बे-शक्ल (डोमेनिकन अमेरिकन कहानी)

बे-शक्ल
मूल कहानी : जूनोट डियाज़
अनुवाद : उपमा ऋचा
‘ड्रॉन―ए कलेक्शन ऑफ सॉर्ट स्टोरीज’ में ‘नो फेस’ नाम से शामिल यह कहानी येशरिल की है। बचपन में एक सुअर उसका चेहरा चबा जाता है और उसे जिंदगी भर के लिए एक ऐसा नकाब दे जाता है जिसमें कल्पना, डर और घुटन के सैकड़ों पिस्सू रेंगते हैं। एक बे-शक्ल इंसान की नकाब से बाहर आने की तड़प, लेकिन फिर उसी नकाब में ताकत तलाशने की यह कहानी जीवन के उस द्वंद्व को रेखांकित करती है जहाँ नकाब ही इंसान की राहत है और नकाब ही डर। साथ ही एक सूत्र भी सौंपती है कि चयन उसे ही करना है कि वह राहतों में लिपटे डर चुनता है या डर के पार बिछी राहत...।
सुबह होते ही येशरिल अपना नकाब पहनता है। हथेली पर मुट्ठी रगड़ता है। गुयानबाना के पेड़ के ऊपर पहुँच जाता है और लगभग पचास पुल-अप करता है। फिर कॉफी के छिलके छीलने वाली मशीन उठाता है और चालीस तक गिनती पूरी होने तक उसे अपने सीने पर रखे रहता है। उसकी बाँहें, सीना, गर्दन का उभार और कनपटी के आसपास की त्वचा टूटने की हद तक खिंच उठती हैं। लेकिन नहीं! येशरिल टूटने के लिए नहीं बना। वह अपराजेय है। बहती चर्बी के साथ वह मशीन छोड़ देता है। हाँ, वह जानता है कि उसे अब उठ जाना चाहिए, लेकिन सुबह के वक्त चारों ओर कोहरा इस कदर लिपटा रहता है कि वह मुर्गों की आवाज सुनने लगता है। घर की सरगर्मियों पर कान रख देता है। लेकिन फिर खुद ही खुद को हड़काता है और दौड़कर अपने चाचा के खेतों की ओर चला जाता है। एक ही नजर में येशरिल को चाचा के खेतों में उगते कॉफी के लाल, काले और हरे बीजों की गिनती समझ आ जाती है और वह जल-घर से चारागाह की ओर चला जाता है। एक पल इंतजार के बाद खुद को आदेश देता है– “उड़ो।”
और अगले ही पल येशरिल का साया पेड़ों की शाखों को कतरता हुआ, उनके ऊपर से गुजरने लगता है। इस वक्त वह इतनी ऊँचाई पर है कि उसे अपने घर की बाड़ साफ-साफ दिखाई दे रही है। घर में माँ छोटे भाई के चेहरे और पैरों को रगड़कर नहला रही है। बाहर धूल से बचने के लिए दुकानदार सड़क पर पानी छिड़काव कर रहे हैं। लोग दौड़ रहे हैं। भाग रहे हैं। अचानक उसके कानों में आवाज आई, “बे-शक्ल नकाबपोश!”
येशरिल के पास ऐसी आवाजों को सुनने का समय नहीं था। इसलिए वह उन्हें पीछे छोड़ता हुआ, एक बार में चला जाता है और चिल्लर बिखेरने के लिए पास ही कोई जगह तलाशने लगता है। नशेड़ी अक्सर रास्ते में सो जाते हैं, इसलिए वह बहुत धीरे-धीरे चलता है। गंदी, बदबूदार जगहों और जहाँ-तहाँ पड़ी कै के बीच से गुजरते हुए येशरिल अपनी नाक को साँस लेने से रोके रहता है। आज उसके पास एक बोतल सोडा या फिर एक जॉनी केक खरीदने लायक पर्याप्त पैसे हैं। वह अपने हाथों में सिक्कों को कसकर पकड़ लेता है और नकाब के भीतर से मुस्कुराता है।
गर्म दुपहरियों में फादर लॉऊ येशरिल को बूढ़ी छतों और कमजोर तारों वाले चर्च में ले जाते हैं और दूध-कॉफी देकर दो घंटे के लिए पढ़ने-लिखने को छोड़ देते हैं। चर्च में कागज, कलम, किताबें इफरात में रहते हैं। रहें भी क्यों न! आखिर पास के स्कूल से सब चीजें दान में जो आती हैं। येशरिल काफी समय से फादर लॉऊ के पास आता है। उनके हाथ छोटे-छोटे हैं और आँखें खराब। दो बार ऑपरेशन के लिए कनाडा भी हो आए हैं, लेकिन नतीजा ज्यादा राहतमंद नहीं रहा। आजकल वे येशरिल को अंग्रेजी सिखाते हैं। जैसे―मैं भूखा हूँ, बाथरूम कहाँ है, मैं डोमिनिकन गणराज्य से आया हूँ, डरो मत, आदि-आदि बातों को अंग्रेजी में कैसे कहेंगे, यही सब।
दिन भर की पढ़ाई के बाद येशरिल चिक्लेट्स खरीदता है और चर्च के पार बने घर की ओर चल देता है। घर के बाहर एक बड़ा गेट है। नारंगी के कई सारे पेड़ और गोल पत्थरों से बना सुंदर रास्ता... अंदर हर समय टीवी शोर करता रहता है। येशरिल रुक जाता है और लड़की के बाहर आने का इंतजार करता है, लेकिन वह नहीं आती। कभी-कभार वह बाहर झाँकती, उसे देखती और हाथ के इशारे से टीवी बनाती। मानो पूछना चाहती हो, “टी.वी. देखोगे?”
