अनिल गंगल की कविताएँ

खिड़की के बाहर
खिड़की के बाहर एक पेड़ है—
जिसकी डाल पर हर सुबह एक चिड़िया आकर बैठती है
और कुछ देर शहर को देखती रहती है।
मुझे लगता है वह चिड़िया नहीं,
शायद कोई सवाल है जो उड़कर आया है
और मेरे कमरे में जगह तलाश रहा है।
नीचे सड़क पर दूध वाला साइकिल से उतरकर
एक घर के दरवाज़े पर बोतलें रखता है,
अख़बार वाला बंद दरवाज़ों के नीचे
दिन की ख़बरें सरका जाता है।
दुनिया इस तरह हर सुबह हमारे घर में प्रवेश करती है—
बिना दस्तक दिए।
खिड़की के बाहर एक आदमी रोज़
फुटपाथ पर बैठकर अपने जूते में पालिश करता है।
मैं उसे देखता हूँ
तो लगता है वह जूतों को नहीं,
किसी और के रास्ते को चलने लायक बना रहा है।
सामने वाली इमारत में एक लड़की कपड़े सुखाते हुए
अचानक रुक जाती है।
शायद उसे याद आया है
कि आज भी उसे अपने हिस्से का जीवन
किसी और की मर्ज़ी से जीना है।
खिड़की के शीशे पर धूप आकर ठहरती है,
फिर धीरे-धीरे खिसक जाती है—
जैसे कोई आदमी बात पूरी किए बिना सभा से उठ गया हो।
दोपहर में सड़क तपने लगती है।
एक बच्चा
पानी की टंकी के नीचे हथेलियाँ फैलाए खड़ा है
और उसकी माँ दूर से उसे देखती हुई
अपने खाली घड़े को और कसकर पकड़ लेती है।
मैं खिड़की बंद कर देता हूँ।
लेकिन बाहर की आवाज़ें अंदर आ चुकी होती हैं।
हॉर्न, सब्ज़ीवाले की पुकार,
किसी घर में झगड़ती हुई आवाज़,
किसी रिक्शे के ब्रेक की चीख—
सब मिलकर मेरे कमरे में एक ऐसी दुनिया बनाते हैं
जिससे बचने के लिए मैंने खिड़की लगाई थी।
शाम को वही चिड़िया लौटती है।
पेड़ पर बैठकर वह कुछ देर अँधेरे होते आकाश को देखती है,
फिर उड़ जाती है।
मैं सोचता हूँ—
शायद खिड़कियाँ बाहर देखने के लिए नहीं होतीं,
वे हमें यह याद दिलाने के लिए होती हैं
कि दीवार के उस पार भी एक दुनिया है
जो हमारी चुप्पी के बावज़ूद लगातार घट रही है।
और कभी-कभी खिड़की के बाहर खड़ी दुनिया
हमारे भीतर की
सबसे बंद खिड़की खोल देती है।
गौरी लंकेश
रात ने बेंगलुरु की एक गली में
तीन बार दरवाज़ा खटखटाया था—
पहली गोली एक देह में लगी,
दूसरी ने एक घर की ख़ामोशी को चीर दिया,
तीसरी शायद उन लोगों के लिए थी
जो समझते थे कि सवाल पूछने वाले
डरा दिए जा सकते हैं।
लेकिन सुबह सूरज ने अख़बार नहीं पढ़ा,
उसने सीधे शहर के चेहरे पर एक ख़बर लिख दी—
एक आवाज़ को मारा गया है,
मगर आवाज़ की ज़रूरत अभी बाक़ी है।
गौरी किसी ऊँचे मंच पर खड़ी
सिर्फ़ भाषण देती हुई स्त्री नहीं थीं;
वे उस काँटे की तरह थीं
जो सत्ता के मुलायम कपड़े में बार-बार चुभता था।
वे पूछती थीं—
किसके खेत में भूख उगती है?
किसके घर में नफ़रत पकती है?
किसकी ज़ुबान पर ताला लगता है?
और किसके हाथ में इतनी ताक़त आ जाती है
कि वह अपने झूठ को देश का सच कह सके?
