top of page

ग़ैरत (मिस्र की कहानी)

13 hours ago
33 min read

Updated: 1 hour ago



मूल कहानी : यूसुफ़ इदरीस
अँग्रेज़ी से अनुवाद : श्रीविलास सिंह 

                                                       

मुझे विश्वास है कि वे अब भी वहाँ प्रेम को ग़ैरत के रूप में संदर्भित करते हैं। वे संभवतः अभी भी इसके संबंध में ढँके-छिपे इशारे करते हुए, खुल कर बात करने में हिचकिचाते हैं, हालाँकि तब भी आप इसे उनकी आँखों की धुँधली दृष्टि में देख सकते हैं और तब भी जब लड़कियाँ लज्जा से सिंदूरी हो जाती हैं और शर्म से नीचे देखने लगती हैं। 

      

किसी अन्य फ़ार्म की ही भाँति, वह फ़ार्म बहुत बड़ा नहीं था। उसमें कुछ थोड़े मकान बने हुए थे जिनका पिछला हिस्सा बाहर की ओर खुलता था, दरवाज़े भीतरी अहाते में खुलते थे जहाँ वे अपनी शादियों का उत्सव मनाते अथवा मेमनों को लटकाते थे जब बीमार होने पर थोक में बेचने हेतु उन्हें मार दिया जाता था। उत्सव थोड़े थे और उनके संबंध में पहले से बताया जा सकता था। दिन का आरंभ सूर्योदय से पूर्व हो जाता था और अंत सूर्यास्त के पश्चात होता था। घर का सबसे प्रिय स्थान सामने का दरवाज़ा था जहाँ उत्तर की हवा बहती थी और जहाँ दोपहर में झपकी लेना और ‘सिगा’ खेलना आनंददायक होता था।


कुछ बहुत अधिक नहीं घटित हुआ था और जो कुछ घटित हुआ था, वह सब अपेक्षित था। आप इस बारे में निश्चित हो सकते थे कि चिबिड्डी खेलती सूखी सी लड़की का कुछ वर्षों में विवाह हो जाएगा, उसका रंग साफ़ हो जाएगा और उसकी कोणीय देह में कोमल वक्रीय रेखाएँ उभर जाएंगी, और वह अंततः उन चिथड़े ग़लबिया (एक लबादे जैसी पोशाक) पहने, बँधे हुए बंदरों की भाँति नहर में तैरने हेतु पुल पर से छलांग लगाते लड़कों में से किसी एक के संग ब्याह दी जाएगी।


कभी-कभी कुछ ऐसा घटित हो जाता था जिसकी न अपेक्षा होती थी न पूर्वानुमान। जैसे खेतों से आती हुई सुनी गई चीखें। उन्होंने अहाते की विशाल रिक्ति को चीर दिया था, किसी भयानक घटना की चेतावनी की भाँति। और यद्यपि पहले लोगों को पता नहीं चला कि आवाज़ कहाँ से आ रही थी लेकिन उन्होंने स्वयं को सहायता हेतु दौड़ते हुए पाया था, या कम से कम यह पता लगाने हेतु कि आख़िर हुआ क्या था। किंतु उस दिन वहाँ सहायता की आवश्यकता नहीं थी। जब महिलाओं ने पूछा कि क्या हुआ तो फ़ार्म को वापस लौटते व्यक्तियों ने उत्तर देने से बचने का प्रयत्न किया था। क्योंकि वे यह कहने का स्वयं में साहस नहीं जुटा सकते थे कि फ़ातमा ग़रीब के साथ मक्के के खेत में पकड़ी गई थी। वे दोनों फ़ार्म के निवासियों के लिए अजनबी नहीं थे। फ़ातमा, फ़राग़ की बहन थी और ग़रीब अबदून का बेटा और मामला सब के समक्ष स्पष्ट था।


यह एक छोटा सा फ़ार्म था जहाँ हर कोई हर एक को जानता था और निजी मामले निजी नहीं रह जाते थे। लोग यह भी जानते थे कि किसने पैसा जमा कर रखा था, ठीक-ठीक कितना, यह कहाँ रखा हुआ था और यदि किसी के मन में आए तो उसे कैसे चुराया जा सकता था। सिवाय इसके कि किसी ने कभी किसी दूसरे का पैसा चुराया नहीं था। यदि कभी वे कुछ चुराते भी थे तो खेत से थोड़ी बहुत फसल, कपास का एक गठ्ठर या कुछ भुट्टे की बालें। अथवा कभी-कभार वे धान के खेतों के पानी की निकास की नालियों में, जब रखवाला न देख रहा होता, घुस जाते थे और कारिंदे संग बाँटे बिना, जैसी की परंपरा थी, अकेले ही सारी मछलियाँ ले जाते। 


हर कोई फ़ातमा को जानता था, वह सब कुछ जो उसके बारे में जानने को था। ऐसा नहीं था कि वह बदनाम थी अथवा ऐसा वैसा कुछ था। मात्र यह बात थी कि वह सुंदर थी, अथवा यदि और अधिक सच्चाई से कहें तो फ़ार्म में सबसे सुंदर लड़की थी। लेकिन मुद्दा वह भी नहीं था, क्योंकि यदि देहातों में गोरी चमड़ी सुंदरता का पैमाना थी तो फ़ातमा साँवली थी। मुद्दा यह था कि कोई स्पष्ट नहीं कर सकता था कि उस लड़की में क्या था जो उसे अन्य लड़कियों से इतना अलग बनाता था। उसके गाल स्वस्थ और लाल थे, यह आभास देते हुए मानों वह नाश्ते के लिए शहद और दोपहर के भोजन में चिकन और फ़ाख्ता लिया करती हो, जबकि उसका नित्य का भोजन सादा दही, चीज़, मिर्च का अचार, प्याज़ और कुछ सूखा तला हुआ था। उसकी आँखें काली और मनकों जैसी चमकीली थी, निरंतर जीवंत, एक भेदक दृष्टि लिए हुए जो उससे देर तक आँखें मिलाए रखने को कठिन बना देती थी। यह कहना कि उसके बाल कोमल और काले थे और उसका काला लहराता गाउन उसके उत्तेजक उभारों को नहीं छिपा पाता था, उसके साथ न्याय नहीं होगा। यह उसका रूप नहीं था जो उसे वह बनाता था जो वह थी बल्कि यह उसका उत्कट स्त्रीत्व था, एक उमड़ती, धड़कती, चकनाचूर करती शक्ति जिसका कोई  निश्चित स्रोत ढूँढ पाना मुश्किल था। जिस तरीक़े से वह मुस्कराती थी, जिस तरीक़े से वह अपने पीछे देखने को अपना सिर मोड़ती थी, जिस प्रकार वह किसी से अपना घड़ा उठाने में मदद करने को कहती थी, उसकी हर बात उत्तेजक होती थी। जिस प्रकार वह अपने धानी रंग के रूमाल से अपने बालों को तिरछे बाँधती थी ताकि उसके रेशमी काले बाल दिखते रहें, उसमें एक जादू होता था। जब वह मुस्कराती थी तो उसके गालों में पड़ने वाले गड्ढों में एक जादू होता था, और उसकी खिलखिलाती हँसी में भी; उसकी मद्धम, तरल आवाज में, जिसे वह शुद्धतम स्त्री आकर्षण की बूँदों में संघनित और आसवित करना जानती थी, जिसकी एक-एक बूँद दर्जनों पुरुषों की लालसा को तृप्त कर सकती थी। 


फ़ातमा, पुरुषों को अवश कर देती थी, मानो‌ वह इसी के लिए बनी हो। वह छोटे बच्चों तक में छिपे पुंसत्व को जगा देती थी। जब वे उसे आता हुआ देखते, वे स्वयं को निर्वस्त्र करने की एक आकस्मिक और तीव्र इच्छा महसूस करते। और वे अक्सर अपने ग़लबिया को घुटनों से काफ़ी ऊपर तक उठा कर ऐसा करते भी, कितनी भी चीख-चिल्लाहट या डाँट उन्हें ऐसा करने से न रोक पाती, क्योंकि वे स्वयं भी स्वयं को उसके सम्मुख यों नग्न होने की प्रबल इच्छा के सम्बंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाते थे। 


