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नसीब का पत्थर

3 hours ago
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नसीब का पत्थर

मूल कहानी :  मजीद क़ैसरी

अंग्रेजी से अनुवाद : अक्षत जैन-अमृता बेरा


बस की सीढ़ी पर पैर रखते ही ड्राइवर के सिर के ऊपर लगा फ़्रेशनर फुस्स से छूटा और उसकी महीन फुहार मेरे चेहरे पर आ पड़ी। चमेली की महक से मेरा इस्तक़बाल हुआ। भीतर बस गर्म थी, लगभग ख़ाली। मैं दूसरी क़तार में खिड़की वाली सीट पर जा बैठा। हरी गद्दी मुलायम थी, और सीट इतनी खुली कि आदमी चाहे तो रास्ते भर दुनिया से बेख़बर पड़ा रहे। मेरा इरादा भी यही था। बैठते ही मैंने सीट पूरी पीछे ढलका दी। अब नींद के हवाले होने में कोई रुकावट नहीं थी।

       

दरवाज़े के बाहर बस-कंडक्टर सिगरेट पीता हुआ खड़ा था। वह लाहिजान और रश्त जाने वालों को पुकार रहा था। उसकी सिगरेट का धुआँ एक पतली लकीर बनकर ऊपर उठता और उसके सिर के ऊपर ही कहीं खो जाता। मैंने भोर से पहले वाली बस पकड़ी थी, डेढ़ बजे उसे निकलना था। हिसाब साफ़ था : लंगरूद पहुँचते-पहुँचते सुबह हो जाएगी, रास्ते में मेरी नींद भी पूरी हो जाएगी, और वहाँ उतरकर मैं सीधे काम में लग सकूँगा।


बस ठीक वक़्त पर चल पड़ी। पीछे की पाँच-छह सीटें फिर भी ख़ाली रह गईं। करज हाईवे आने से पहले ही आँखों पर नींद का बोझ उतरने लगा और बदन ढीला पड़ गया। नींद आती, पलकों की देहरी पर ठहरती और फिर न जाने क्यों लौट जाती। जब भी आँख लगने को होती, वही फुसफुसाहट-सी फुफ़कार सुनाई देती—स्प्रे की एक हल्की-सी आवाज़, जो मुझे किसी साँप की सरसराती पूँछ जैसी लगती; मानो वह कभी-कभार अपने बिल से बाहर आता हो, शिकार को डँसकर सुस्ता जाता हो, और फिर चुपचाप अगले ही पल, अगले शिकार की ताक में लौट जाता हो।


हम शिकार पर जा रहे थे। बात यूँ ही बातों-बातों में निकली और यूँ ही तय भी हो गई—और अब मैं रास्ते में था। हम सात-आठ लोग ख़ुजिर के एक बाग़ में बैठे दुनिया-जहान के मसलों पर बहस कर रहे थे—पाबंदियाँ, परमाणु ऊर्जा, बेरोज़गारी, बाज़ार की मंदी, चढ़ता डॉलर और तलाक़ की बढ़ती दरें।


मुझे आज तक समझ नहीं आया कि बाज़ार की मंदी से बात ज़िंदगी की मंदी तक कैसे जा पहुँची, और फिर वहाँ से तलाक़ों की बढ़ती तादाद तक—जिसका सीधा इशारा, दरअसल, मेरी ही तरफ़ था। मेरे तलाक़ को छह महीने बीत चुके थे। उस सदमे की टीस अब भी बाक़ी थी और अकेलेपन की आदत अभी पड़ी नहीं थी। लगा कि शिकार पर निकलना शायद मुझे इस वीराने से थोड़ा बाहर खींच लाए।


हम कभी-कभार घरवालों के बिना भी इकट्ठा होते थे। महीने में एक-आध बार, अगर सबका वक़्त मिल जाए, तो ऐसी ख़ास मर्दाना महफ़िल जम ही जाती थी। वक़्त ज़्यादातर गपशप, हँसी-मज़ाक़, भुने हुए बीज चटकाने और ताश के पत्तों में गुज़रता। न जाने उस रोज़ क्या हुआ कि बात अचानक शिकार पर आ टिकी। किसने कब बंदूक़ चलाई, किसका कैसा तजुर्बा रहा, जाल कैसे बिछाया जाता है और समुद्री परिंदों को कैसे पकड़ा जाता है, और चूँकि शिकार का मौसम भी वही था, हमने बड़ी संजीदगी से तय कर लिया कि उत्तर की तरफ़ सिर्फ़ हम दोस्तों का एक सफ़र होगा—ख़ालिस शिकार के लिए, औरतों की बेवक़ूफ़ियों के झंझट से दूर।


कुछ लोगों ने उसी वक़्त बहाने तलाशने शुरू कर दिए। किसी ने ठंड का रोना रोया, तो किसी ने शिकार के परमिट की अड़चन गिनाई। कहने को वजहें यही थीं, पर असल मक़सद साफ़ था—साथ न चलने का कोई माकूल बहाना मिल जाए। अच्छा ही हुआ कि वे पीछे हट गए। शुरुआत में तो सभी हामी भरते दिख रहे थे, लेकिन रुख़सत होते-होते महज़ पाँच लोग ही बचे। उन्हीं पाँचों ने गुरुवार के लिए पक्की रज़ामंदी दी। इस तरह, आख़िरकार हमारा एक छोटा-सा दल बन ही गया।