येशरिल कभी दूसरे लोगों के घर के भीतर नहीं जाता, इसलिए जवाब में वह अपना सिर हिला देता। लेकिन हाथ के इशारे से इतना जरूर कह देता, “नहीं, मुझे बाहर रहना पसंद है। मैं अंदर के बजाय, यहीं बाहर ठंडक में रहना पसंद करता हूँ।”
येशरिल वहीं खड़े-खड़े देर तक इशारे करता रहता है। आखिर घर में काम करने वाली औरत रसोई से चिल्लाकर कहती है, “अरे, कोई शर्म-लिहाज नहीं है क्या? भागो यहाँ से…”
औरत की डाँट सुनकर येशरिल गेट को पकड़ लेता है और उसे उसकी गलती और अपनी ताकत का अहसास कराने दिखाने के लिए गेट की सलाखों को थोड़ा-सा खींच देता है।
हर सप्ताह फादर लॉऊ येशरिल को एक कॉमिक्स खरीदने के लिए किताबों की दुकान पर ले जाते हैं। जितनी देर वह किताबों की अलमारियाँ खँगालता है, वे उसकी बाहर सड़क पर खड़े पहरा देते रहते हैं। आज उसने कैलीमैन (राफेल नेव्रो और मोडेस्टो वोंजालेज का रचा एक कॉमिक कैरेक्टर) खरीदी। इस कॉमिक्स का हीरो बकवास नहीं करता। झूठ भी नहीं बोलता। पगड़ी पहनता है, लेकिन येशरिल को लगता था कि अगर कैलीमैन के चेहरे पर भी उसकी तरह नकाब हो, तो गजब हो जाएगा।
येशरिल कोनों में छिपकर, लोगों से दूर रहने के अवसर तलाशता है। उसके पास गायब होने की ताकत है। कोई उसे छू नहीं सकता। यहाँ तक कि बाँध की रखवाली करने उसके अंकल भी अतीत में चहल-कदमी करते रहते हैं, पर येशरिल से कुछ नहीं कहते। कुत्ते आकर उसे सूँघते हैं। कई बार उसके पैरों पर अपनी थूथन रगड़ने लगते हैं। वह उन्हें धक्का देकर दूर खदेड़ देता है, ताकि वे धोखा खा जाएँ और वापस पलटकर न आएँ। येशरिल थोड़ा अलग है, इसीलिए कई लोग उसे गिराना चाहते हैं। उसके कहीं चले जाने की दुआ करते हैं। लेकिन वह जाए तो कहाँ...?