इसी कारण वह फ़राग़, अपने भाई के लिए चिंता का कारण थी जो एक ग़रीब फ़ेलाह (किसान) था जिसके पास अपनी गाय के अतिरिक कुछ न था। कारिंदा उसे तीन फ़ेदान (ज़मीन की माप, लगभग एक एकड़) से अधिक ज़मीन पर खेती नहीं करने देता था। उसका हर साल अपनी जोत को आधे फ़ेदान बढ़ा देने का प्रयत्न निरंतर असफलता में ख़त्म होता। जो भी हो वह एक दीर्घकाय पुरुष था। एक बार के भोजन में वह ढेरों रोटियाँ खा जाता था, यदि उसके पास होतीं तब, और वाटर कूलर का सारा पानी एक ही सांस में ख़त्म कर देता था। उसके पाँव की पिंडली किसी की जाँघ की भाँति थी। किंतु उसका जीवन उसकी बहन के कारण एक अज़ाब बन गया था। वह फ़राग़ और उसकी पत्नी के साथ रहती थी, ज़िसकी नाक चपटी और चेहरा पीला था और जो कुल मिला कर अच्छी थी, सिवाय तब जब वह फ़राग़ का ध्यान उसकी बहन के वक्षों की ओर दिलाती, इस बात पर ज़ोर देते हुए कि फ़ातमा चलते समय उन्हें जान-बूझकर उछालती थी। और उस काजल की ओर जिससे वह अपनी आँखें खुले दिल से सजाती तथा च्युइंग-गम, जो वह हमेशा अपने लिए बाज़ार जाते लोगों से मँगवाया करती थी। फ़राग़ को इन सब बातों को याद दिलाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। वह स्वयं सब कुछ देख सकता था और इस बात से उसका खून उबलने लगता था। फिर भी उसके पास फ़ातमा को रोकने का कोई वास्तविक कारण नहीं था। वह अन्य लड़कियों से कुछ अलग नहीं थी। वे सभी एक जैसे कपड़े पहनती थीं, वे सभी आँखों में काजल लगाती थीं, और वे सभी च्युइंग-गम चबाती थीं। वह कभी संदेहास्पद स्थिति में नहीं पकड़ी गई थी, और उसका व्यवहार निंदा से परे था। तब भी जब उसकी पत्नी ने उस पर अपने गालों को तंबाकू के कार्टनों को लपेटने वाले कागज से रंगने का दोष लगाया था, उसने अपनी पगड़ी खोली थी और उसके एक कोने को अपने थूक से गीला करके उसके गालों को तब तक रगड़ता रहा जब तक कि खून निकलते-निकलते न रह गया लेकिन कोई रंग नहीं मिला। वह उसे मात्र ग़ुस्से से घूर कर और कस कर डाँट लगा कर संतुष्ट हो गया, जब कि फ़ातमा अपने साथ इस तरह का व्यवहार किए जाने का कोई कारण न समझ सकी। फ़राग़ द्वारा चेतावनी और धमकी के बाद वह ग़ैरत का मतलब अच्छे से समझ गई थी। वह इसकी दोषी नहीं थी, न तो यह बात कभी उसके मस्तिष्क में ही आयी थी। निश्चय ही इसकी बजाय वह मर जाना पसंद करती।


चूँकि वह जानती थी कि लोग उससे प्यार करते थे, इस लाड़-दुलार ने उसे बिगाड़ दिया था, वह किसी ऐसे व्यक्ति की भाँति व्यवहार करती थी जिसे लोगों का स्नेहभाजन होने की आदत हो। उसका व्यवहार स्वाभाविक था और उसकी प्रतिक्रियाएँ उसके हृदय से आती थीं। वह जानती थी कि यह उसका रूप-सौंदर्य था जो लोगों को उसकी ओर आकर्षित करता था, अतः वह इसका ध्यान रखती थी, कभी भी बिना नहाए अथवा बिना बाल सँवारे बाहर नहीं जाती थी। जब वह खेतों में काम करती थी तो इस बात का ध्यान रखती थी कि उसके दस्ताने, जो उसने ओम जॉर्ज से उधार ले रखे थे, खिसक जाने के कारण उसके हाथों में खरोंच न आए। वह सदैव उसकी किसी अभद्र भाषा अथवा कर्कश बातों से कोई अपमानित न हो जाए, इस बात के प्रति सावधान रहती थी। हर कोई उसे प्यार करता था; हर कोई उसका मित्र था और वह भी बदले में उन सब को प्यार करती थी। इस कारण वह यह नहीं समझ सकी कि उसका भाई उसके प्रति इतना कठोर क्यों था, अथवा वह उसकी ओर विषाक्त नज़रों से क्यों देखता था।


न ही फ़राग़ स्वयं समझता था। वह बस इतना जानता था कि वह अपनी बहन के प्रति उत्तरदाई था और उसके उमड़े पड़ रहे स्त्रीत्व के प्रति भी। उसकी ओर उठती हर ललचायी निगाह उसे अपनी देह में धँसती सी प्रतीत होती थी। वह उसका ब्याह कर के, यदि सम्भव हो तो किसी और क़स्बे में, अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त होने की और प्रतीक्षा नहीं कर सकता था। किंतु इस संदर्भ में फ़ातमा का प्रदर्शन अच्छा नहीं था, उसका हाथ माँगने वाले कम थे, अथवा बिलकुल नहीं थे। क्योंकि कौन ऐसा बेवक़ूफ़ था जो उन ललचायी नज़रों के ढेर तले दबना चाहता? और एक बार विवाह हो जाने के पश्चात वह उसका क्या करता? उन इलाक़ों के लोग सौंदर्य का आनंद लेने और उसकी रक्षा हेतु दीवारें खड़ी करने के लिए विवाह नहीं करते थे क्योंकि पहले तो यह कि वे आनंद के लिए नहीं जीते थे। वे बस जीवित रहने भर से पर्याप्त खुश थे। वे जब विवाह करते थे तो मात्र इसलिए कि एक जोड़ी हाथ और उपलब्ध हो जाते, श्रमशक्ति बढ़ जाती और संतान उत्पन्न होने की संभावना हो जाती। इस कारण फ़ातमा के लिए कोई इच्छुक वर उपलब्ध नहीं था। 


ऐसा नहीं था कि फ़ार्म पर पुरुषों या लड़कों की कमी थी, और फ़ातमा भी अन्य लड़कियों की भाँति कड़ी मेहनत करती थी। भोर में ही खेतों में जाती और सूर्यास्त होने पर नमाज़ की अजान के समय लौटती थी। किंतु अन्य लड़कियों के विपरीत वह जहाँ जाती वहीं मुसीबत खड़ी हो जाती थी। इसी कारण फ़राग़ निरंतर भय में जीता था जिसे वह अपने बड़बोलेपन में छिपाए रहता था। फ़ार्म का अधिकांश मस्ती का वातावरण उसी के कारण बना होता था जब वह इधर-उधर बेवक़ूफ़ियाँ करता घूमता और लोगों की फर्ज़ी भद्रता का मज़ाक़ उड़ाता था। वह लड़कों को तैराकी के मुक़ाबले में चुनौती देता था और औरतों के सिर से बोझ गिरा देता था, सबसे शर्मीले लोग भी उसकी शरारतों से बच न पाते थे। शादियों में वह अपना सफ़ेद ग़लबिए और रेशमी पगड़ी पहनता और अपने छोटे बालों को सँवार लेता; अपनी दाढ़ी साफ़ कर लेता और दूल्हे के लिए नृत्य करता था। वह दुल्हन को रुपये-पैसे का उपहार देता और निकाह कराने वाले और चरवाहों को तथा आसपास जो भी उपस्थित होता, उन्हें भी न भूलता था। यह सब वह भंडारागार से चुराई हुई कपास अथवा किसी ट्रक से झटक लिए गए कपास के बंडलों के पैसों से करता था।


वह दिल खोल कर ख़र्च करता और अपनी शाहख़र्ची से फ़ार्म को भर देता था। वह हर तरफ़ लोकप्रिय था। चूँकि उसकी बहन का असहनीय आकर्षण पत्थर में भी हलचल मचा देता था और हालाँकि पुरुष उस आकर्षण के आवेग से पीड़ित उसकी कामना की आग में जलते होते थे पर फ़राग़ उन सब का मित्र था। इसके विपरीत वे जब फ़ातमा से मिलते, दूसरी ओर देखने लगते, और यदि उनमें से कोई एक आह भी भर लेता दूसरा कोई उसे सावधान करने को वहाँ उपस्थित रहता।


और इसलिए फ़ातमा एक सुस्वादु फल की भाँति थी, पका हुआ लेकिन अखाद्य। कोई उसके पास न आता, न ही किसी अन्य को आने देता, जबकि उनके हृदयों में चुभन होती रहती थी। युवा और वृद्ध सब को उसकी लालसा थी। किंतु फ़राग़ सदैव वहाँ उपस्थित होता था। उसकी उद्दण्ड हँसी उन्हें उसकी उपस्थिति की याद दिलाती और उन्हें शर्म करने हेतु सावधान करती थी। वे अपने होशो-हवास में लौट आते और अपराह्न की नमाज़ हेतु अथवा नुक्कड़ की दुकान पर एक प्याली चाय हेतु चल पड़ते थे। 


