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साँड

23 hours ago
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मूल  कहानी : ग़ज़नफ़र
उर्दू से अनुवाद : आफ़ताब अहमद

“यह कैसी भगदड़ मची है भाई?”


सूरजपूर गाँव के एक बूढ़े ने अपने बरामदे से भागने वालों को संबोधित किया। एक नौजवान ने रुककर हाँपते हुए जवाब दिया―


“चाचा! गाँव में आज साँड फिर घुस आया है।”


“साँड फिर घुस आया है!” बूढ़े की सफ़ेद लंबी दाढ़ी ऊपर से नीचे तक हिल उठी।


“हाँ चाचा! फिर घुस आया है और आज तो उसने ऐसी तबाही मचाई है कि पूछिए मत। नत्थू की बछिया को ख़राब कर दिया। छेदी के बछड़े को सींग मार दिया। भोलू के बैल को टक्करें मार-मार कर लहूलुहान कर दिया। कालू की गाय-भैंस के चारा-पानी के बर्तन को तोड़-फोड़ दिया। बुध्धू और भोला की तैयार सब्ज़ियों को नोच-खसोट कर मलियामेट कर दिया। अब भी बौराया हुआ ऐंडता फिर रहा है। ना जाने और क्या-क्या करेगा? किस-किस पर क़यामत ढाएगा?”


“तुम लोग धामपुर वालों से कहते क्यों नहीं कि वे अपने साँड को रोकें। इधर ना आने दें।”


“कहा था चाचा! गाँव के बहुत से लोगों ने मिलकर कहा था। उनको बताया था कि उनके गाँव का साँड हमारा कितना नुक़सान कर रहा है। मगर जानते हैं उन्होंने क्या जवाब दिया।”


“क्या जवाब दिया?”


“उन्होंने यह जवाब दिया कि भला साँड को भी कहीं रोककर रखा जा सकता है। साँड तो देवी-देवता का प्रसाद होता है। उसे भगवान के नाम पर छोड़ा जाता है और भगवान के नाम का साँड भगवान की बनाई हुई इस दुनिया में कहीं भी बिना रोक-टोक जा सकता है। भगवान ही की तरह उसका भी सब पे अधिकार है। सब में उसका हिस्सा है। वह जो चाहे खा सकता है। उसे रोककर अपने को भगवान की दृष्टि में दोषी और नरक का भोगी बनाना है क्या? चाचा! मेरी समझ में नहीं आया कि धामपुर के लोगों ने ऐसा क्यों कहा? क्या सचमुच साँड भगवान के नाम पर छोड़ा जाता है?”


“हाँ बेटे! बात तो सच है। लोग अपनी किसी मुराद को पाने के लिए भगवान या देवी-देवता से मन्नत मानते हैं कि अगर उनकी मुराद पूरी हो गई तो वे भगवान या देवी-देवता के नाम का कोई साँड छोड़ देंगे और अपनी गाय के बछड़े को या किसी दूसरी गाय के बछड़े को ख़रीदकर आज़ाद छोड़ देते हैं। छोड़ने से पहले उस बछड़े को ख़ूब मल-मलकर नहलाते हैं। उसके गले में फूलों का हार डालते हैं। गाँव वालों को एक जगह जमा करके पूजा-पाठ करते हैं और सबके सामने बछड़े के शरीर या माथे पर भगवान या देवी-देवता का कोई पक्का निशान बना देते हैं। इसके बाद वे बछड़े को खूँटे से खोलकर आज़ाद कर देते हैं। क्योंकि वह भगवान के नाम पर छोड़ा जाता है। इसलिए उसके खाने-पीने और घूमने-फिरने में कोई किसी तरह की रुकावट नहीं डालता और वह आज़ादी और बेफ़िक्री से ख़ूब खा-पीकर बहुत जल्द बछड़े से साँड बन जाता है।”


“फिर तो धामपुर वालों ने ठीक ही कहा था चाचा?” 


“ठीक तो कहा था, मगर यह भी तो ठीक है कि कोई अपनी बर्बादी को चुप-चाप नहीं देख सकता। अपने बचाव के लिए उसे भी तो कुछ करना ही पड़ता है।” 


“तो अब हमें क्या करना चाहिए चाचा?” 