सर्दी का मौसम था। तीलों (मुर्गाबी/छोटी बत्तख की एक ख़ास प्रजाति) और जलमुर्गियों की आमद के दिन—वे हलाल गोश्त वाले प्रवासी परिंदे, जो हर साल रूस और न जाने कहाँ-कहाँ से उत्तर की तरफ़ खिंचे चले आते हैं; थोड़ी गर्माहट, कुछ सुकून, और दलदलों व कैस्पियन समंदर की पनाह पाने के लिए। हमारे साथ एकाध लोग उत्तर के ही थे, सो वे हमारे रहबर बन गए। इंतज़ाम उन्होंने सँभाला और हम राज़ी होते गए—बंदर-ए-अंज़ली के लिए निकलने का दिन और वक़्त तय हुआ, वहाँ से चमख़ालेह के साहिल और समंदर तक का रास्ता, केबिनों में ठहरना और जाल से शिकार का तजुर्बा लेना।


शिकार का मुझे कोई तजुर्बा न था—न बंदूक़ का, न जाल का। हाँ, चमख़ालेह के समंदर किनारे बने वे केबिन मैंने ज़रूर देखे थे। धान के खेतों के बीच लकड़ी की छोटी-छोटी मचानें खड़ी थीं, जिनकी छतें पुआल से छाई हुई थीं। दूर से देखने पर वे पुआल की टोपी पहने बिजूके जैसी लगती थीं। गौरैयों, कौवों और न जाने कितने भटकते हुए मुसाफ़िर, दाना-चुगते परिंदों के लिए वे महफ़ूज़ पनाहगाहें बनी हुई थीं।


शायद उन्हीं मचानों की छाँव में बैठकर सिगरेट सुलगाने की चाहत थी, जिसने मुझे इस सफ़र के लिए राज़ी कर लिया था। गोली चलाने का मुझे कोई ख़ास शौक़ न था—ख़ासकर उन नन्हे परिंदों पर, जिनका वज़न सौ-दो सौ ग्राम से ज़्यादा क्या रहा होगा।


लंगरूद के बाज़ार में मैंने शिकार किए गए इन परिंदों को छोटी-बड़ी तश्तरियों में सजे देखा था। कुछ तब भी ज़िंदा होते, जो अपनी सुलगती लाल आँखों से आते-जाते लोगों को ताकते रहते; और राहगीर उन्हें यूँ देखते मानो किसी रंगीन कैनवस को निहार रहे हों—तश्तरियों में बिखरे चमकदार हरे और नीले रंग।


बाज़ार के फ़र्श की ढीली टाइलों पर मेरे हर क़दम के साथ लकड़ी की मेज़ों के पाए हल्के-से काँप उठते। उसी थरथराहट के साथ उन परिंदों की सुर्ख़, जेली जैसी तैरती आँखों में ख़ौफ़ साफ़ झलकने लगता। ऐसे बेज़बानों पर गोली चलाने के लिए जिस जिगरे की ज़रूरत होती है, वह मेरे पास नहीं था; खाने की बात तो बहुत दूर की थी।


इसका यह मतलब भी नहीं कि मैं कोई बहुत रहमदिल या नाज़ुक-मिज़ाज बुज़दिल इंसान था—ऐसी बातों से तो मेरी उम्र अब काफ़ी आगे निकल चुकी थी। मछली के शिकार से लेकर किसी जानवर को ज़बह (गले पर छुरी फेरकर कुर्बानी देना) करने तक के ख़याल से मुझे घिन आती थी। फिर भी, थोड़ी देर ठहरने के बाद मैंने कहा, “मैं चलूँगा।”


वे हँसने लगे। बोले, “डरो मत, तुम्हारा शिकार नहीं होगा।”


मैंने कहा, “पिछली बार जब मैंने जाल फेंका था तो बहुत बड़ा शिकार हाथ लगा था।”


उन्होंने बात को और आगे बढ़ाया। “इस बार ऐसी गोली मारना कि शिकार हिल भी न सके।”


मैंने कहा, “ख़ून मैं बहुत देख चुका हूँ।”


उन्होंने पूछा, “किस रंग का?” और फिर हँसी-मज़ाक़ शुरू हो गया। उन्हें मालूम था कि मेरा तलाक़ हो चुका है, और यह भी कि मेरे दाएँ हाथ पर जंग का ज़ख़्म है।


मैं बंदरगाह नहीं गया। यह बहाना बना दिया कि दफ़्तर से छुट्टी के साथ वीकेंड जोड़ने की इजाज़त नहीं मिली। गुरुवार को मैं देर से निकला—शिकार करने नहीं, बस शिकार की रिवायत को देखने-समझने के लिए। बंदूक़ चलाने से मुझे कभी कोई लगाव नहीं रहा; जाल बिछाने का तरीक़ा मुझे उससे कहीं बेहतर लगता था।


वैसे भी, उससे पिछली रात मैंने एक ख़्वाब देखा था कि मैंने एक पेड़ की भारी-भरकम, हज़ार रंगों से लदी शाख़ पर गोली चलाई है। मगर उससे पत्ते नहीं झड़े, बल्कि रंग-बिरंगे पर झड़े; और ओस की जगह ख़ून टपका।