और आज वह मक्के के खेत में पकड़ी गई थी।


यह पहली बार नहीं था। वह हमेशा किसी न किसी के साथ पकड़ी जाती रहती थी। कभी मक्के के खेत में, कभी घुड़साल के पीछे, कभी थ्रेशर के नीचे। सदैव ही उनकी कल्पना द्वारा। अफ़वाहें जो बिला नागा झूठी पाई जाती थीं। क्योंकि जहाँ भी वह जाती वहाँ अफ़वाहों का होना लाज़मी था, वैसे ही जैसे उसके आते ही आहों का उठना अनिवार्य था।


लोगों में कोई दुर्भावना नहीं थी। वे सब अच्छे और दयालु लोग थे जो दूसरों के लिए भी वही कामना करते थे जो स्वयं अपने लिए। उसका विचित्र चुंबकत्व ही वह कारण था जिससे लोग उसके लिए डरते थे। वे डरते थे कि वह फिसल सकती थी, क्योंकि वे विश्वास नहीं कर सकते थे कि उस जैसी कमनीय स्त्री बहुत समय तक अपनी ग़ैरत बचा पाएगी। उनका यह विश्वास उन्हें ऐसे योग्य पुरुषों का चयन करने को भी उकसाता था जिनके संग उसके अपनी ग़ैरत त्याग सकने की संभावना थी, और ऐसा पुरुष ‘ग़रीब’ था।


ग़रीब अबदून का बेटा था। उसकी उम्र के बावजूद कोई अबदून को ‘चाचा’ नहीं कहता था। वह जल्दी से ग़ुस्सा हो जाने वाला, तंबाकू चबाने का आदी और बिना शक्कर के कॉफ़ी पीने वाला बुड्ढा था। वह छोटी से छोटी बात पर लड़ पड़ता था। मौलवी तक उसके रास्ते से बच कर चलने की सावधानी बरतता था। उसने कभी भी किसी के लिए एक भी अच्छा शब्द नहीं कहा होगा। उसकी क़सम खाने की क्षमता अपने बेहतरीन रूप में तब सामने आती थी जब फ़ार्म पर कोई आपदा आती थी। तब वह नहर के किनारे, किसी अशुभ पक्षी की भाँति, अपना स्थान ग्रहण कर लेता,  अपना ग़ालाबिये किनारों से पकड़ ऊपर उठा लेता, चबाई हुई तंबाकू थूकते हुए शाप देता, क़सम देता और किसानों-मज़दूरों को गालियाँ देता मानो उस दुर्भाग्य के लिए वे ही उत्तरदाई हों। लेकिन कोई उसकी ओर अधिक ध्यान नहीं देता था क्योंकि वे सब जानते थे कि उससे कोई हानि नहीं होनी थी। 


जहाँ तक ग़रीब की बात थी, हर कोई उस पर अविश्वास करता था। वह थोड़ा अभद्र और अक्खड़ था और उसने माथे पर लटें बढ़ा रखी थी, जिनका प्रदर्शन करना उसे पसंद था, मुलायम और चमकीली लटें जो सफ़ेद ऊनी टोपी में से बाहर झाँकती रहती। सोने में सुहागा कि उसकी निगाह महिलाओं पर रहती थी और वह उन्हें आकर्षित करने की कोशिश करने से पूर्व कुछ भी आगा-पीछा नहीं सोचता था—यही कारण था कि लोग उससे दूर रहते थे—बिना इस बात पर विशेष ध्यान दिए कि वह किसकी पत्नी थी।


अपने पिता की अनाकर्षक शक्ल-सूरत के बावजूद, ग़रीब एक सुदर्शन युवक था, और मौसम की सारी मार के बावजूद उसका रंग उतना गहरा नहीं था। वह कम बोलता था लेकिन उसकी बातें आकर्षित करती थी, संभवतः इसलिए कि उसका अंदाज़ बहुत बेपरवाह होता था, और आवाज किशोरावस्था की कर्कशता लिए हुए थी। किसी तरह वह खेतिहर मज़दूर लड़कों की बेवक़ूफ़ों जैसी शक्ल से अलग था, उसके कपड़े हमेशा साफ़-सुथरे रहते थे तथा वह तेज और हाज़िर-जवाब था और संभवतः इसी बात ने उसे थोड़ा दंभी बना दिया था। वह अथक मेहनत करता था, फ़ुरसत में लेट कर गाने गाता था, अपने लिए चाय बनाने की चीज़ें साथ रखता था जिसका हमेशा अपने दोस्तों पर रोब डाला करता था। जब रात गहराती थी, वह अपने घर की तंग क़ैद सहन न कर पाता था, और पुआल का आराम ढूँढने को खलिहान में बाहर निकल जाता था। वहाँ वह गर्व से बैठ अपनी जाँघों और वक्ष को महसूस किया करता और अपने मित्रों से अपनी आशिक़ी के प्रसंगों की डींगें मारता―एक ऐसा क्षेत्र जिसमें वह बहुत कुशल था और वे सब निराशाजनक रूप से अनुभवहीन।


उसकी इश्क़बाज़ियाँ बेशर्म थीं और ढँकी-छुपी नहीं थी। वह अपनी आँखों में व्यंग्य का सा भाव लिए जीभ चटकाते हुए  महिलाओं को टाँगों से ले कर ऊपर तक बेझिझक घूरा करता था। उसे इसकी परवाह नहीं थी कि वे उसके घूरने से असहज महसूस करती थीं। जब वह किसी को इस तरह देखता था तो महिला जानती थी कि उसके विचार बहुत पवित्र नहीं थे। और यदि उसके विचारों में ग़ैरत की बात होती भी, जो कि अक्सर होती थी, तो उसे पता चल जाता कि वह आँखों से उसे नग्न कर रहा था और वह स्वयं को ढँकने हेतु इतनी अधिक विभ्रमित हो जाती कि उसकी सारी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो जाती और फिर उसके समक्ष हथियार डालने के अतिरिक्त कोई विकल्प न रहता। जैसे-जैसे उसके शिकारों की गिनती बढ़ती जा रही थी, उसकी सनक भी बढ़ रही थी और उसकी आँखों की चमक और ढीठ होती जा रही थी।


लड़के में कुछ था जो उसे अन्य पुरुषों से अलग करता था। संभवतः यह उसका गहन पुरुषत्व था। उसकी गर्दन के पिछले हिस्से की एक झलक मात्र या उसके अंतर्वस्त्र की डोरी का दिखना भर  किसी स्त्री के अंगों के पिघलने को पर्याप्त था। वह अपने तौर-तरीक़ों की अधिक चिंता नहीं करता था। वे सभी उपाय जो उसे किसी स्त्री के क़रीब ले जाते, उसके लिए उचित थे। शादियों के दौरान वह उनके मध्य घुस जाता और उन्हें जहाँ वे खड़ी रहती, वहीं जड़ कर देता। रहट पर वह उनकी बाल्टियाँ उठाने में ख़ुशी महसूस करता अथवा उनके लिए चक्की के पहिए घुमाता। वह किसी को भी नहीं बख़्शता था और यदि फ़ार्म के कारिंदे की राइफ़ल का भय न होता तो वह किसी रात ओम जार्ज के कमरे में भी घुस जाता। जब लोग अबदून से ग़रीब की शिकायत करते तो अबदून उन पर भड़क उठता और उसका चेहरा ग़ुस्से से सिकुड़ जाता। “वह उधर है,” वह कहता, “जो मर्ज़ी हो उसके साथ करो। मुझसे कोई मतलब नहीं है।”


लेकिन ऐसा कुछ नहीं था जो कोई कर पाता। क्योंकि यद्यपि ग़रीब क़द का छोटा था लेकिन उसमें सांड जैसी शक्ति थी। आँखों में वही व्यंग्यात्मक चमक लिए हुए, वह अपने एक हाथ से लोहे का पनचक्की का भारी पहिया उठा सकता था और दूसरे से किसी आदमी की गर्दन तोड़ सकता था।


सभी पुरुषों के मुक़ाबले उसमें सबसे अधिक पुरुषत्व था और सभी स्त्रियों में फ़ातमा सबसे अधिक आकर्षक थी। ऐसे में यह स्वाभाविक था कि गप्पों-अफ़वाहों में उनका जोड़ा बनाया जाता। फिर भी वे दोनों एकदम अलग थे। फ़ातमा उसकी कुख्याति के कारण उससे दूर रहती थी, जबकि वह कहीं भीतर उससे डरता था। यद्यपि वह कारिंदे की नौकरानी तक को कुशलता से वश में कर सकता था या फिर कई बच्चों वाली विधवा शाइफ़ा को भी, लेकिन फ़ातमा की बात अलग मामला थी क्योंकि फ़ातमा एक अलग ही प्राणी थी।