उनकी कलम स्याही से कम
लोगों की बेचैनी से अधिक लिखती थी।
इसलिए शायद उन्हें मारना ज़रूरी समझा गया—
क्योंकि गोली चलाने वाले अक्सर जानते हैं
कि विचार की कोई देह नहीं होती जिसे दफ़नाया जा सके।
गौरी चली गईं,
पर उनके जाने के बाद सवालों ने अपना घर बदल लिया।
वे अख़बारों से निकलकर चौराहों पर आ गए,
विश्वविद्यालयों की सीढ़ियों पर बैठ गए,
किसानों के कंधों पर रखे पुराने गमछे में छिप गए,
और उन लड़कियों की आँखों में ठहर गए
जिन्होंने पहली बार 'नहीं' को पूरा वाक्य बनाकर बोला।
अब जब भी कोई सच बोलने से पहले
चारों ओर देखता है,
कहीं बहुत भीतर गौरी की आवाज़ पूछती है—
डर किससे है?
सच से या उस दिन से जब सच बोलने वाले
डरना छोड़ देंगे?
गौरी की हत्या एक देह की हत्या थी—
पर उसी क्षण सवाल ने अपना नया जन्म लिया था।
और सवाल, जब सचमुच जन्म ले लेता है,
तो गोली की पहुँच से बाहर एक लंबी उम्र लेकर आता है।
उज़बक
वे बहुत पढ़े-लिखे लोग थे।
उनके पास हर झूठ के समर्थन में एक शोधपत्र था,
हर अन्याय के पक्ष में एक संविधान-सम्मत तर्क,
हर हत्या के लिए एक राष्ट्रीय शोकगीत।
मैंने सिर्फ़ इतना कहा—
"ख़ून का रंग अभी भी लाल है।"
उन्होंने मुस्कराकर कहा—
"उज़बक!"
यह शब्द उनकी जेब में रखा सबसे सस्ता हथियार था।
जब तर्क हारने लगते,
वे उसे निकाल लेते।
जब तथ्य असहज करने लगते,
वे उसे हवा में उछाल देते।
जब आईना उनके चेहरे की तरफ़ मुड़ता,
वे आईने को नहीं,
देखने वाले को उज़बक कह देते।
धीरे-धीरे शहर में दो ही जातियाँ बचीं—
एक,
जो हर आदेश पर तालियाँ बजाती थी।
दूसरी,
जिसे उज़बक कहा जाता था।
पहली जाति तरक़्क़ी के भाषण लिखती रही।
दूसरी अपने बच्चों की फ़ीस, दवाइयों की पर्चियाँ
और राशन की पंक्तियाँ गिनती रही।
इतिहास ने हमेशा एक अजीब आदत निभाई है—
दरबार जिन लोगों को उज़बक लिखता है,
समय अक्सर उन्हीं के नाम के आगे
‘नागरिक’ लिख देता है।
और जिनके सिर पर बुद्धिमानी का ताज रखा जाता है,
उनकी क़ब्रों पर कभी-कभी सिर्फ़ ख़ामोशी उगती है।
तूतनखामन की ममी
हज़ारों वर्षों से एक किशोर राजा
अपने ही मौन के भीतर इतनी सावधानी से रखा गया है
जैसे समय ने अपनी सबसे नाज़ुक भूल
सोने की तहों में लपेट दी हो।
उसके चेहरे पर चढ़ा मुखौटा दरअसल
एक साम्राज्य का आख़िरी बहाना है—
कि मृत्यु को भी राजकीय भाषा सिखाई जा सकती है।
लेकिन देखो,
रेगिस्तान की धूल वंशावलियों का व्याकरण नहीं पढ़ती।
वह हर राजदण्ड को धीरे-धीरे साधारण लकड़ी में बदल देती है।
जो हाथ नील के किनारों पर
देवताओं की मुहर बनकर उठते थे,
आज पट्टियों की गाँठों में
अपनी ही उँगलियों का पता पूछते हैं।
पिरामिड धरती की स्मृति पर रखा हुआ
एक विशाल विराम-चिह्न है,
जिसके भीतर एक किशोर की साँस
इतिहास के कान में अब भी अधूरा वाक्य बनी हुई है।
पुरातत्त्ववेत्ता जब उसकी समाधि खोलते हैं,
तो केवल सोना नहीं मिलता—
मिलती है सभ्यता की वह घबराहट
जो मानती रही कि वस्तुओं को बचा लेने से
मनुष्य भी बच जाएगा।
पर समय किसी संग्रहालय का दर्शक नहीं।
वह काँच के पार खड़ा होकर हर चेहरे से
उसका वर्तमान उतार लेता है।
तूतनखामन अब मिस्र का राजा कम,
मनुष्य का प्रश्न अधिक है।
वह पूछता है—
यदि इतनी समृद्ध मृत्यु के बाद भी एक शरीर को
दूसरों की आँखों में जीवित रहने के लिए प्रदर्शनी बनना पड़े,
तो फिर सिंहासन किसके लिए था?