मैंने उस ख़्वाब को बदशगुनी माना और अंज़ली जाने से किनारा कर लिया। शिकार से कहीं ज़्यादा मेरी दिलचस्पी उस इंतज़ार में थी, जो शिकार से ऐन पहले आता है—मछुआरों को जाल बिछाते देखना, उनका घात लगाए बैठे रहना और साँस तक संभाल-संभालकर लेना, ताकि हवा की कोई लहर उनके जिस्म की गंध परिंदों तक न पहुँचा दे।


रात की वह ठहरी हुई ख़ामोशी मुझे खींचती थी। शायद इसलिए कि उसमें मुझे पहरेदारी की वे पुरानी रातें याद आ जाती थीं—घंटों मुकम्मल सन्नाटे में बैठे रहना, सामने पसरे अँधेरे को ताकते रहना, और कानों में सिर्फ़ दो ही आवाज़ें गूँजना : शिकारियों की दबी हुई साँसें और झींगुरों की झंकार। ऐसे में धान के खेतों की भीनी सोंधी गंध आहिस्ता-आहिस्ता फेफड़ों में उतरती रहती थी। मेरे लिए शिकार हक़ीक़त से ज़्यादा कल्पना का खेल था। ख़ून बहाने से बढ़कर मुझे वह दहशत पसंद थी, जिसमें पलकें फड़कती हैं, आँखों में हल्की चुभन उठती है, और इंसान बिल्कुल चुप साधे बैठा रहता है। ये बातें मैंने दोस्तों से नहीं कहीं। कहता भी क्यों। मैंने बस इतना कहा, “तुम लोग अंज़ली निकलो। लौटते हुए जब चमख़ालेह की तरफ़ आओगे, मैं रास्ते में तुमसे मिल जाऊँगा।”


मैं रात में निकला था ताकि सुबह-सवेरे लंगरूद पहुँच सकूँ। ऊँघने और जागने की कशमकश में था कि लगा बस रुक गई है। रास्ते के बीचों-बीच कहीं हम ठहर गए थे। बाहर घुप्प अँधेरा था। किसी मुसाफ़िर ने कहा, “आधा घंटा हो गया।” जगह शायद क़ज़वीन की सीमेंट फ़ैक्टरी से आगे की थी। मैंने खिड़की से बाहर झाँककर देखा—ड्राइवर का हेल्पर बस के नीचे घुसा हुआ था, सिर्फ़ उसके पैर बाहर दिख रहे थे। पास ही एक पीली-लाल लौ थरथरा रही थी; किसी ने झाड़ियाँ जलाई थीं, मगर आग भड़कने से पहले ही बुझ गई। कुछ लोग नई झाड़ियों की तलाश में निकल पड़े। दूर अँधेरे में उनके मोबाइलों की रोशनी यूँ टिमटिमा रही थी, मानो वीराने में हवा में फँसे पतंगे भटक रहे हों। मैं फिर आँख मूँदकर लेट गया। बाहर ठंड थी, और उतरकर देखने लायक कुछ था भी नहीं। बल्कि, उन लोगों को शीशे के पीछे से देखना ज़्यादा अच्छा लग रहा था।


बस में बैठे-बैठे मुसाफ़िर कुढ़ने लगे। थोड़ी देर में साफ़ हो गया कि यह बस अब आगे जाने से रही। कई लोग वक़्त पर काम पर नहीं पहुँच पाएँगे, दफ़्तर खुलेंगे भी और उनके पहुँचे बिना बंद भी हो जाएँगे। ड्राइवर ने तेहरान में बस कंपनी के दफ़्तर फ़ोन घुमाया और दूसरी बस भेजने को कहा। फिर लौटकर उसने तसल्ली दी कि बस रास्ते में है, आ रही है।


कब?


तेहरान वहाँ से दो घंटे दूर था। कुछ लोग ड्राइवर के पास गए कि कोई और रास्ता निकाले, कुछ तो करे। मगर उस सुनसान सड़क पर गुज़रती गाड़ियाँ भी नहीं रुक रही थीं। या तो वे भरी हुई थीं, या अँधेरे में रुकने से डरती थीं। तभी एक बस दिखाई दी। उसने हेडलाइट झपकाई, रफ़्तार कम की और सड़क के किनारे आकर ठहर गई। हम लोगों ने सोचा, शायद हमारे ड्राइवर का कोई जान-पहचान वाला होगा, मदद के लिए रुक गया है। हमारा ड्राइवर तेज़ी से उसके पास गया और कुछ ही मिनटों में लौट आया।


उसने कहा, “जिसे वक़्त पर पहुँचना है, वह इस बस में बैठ जाए। वरना कंपनी की बस आने तक इंतज़ार करना पड़ेगा।”


अब हमारे पास करने को था ही क्या। मैंने अपना बैग उठाया, सड़क के अँधेरे में उतरा और दूसरी बस में चढ़ गया।