कभी-कभी वह पुआल पर लेटा लड़कों से डींग हाँकना पसंद करता था कि वह उससे प्रेम करती थी और उसे संदेशे भेजा करती थी। किंतु अपनी बेसिर-पैर की डींगों पर सबसे पहले वह स्वयं ही अविश्वास करता था। वह खेतों में हर कहीं अपने अदम्य आकर्षण से स्त्रियों के पैर उखाड़ता हुआ किसी अरबी घोड़े की भाँति काम किया करता था लेकिन फ़ातमा के समक्ष वह शक्तिहीन सा हो जाता। दूसरी ओर, वह उससे डरती थी, इसलिए कभी यदि वह उसे अभिवादन कर देता, ऐसा करने में उसका हृदय ज़ोर से धड़कने लगता, तो उसका उत्तर संक्षिप्त और डरा सा होता। वह उससे डरती थी क्योंकि वह ग़ैरत से डरती थी जबकि वह उसके समक्ष असफल हो जाने से डरता था। सारे समय उनका नाम एक-दूसरे से जोड़ा जाना जारी रहा और फ़राग़ ने ग़रीब के संग अपने संबंध को, अपने संशयों को, अपने अच्छे व्यवहार के पीछे छिपाना भी जारी रखा जबकि वह उसके तमाम डरों का सबसे बड़ा कारण था। यह सब ढँके-छिपे चलता रहा। सतह पर वे सभी भाईचारे के साथ रहते खुश थे, फ़ार्म छोटा था और अबदून का घर फ़राग़ के घर के दाहिनी ओर मात्र तीन मकान छोड़ कर था और बतखों के गुम होने की भी कोई घटना नहीं घटी थी।


इस दौरान वे सभी किसी बात की प्रत्याशा की कगार पर खड़े जी रहे थे। कुछ न कुछ तो घटित होना ही था, जैसे कि रात के मध्य में गोली चलने की आवाज़ पर अथवा खेत में से उसके ग़रीब के साथ पकड़े जाने की पुकार सुन कर जाग उठना।  


और बहुत समय नहीं बीता था जब यह घटित हो गया। 


इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। वे इस घटना को कुछ इस तरह अवश्यंभावी मान बैठे जैसे इसे कभी न कभी घटित होने की अपेक्षा थी ही थी। यहाँ तक कि बच्चे भी—अपनी निजी दुनिया में जहाँ वे अपनी गप्पें सृजित करते थे और बड़े लोगों के प्रति अपनी धारणा बनाते थे—उन्हें भी भान हो गया कि अंततः फ़ातमा ने वह निषिद्ध काम कर ही डाला जिसके घटित होने के विरुद्ध चेतावनी उनके अभिभावकों ने दी थी। फ़ातमा ने ग़ैरत गँवा दी।


तो जब उन्होंने फ़राग़ को पहली बार बिना पगड़ी के, नंगे सिर और सदरी के बटन खोले, पजामे में कीचड़ पोते हुए खेत से जाते हुए देखा, और जब उन्होंने उसका राख सा बदरंग चेहरा, कंपकंपाती मूँछें और रक्त जैसी लाल आँखे देखी, वे सब अस्तबल की दीवार से लग कर खड़े हो गए जैसे प्राकृतिक रूप से उन्होंने जो कुछ फ़राग़ के साथ घटित हुआ था, उसकी गंभीरता को महसूस कर लिया हो। उन्होंने चुपके से फ़ार्म के मुख्य द्वार से जाते हुए फ़राग़ का अनुगमन किया जब तक वह अपने घर न पहुँच गया। उन्होंने उसे अपने बच्चे पर, जो पुराने जंग खाए डिब्बे को बजा रहा था, चिल्लाते हुए देखा। उन्होंने उसे धीमी किंतु कर्कश आवाज में अपनी पत्नी से हुक्का लाने को कहते हुए सुना और फिर उसे उसका गहरा कश लेते और चिलम की आग में से हो कर निकलते गहरे बादल जैसे धुएँ को देखते खड़े रहे।


जब लोगों ने भीतर जाना शुरू कर दिया, बाक़ी भी भयमुक्त हो उनके पीछे सरकने लगे। किंतु सब जो कुछ घटित हो रहा था, वे उसे संशय से देखते दरवाज़े के पास ही सावधानी से खड़े थे। ऐसा नहीं था कि कुछ भयोत्पादक हो रहा था। बदरंग और मौन, फ़राग़ चुपचाप, बीच-बीच में तंबाकू की आपूर्ति जाँचता हुआ, कश लगा रहा था, जब कि लोग उसके चारों ओर बैठे थे, चौकन्ने और लज्जित। जब उनमें से कोई कुछ कहने को मजबूर होता, ताकि चोट का असर कुछ कम हो, असहजता से हिलता, फ़राग़ उसे देखता और शांति से उसे हुक्के का कश लगाने हेतु कहता ताकि वह चुप रह सके। वह बात जिससे वह लंबे समय से डरता रहा था, अंततः घटित हो गई थी और अब वह अथवा कोई अन्य ऐसा कुछ नहीं कह सकता था जिससे यह स्थिति बदल सके। 


उसे याद आया कि कैसे जब वह फटे हुए काले गाउन के नीचे गतिशील अपनी बहन की देह को अथवा छेद से झाँकते उसके अंगों को देखता; कैसे जब वह उसे हँसते, बोलते अथवा खाना भी खाते हुए देखता तो उसके सिर में रक्त का प्रवाह तीव्र हो जाता और वह उसे गर्म सलाख़ों जैसी नज़रों से देखने लगता, या फिर ज़ोर से हँसने लगता जिसकी आड़ में वह आने वाली आपदा के आसन्न भय को छिप जाने की उम्मीद करता। उसने कई बार स्वयं से पूछा था कि यदि वह घटित हुआ―अल्लाह न करें―तो वह क्या करेगा। इस विचार मात्र से उसके रोंगटे खड़े हो जाते और वह फ़ातमा को देखता और आशा करता कि काश वह उसे इस धरती के पटल से मिटा पाता। और अब जब कि वह घटित हो चुका था, यह उसका कर्तव्य था कि वह एक मर्द और एक भाई जैसा बर्ताव करे। यह उसका कर्तव्य था कि वह उसे जान से मार डाले और ग़रीब को भी मार डाले―उस बहन को मार डाले जिसे उसने एक नन्ही बच्ची के रूप में अपनी बाहों में उठा कर नहर किनारे तक घुमाया था, और जिसे उसकी मरती हुई माँ उसकी अभिरक्षा में छोड़ गई थी। ग़रीब को मार डालना उसका कर्तव्य था, उस बेकार कुत्ते को जिसे उसने हमेशा शरण दी थी और खिलाया-पिलाया था, सदैव धोखा खाने के संदेह के बावजूद।


जो कुछ हुआ था, उसका बदला खून से ही चुकाया जा सकता था। किंतु इसके पूर्व कि वह स्वयं को उनके खून का दोषी बनाये, उनका दोष सिद्ध होना चाहिए। वह अपने लिए, अपनी पत्नी के लिए और अपने बच्चों के लिए बर्बादी लाने की सोच रहा था किंतु यह सब व्यर्थ नहीं होना चाहिए। उसे हुक्का पीने दो और प्रतीक्षा करने दो इसके पूर्व कि वह अपना छुरा उठाये। निर्णय खून जमाने वाला, निर्दय और अपरिवर्तनीय था। क्योंकि फ़राग़ खेतिहर मज़दूर था और खेतिहर मज़दूर गाँव वालों द्वारा नैतिकता के मामलों में लापरवाह ठहराए जाते थे। वह उन्हें दिखा देना चाहता था कि खेतिहर मज़दूरों की नैतिक संहिता भी उन्हीं जैसी श्रेष्ठ थी और वे ग़ैरत के मामले में समझौता नहीं करते थे।


****


असंख्य हाथों और सिरों का एक काला हुजूम दूर से धूल के बादल में गतिमान आता हुआ दिखाई पड़ा। वे अपने आगे-आगे फ़ातमा, जिसका रंग किसी चादर की भाँति सफ़ेद था और जिसके गालों का रंग उड़ा हुआ था, को धकेलती, सख़्ती से मार्च करती हुई औरतें थी। अब उसके चेहरे में सौंदर्य का एक भी चिह्न‌ शेष नहीं था और उसका चेहरा मृत्यु के मुखौटे जैसा हो रहा था। 


ज्यों-ज्यों वे पास आ रही थी, तीखी आवाज़ में तर्क-वितर्क करती शोर कर रही थीं। कुछ ने कहा उसे फ़ार्म के प्रबंधक के पास ले जाना चाहिए जबकि दूसरों ने ज़ोर दिया कि उसका स्थान उसके भाई के घर में है और उसे वहाँ ले जाना अधिक उचित था। काफ़ी झें-झें के पश्चात उसे फ़ार्म के कोने में स्थित प्रबंधक के घर में ले जाया गया जबकि बच्चे दरवाज़े पर ही रुक गये और प्रतीक्षा करने लगे।