येशरिल सड़क किनारे खड़ा था। एक बूढ़े को अपनी गाड़ी में धक्का लगवाने के लिए मदद की जरूरत थी। एक बिल्ली को सड़क पार करने के लिए... वह आगे बढ़ा ही था कि एक मोटर ड्राइवर चिल्लाया, “ओ बे-शक्ल नकाबपोश... ये क्या कर रहे हो? तुम ऐसे बिल्लियों को नहीं खा सकते।”
“हुँह... इसके बाद मैं बच्चों को खाऊँगा” येशरिल को गुस्सा आ गया।
“बिल्ली को छोड़ दो, वो तुम्हारी नहीं है।”
कहते हुए ड्राइवर उसकी ओर लपका। वह दौड़ने लगा। शाम ढल गई थी। दुकानें बंद हो रही थीं। कोनों में खड़ी रहने वाली मोटरबाइक्स तक सड़क पर तेल के दाग और धूल के निशान छोड़ गायब हो चुकी थीं। ड्राइवर भी पीछे रह गया था। येशरिल ने राहत की साँस ली और जॉनी केक खरीदने के लिए रुक गया। अचानक चार लड़कों ने पीछे से येशरिल पर हमला कर दिया। मुट्ठी में बंधे सिक्के उसके हाथ से टिड्डियों की तरह फिसलते चले गए। एक लड़का उसके ऊपर तनकर खड़ा हो गया। जबकि दूसरा मोटा लड़का उसकी छाती पर बैठ गया। येशरिल की साँस घुटने लगी। वह डर गया।
“हम तुमको लड़की बनाने जा रहे हैं,” मोटे लड़के ने होठ हिलाए, लेकिन येशरिल इन शब्दों को उस मोटे की पूरी देह में प्रतिध्वनित होते सुन सकता था। उसने घबराकर साँस लेने की कोशिश की, लेकिन उसे अपने फेफड़े ऐसे तंग होते मालूम हुए, जैसे गरीब की जेब…
“तुम पहले कभी लड़की बने हो?” एक ने ठट्ठा किया।
“मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि तुम्हें इसका कोई अनुभव नहीं है,” दूसरा बोला।
“छोड़ो मुझे... क्या कर रहे हो? ये अच्छी बात नहीं…” येशरिल ने पूरी ताकत लगाई और बोला, “मुझे शक्ति चाहिए।”
अगले ही पल मोटा लड़का दूर पड़ा था। येशरिल सड़क के दूसरी ओर भागने लगा। लड़के भी उसके पीछे भागे।
“अरे उसे अकेला छोड़ दो तुम लोग” ब्यूटी-पार्लर की मालकिन ने उन लड़कों को समझाने की कोशिश की, लेकिन किसी ने भी उसकी बात नहीं सुनी।
येशरिल वापस चर्च की ओर भागने लगा। भागते-भागते, ऐन चर्च के सामने अचानक उसका पैर फिसला और वह सीधा अंदर जा पहुँचा। थोड़ी चोट आई, मगर उसने फुर्ती दिखाई और छुप गया। गुस्साए लड़के चर्च के दरवाजे पर पत्थर फेंकने लगे, मगर वह बाहर नहीं आया। खेतों में काम करने वाले एलिसो ने लड़कों को घुड़का और अपनी लंबी कैंची लेकर उनकी ओर भागा, “अब तुम जहन्नुम में जाओगे।”
सब डर कर भाग गए, लेकिन येशरिल एक बेंच के नीचे छिपा बैठा रहा। उसे घर वापस जाने के लिए रात बढ़ने का इंतजार था। पैर से रिसते खून को येशरिल ने कपड़ों से पोंछ लिया।
“तुम ठीक हो न?” फादर लॉऊ ने पूछा।
“हम्म... बस थोड़ी कमजोरी महसूस कर रहा हूँ।”
फादर लॉऊ उसके पास बैठ गए।
“पता है येशरिल, मैं सोच रहा था कि तुम उत्तरी इलाके में हो। बर्फ से घिरे हुए... परेशान तो नहीं हो जाओगे?”
“बर्फ मुझे परेशान नहीं करती।”
“बर्फ सबको परेशान करती है मेरे बच्चे!”