भीतर ठंड थी और अँधेरा भी। बस दरवाज़े के ऊपर की छोटी-सी बत्ती जल रही थी, जितनी ड्राइवर के देखने के लिए ज़रूरी हो। शायद उसने गलियारे की बत्तियाँ इसलिए बुझा रखी थीं कि पहले से सवार कुछ मुसाफ़िर सो रहे थे। हम दस-बारह लोग, हाथों में अपने-अपने बैग थामे दबे पाँव चढ़े और आगे की सीटों पर तितर-बितर होकर बैठ गए। चमेली की जगह अब प्याज़ और बासी रोटी की गंध ने ले ली। छठी क़तार में एक खाली सीट मिल गई और मैं अकेला बैठ गया।


गलियारे की बीच वाली बत्तियाँ एक पल के लिए जलीं। हमारी वीआईपी बस का ड्राइवर इस नई बस के ड्राइवर को मुसाफ़िरों की फ़ेहरिस्त थमा रहा था, और साथ ही आख़िरी हिदायत भी—किराया लंगरूद की फलाँ को-ऑपरेटिव कंपनी से ले लेना।


छत की धुँधली रोशनी में मेरी नज़र आगे वाली सीट पर रखे जालीदार थैले पर पड़ी। उसमें ताज़े टमाटर, प्याज़ और आलू रखे थे। पास ही नायलॉन की एक थैली थी, जिसमें सुबह की बची रोटियों के कुछ टुकड़े थे और सफ़ेद प्लास्टिक का एक चाक़ू, जिस पर शायद जैम के काले-से धब्बे लगे थे। बस के पिछले हिस्से में, आख़िरी दो-तीन क़तारों के आगे, फूलों के प्रिंट वाले कपड़े का एक परदा लटका था। उसने बाक़ी मुसाफ़िरों को पीछे की जगह से ओझल कर रखा था। देखकर लगता था मानो यह किसी घरेलू परिवार की बस हो। मैंने क़यास लगाया कि ड्राइवर का कुनबा शायद उसी परदे की ओट में बैठा होगा।


अब हम उसके लिए अजनबी नहीं रह गए थे। हमसे कहीं ज़्यादा ख़ुशी तो ड्राइवर को थी। उस वीरान बियाबान के बीच, बिना किसी आस के, अचानक उसे वीआईपी मुसाफ़िर जो मिल गए थे। रास्ते में यूँ अचानक सवारियों का हाथ लगना उसके लिए ऐसी नेमत थी कि बाद में जहाँ भी गया, यही कहता फिरा—“ख़ुदा जब अपने बंदे का रिज़्क़ खोलता है, तो गुफा में पड़ा मरा हुआ शिकार भी उसकी झोली में डाल देता है।” कुछ ही मिनटों में बस चल पड़ी। पहले ही झटके के साथ खिड़कियों पर टंगे परदे काँपने लगे। फिर हवा की सीटी जैसी आवाज़ कानों में पड़ी, तो मेरे मुँह से बेसाख़्ता निकला, “बस, ठंड न लग जाए, यही बहुत है।”


बस में बैठे-बैठे मुझे लग रहा था मानो किसी पहाड़ी पर बने पुराने, जर्जर झोपड़े में आ फँसा हूँ—जहाँ खिड़कियों, छत और फ़र्श की हर झिर्री से सर्द हवा भीतर घुसती चली आ रही हो। कैसेट प्लेयर की आवाज़ सुनते ही मुझे कुछ तसल्ली हुई। लगा, बस उतनी भी गई-गुज़री नहीं है; शायद हमें सही-सलामत पहुँचा ही देगी। गाने वाली कोई तुर्क औरत थी। उसकी आवाज़ में ऐसी उदासी थी मानो वह गा न रही हो, बल्कि दूर छूटी किसी बात को याद कर रही हो। संगीत के साथ ही छत की नीली बत्तियाँ भी जल उठीं और बस का ठंडा अँधेरा कुछ मद्धिम, कुछ सहने लायक हो गया, जैसे रात के स्याह सीने पर नन्हे तारे झिलमिलाने लगे हों। हालाँकि, ऐसी कड़कड़ाती ठंड और उस तंग जगह में मुझे उम्मीद नहीं थी कि नींद फिर लौटेगी। फिर भी मैं सोने और जागने के बीच कहीं अटका हुआ था कि किसी की आवाज़ सुनाई दी—“कहाँ जा रहे हो?”


मैंने देखा, गलियारे के दूसरी तरफ़, मेरे बराबर वाली सीट में एक औरत बैठी है—तीस-बत्तीस की रही होगी। वह हमारे साथ वाली वीआईपी बस से नहीं आई थी। न उसे मैंने बेहाघी टर्मिनल पर चढ़ते देखा था, न बस बदलते वक़्त। उसके सिर पर फूलदार रूमाल था। ताजिक औरतों की तरह उसने उसे गर्दन के पीछे बाँध रखा था, इसलिए उसकी लंबी, गोरी गर्दन साफ़ दिखाई दे रही थी। ऊपर से उसने गहरे, चमकीले रंगों की कढ़ाईदार मख़मली सदरी पहन रखी थी। नीचे फूलों वाली पोशाक थी, जिसके नक़्श छत की नीली रोशनी में हल्के-हल्के उभर रहे थे।


मैंने चौंककर पूछा, “क्या?”


उसने वही बात फिर कही, “कहाँ जा रहे हो?”