जहाँ तक ग़रीब की बात थी, वह अंतिम बार खेतों की तरफ़ जाता हुआ देखा गया था। उन्होंने कहा, वह भाग गया था, संभवतः कभी न वापस आने के लिए।


एकाएक सब कुछ विभ्रमित हो गया था, विचार अस्पष्ट हो गए थे, दृष्टि बाधित हो गई थी और कोई स्पष्ट राह नज़र नहीं आ रही थी। पुरुष ख़ामोश थे जबकि औरतें ग़रीब को कोस रही थी और अल्लाह से प्रार्थना कर रहीं थी कि उसे मारक प्लेग हो जाये। लेकिन औरतों की तेज चिल्लाहट भी फ़ार्म पर धीरे-धीरे पसरती जा रही निराशा को दूर कर पाने में असमर्थ थी यहाँ तक कि कुत्ते भी अपने-अपने कोनों में डर से सिमट गये थे। 


प्रबंधक के घर पर घेरा फ़ातमा के इर्द-गिर्द कसता जा रहा था। उस पर प्रश्नों की बौछार हो रही थी किंतु उसके जवाब देने से पहले ही कोई उस पर विश्वास करने को तैयार नहीं था। उसने बताया कि वह उस दिन फ़राग़ का नाश्ता ले कर खेतों में जा रही थी और बस नहर पार कर ही रही थी कि ग़रीब पता नहीं कहाँ से प्रगट हुआ था और उसने उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी ओर खींचने की कोशिश की थी। उसने उसका विरोध किया था और मदद के लिए गुहार लगाई थी। इस बिंदु पर उसने अपनी कहानी रोक दी। लेकिन औरतों ने उसे और आगे बताने हेतु मजबूर कर दिया। कुछ लोग उसके बचाव हेतु आगे आये, वह आगे कहती रही, कि उसके बाद ग़रीब पता नहीं कहाँ ग़ायब हो गया था। लेकिन उन्होंने उसका विश्वास नहीं किया। इससे अधिक भी ज़रूर कुछ था। नहीं, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं हुआ था, फ़ातमा ने ज़ोर दे कर कहा। यह सच नहीं था, उन्होंने अपने सिर हिलाए और सब ने अपने हिसाब से ग़रीब द्वारा फ़ातमा का हाथ पकड़ने की घटना की व्याख्या की, जो भी रंग उनकी कल्पना में आ सकते थे, उन्हें मिला कर प्रस्तुत किया। वे सब वास्तव में ठीक-ठीक क्या हुआ था,  यह जानने के बुखार से ग्रस्त थीं और ज्यों-ज्यों फ़ातमा ने और कुछ कहने से इनकार किया, यह बुखार और अधिक आक्रामक और आग्रही होता गया। यहाँ तक कि जो लोग फ़राग़ को घेरे बैठे थे, फ़ातमा और उसके घेरे से दूर, उन्हें भी लगता था इसी बुखार ने पकड़ लिया था पर वे अधिक नियंत्रित लग रहे थे।


“इंतज़ार करो और देखो,” किसी ने रहम से कहा, “शायद सच में कुछ नहीं हुआ था।”


कोई उस इच्छा को और दबाने में स्वयं को सक्षम नहीं पा रहा था। अब जबकि यह घटित हो चुका था, कोई अचंभित नहीं था। क्योंकि यह कल्पना करना कठिन नहीं था कि फ़ातमा के साथ अकेले किसी पुरुष के होने का क्या परिणाम हुआ होगा, और वह भी तब जब वह पुरुष ग़रीब जैसा कोई हो। कौन विश्वास करने वाला था कि उसने प्रतिरोध किया होगा? यदि वह वास्तव में उसके साथ अकेली थी तो सब कुछ ख़त्म हो गया था। महत्वपूर्ण बात अब यह थी कि क्या वास्तव में सब कुछ ख़त्म हो गया था। यहाँ तक कि फ़राग़ भी, जिसने लोगों के गुप्त विचारों का अनुमान लगा लिया था, सच जानना चाहता था, अपने लिए नहीं बल्कि इसलिए कि यह सुनिश्चित कर सके कि फ़ातमा अब उसकी बहन नहीं थी और वह जैसा उचित समझे उसको वैसा दंड देने को स्वतंत्र था। 


जब ऐसे मामलों की बात होती थी तो महिलाएँ आश्चर्यजनक रूप से पुरुषों के मुक़ाबले अधिक निडर हो जाती थी। वे जल्दी ही वह बात फुसफुसाने लगी, पहले आपस में फिर फ़राग़ की पत्नी से—जो रोते हुए और फ़ातमा पर चिल्लाते हुए वहाँ पहुँची थी—और फिर फ़ातमा की चाची से। जब उन्होंने यह बात स्वयं फ़ातमा से कही, उसका का चेहरा स्याह पड़ गया, ग़ुस्से से उसके नथुने फड़कने लगे, कुछ आँसू उसकी आँखों से गिर पड़े, उससे भी कम जितने बूँद रस किसी हरे नींबू को निचोड़ने से निकलता है। वह उन पर चिल्लाई कि वह उन्हें ऐसा कुछ नहीं करने देने वाली। उसने पवित्र क़ुरान की क़सम खायी कि उसे छुआ भी नहीं गया था। ‘तुम्हें यदि परीक्षण से डर लग रहा है, तो निश्चय ही कुछ हुआ था,’ उन सब ने कहा। अकस्मात वह लाल पड़ गई, कुछ भी कह पाने में अक्षम। वह जो एक समय स्वयं में विश्वास करती थी, और जिसे दूसरे कहते थे कि वह नहीं जानती थी कि शरमाना क्या होता था। 


यदि ऐसी कोई बात गाँव में हुई होती, तो सभी लोग उसे अपनी गलती की भाँति छुपाने को एक हो गए होते। किंतु फ़ार्म पर जहाँ कोई बात नहीं छिपती, इसका क्या फ़ायदा था? हर कोई, बूढ़ा और जवान, जानने को मरा जा रहा था कि क्या फ़ातमा के साथ वैसा कुछ हुआ था जिसकी उन्होंने भविष्यवाणी की थी। 


उस भय से, जिसका वह सामना करने वाली थी, वह बेहोश हो गई। उन सब ने उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे और उसे होश में लाने के लिए उसकी नाक में प्याज़ सुँघाया। यह सोच कर उसका सिर घूम गया कि उस पर सबसे घृणित अपराध का आरोप लगाया जा रहा था, कि वह पूरी तरह इन लोगों की दया पर थी, उनकी क्रूर जिज्ञासा के समक्ष असहाय, अपने ख़ुद के भाई, रिश्तेदारों और उन सब, जो उसे प्यार किया करते थे और जिन्हें वह प्यार करती थी, के देखने और सुनने की सीमा के भीतर। उसने ऊपर स्त्रियों के घेरे की ओर देखा और दया की गुहार लगाई। वे बस शोकग्रस्त आँखों से देखती रहीं जिनसे सारे संदेश मिट चुके थे। “ठीक है,” उसने पत्थर जैसे चेहरे से कहा, “मैं तैयार हूँ।”


तब तक फ़राग़ का सिर, ख़ाली पेट हुक्के के अत्यधिक कश लगाने से, चकराने लगा था। उसका सिर झुका हुआ था, अपने हाथों पर रखा हुआ। यदि वह पुरुष न होता तो उसे एक ऐसी शोकग्रस्त विधवा मान लिया जाता जो अपने मृत पति के लिए विलाप कर रही थी।


इन मामलों में फ़ार्म पर सबा, ‛मश्ताह’ से अधिक जानकार कोई न था, जो अन्यों की तरह पेशेवर नहीं थी। उसके पास एक पुरानी सिलाई मशीन थी और वह पुरुषों और स्त्रियों दोनों ही के कपड़े सिला करती थी। वह अपनी उम्र से कम दिखती थी, गोरे रंग और मातृ तुल्य अच्छे व्यवहार के साथ। लेकिन जब वह बोलती थी तो वह स्वयं को ही धोखा दे जाती थी कि वह क्या थी : एक सख़्त, काम से काम रखने वाली, जो औरतों और आदमियों के संग अपने अनुभव के आधार पर अच्छा सौदा करने में सफल रहती थी और जिसे देख कर अधिक विश्वास नहीं पैदा होता था। 