“क्या वे झगड़ा पसंद लोग हैं”
फादर लॉऊ हँसे, “उतना ही जितना कि हम उन्हें इजाजत दें। मेरा मतलब कोई तभी हमसे झगड़ सकता है, जबकि हम भी ऐसा चाहें।”
उसे कुछ समझ आया, कुछ नहीं। मगर वह बेंच के नीचे से बाहर निकल आया और अपना जख्म फादर को दिखाने लगा। फादर ने गहरी साँस ली,
“अब चलना चाहिए। चेहरे का ख्याल रखना, ठीक है? लेकिन देखो लाल दवा का इस्तेमाल मत करना। अब हम लाल दवा का इस्तेमाल नहीं करते। हमारे पास सफेद दवाई है, जिससे ज्यादा दर्द नहीं होता।”
“ऐसा...? लेकिन मुझे इस बात पर तभी विश्वास होगा, जब मैं इसे अपनी आँखों से देख लूँगा।”
फादर से कोई बात नहीं छिप सकती। येशरिल भी उनसे कुछ नहीं छिपाता। फिर भी वे एक ही बात बार-बार उसके सामने दोहराते रहे, मानो डरते हों कि वह अपना सच भूल न जाए। सच... उसका सच...।
कई बार रातों को येशरिल की नींद खुल जाती। और वह देखता कि सुअर वापस आ गया है। बेहद विशालकाय, पीला, घिनौना सुअर... वह उसके सीने पर चढ़ा हुआ है। उसकी तीखी, बदबूदार गंध येशरिल को अपनी साँसों से टकराती महसूस होती। वह साफ देख सकता था था उसकी लाल-लाल आँखों के नीचे से चमकते पैने दाँतों की दूधिया रंगत... येशरिल अपने चेहरे को बचाने के लिए सिर घुमाने की कोशिश करता। सकते जैसी हालत में वह दाएँ घूमता, फिर बाएँ, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी वह अपना सिर नहीं घुमा पाता। वह डर जाता और महसूस करने लगता कि सुअर का मुँह सड़क के उस गड्ढे जैसा था, जिसमें गिरने से उसे कोई नहीं बचा सकता। कोई नहीं... और वह जाग जाता। जागने पर हमेशा येशरिल खुद को जोर से चीखते पाता। उसकी गर्दन के नीचे खून की मोटी परत जमी होती। जीभ कट जाती। वह सोना चाहता, लेकिन जानता था कि जब तक वह अपने भीतर ‘पूरा इंसान’ होने का भरोसा नहीं जगा देता, सो नहीं सकता।
दूसरे दिन फादर लॉऊ ने कहीं से एक मोटरसाइकिल उधार ली और अल-सुबह दोनों उस पर बैठकर बाहर निकल गए। मोड़ आने पर वह झुका, तो फादर लॉऊ बोले, “इतना भी मत झुको कि गिर ही जाएँ।”
“हमें कुछ नहीं होगा!” वह चिल्लाया।
शहर की सड़कें खाली थीं। कई खेत सूखे पड़े थे और कई लावारिस। एक जगह उसे काला घोड़ा दिखाई दिया। वह झाड़ियों में मुँह मार रहा था और एक बगुला बड़े आराम से उसकी पीठ पर बैठा हुआ था। क्लिनिक में चोट खाए लोगों की खासी भीड़ थी, लेकिन ब्लीच्ड बालों वाली नर्स ने उन्हें पहले भीतर जाने दिया।
“तो आज कैसे मिजाज हैं?” डॉक्टर ने कहा।
“मैं ठीक हूँ, लेकिन आप मुझे इस नकाब से निजात कब दिलाओगे?” उसने जवाब देने के साथ ही सवाल किया। डॉक्टर मुस्कुराया और नकाब हटाकर अँगूठे से उसके चेहरे की मालिश करने लगा। डॉक्टर के दाँतों में सुबह खाया खाना चिपका हुआ था।
“क्या तुम्हें खाना निगलने में परेशानी होती है?”
“नहीं।”
“साँस लेने में?”
“नहीं।”
“सिरदर्द, चक्कर या गले में दर्द?”
“कभी नहीं।”
“हम्म…” डॉक्टर ने सिर हिलाया और येशरिल की आँख, कान, गले की जाँच करने लगा। उसने थोड़ी देर तक उसकी साँस भी सुनी।
“लॉऊ, मुझे सब कुछ ठीक लग है।”
“ओह मैं यह सुनकर खुश हूँ। लेकिन ऑपरेशन कब होगा? मेरा मतलब कोई अनुमानित तारीख?”
“तारीख...? हम्म मेरा ख्याल है कि हम उसे सबसे अंत में ऑपरेशन के लिए ले जाएँ,” डॉक्टर ने कहा।
फादर लॉऊ मुस्कुराए और उसके कंधे पर हाथ रख दिया।
“तुम इस बारे में क्या सोचते हो?”