वह फ़ारसी मीठे, धीमे लहजे में बोल रही थी। आवाज़ गले की गहराई से उठती थी। मैं समझ गया, वह ताजिक है।


मैंने पूछा, “आप हमारी बस में नहीं थीं?”


उसने कहा, “नहीं।”


फिर उसने सिर मोड़कर बस के पिछले हिस्से की तरफ़ देखा। उधर से कोई हल्की-सी सरसराहट आ रही थी। मैंने परदे को भी हिलते देखा। हो सकता है हवा से हिला हो; हो सकता है किसी का हाथ या पैर उससे छू गया हो।


अब तक मुझे लगने लगा था कि वह इसी बस की मुसाफ़िर है, शायद ड्राइवर की बीवी। फिर भी यक़ीन नहीं था।


मैंने कहा, “आज दिन ही ऐसा था। जब तुम्हारी बस हमारे लिए रुकी, तुमने हमें नहीं देखा?”


“देखा,” उसने कहा। फिर वही पूछा, “कहाँ जा रहे हो? आस्तारा?”


“नहीं। लाहिजान और लंगरूद की तरफ़।”


इन दोनों शहरों के नाम उसके लिए अजनबी थे। रश्त को वह जानती थी।


“वहाँ किस काम से जा रहे हो?” उसने पूछा। “कारोबार?”


“शिकार पर जा रहा हूँ।”


उसकी आँखों में चमक आ गई।


“शिकार?” उसने हैरत से कहा। “मेरे बाबा भी शिकार पर जाते थे। हमारे घर की अटारी मेढ़ों के सींगों से भरी रहती थी।”


मैंने पूछा, “अब नहीं है?”


उसने सिर झुका लिया। “वह अपनी शान में चले गए।”


मैंने धीमे से कहा, “ख़ुदा उन्हें बख़्शे।”


यह कहते हुए उसने दोनों हाथों से बंदूक़ थामने की अदा बनाई। अपने पिता के बारे में उसने फिर कुछ नहीं कहा, और मैंने भी बात आगे नहीं बढ़ाई।


अब वह अपने बारे में बताने लगी। बोली, वे लोग कुछ ख़रीदारी करने आए थे और सोमवार को घर लौट जाएँगे। क्या ख़रीदा, यह उसने नहीं बताया। मैंने पूछा भी नहीं। परदे के पीछे कितने लोग थे, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। उसने उनके बारे में भी कुछ साफ़ नहीं कहा। वे दिख नहीं रहे थे। मुझे भी कोई ख़ास जिज्ञासा नहीं हुई। उसने बस के पीछे की तरफ़ इशारा किया—मतलब, “वे उधर हैं।”


फिर वह अचानक उठी और चली गई।


सच कहूँ तो मुझे बुरा लगा। न विदा, न माफ़ कीजिए, न कोई बात। बस उठी और चली गई।


इस तरह की औरतों को मैंने तेहरान में देखा था—बाब हुमायूँ सड़क पर, प्लास्को बिल्डिंग के आसपास, बाज़ार में ज़मीन पर बैठी हुईं। सिर पर चौकोर, रंग-बिरंगी टोपी, बदन पर चमकदार स्थानीय सदरी; भीड़ में भी अलग पहचानी जाती थीं। वे अक्सर टोलियों में चलतीं, कपड़ों का काम करतीं, और आम तौर पर उनके साथ कोई मर्द दिखाई नहीं देता था।


मैं पीछे की तरफ़ देखता रहा, जब तक वह परदे के भीतर गुम नहीं हो गई। परदा सरका तो बस एक धुँधला-सा घेरा दिखा, कुछ लोग आपस में सटे बैठे हुए थे। दृश्य इतना अस्पष्ट था कि लगता था जैसे चाँदनी में दूर से कोई जंगल दिखाई दे रहा हो; पेड़ नहीं, बस उनकी मिली-जुली परछाइयाँ।


मैंने नज़र फेर ली। दोनों बाँहें सीने पर बाँध लीं कि शायद ठंड कुछ कम लगे। नींद की उम्मीद तो अब छोड़ ही देनी थी। फिर भी उस तंग, ठंडी सीट में अपने को किसी तरह जमा रहा था, पीठ को सीट से रगड़कर थोड़ी गरमी पैदा करने की कोशिश कर रहा था।


तभी वह औरत लौट आई। बिना कोई आहट किए, कबूतर की तरह हल्के से आई और अपनी सीट पर बैठ गई।


“ठंड काट रही है,” उसने कहा।


मैंने कहा, “बस ही ऐसी है। बीमार न पड़ जाऊँ, यही ग़नीमत है।”


उसकी गोद में चमड़े का एक छोटा-सा बैग रखा था। उसने बैग खोला और पूछा, “चाक़ुओं की पहचान है आपको?”


“नहीं,” मैंने कहा।


उसके लौट आने के बाद मेरी थकान जैसे कुछ कम हो गई थी। मगर जैसे ही मैंने उसे बैग खोलते देखा, मन में आया—लो, आधी रात को सामान बेचने बैठ गई।


उसने कहा, “क़लमतराश है। फ़ौलादी धार वाला।”


मैंने पूछा, “बाग़वानी वाला चाकू?”