जब फ़ातमा ने घोषित किया कि वह परीक्षण हेतु तैयार थी, उन्हें सबा को बुलाना चाहिए था लेकिन वे हिचकिचा रही थीं। वे सब सच जानने को उत्सुक थी और यद्यपि सबा ऐसे मामलों में अनुभवी थी और वे निश्चित थीं कि जो कुछ जानने को था, उसे वह तुरंत जान जाएगी, परन्तु वे उस पर विश्वास नहीं करती थी, क्योंकि उसकी प्रसिद्धि ठीक नहीं थी। सही था कि फ़ार्म पर वह एकमात्र परिधान बनाने वाली थी और उसने हरेक के लिए कपड़े सिले थे लेकिन उसके घर में मात्र एक ग़लाबिए के लिए देखना मात्र आपत्तिजनक था। यह सब को पता था कि सबा स्वयं अपने घर को पुरुषों और स्त्रियों को, जिनके वहाँ होने के अपने कारण होते थे, छिप कर मिलने की आड़ के रूप में प्रयोग किए जाने की परवाह नहीं करती थी। निश्चय ही किसी ने वास्तव में कुछ नहीं देखा था। यह बात सच हो सकती थी, वैसे ही जैसे यह एक आधारहीन अफ़वाह हो सकती थी, लेकिन जो बात निश्चित थी वह यह थी कि सबा एक विश्वास योग्य व्यक्ति नहीं थी। वह सच जानने के बावजूद उसे छिपा सकती थी अथवा वह जो कुछ पता करती उसके उलट बता सकती थी। “केवल ओम जॉर्ज ही सही बता पाएगी,” फ़राग़ की पत्नी ने कहा।


महिलायें तत्काल सहमत हो गयीं। फ़ार्म पर ओम जॉर्ज एकमात्र सभ्रांत महिला थी और एकमात्र ऐसी महिला थी जो शिक्षित थी और लिख-पढ़ सकती थी। उससे महत्वपूर्ण बात थी कि वह क़स्बे से आती थी जहाँ लोग हर चीज‌ के बारे में हर बात जानते थे।


जब जुलूस प्रबंधक के घर से कारिंदे के घर की ओर चला, बच्चे एक दूसरे से धक्कामुक्की करने लगे। उत्सुक किंतु उदास भीड़ धूल और पुवाल के ढेरों से अटी संकरी गली में चल पड़ी। अभी भी दिन का उजाला शेष था लेकिन सूरज नीचे की ओर जाने लगा था। उनके मध्य फ़ातमा आँख बंद किए चल रही थी, उसका चेहरा राख की भाँति हो रहा था, उसका दिल डूब कर उसके पाँवों में आ गया था और वह हर कदम के साथ ऐसा महसूस कर रही थी मानो उसे अपने पाँवों से कुचल रही हो। अपनी मासूमियत को कुचल रही हो और अपने बचपन को, संगीत की और रस्मों रिवाजों की उन रातों की मधुर स्मृतियों को कुचल रही हो, जब उसके हाथों में मेहंदी लगाई जाती—रातें जब सभी उसके किसी महारानी की भाँति बाहर आने की खड़े हो कर प्रतीक्षा करते। और अभी वे फिर उसी की प्रतीक्षा कर रहे होते थे। सैकड़ों आँखें हिंसक और क्रूर, उसको भेदती हुई थीं, वह जिधर भी देखती। वे बिना शर्म के उसके साथ बल प्रयोग करती जब वह लड़खड़ा जाती। उसका हृदय रक्तरंजित था, वह नंगे पाँव थी, अपमानित थी, निर्दयता से धकेली जा रही थी।


उसकी सहेली हिकमत ने उसका बुर्का नीचे खींचना चाहा ताकि उसका चेहरा ढका रहे लेकिन उसने उसे वापस उठा दिया। अब चेहरा ढकने का क्या लाभ था जब उसका सारा अस्तित्व ही नग्न था।


दुःखद रूप से, बिना थके महिलाओं का झुंड आगे चलता रहा, सिर और हाथ कुलबुला रहे थे, बच्चों और भूखे कुत्तों का एक रेला उनके पीछे था, सभी धूल के एक बादल से ढके हुए थे। उनके रास्ते में आने वाले बतख डर कर भागे, ऊपर पक्षी और कबूतर अपने घोंसलों की ओर चल दिए जबकि निष्ठुर और दृढ़ महिलाएँ आगे बढ़ती रहीं जब तक अंततः वे कारिंदे के घर न पहुँच गई।


उस क्षण चौकीदार दोरगम को फिर दौरा पड़ा हुआ था और वह सदैव की भाँति बड़बड़ा रहा था। किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया क्योंकि लोग उसकी बड़बड़ाहट के आदी हो चुके थे। फ़ार्म पर वह एकमात्र व्यक्ति था जो ऊपरी मिस्र से आया था और वह अपने वहाँ आने के दिन से उस खलिहान का चौकीदार था। वह अब सत्तर साल से ऊपर का हो चुका था और अब भी वही काम कर रहा था। उसका बड़ा सा काला सिर था और उसके मोटे काले नाक-नक़्श सदैव ग़ुस्से में चढ़ी त्योरी में गुथे रहते थे। उसके बाल गाँठदार थे और अब तक काफ़ी भूरे हो चले थे। वह अपने लम्बी सफ़ेद ग़लमुच्छों में किसी मास्टिफ़ कुत्ते जैसा दिखता था। उसके चेहरे से सदैव पसीना बहता रहता था जिसके कारण वह ऐसे चमकता था मानो उस पर ग्रीस पोत दिया गया हो। वह भयंकर गुरगुराहट के साथ बोलता था, जिसे कोई नहीं समझ पाता था। किसी को खलिहान के पास आता हुआ देखना मात्र ही उसका ग़ुस्सा भड़काने के लिए पर्याप्त होता था। फ़ार्म पर तीस साल से रहने के बावजूद वह किसी को नाम से नहीं जानता था, न ही उसे इसकी कोई परवाह थी, और जब तक लोग उसके खलिहान से दूर रहते थे, वह भी उन्हें कुछ नहीं कहता था। 


अभी वह ग़रीब पर भौंक रहा था जिसे उसने मक्के के ढेर के नीचे छिपे हुए देख लिया था। लड़का अभी ही अपने छिपने के स्थान से बाहर झाँक रहा था और अपनी धृष्टतापूर्ण हरकत का परिणाम देखने हेतु फ़ार्म की ओर वापस खिसकने के चक्कर में था। उसका पहले से साँवला चेहरा कुछ और गहरे रंग का हो गया था। वह अपनी गोल टोपी अपने सिर पर आगे की ओर माथे पर झुका कर अपनी प्रिय लटों का प्रदर्शन न करते हुए पहने हुए था। यह मक्के के नीचे दुबका हुआ, डरा हुआ सा ग़रीब था, गम्भीर और पश्चाताप में डूबा हुआ। उसकी अपनी बदहाली ख़ुद को उसके समक्ष अपनी पूरी कठोरता में व्यक्त कर रही थी। जैसे-जैसे हुजूम पास आया और फ़ातमा दिखाई पड़ी, वह अपने छुपने के स्थान में और गहरे घुस गया और दूसरी ओर देखने लगा।


उसका फ़ातमा से डरना और यह तथ्य कि वह अप्राप्य थी, यही बातें थी जिन्होंने उसकी कामना को उद्वेलित किया था। और जितनी ही अधीरता से वह उसे चाहता था, वह उतनी ही दूर प्रतीत होती थी। उसकी मंशा उसे किसी तरह का नुक़सान पहुँचाने की नहीं थी। वह बस अपने लिए थोड़ी-सी शिनाख्त चाहता था, यह निशानी भर कि वह इस बात के प्रति बाख़बर थी कि उसका भी अस्तित्व था, बस एक लापरवाह और उड़ती हुई निगाह मात्र। लेकिन वह नज़र कभी न आयी, और उसने इसका उत्तर और तीव्रता से दूसरी औरतों की तलाश द्वारा दिया था, कभी एक क्षण के लिए भी फ़ातमा की एक नज़र अथवा एक-दो बोल की प्रत्याशा को छोड़े बिना। 


यह पहली बार नहीं था जब वह छिपा था। अपने भाई के लिए सुबह का नाश्ता खेत पर ले जाते हुए, काले परिधान में लहराती अपनी देह की मधुर स्वाँस वृक्षों पर, मैदान में और नदी में प्रवाहित करते, धरती को अपनी सुगंध से आपूरित करते उसे देखने के लिए वह पहले भी छिप चुका था। पहले भी कई बार वह उसे देखता खड़ा रहा था, बिना किसी की दृष्टि में आए, किसी के द्वारा देख लिए जाने से डरता हुआ। लेकिन उस दिन पहली बार उसने अपने देखे जाने की परवाह नहीं की थी। वह चाहता था कि वह उसे देखे। पहली बार वह वो बेग़ैरत हरकत करने को लालायित हुआ था जिसने उसे अनेक रातों को जगाए और पुआल पर करवटें बदलते तड़पाए रखा था। और फिर भी वह उस लड़की से, जो न तो उसकी बहन थी और न माँ, बस बात कर के और उसका डरा हुआ सा उत्तर सुन कर संतुष्ट हो जाता। 