“तुम लोग काँजी हाउस के अधिकारियों से मिलो। गाँव का हाल बताओ। और उनसे कहो कि वे धामपुर गाँव के साँड से हमारे गाँव को तबाह होने से बचाएँ। उनसे यह भी कहो कि यह साँड पागल हो गया है। इसलिए इसे जल्द से जल्द काँजी हाउस में बंद कर दिया जाये। वरना हमारे गाँव के साथ-साथ दूसरे गाँव को भी रौंद डालेगा।” 


“ठीक है चाचा! मैं आज ही गाँव वालों को तैयार करता हूँ।


सूरजपुर वाले अपनी तबाही की सूचना और साँड की शिकायत लेकर काँजी हाउस पहुँचे। काँजी हाउस के उच्च अधिकारी ने उनका दुखड़ा सुनकर कहा―


“आप लोगों की पीड़ा सुनकर हमें बहुत दुख हुआ। मगर अफ़सोस कि इस विषय में हम आपकी कोई सहायता नहीं कर सकते।” 


“क्यों साहिब? गाँव वाले उसकी ओर देखने लगे।

इसलिए कि इस काँजी हाउस में लावारिस साँड को बंद करने का चलन नहीं है। यहाँ तो ऐसे जानवरों को बंद किया जाता है जिनका कोई ना कोई वारिस होता है। जो कुछ दिनों के अंदर-अंदर अपने जानवरों को जुर्माना भरकर छुड़ाकर ले जाता है। अगर हम ऐसे जानवरों को बाँधकर रखने लगे तो कुछ दिनों में यह हाउस ही बंद हो जाएगा।” उसने बहुत ही नरम लहज़े में जवाब दिया। 


अधिकारी का जवाब सुनकर गाँव वाले गिड़गिड़ा कर बोले―“साहिब! कुछ कीजिए। वरना तो हमारा सत्यानाश हो जाएगा। हम कंगाल हो जाएँगे” 


अधिकारी ने उन्हें समझाते हुए फिर कहा―“हम मजबूर हैं। हम ऐसे जानवर को काँजी हाउस में बिलकुल नहीं रखते। आप लोगों को मेरी बात पर शायद यक़ीन नहीं आ रहा है। आइए मेरे साथ।” 


अधिकारी ने गाँव वालों को अपने साथ लेकर काँजी हाउस में प्रवेश किया। 


गाँव वालों की निगाहें वहाँ पर बँधे हुए जानवरों को घूरने लगीं। उन्हें कहीं भी कोई साँड नहीं मिला। वहाँ तो ऐसे जानवर बँधे थे जो बहुत ही कमज़ोर और दुबले-पतले थे जिनके पेट अंदर को धँसे हुए थे और पसलियाँ बाहर को निकलीं हुई थीं। 


काँजी हाउस के अंदर का हाल देखकर गाँव वाले वापस लौट आए और अपने को क़िस्मत के हवाले कर के बैठ गए।


एक दिन साँड ने गाँव में फिर तबाही मचाई। इसके बाद एक बार और घुस आया।


परेशान होकर गाँव वाले एक जगह जमा हुए। बूढ़े ने गाँव वालों को इस बार यह सुझाव दिया कि वो काँजी हाउस के ऊपर वाले विभाग में जाकर अपनी फ़रियाद सुनाएँ। गाँव वाले वहाँ भी पहुँचे। वहाँ के अधिकारियों ने गाँव वालों की प्रार्थना पर गंभीरता से ग़ौर किया और काँजी हाउस के अधिकारियों को ज़ोर देकर लिखा कि वे धामपुर वालों को साँड की तबाही से बचाएँ और गाँव वालों से कहा कि वो काँजी हाउस के अधिकारियों से संपर्क करें। वे ज़रूर इस विषय में आवश्यक कार्रवाई करेंगे।


गाँव वाले फिर काँजी हाउस पहुँचे। अधिकारियों ने उनसे कहा–“ठीक है। आप लोग साँड को पकड़कर लाइए। हम उसे यहाँ बंद कर लेंगे।”


गाँव वाले काँजी हाउस के अधिकारी की बात सुनकर बहुत ख़ुश हुए और गाँव आकर उन्होंने साँड को पकड़ने की तैयारी शुरू कर दी।