वह हँस पड़ी। हँसी इतनी मीठी और बच्ची-सी थी, मगर इतनी धीमी कि सिर्फ़ मुझे ही सुनाई दी। उसने चाकू की धार अपने मुँह के सामने कर ली। एक हाथ से वह चमड़े का बैग अपनी गोद में थामे रही, दूसरा हाथ मुँह पर रख लिया कि हँसी ज़ोर से न निकल जाए। इसी फेर में चाकू वाला हाथ भी उसके चेहरे तक उठ आया था।


मैंने कहा, “ज़रा संभलकर। यह बस नहीं, टैंक है। देख नहीं रहीं, कैसे उछल रही है?”


वह फिर हँस पड़ी। सिर मेरे कान के पास लाकर उसने हथेली से मेरे कंधे पर हल्की-सी चोट की और अपनेपन से बोली, “टैंक!”


मैंने कहा, “देखो तो सही, रेंग रही है।”


उसने चाकू की धार मेरी तरफ़ की और बोली, “तुम अजीब हो।”


मैंने कहा, “तबीयत कुछ ठीक नहीं है।”


शायद उसने सुना नहीं। मैं थोड़ा और उसकी तरफ़ झुक आया। उसकी बहुत-सी बातें मेरे कान तक साफ़ नहीं पहुँच रही थीं। मगर उसके शब्द मुझे अच्छे लग रहे थे—नए और अजनबी।


वह बोली, “क़लम! क़लम! यह सरकंडे की क़लम तराशने का चाकू है।”


उसे भाँपते देर न लगी कि बात अब भी मेरी समझ में नहीं आई। उसने कहा, “रुको।”


फिर मुस्कुराते हुए उसने क़लमतराश की नोक अपने नाख़ून पर हल्के से फेरी और दोबारा हँस पड़ी। इस बार मैंने भी हवा में हाथ चलाकर क़लम छीलने की नक़ल की—मानो कह रहा हूँ कि अब समझ गया।


उसने अपने मीठे ताजिक लहजे में कहा, “हाथ का बना है। बहुत नफ़ीस है। इसे पास से देखना चाहिए।”


मैंने कहा, “ज़रा देखने दो।”


उसने वही चाकू, जो अभी तक उसके हाथ में खुला था, मेरी तरफ़ बढ़ाया। पहले धार बंद की, फिर मेरे हाथ में रख दिया।


“मैं जब भी ईरान आती हूँ,” उसने कहा, “ऐसे चाकू ढूँढ़ती हूँ। तुम्हें मालूम है, इस तरह के चाकू कहाँ मिल सकते हैं?”


मैंने कहा, “मानूचेहरी स्ट्रीट गई हो?”


“जानती हूँ,” उसने कहा।


मैंने चाकू को हथेली पर उलट-पलटकर देखा। “इनका क्या करती हो?”


“जमा करती हूँ। शौक़ है मेरा। मेरे पास इनके कुछ खोल भी हैं।”


“तुम्हारे यहाँ लोग इन्हें ख़रीदते हैं? बाज़ार है इनका?”


“नहीं,” उसने कहा, “ये बेचने के लिए नहीं हैं।”


मैं मुस्कुराया। “तो तुम ख़ुशनवीसी करती हो? सिखाती भी हो?”


“नहीं। कभी-कभी मश्क़ कर लेती हूँ। अच्छा नहीं लिखती। आलसी हूँ।” फिर ज़रा ठहरकर बोली, “बाबा से सीखा था।”


मैंने पूछा, “नस्तालीक़? शिकस्ता? कौन-सी लिखावट आती है तुम्हें?”


वह बोली, “लिखना आसान काम नहीं। हुनर चाहिए। मैं तो बस धारें जमा करती हूँ।”


फिर उसने उसी चमड़े के बैग में हाथ डाला और एक पतला-सा पत्थर निकाला, अँगूठे के बराबर। उसने जब वह मेरी हथेली पर रखा तो मुझे लगा, यह आम पत्थर नहीं है। बहुत हल्का था; पत्थर जैसा लगता ही नहीं था।


“यूनान का है,” उसने कहा। “यहाँ नहीं मिलता। वहाँ एक ख़ास पहाड़ है, बस वहीं का पत्थर है। धार को इस पर दो-चार बार फेर दो तो चाकू इतना तेज़ हो जाता है कि पत्थर तक काट दे।”


उसने चाकू की एक धार खोली और उस घिसनी पर कुछ बार चला दी।


मैंने पूछा, “आख़िरी दाम क्या रखोगी?”


मुझे मालूम है, यह शरारत थी। असल में मैं बस यह जानना चाहता था कि वह उस पत्थर की क़ीमत क्या समझती है।


उसने कहा, “मैंने कहा न, यह बिकाऊ नहीं है। मैं इन्हें अपने शौक़ के लिए जमा करती हूँ।”


मैंने कहा, “ख़रीदना नहीं चाहता था। बस क़ीमत जानना चाहता था।”


“मिल जाए,” उसने कहा, “तो तीन सौ तूमान से कम का नहीं होगा।”


“इतना महँगा?”


वह मुस्कुराई। “तेहरान में जब मर्द यह पत्थर देखते हैं, तो पीछे पड़ जाते हैं। मैं सबको टाल देती हूँ। दिखा देती हूँ, बेचती नहीं। इसके चाहने वाले बहुत हैं।”


मैंने कहा, “तो यह तुम्हारा संग-ए-इक़बाल है। नसीब का पत्थर?”