उसने हाँ में सिर हिलाया, मगर वह समझ नहीं पा रहा था कि इस वक़्त उसे क्या सोचना चाहिए। उसे ऑपरेशन से डर लग रहा था। डर इस बात से भी लग रहा था कि कौन जाने ऑपरेशन से कुछ बदलेगा भी या नहीं। कि कैनेडियन डॉक्टर भी कहीं हार तो नहीं जाएगा। कि कहीं ये नकाब उसका नसीब बनकर तो नहीं रह जाएगा...।
कुछ देर बाद वह क्लिनिक के एक अँधेरे, गर्म और धूल भरे कमरे में था। उसे डर के मारे पसीना आ रहा था। वह किसी टेबल के नीचे छिप जाना चाहता था, जहाँ कोई उसे देख न सके। उसने पास के कमरे में झाँककर देखा। वहाँ एक लड़का था, जिसकी खोपड़ी खुली हुई थी। एक लड़की, जिसके हाथ नहीं थे और एक बच्चा, जिसका चेहरा बहुत बड़ा था और आँखों से मवाद टपक रहा था।
“उफ नहीं... मुझे यहाँ नहीं होना है।” येशरिल ने जैसे खुद से सवाल किया कि वह यहाँ क्यों है और भाग निकला।
सुबह येशरिल बड़ी मुश्किल से दर्द से कराहता हुआ उठा। उसे चक्कर आ रहे थे। जैसे-तैसे वह बाहर आया और गुयानबाना के पेड़ का सहारा लेकर खड़ा हो गया। छोटा भाई पेसो जाग गया था। मुर्गियों को दाने डालती पेसो की छोटी-सी काया सामने की ओर झुकी हुई थी। उसने भाई के सिर को सहलाया, तो उसे पीले घाव महसूस हुए। उसने उन्हें ठीक से छूना चाहा, लेकिन पिछली बार जब उसने ऐसा किया था, घाव से खून बहने लगा था और पेसो मारे दर्द के रोने-चिल्लाने लगा था। उसने खुद को रोक लिया।
“कल तुम दिन भर कहाँ थे?” पेसो ने सवाल किया।
“मैं... मैं बुराई से लड़ रहा था।”
“मैं भी लड़ना चाहता हूँ।”
“उहूं... तुम्हें यह अच्छा नहीं लगेगा,” उसने पेसो को समझाया।
पेसो ने एक पल उसके चेहरे को गौर से देखा, फिर दाँत निकालकर वापस मुर्गियों को दाना डालने लगा।
येशरिल सामने की ओर देखने लगा। सूरज दिन पर छाई कोहरे की नीली परत को जला रहा था। धूप के बावजूद खेतों में गाढ़ी हरियाली बिछी हुई थी और हवा नरम लचक से भरी हुई... आउटहाउस से वापस आते हुए माँ ने उसे देखा। वह उसका नकाब लेने चली गई। उसे बेतरह थकान हो रही थी और दर्द भी, लेकिन वह घाटी की ओर देखता रहा। उसे याद आया, वहीं सामने तीखे मोड़ पर ही तो फादर लॉउ ने उसका नकाब छिपा दिया था। नकाब... येशरिल ने जैसे अपने भीतर कुछ तलाशने की कोशिश की। तब तक माँ नकाब ले आईं।
“इससे पहले कि फादर आएँ, जाओ कहीं चले जाओ।”
येशरिल जानता था कि फादर के आने पर क्या होगा। उसने चुपचाप नकाब पहन लिया। जाने क्यों उसे लगा कि जैसे नकाब के भीतर सैंकड़ों पिस्सू रेंग रहे हैं। मगर बाहर तो उससे भी ज्यादा... येशरिल ने आह भरी और जैसे ही माँ ने पीठ घुमाई, खेतों की ओर बढ़ गया। कुछ कदम चलने के बाद येशरिल ने पलटकर देखा, माँ नल के नीचे पेसो का सिर पकड़े खड़ी थीं। पानी पेसो के सिर पर गिर रहा था और वह चिल्ला रहा था। मानो कोई ख्वाहिश पूरी होने वाली हो या कोई तोहफा मिलने वाला हो।
“नकाब…” येशरिल ने किसी आदत की तरह दोहराया और शहर की दौड़ने लगा। सब पीछे छूटता जा रहा था, लेकिन इस बार न वह गिर रहा था। न फिसल रहा था।
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डोमेनिकन अमेरिकन लेखक, मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी में क्रिएटिव राइटिंग के प्रोफेसर और पुलित्जर बोर्ड के सदस्य जूनोट डियाज़ का जन्म 31 दिसंबर 1968 को हुआ। उम्र के तीसरे दशक में प्रवेश करने से पहले ही लेखन में नाम कमा लेने वाले जूनोट की रचनाओं में 21वीं सदी की गहरी मनोवैज्ञानिक दृष्टि है जो हद दर्जे तक अमूर्त होने के बावजूद पाठकों को एक स्पष्ट सबक थमाती है।
उपमा ऋचा पिछले डेढ़ दशक से लेखन, संपादन व अनुवाद कार्य में सक्रिय हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : उपमा ऋचा
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