गाँव के मज़बूत और फ़ुर्तीले नौजवान हर तरह से तैयार होकर साँड की प्रतीक्षा करने लगे। जल्द ही मौक़ा हाथ आ गया। साँड के गाँव में घुसते ही नौजवानों की टोली अपने हाथों में लाठी और रस्सी लेकर उसके पीछे दौड़ पड़ी। नौजवानों ने साँड को घेरने और उसे गिराकर पकड़ने में बड़ी होशियारी दिखाई। अनथक मेहनत की मगर वे कामयाब ना हो सके। साँड उनके घेरे से निकल भागा। इस कोशिश में बहुत से नौजवान घायल भी हो गए। मगर नौजवानों ने भी हिम्मत नहीं हारी। वे उसका पीछा करते रहे।


वह साँड सूरजपुर गाँव से निकलकर अपने गाँव यानी धामपुर की ओर भागा। नौजवान भी उसके पीछे दौड़े।


धामपुर वालों ने जब यह देखा कि कुछ लोग उनके साँड को दौड़ा रहे हैं और दौड़ाने वालों के हाथों में लाठियाँ और रस्सियाँ भी हैं तो वे अपने साँड को बचाने के लिए अपने घरों से लाठी, भाले और बंदूक़ें लिए बाहर निकल आए और पीछा करने वालों को ललकारते हुए चिल्लाए―


“ख़बरदार, वहीं रुक जाओ! आगे मत बढ़ो। अगर तुमने हमारे साँड को हाथ भी लगाया तो हम तुम्हारे हाथ तोड़ डालेंगे। तुम्हें गोलियों से भून देंगे। यहीं ज़मीन पर ढेर करके रख देंगे। जानते नहीं, यह साँड हमारे देवता पर चढ़ाया गया प्रसाद है।”


साँड का पीछा करने वाले सूरजपुर के नौजवानों ने जब धामपुर वालों की धमकी सुनी और उनके हाथों में लहराते हुए भालों, लाठियों और तनी हुई बंदूक़ो को देखा तो उनके पाँव थर्राकर थम गए और वे आगे बढ़ने के बजाय मुँह लटकाए हुए पीछे पलट आए।


इस घटना के बाद धामपुर वाले और शेर हो गए। और अब वे अपने साँड को आए दिन जानबूझकर सूरजपुर गाँव की ओर हाँकने लगे।


सूरजपुर गाँव की तबाहियाँ जब हद से ज़्यादा बढ़ गईं तो एक दिन बूढ़े ने गाँव के छोटे-बड़े सभी को बुलाकर कहा―


“मेरे गाँव के प्यारे लोगों! हमने हर तरह की कोशिश करके देख ली मगर साँड से अपने गाँव को ना बचा सके और यह भी अंदाज़ा हो गया कि अगर हम साँड को पकड़ने के लिए ज़्यादा कुछ करेंगे तो इसकी मदद के लिए धामपुर वाले उठ खड़े होंगे। नतीजे में भारी ख़ूनख़राबा होगा और तबाही मचेगी। इसलिए अब एक ही रास्ता बचता है कि हम लोग भी अपने देवता के नाम पर एक बछड़ा छोड़ दें और जल्द से जल्द उसे साँड बना दें।”


“इससे क्या होगा चाचा?” कई नौजवान एक साथ बोल पड़े। उनकी हैरान आँखें बूढ़े के चेहरे पर केंद्रित हो गईं।


“इससे यह होगा कि हमारा साँड भी धामपुर वालों का वही हाल करने लगेगा जो अपने साँड से वे हमारा करवाते हैं। उधर भी जब तबाही मचेगी तब उनकी आँखें खुलेंगी और वे अपने साँड को रोकने पर मजबूर होंगे।”


“आप ठीक कह रहे हैं चाचा। यह रास्ता ही उनके लिए ठीक है।” नौजवानों के चेहरे बदले की आग से दहक उठे। मगर कुछ बुज़ुर्गों के चेहरों पर गंभीरता तारी हो गई।


सूरजपुर वालों ने एक बछड़ा ख़रीदा उसे नहलाया-धुलाया। गले में हार पहनाया और सबके सामने उसकी पीठ पर देवता के नाम का एक ठप्पा लगाकर उसे आज़ाद छोड़ दिया।


कमज़ोर बछड़ा खूँटे से अलग होते ही आज़ादी और बेफ़िक्री की खाने-पीने और परवान चढ़ने लगा और सारे गाँव का चारा-पानी खा पीकर बहुत जल्द बछड़े से साँड बन गया।