“शायद,” उसने कहा। “हर आदमी अपने इक़बाल के सितारे के साथ पैदा होता है। यह मेरा पत्थर है। अभी ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ मिले हुए—साल भर होगा। इसे छोड़ते हुए मुझे अच्छा नहीं लगेगा।”


उसने होंठ भींचे और झेंपकर सिर झुका लिया।


मैंने पूछा, “मुझे बेचोगी?”


“तुम तो मेरे भाई हो,” उसने कहा। “ले लो।”


और तकल्लुफ़ में उसने दोनों हाथों से पत्थर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। फिर उसे मेरी हथेली पर रखकर अपनी उँगलियों से मेरी मुट्ठी बंद कर दी। उसके हाथ बहुत नरम थे।


मैंने कहा, “मेहरबानी तुम्हारी। मैं तो बस मज़ाक़ कर रहा था।”


उसने पूछा, “तुम्हारे पास चाकू है? दिखाओ।”


मैंने कहा, “नहीं।”


वह हैरान रह गई। “शिकारी और चाकू नहीं!”


मैंने कहा, “शिकार-विकार क्या, बस घूमने जा रहा हूँ। लेकिन एक चाकू ले लेना चाहिए। काम आ सकता है।”


उसने चमड़े के बैग से कई क़लमतराश निकाले और अपनी गोद में, स्कर्ट पर, एक-एक करके सजा दिए। बस की रोशनी कम थी, इसलिए मुझे उसके बैग पर अपने मोबाइल की टॉर्च जलानी पड़ी। बस के साथ रोशनी भी ज़रा-ज़रा हिलती, कभी उसके गोरे हाथों पर जा टिकती, तो कभी उस बदरंग चमड़े के छोटे से बैग पर।


वह एक-एक चाकू मुझे अलग से दिखाती और बताती गई कि कौन-सा कहाँ से मिला था। उनके खोल हिरन के सींगों से बने थे। किसी की मूठ पर तोते का सिर तराशा हुआ था, तो किसी पर साँप या शेर की आकृति। कहीं अंजीर या अंगूर की बेल के पत्ते उकेरे थे, तो कहीं सेब या नाशपाती जैसे फल। देखते ही देखते उसने मेरे आगे बीस-पच्चीस, शायद तीस क़लमतराश सजा दिए।


रश्त-क़ज़वीन हाईवे पर जब बस रोड-पुलिस चौकी के पास रुकी, तो वह उठकर परदे के पीछे चली गई। न उसकी चाल में कोई ख़ौफ़ था, न छिपने की कोई हड़बड़ी। मुझे लगा कि वह शायद थक गई होगी, थोड़ी देर में लौट आएगी। बस फिर चल पड़ी। मैंने पीछे मुड़कर देखा, वह नहीं आई।


नींद कब लगी, याद नहीं। इतना याद है कि ड्राइवर की आवाज़ से कई बार चौंककर आँख खुली थी। शायद वह रश्त या अस्तानेह जाने वाले किसी मुसाफ़िर को पुकार रहा था, ठीक-ठीक याद नहीं। बस इतना याद है कि जब मैंने आँख खोली, सूरज ऊपर चढ़ आया था और उसकी तेज़ रोशनी से मेरी आँखें सिकुड़ गईं। लाहिजान के गिल चौक पर बस रुकी। एक-दो मुसाफ़िर उतर गए। बेहाघी टर्मिनल से चढ़े हमारे लोगों में से भी अब कुछ ही बचे थे।


मैंने पीछे की तरफ़ देखा। परदा हटाकर सीट के हत्थे से लपेट दिया गया था। उसके पीछे अब कोई नहीं था—सिर्फ़ सफ़र के कुछ बैग और सन के बोरे, एक-दूसरे पर रखे हुए। दो-तीन बार मेरा मन हुआ कि उठकर जाऊँ और देखूँ, वहाँ आख़िर था क्या। वे लोग कौन थे, कहाँ उतर गए। मगर फिर लगा, आँखें कहीं ऐसी चीज़ न देख लें जो उन्हें नहीं देखनी चाहिए। बस के गलियारे में जगह-जगह बीजों के छिलके, माचिस की तीलियाँ और जूतों से झड़ी हुई सूखी मिट्टी पड़ी थी। मैं पीछे नहीं गया।


बस लंगरूद के फ़रमानदारी चौक की तरफ़ बढ़ती रही और मैं बीच-बीच में पीछे झाँकता रहा। उतरने से पहले रहा नहीं गया। मैंने ड्राइवर से पूछ ही लिया, “पीछे जो औरतें थीं, वे कहाँ गईं?”