जैसे ही वह खेतों में से निकल कर उसके समक्ष प्रगट हुआ, वह उसी जगह इस प्रकार जड़ हो गई मानो‌ उसने उसे एकदम निर्वस्त्र देख लिया हो। इस तरह जैसे ग़ैरत स्वयं उसके समक्ष आ खड़ी हुई हो। 


वही ग़ैरत जिसके कारण फ़ातमा की खून टपकाती आँखों ने, उसे आग की भाँति जलाते हुए, चेतावनी दी थी। टोकरी उसके सिर से गिर गई थी। वह घबड़ाहट में चिल्लाई थी। हर कोई उसकी आवाज पर उधर ही दौड़ पड़ा था। एक क्षण में सारी दुनिया उसके कानों के पास ढह पड़ी थी और वह सिर पर पाँव रख कर खेतों में ग़ायब हो गया था। 


****


अपेक्षा के विपरीत, ओम जॉर्ज ने क्रॉस का निशान बनाया और सारे मामले पर सच्चा दुःख व्यक्त किया, और सच जानने में जो कुछ उससे हो सकता था वह सहायता देने का वचन दिया। उसने ईसा मसीह की क़सम खायी कि वह अपने पति से कह कर ग़रीब को पुलिस स्टेशन में बंद करवाएगी, पुलिस अफ़सर से उसे घोड़े की पूँछ में बँधवा कर घिसटवाएगी और टेलीफ़ोन के खंभे पर लटकवा देगी। ओम जॉर्ज अपनी दया के लिए जानी जाती थी। वह संस्कारवान और गरिमामय थी। कोई उसका असली नाम नहीं जानता था। वह, उसके बड़बड़ाने के बावजूद, अपने पति को हर रविवार उसे क़स्बे के चर्च ले जाने को मजबूर करती थी। वह शनिवार की शामें पड़ोस के गाँव में ‘अरक’ पीते हुए गुजारती थी जहाँ पनयोती, किराने वाला,  जो चाहते उन्हें शराब भी पेश करता था।


ओम जॉर्ज गोरी और छोटे क़द की थी, उसके बालों में सफ़ेदी आने लगी थी और उसकी ठुड्डी पर तीन बिंदियों वाला टैटू था। वह फ़ातमा के सम्बंध में सब कुछ जानती थी और वह लड़की को पसंद भी करती थी। अक्सर वह उसे बिस्कुट, जिनके बिना अबू जॉर्ज नाश्ता नहीं करता था, बनवाने में मदद करने हेतु अपने यहाँ बुलवाया करती थी। अथवा कभी-कभी बस उसके साथ के लिए, अथवा केवल ताज़ा ख़बरों को जानने के लिए क्योंकि उसे फ़ार्म की महिलाओं से घुलने मिलने की अनुमति नहीं थी। यदि उम्र का अंतर न होता तो वह उसकी सबसे अच्छी दोस्त हो सकती थी।


बहुत गहरे अपमान के साथ फ़ातमा ने कारिंदे के घर में कदम रखा। वह अभी उस घर में इसलिए नहीं जा रही थी कि वह वहाँ वांछित थी बल्कि इसलिए कि ओम जॉर्ज उसके सम्मान के सम्बन्ध में बिचौलिए निर्णायक का काम कर सके; उस औरत के यहाँ जिसने कुछ ही दिन पूर्व उसका मुख चूम कर कहा था कि यदि उनका धर्म एक होता तो वह उसे अपने भाई की पत्नी बना लेती जो बहेरिया प्रांत में कैशियर था। 


वह क्षण भर चौखट पर बुत बनी खड़ी रही लेकिन औरतों ने उसे भीतर खींच लिया। उसका बुर्का उसके सिर से खिसक गया। ओम जॉर्ज ने यह देखने के लिए एक चक्कर लगाया कि अबू जॉर्ज घर में तो नहीं था और दरवाज़े और खिड़कियाँ ठीक से बंद तो थे। फ़ातमा स्वाभाविक शर्मिंदगी के कारण पूरी शक्ति से संघर्षरत थी किंतु वे सब उस पर टूट पड़ी थीं और उसे बिस्तर पर गिरा रही थी। एक औरत ने उसके हाथ बाँध दिए और दो अन्य ने उसकी टाँगें पकड़ ली। ग़ैरत की तलाश में, उसकी रक्षा के प्रयत्न में उत्तेजनावश उनकी आँखें बाहर निकली पड़ रही थी। जलती, चीरती, भीतर तक बेधती आँखें, तब भी जब उन्हें पता तक नहीं था कि वे क्या तलाश रही थी। ओम जॉर्ज काँप सी रही थी मानो स्वयं उसे ही इस अग्नि परीक्षा से गुजरना था। वह औरतों को डाँट रही थी, साथ ही फ़ातमा को ढाढ़स भी बंधा रही थी लेकिन सब व्यर्थ था। घुटी हुई चीख़ों के साथ जारी संघर्ष धीरे-धीरे ख़त्म होता हुआ एक ठंडी फुसफुसाहट में परिवर्तित होता जा रहा था। कमरे में अपेक्षाओं से बोझिल एक खामोशी पसर गई थी जो धीरे-धीरे बाहर तक फैलती जा रही थी—घर में, फ़ार्म में और समूचे ब्रह्मांड में। यह निराशा और उदासी फ़राग़ के आसपास बैठे लोगों, सिंचाई के पंप के पास इकट्ठा लोगों अथवा खेतों में जमा लोगों के सिरों तक फैल गई थी, उनकी कल्पनाओं में कि कारिंदे के घर में क्या कुछ चल रहा था। 


दोरघम को छोड़ कर यह सन्नाटा पूरे फ़ार्म पर तारी था। वहाँ उसे सुनने वाला बस एक व्यक्ति था, अबदून, ग़रीब का बाप। अपना लबादा किनारे से उठाए वह किसी जीवित प्राणी की तलाश में खलिहान की ओर भागा, जिसके समक्ष वह फ़ातमा, अपने बेटे और पूरे फ़ार्म लिए अपना क्रोध और गालियाँ निकाल सके―भले ही वह अकेला दोरघम ही क्यों न हो।


अकस्मात उस कमरे से जहाँ फ़ातमा क़ैद थी एक तेज चींख निकली जिसने सन्नाटे को चीर दिया। इसके पश्चात कई दूसरी चीखें भी आयी, “सब ठीक है! अल्लाह का शुक्रिया, सब ठीक है! ग़ैरत सुरक्षित है।”


उस समय इतनी देर बाद फ़राग़ ने अपना सिर उठा कर देखा। “उसे मेरे पास ले आओ,” उसके पहले शब्द थे।


कुछ क्षण पश्चात, दोरघम की बकवास बंद होने के थोड़ी देर बाद, एक पुरानी पनचक्की के पास के कुएँ से एक भारी शोर सा सुनाई पड़ा। शोर की जगह, कुँए के ठीक किनारे पर बूढ़ा अबदून अपने बेटे को कॉलर से पकड़े हुए अपनी कंपकंपाती ताक़त से उसे कुएँ में धकेलने का प्रयत्न कर रहा था। सब तरफ़ से आदमी उसके ग़ुस्से को शांत करने और ग़रीब को उसकी पकड़ से छुड़ाने के लिए उनके चारों ओर इकट्ठे हो गए थे। हर बार जब वह ग़रीब को झुका पाने में असफल रहता, उसकी गालियाँ तेज हो जातीं और जलते हुए लावा की भाँति उसके मुँह से प्रवाहित होती। यह नाटक देखने वाले किसी भी व्यक्ति को अबदून की अपने बेटे को डुबो देने की सच्ची कोशिश पर कोई संदेह नहीं था। लेकिन उसकी आवाज़ में एक न समझ में आने वाली लोच थी, अथवा उसकी गालियों के चयन में कुछ था, जिससे पता लगता था कि अबदून मन से अपने बेटे की करतूत से शर्मिंदा नहीं था। यदि कुछ था तो एक गुप्त गर्व कि वह एक ऐसी स्त्री को लुभा रहा था, जिसके लिए कोई स्वयं को न रोक पाता और यह कि उसके बेटे पर बलात्कार का आरोप लगा था।  