साँड बनकर जब उसने ऐंडना और सींग मारना शुरू किया तो सूरजपुर वालों ने उसका रुख़ धामपुर वालों की ओर मोड़ दिया। धामपुर गाँव में घुसकर उसने गाँव को रौंदना और तहस-नहस करना शुरू कर दिया। वहाँ भी बैल लहूलुहान होने लगे। उनके चारा, पानी के बर्तन भी टूटने-फूटने लगे। उनके खेत और खलियान भी नष्ट होने लगे।


दोनों ओर से साँड एक-दूसरे की दिशा में हाँके जाने लगे। कुछ दिनों बाद एक रोज़ एक अनोखा दृश्योद्धघाटन हुआ। दोनों साँडों को लोगों ने एक साथ घूमते हुए देखा। दोनों ऐंडते हुए पहले सूरजपुर गाँव में घुसे और दोनों ने मिलकर गाँव को रौंद-रौंद कर मलियामेट किया। फिर वहाँ से एक साथ निकले और धामपुर में घुसकर तोड़-फोड़ मचाने लगे।


यह दृश्य देखकर दोनों गाँव वालों की आँखें हैरत में डूब गईं। 


उस दिन के बाद दोनों साँडों का एक साथ घूमना और मिल जुलकर गाँव को रौंदना दिनचर्या बन गई। दोनों गाँव के अलावा आस-पास के दूसरे गाँव भी इन साँडों की चपेट में आने लगे।


अपनी बर्बादी से तंग आकर आस-पास के सभी गाँव वाले मिल जुलकर साँडों को मारने की योजना बनाने लगे मगर किसी तरह ये सूचना वन्य जीव संरक्षण विभाग तक पहुँच गई और उसने उन साँडों की पीठ पर अपना ठप्पा लगा दिया जो इस बात का ऐलान था कि यह जानवर वन्य जीव संरक्षण विभाग की हिफ़ाज़त में हैं। उन्हें कोई भी मार-पीट नहीं सकता।


लोगों ने यह देखकर साँडों को मारने-पीटने के बजाय अपना-अपना सर पीट लिया।


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कथाकार, शायर, आलोचक और उर्दू के बहुआयामी साहित्यकार ग़ज़नफ़र का जन्म 9 मार्च 1953 को बिहार के गोपालगंज ज़िले के गाँव चौरांव में एक ग्रामीण परिवार में हुआ।  ग़ज़नफ़र समकालीन उर्दू कथा-साहित्य के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, रेखाचित्र, मसनवी, नाटक तथा भाषा-शिक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है।


उनके उपन्यासों में पानी, केंचली, कहानी अंकल, दिव्य वाणी, फ़ुसूँ, विष मंथन, मिम, शोराब और माँझी शामिल हैं। पानी (1989) को उर्दू के महत्वपूर्ण उपन्यासों में गिना जाता है जिसमें जल के एकाधिकार और मानवीय संघर्ष को प्रभावशाली प्रतीकात्मकता के साथ प्रस्तुत किया गया है। उनकी अन्य प्रमुख कृतियों में हैरत फ़रोश, पार्किंग एरिया, आँख में लुकनत, सुख़न ग़ुंचा, सुरख़ रू, रू-ए-ख़ुशरंग, फ़िक्शन से अलग तथा मशरिक़ी मेयार-ए-नक़्द शामिल हैं, जबकि 'देख ली दुनिया हमने' उनकी आत्मकथा है। वे Urdu Style Manual के संपादक रहे तथा जामिया से तदरीस नामा नामक एक विशिष्ट शैक्षिक पत्रिका भी प्रकाशित की।



आफ़ताब अहमद साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं। वे ‘मोहसिन’ (मोहसिनुल मुल्क हॉल, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिका) के संपादक और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित ‘अलीगढ़’ पत्रिका के संपादकीय मंडल के सदस्य रहे हैं। उन्होंने महादेवी वर्मा की लघु कहानी (संस्मरण) ‘गिल्लू’ का हिंदी से उर्दू में अनुवाद किया जो यूजीसी केयर द्वारा सूचीबद्ध पत्रिका ‘नया दौर’ में प्रकाशित हुई थी। उनके अनुवाद कार्यों में फ़िलिस्तीनी पत्रकार और लेखक अकरम हानिया, साथ ही भारतीय लेखकों जैसे प्रो. जी. श्रीनिवास राव और ग़ज़नफ़र की रचनाएँ भी शामिल हैं।



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