उसने कहा, “रास्ते में नाश्ते के लिए उतर गईं। वापसी में ले लूँगा।”


फिर जैसे बात साफ़ कर रहा हो, बोला, “मैं इस रूट का पक्का ड्राइवर नहीं हूँ। बाकू रोड पर चार्टर चलाता हूँ, वह भी सिर्फ़ सोमवार को।”


मैंने उससे ख़ुदा हाफ़िज़ कहा और उतर गया। मैं सोच ही रहा था कि ड्राइवर से पूछूँ―वे औरतें कहाँ मिलेंगी, तेहरान कब लौटेंगी—कि तभी समझ में आया, अब देर हो चुकी है। नीली बस नज़र से ओझल हो चुकी थी।


मैं लैला-कूह गाँव की तरफ़ एक-दो गलियाँ पैदल पार कर गया। फिर जेब में हाथ डाला, शायद मोबाइल ढूँढ़ने के लिए, या शायद कुछ खुले पैसे, ताकि कोई सवारी कर लूँ। ठीक-ठीक याद नहीं। तभी उँगलियों से कोई पतली, सख़्त चीज़ टकराई। निकालकर देखा तो वही हड्डी की मूठ वाला एक क़लमतराश मेरी जेब में पड़ा था। मैंने तो उसे लिया नहीं था। मुझे याद भी नहीं कि उनमें से कोई चाकू कभी मेरे हाथ में रहा हो। वे सब मैंने उसी औरत की गोद में देखे थे, मोबाइल की रोशनी में, उसकी स्कर्ट पर सजे हुए।


मैंने चाकू को रोशनी में ऊपर उठाकर ग़ौर से देखा। मूठ के सिर पर नन्हा सेब उकेरा हुआ था। सेब से निकली हुई पतली, पत्तीनुमा डंडी पर मैंने उँगली फेरी। मुझे यक़ीन हो गया कि उसने ही यह चाकू मेरी जेब में रख दिया होगा - बरकत की तरह, या नसीब की कोई छोटी निशानी मानकर; जैसा कि वह कह रही थी, मेरे इक़बाल के लिए। ज़रूर उसने यह काम बस से उतरते वक़्त किया होगा, जब मैं नींद में था। काश, मैंने उसका नाम पूछ लिया होता!


सड़क सर्द और सुनसान थी। तय जगह तक अब मुझे अकेले ही जाना था। मैंने नज़र उठाकर लैला-कूह की चोटियों पर फैली हरियाली को देखा। सफ़ेद, भारी-भरकम सारसों का एक झुंड धीमे-धीमे समंदर की जानिब उड़ा जा रहा था।


(फ़ारसी से सजदेह अस्नाशरी द्वारा किए गए अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)


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कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित मजीद क़ैसरी (Majid Gheisari) समकालीन ईरानी कथाकार और लेखक हैं जो युद्ध के प्रत्यक्ष अनुभवों और मानवीय मनोविज्ञान पर आधारित अपनी गहन रचनाओं के लिए जाने जाते हैं। ‘थ्री प्रीस्ट्स’, ‘स्टोन ऑफ डेस्टिनी’, ‘ओल्ड स्नो, न्यू स्नो’, ‘शमास शामी’, ‘डार्क गार्ड’, ‘व्हाइट ग्रेव’, ‘ने चेंज प्लस टॉन नॉम’ और ‘तेहरान बीच’ आदि उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।


अक्षत जैन लेखक, संपादक और अनुवादक हैं। उनके लेख The Caravan और Newslaundry सहित विभिन्न पत्रिकाओं और मंचों पर प्रकाशित हुए हैं। वे अनुवाद-केंद्रित वेबसाइट ‘अनुवाद संवाद’ का संचालन करते हैं, जहाँ विश्व साहित्य और विचार की अनेक रचनाओं के उनके हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। पुस्तकाकार अनुवादों में इज़राइली लेखक एटगर केरेट का कहानी-संग्रह ऑटोकरेक्ट और मीरा नंदा की सत्य विपरीत भारत शामिल हैं। प्रकाशन के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम शुरू करने से पहले वे लगभग पाँच वर्षों तक संपादक रहे। लेखन, संपादन और अनुवाद के इस संयुक्त अनुभव के कारण उनकी विशेष रुचि इस प्रश्न में है कि विश्व साहित्य को हिंदी में लाते समय भाषा, संदर्भ, संपादकीय प्रक्रिया और पाठकीयता के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाए।


अमृता बेरा कवि, अनुवादक और स्वतंत्र लेखक हैं तथा 2009 से हिंदी, बांग्ला और अंग्रेज़ी के बीच लेखन और अनुवाद में सक्रिय हैं। उनकी अब तक बारह मौलिक और अनूदित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने रबिशंकर बल के दोज़ख़नामा और रूमी—एक आईना-सी ज़िंदगी, मनोरंजन ब्यापारी की चांडाल जीवन त्रयी, तसलीमा नसरीन के लेखन और सुबोध सरकार के साहित्य अकादमी पुरस्कृत काव्य-संग्रह सहित अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियों का अनुवाद किया है। भागा हुआ लड़का के अनुवाद के लिए उन्हें 2023 का Valley of Words ‘शब्दावली पुरस्कार’ मिला। हिंदी, बांग्ला और अंग्रेज़ी—तीनों भाषाओं में लंबे समय से काम करने के कारण उनका अनुभव विशेष रूप से भारतीय भाषाओं के बीच सीधे अनुवाद, सांस्कृतिक संदर्भों के हस्तांतरण और अनुवाद में लेखक की शैली तथा सामाजिक संसार को सुरक्षित रखने की चुनौतियों से जुड़ा है।


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