और अमरता—
क्या वह सिर्फ़ उन लोगों की कल्पना है
जो अपने समय पर विश्वास नहीं कर सके?
पुनर्जन्म
मेरे भीतर एक आदमी नहीं रहता—
कई चेहरे हैं जो बारी-बारी से मेरी आँखों में उतरते हैं।
एक चेहरा बहुत सभ्य है,
हर बात पर मुस्कुराता है,
दर्द को भी शिष्टाचार की तरह सहता है।
एक चेहरा भीड़ में खड़ा होकर चुप रहता है—
जानता है सच,
पर बोलने से डरता है।
एक चेहरा विद्रोही है,
दीवारों पर अपनी उँगलियों से लिखता है—
“मैं सहमत नहीं हूँ।”
एक चेहरा बहुत थका हुआ है,
वह किसी से कुछ नहीं कहता,
बस रात के अँधेरे में अपने ही कंधे पर
सिर रखकर सो जाता है।
एक चेहरा बचपन का है—
मिट्टी से सना हुआ,
आसमान को छू लेने की जिद में अब भी खड़ा है।
एक चेहरा पिता की तरह कठोर,
माँ की तरह नम,
प्रेमी की तरह बेचैन,
और अपराधी की तरह अपने ही भीतर
कटघरे में खड़ा है।
एक चेहरा दुनिया को ख़ुश रखने में इतना व्यस्त रहा
कि उसे यह याद ही नहीं रहा
कि उसे खुद क्या चाहिए।
और एक चेहरा—
जिसे मैंने सबसे गहरे अँधेरे में छिपा रखा है—
वह न अच्छा है, न बुरा।
वह सिर्फ़ सच है।
वही चेहरा आईने के सामने मुझसे पूछता है—
इन सबके बीच तुम कौन हो?
मैं जवाब खोजता हूँ,
पर हर बार एक नया चेहरा मेरे सामने आ जाता है।
शायद पुनर्जन्म यही है—
अपने भीतर एक चेहरे की मृत्यु
और दूसरे के जन्म को देखते रहना।
मैं हर सुबह वही आदमी नहीं उठता
जो रात को सोया था।
कुछ भय रात में मर जाते हैं,
कुछ इच्छाएँ सुबह जन्म लेती हैं।
कुछ रिश्ते मेरे भीतर से उतर जाते हैं,
कुछ अनजान लोग मेरी आत्मा में घर बना लेते हैं।
इसलिए मेरी कोई एक पहचान नहीं।
मैं अपने ही भीतर चलता हुआ एक शहर हूँ—
हर गली में मेरा अलग चेहरा,
हर मोड़ पर मेरा अलग जन्म।
और शायद जिस दिन मैं अपने सभी चेहरों को
बिना शर्म, बिना भय,
बिना किसी एक को सही और दूसरे को गलत ठहराए
देख सकूँगा—
उस दिन मेरा सबसे सच्चा चेहरा
पहली बार जन्म लेगा।
शब्दों के धागों से मैं कविता बुनता हूँ
शब्दों के धागों से मैं कविता बुनता हूँ—
लेकिन हर धागा मेरे हाथ से निकलकर
कहीं न कहीं किसी अनकहे दुख से जुड़ जाता है।
एक शब्द है
जिसकी गाँठ खोलते ही बचपन की वह दोपहर निकल आती है
जब माँ ने अपनी साड़ी के किनारे से
मेरे फटे कुरते को बाँध दिया था।
एक शब्द है—
जिसे बोलते ही बाज़ार के शोर में
सब्ज़ी बेचती वह औरत दिखाई देती है
जो भाव कम करने की गुंजाइश में
अपना शाम का खाना घटा रही है।