इस बीच फ़राग़ के घर में एक नियमित हत्याकांड घटित होने को था। फ़राग़ फ़ातमा को कॉफ़ी ग्राइण्डर से पीट रहा था और फ़ातमा पीड़ा से चीत्कार कर रही थी। फ़राग़ की पत्नी इस भय से चीख रही थी कि कहीं वह अपनी बहन को मार न डाले और मुसीबत में न पड़ जाए। पड़ोसियों की पत्नियाँ भी चिल्ला रही थी जबकि घर के बाहर और भीतर उपस्थित अन्य सब उसे रोकने का असफल प्रयत्न कर रहे थे। फ़राग़ एक पगलाए हुए जानवर जैसा हो रहा था और कुछ सुने बिना बस अपनी बहन को मार डालना चाह रहा था। लेकिन फिर भी उसके प्रहारों की शक्ति में कुछ कमी थी और उसकी आँखें विचित्र रूप से भावहीन थी। यह कुछ ऐसा था जैसे कि भले ही फ़ातमा निर्दोष सिद्ध हुई हो और उसकी ग़ैरत पर कोई आँच न आयी हो लेकिन उसे लोगों की बकवास का और उनके मस्तिष्क में उपजी तमाम कल्पनाओं का जवाब देने हेतु कुछ चमत्कारी काम करना ही था।


निश्चय ही अबदून ने अपने बेटे को कभी नहीं डुबोया और फ़राग़ ने अपनी बहन का कभी क़त्ल नहीं किया। सूरज हमेशा की भाँति ढल गया और लोग अपने जानवर खेतों से घर ले आए, गधों की पीठ पर चारा लादे हुए। मिट्टी के मकानों की छतों की दरारों से धुआँ उठना शुरू हो गया और खाना पकाने की गंध सूर्यास्त की चमक के साथ हवा में फेल गई। पुरुष संध्या की नमाज़ के लिए चले गए और औरतें पालतू पशुओं को चारा डालने और मुर्गियों को रात के लिए उनके दड़बों में बंद करने में व्यस्त हो गयीं। जब तक रात्रि की नमाज़ की अज़ान लोगों की छतों पर फैली, फ़ार्म में सब कुछ फिर से शांत हो चुका था। घटना से संबंधित हर तथ्य दीपकों की लौ के बुझने तक टुकड़े-टुकड़े में चर्चा का विषय रहा। बढ़ती कालिमा के साथ नींद सरक आई और थकी हुई देहें अपने-अपने बिछावन पर फैल कर शांत हो गयीं।


सब के सोने चले जाने के पश्चात जब फ़ातमा अकेली थी, थकी और टूटी हुई, उसने रोना शुरू कर दिया। उसके आँसू बह कर उस मिट्टी को भिगोते रहे जहाँ फ़राग़ ने उसे बिना बिस्तर अथवा बिना चादर के सोने को मजबूर किया था। उसकी देह उसकी सिसकियों के साथ हिल रही थी, और उसकी बग़ल का मुर्गियों का दड़बा भी, और चूल्हा और घर और समूचा फ़ार्म। तब तक जब तक कि उसने लोगों को उनकी नींद से लगभग जगा नहीं दिया। वह पीड़ा से निढाल हो गई थी और रात में देर तक अपने दुःख में रोती रही।


आने वाले दिनों में, जब ग़रीब ने फ़ातमा से विवाह का प्रस्ताव रखा, शुभचिंतक मित्रों ने फ़राग़ को उसे स्वीकार करने की बात समझाने का बहुत प्रयत्न किया लेकिन उसने उनकी एक न सुनी और उन्हें अपनी कोशिश छोड़नी पड़ी। जहाँ तक ग़रीब की बात थी, उसने फिर कभी फ़ातमा के बारे में बात नहीं की। वास्तव में उसने महिलाओं के बारे में भी पूरी तरह बात करना बंद कर दिया। उसने अपनी लटें कटवा दी और नियमित रूप से नमाज़ पढ़ने जाने लगा, लेकिन यह सब उसे फ़ार्म में भटकने और फ़राग़ के घर की खिड़की से झाँकने से नहीं रोक सके थे। 


दूसरी ओर फ़ातमा, घर में बंद कर दी गई, फ़राग़ ने उसे बाहर निकलने और काम पर जाने से भी मना कर दिया, जबकि उसे उसकी कमाई की बहुत ज़रूरत थी। इससे कोई अंतर नहीं पड़ा, क्योंकि उसने दुनिया से किनारा कर लिया था और अपने एकांत में संतुष्ट थी। उसके गालों की रंगत जा चुकी थी और आँखों ने अपनी चमक खो दी थी। वह एक सुस्त प्राणी में परिवर्तित हो गई थी, सिकुड़ी हुई, अंतर्मुखी और मुस्कराहटविहीन। उसकी आवाज से विद्रोह ग़ायब था और वह चमक भी जिसके हर शब्द के साथ गहन स्त्रीत्व का सुर बजता था।


जो भी हो, यह सब बहुत दिन तक नहीं रहा। फ़ातमा सदैव के लिए क़ैदी नहीं रही और ग़रीब का नमाज़ का जोश भी शीघ्र ही ठंडा पड़ गया। फ़राग़ फिर से डींगें हाँकने वाला जोकर बन गया। और बाज़ार के दिन से कई दिनों पूर्व एक दिन जो कुछ घटित हुआ था उसे स्मृति के भंडारागार में धकेल दिया गया। शांतिसंस्थापकों ने यह सुनिश्चित किया कि अबदून का अपने बेटे के साथ मेल हो जाए और उनके बीच सब ठीक रहे। ग़रीब ने अपनी लटें भी फिर से बढ़ा लीं और एक बार फिर से वह अपने दोस्तों के बीच बिना किसी कड़वाहट के अपनी आशिक़ी के क़िस्से सुनाने लगा। फ़ातमा भी फिर से काम पर लग गई, सदैव की भाँति मोहक, अपने सिर का दुपट्टा थोड़ा तिरछा कर के पहने हुए, अपना परिधान थोड़ा सा उठाए हुए, और उसका माँसल सौंदर्य पुरुषों के होश उड़ाता हुआ। वह अपने रास्ते में हर एक का अभिवादन करती। सब का बस ग़रीब को छोड़ कर; जानबूझकर नहीं बल्कि बस इसलिए कि उसने उसे फिर देखा ही नहीं था मानो उसका कभी अस्तित्व ही न रहा हो। 


फ़ातमा फिर से पहले वाली फ़ातमा हो गई थी, बात करती, हँसती, मुस्कराती और पहले की भाँति मर्दों पर जादू चलाती। लेकिन उसमें कुछ नई बात आ गई थी, कुछ ऐसा जिसे लोगों ने पहले उसमें नहीं देखा था। अथवा कह सकते हैं कि उसका कुछ खो गया था : वह चीज़ जो उसे पवित्र बनाती थी। वह गुण जो उसकी मुस्कराहट को विश्वसनीयता देता था और उसके ग़ुस्से को वास्तविक बनाता था। उसकी मासूमियत खो गई थी। अब वह छल, कपट और दुराव से ग्रस्त प्राणी बन गई थी।


बस इतना ही नहीं हुआ था। यदि फ़राग़ कभी उसे सबा के घर से निकलते हुए पकड़ता, उसे खींच कर घर लाता और दरवाज़ा बंद करके उसके बाल पकड़कर उससे पूछता कि वह वहाँ क्या कर रही थी तो वह उसकी आँखों में घूर कर धृष्टता से जवाब दे सकती थी, “मैं वहाँ कपड़े की फिटिंग देने गई थी। मेरे रास्ते से हटो।” और वह स्वयं को उसकी पकड़ से मुक्त कर के कमरे के एक कोने में खड़ी हो अपने बाल व्यवस्थित करने लगती, अपनी प्यारी आँखों से सीधे उसकी ओर देखती रहती, धृष्टता से, बिना डरे और बिना शर्म के। 


गोल चक्कर वेब पत्रिका अत्यंत सीमित संसाधनों से चल रही है। इस वेबसाइट के संचालन में आर्थिक सहयोग देने हेतु दिए गए क्यू आर कोड का उपयोग करें :



यूसुफ़ इदरीस मिस्र के प्रसिद्ध कहानीकार, नाटककार और उपन्यासकार थे। उनका जन्म मिस्र के अल वरयाम में 19 मई, 1927 को और मृत्यु लंदन में 01 अगस्त, 1991 को हुई। उन्होंने अपनी यथार्थवादी कहानियों और स्थानीय बोलियों के मिश्रण वाली भाषा से परंपरागत अरबी साहित्य को आधुनिक बनाया। उनकी कहानियों में जीवन की विद्रूपताओं और सामान्य नागरिकों तथा ग्रामीणों के जीवन का सटीक वर्णन मिलता है। उनकी रचनाओं के अनुवाद अंग्रेज़ी सहित अनेक भाषाओं में हुए हैं। उनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं : Arkhas layali (The Cheapest Nights), A-laysa kadhalik (Isn’t That So?). Al-Lahzat al-harija (The Critical Moment), Al-Farafir (The Farfoors, or The Flipflap), and Al-Mukhatatin (The Striped Ones), Al-Haram (The Forbidden) Al-ʿAyb (The Sin).


श्रीविलास सिंह वरिष्ठ कवि, गद्यकार एवं अनुवादक हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : श्रीविलास सिंह









Comments


bottom of page