संदीप निर्भय की कविताएँ

प्लेटफ़ॉर्म नंबर पाँच
पूरे तीन महीने और इक्कीस दिन के बाद
जा रहा हूँ आज घर
दो साल सातेक महीने पहले गाँव जाने का नाम सुनते ही
हवा हो जाती थीं मेरे चेहरे की सारी उदासियाँ
और बँध जाते थे पैरों में घुँघरू
एक हफ़्ते पहले गाँव जाने की करता रहता तैयारी
ज्यों-ज्यों याद आते असबाब
त्यों-त्यों रखता जाता
सलीक़े से सूटकेस के भीतर
यह सिलसिला जारी रहता था ऐन टिकट वाली तारीख़ तक
अब मेरे भीतर नहीं उमगती ख़ुशी
जाना-आना ही तो है
इस शहर से उस शहर और उस शहर से इस शहर तक
जीवन की गाड़ी को धकियाकर ले आया तीस के पार
क्या बाक़ी का बचा जीवन यों ही गुज़र जाएगा
इन ठग-ठगोरी भारतीय रेलों में
जहाँ-तहाँ ज़िम्मेदारियों का थैला कंधों पर लिए
सोचता हूँ
और बहुत कुछ सोचने के बारे में
तभी मेरे ऊपर बीट कर उड़ जाता है कबूतर
बीट पोंछता हुआ
भीतर-ही-भीतर
निकालता हूँ उसे राजस्थानी में गालियाँ
तब तक निकालता रहता हूँ
जब तक तूर्री से तीखी ज़नाना आवाज़ सुनाई न दे—
"यात्रीगण कृपया ध्यान दें
गाड़ी संख्या 22476
कोयंबुत्तूर से हिसार जाने वाली गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म नंबर पाँच पर आने वाली है!"
पाग की लाज
जीवन के पचास बरस तक पिता पहनते आए पेंट-शर्ट
लेकिन आज देवउठनी ग्यारस को
पहने हैं धोती-कुर्ता
और करने हैं उन्हें गाँव-गाइंतरे
माँ के पास बैठे पोते खिलखिलाकर हँसते हैं
सुख-दु:ख की तुरपाई करना छोड़
पिता की तरफ़ देखकर
कहती है माँ—
उम्र के साथ-साथ ही तो फबता है पहनावा
भीतर से हाथों में चुनड़ी का साफा लिए पोती
पिता के पास आती है
और सिर पे पहनाकर
पूरा करती है एक चोट में वाक्य—
छोरो! अब लग रहे हैं दादो जी जैसे गाँव के पंचों की तरह
यह दृश्य देखकर मेरे अंतस में बैठा
एक और पिता
रूख की तरह
होता है हरियल
पिता पोती के सिर पर हाथ फेरकर चले जाते है
और पीछे छोड़ जाते हैं पितृसत्तात्मक बात—
"बेटी, बुआ की तरह तुम्हें
रखनी है आख़िरी दम तक पाग की लाज!"
तब से मेरे अंतस के पिता की सूख-सूखकर झड़ रही हैं पत्तियाँ।
याद
रेगिस्तान में कहीं डाकख़ाने के लाल बॉक्स की तरह
बरसों-से हिय की दीवार में
आख़िरी चुंबन की खूँटी पर
टँगी है
तेरी याद
रंग थोड़ा फीका ज़रूर पड़ा है इन दिनों
पर फ़िक्र मत करो
भादो की 'झड़ी' की तरह तुम आकर
डालकर चली जाओ
प्रेम के
ढाई आखर!
मेहंदी, चिड़िया और बिटिया
चारपाई पर बैठा मैं
पढ़ रहा था
किसी ख़ानाबदोश कवि की कविताएँ
तभी मेरी पाँचेक बरस की बिटिया
हाथ में मेहंदी की कुप्पी लिए
आती है मेरे पास
कुप्पी रखकर ठीक मेरे सामने
कहती है—
पापा ओ पापा! मेहंदी
इतने कहने भर से ही समझ जाता हूँ
कि आगे क्या कहेगी
किताब छोड़ काटता हूँ गालों पर चिकोटी
थामकर उसके हाथ
लगाने लगता हूँ
तन्मयता से
कोमल हथेलियों पर मेहंदी
बेल-बूटे, फूल, पत्तियाँ, चाँद-तारे
आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनाकर
देखता हूँ कि दाहिनी हथेली में
बीच वाली रेखा के ऊपर
बची रह गई थोड़ी-सी जगह
उस जगह चिड़िया बनाकर की पूर्ति
कुछेक देर बाद फुदकती हुई
दोबारा मेरे पास आती है
कहती है हौले-से
पापा! हनीं..हनीं
कितनी अच्छी रची है मेहंदी
उसकी हामी में सिर हिलाकर
मुस्कुराता हूँ मैं
फिर ग़ौर से हथेलियाँ देखती हैं
भौंहें चढ़ाकर पूछती है
पापा! पापा!
चिड़िया?
उस वक़्त मेरे मुँह से औचक ही निकलता है
उड़ गई चिड़िया फुर्र.. फुर्र.. फुर्र
और वह
हीं..हीं..हीं हँसने लगती है।
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युवा कवि संदीप निर्भय का एक कविता संग्रह 'धोरे पर खड़ी साँवली लड़की' (2020) में बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। एक लंबे अंतराल के बाद उन्होंने कविता में वापसी की है। ईमेल : sandeepnirbhy998@gmail.com
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