कुछ शब्द इतने पुराने हैं
कि उनके भीतर दादा की खाँसी,
बाप की चुप्पी और घर के आँगन में
धीरे-धीरे बूढ़ी होती कुर्सी अब भी बची हुई है।
मैं उन्हें कविता में रखता हूँ
तो वे अर्थ नहीं रहते,
चेहरे बन जाते हैं।
कभी कोई शब्द
मेरी उँगली में चुभ जाता है—
जैसे किसी मजदूर की हथेली से निकला हुआ
लोहे का महीन कण।
मैं उसे निकालता नहीं,
कविता में रहने देता हूँ,
क्योंकि बिना चुभन के कह दिया गया सच
अक्सर बहुत जल्दी भुला दिया जाता है।
मैंने प्रेम के लिए भी शब्द चुने हैं,
मगर पाया—
प्रेम किसी शब्द में पूरा नहीं आता।
वह तो उस आदमी की तरह है
जो बरसों बाद घर लौटकर दरवाज़े पर खड़ा रहता है
और भीतर से आती आवाज़ सुनकर भी
दस्तक नहीं देता।
मेरी कविता में
कुछ शब्द रोशनी की तरह आते हैं,
कुछ अपनी जेब में अँधेरा लिए,
कुछ सवाल बनकर,
कुछ ऐसे जवाब जिन्हें सुनने के लिए
समय को अपनी गर्दन झुकानी पड़ती है।
मैं शब्दों को सिर्फ़ जोड़ता नहीं—
उनके बीच की ख़ामोशी भी बुनता हूँ।
क्योंकि कई बार जो कहा नहीं गया
वही कविता के भीतर सबसे देर तक बोलता है।
इसलिए मेरी कविता किसी सजाए हुए कपड़े जैसी नहीं,
उस पुराने कम्बल जैसी है
जिसमें अलग-अलग घरों से आए छोटे-छोटे कपड़े जुड़े हैं—
कहीं माँ का आँचल,
कहीं खेत की मिट्टी,
कहीं शहर की धूल,
कहीं भूख से सिकुड़ा चेहरा,
कहीं प्रेम की बची हुई गर्मी।
शब्दों के धागों से मैं कविता बुनता हूँ
और हर बार एक बात समझ में आती है—
कविता बनाना दरअसल शब्दों को सुंदर करना नहीं,
उनके भीतर छिपी हुई मनुष्य की आवाज़ को
इतनी सावधानी से बाहर लाना है
कि वह टूटे भी नहीं और दबे भी नहीं।
फिर भी हर कविता पूरी होने के बाद
मुझे लगता है—
अभी एक धागा बचा है,
जिससे किसी अनजान आदमी की फटी हुई जेब सी जानी है।
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वरिष्ठ कवि अनिल गंगल (जन्म : 1954) के अब तक छह कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। कविता-संग्रह 'स्वाद' पर राजस्थान साहित्य अकादमी का 'सुधींद्र पुरस्कार' तथा राजस्थान जनवादी लेखक संघ का 'अंतरीप सम्मान' प्राप्त। अनेक विदेशी कविताओं, कहानियों व निबंधों के अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रकाशित। कुछ पुस्तकों के अनुवाद भी प्रकाशित। ईमेल : gangalanil80@gmail.com
ਖੰਡ ਮਿਸ਼ਰੀ, ਸੀ ਪਰਿਚਯ ਆਲਾ ਪੇਜ
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