल करीब आकर रुक गई। समान छत पर चढ़ा दिया गया। उसके बाद मास्टर जी सीट पर बैठ गए। उनका हमेशा से तना हुआ सीना झुक गया और चढ़ी हुई त्योरियां ढीली पड़ गईं। हाथ सब की तरफ आशीर्वाद देने को बढ़ने लगे। बच्चे कन्दराओं में छिपे निरीह साही की तरह सिसकने लगे। कांधे में रखे अंगोंछे से पोंछते-पोंछते हृदयराम जी की आंखें सेमल के फूल बन गईं। घर्र-घर्र, पों-पों हॉर्न बजाती गाड़ी मोड़ काटती हुई बसंतपुर की तरफ दौड़ पड़ी।
अचानक तभी पीछे से एक कड़कदार आवाज गूंजी, “शेरू!”
सब ने पीछे मुड़कर देखा तो मास्टर सिताब सिंह जी हाथ में टिमरू की कंटीली दंडिका लिए खड़े थे।
"सुन लो बच्चो ! अब पढ़ाई में जरा भी लापरवाही नहीं होगी।"
किताब सिंह जी गरज रहे थे, "दंडिका न कभी टूटती है, न कभी मरती है। वह तो आत्मा की तरह अमर है। बस चोला बदलती है चोला ! देख लीजिए यह पहले घिंगारू की थी और अब टिमरू की है। पहले केवल हथेलियां लाल करती थी अब तो चमड़ी उधेड़ देगी चमड़ी!”
दंडिका क्या लौटी, यूँ लगा जैसे स्वयं हैडमास्टर हृदयराम जी हैड़ाखाल लौट आए हों। छड़ी जैसे छरहरे, रोबदार मूंछें, तना हुआ सीना और और चढ़ी हुई त्योरियों वाले हैडमास्टर सिताब सिंह जी बिल्कुल ऐसे लगते जैसे पुराने हैडमास्टर निर्दय राम जी बमबोला।
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भगवती प्रसाद जोशी 'हिमवंतवासी' (1927-1988) जोशियाणा, गंगा सलाण पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड। 'एक ढांगै की आत्मकथा' कहानी संग्रह एवं गढ़वाली खंडकाव्य 'सीता बणवास' प्रकाशित।
कान्ता घिल्डियाल कवि-अनुवादक हैं। 'मुट्ठी भर रंग' (हिंदी कविता संग्रह), बीस बीसि (हिमांशु जोशी कृत उपन्यास ‘कगार की आग’ का गढवाली अनुवाद), पनाळ (गढ़वाली से हिंदी में अनूदित कहानियां), राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT) की चार पुस्तकों का गढ़वाली भाषा में अनुवाद, गढ़वाल राइफल्स पुस्तिका (गढ़वाली से हिंदी अनुवाद)। स्त्री चेतना और विमर्श पर आधारित पत्रिका 'स्त्री द्वीप' का संपादन। ईमेल : kanta.g.873@gmail.com
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कहानी अच्छी लगी। बिल्कुल अपनी जैसी। वर्षों पहले का स्कूली जीवन याद आ गया जब ऐसे ही छड़ी से मार खाते हुए हम बड़े हुए। हृदय राम जैसे मास्टर जी हमें भी मिले थे, उनकी दण्डिका से हमारी हथेलियाँ भी लाल हुईं थीं। अब लगता है वह उनका आशीर्वाद था जो जीवन में फलीभूत हुआ। अब ऐसे मास्टर जी नहीं मिला करते , हर समय उनकी कमी महसूस होती है। कहानी ने उस दौर को याद कराया जो बहुत पीछे छूट गया है।
■ रमेश शर्मा
सुन्दर कहानी, गढ़वाल के गांव की शिक्षा व्यवस्था तथा स्कूल परिपाटी का जीवन्त तथा रोचक वर्णन लिए हुए ।
क्षेत्रीय बोलियों की कहानी के अनुवाद की गोल चक्कर की यह पहल अत्यंत सराहनीय है।