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जनमेजय की कविताएँ

19 hours ago
3 min read


वहाँ


वहाँ, वह जगह 

जहाँ से मैं लिख रहा हूँ

बहुधा मैं सोचता हूँ कि

मैं भी वही जगह हूँ


लेकिन दूरी का एक आभास होता है


और यह आभास वह समय है

जिसके बारे में, मैं नहीं जानता

कि सड़कों को कहाँ रखना चाहिए

यद्यपि हमारे घर उनके बिना 

नग्न खड़े हैं और जीवित हैं


हमें अपना डर दिखाई नहीं देता  

हमारी यात्राएँ क्रमश: संक्षिप्त होती जा रही हैं

हमारी थकान का विस्तार नदियों तक होने लगा है।


मैं भी अब अपनी प्रतीक्षा नहीं करता हूँ 

अगली सुबह फिर से उसी शहर में जाग पड़ता हूँ


लेकिन क्या मैं इसे पहचानता हूँ

और क्या यहाँ की सड़कें, यहाँ के घर 

और इनके विपरीत मेरा स्वागत करते हैं?



गिरना

 

मेरे ‘मैं’ मुझसे दूर नहीं हैं

बस एक-दूसरे से दूर हैं और

ये दूरियाँ रास्ता भटक गई हैं 

विलगाव में एक के उपर एक

विलंबित वर्षों में जहाँ डर भी 

टूटने के कगार पर पहुँच कर 

स्थिर हो चुका है।


सीढ़ियाँ गहनतम गहराइयों में खुलती हैं

यहाँ संसार की नींव तीव्र प्रकाश में

इतना तीव्र कि हम अंतर भूल जाते हैं

हमारी भूलों के बोझ को 

अपनी काँपती उँगलियों पर 

बिना पैरों वाले चकराते घर 

की तरह पहने है।


हम गिर सकते हैं लेकिन 

क्या हम गिरने को माफ़ कर सकते हैं?

क्या हम डरने को माफ़ कर सकते हैं?



सन्नाटा


मैं एक अंतराल हूँ

अपने विभाजित क्रम में

जहाँ मैं एकत्र करता हूँ

वस्तुओं की एक सूची 

जो यहाँ उनकी आकांक्षा से भी 

पहले चली आती है


मुझे याद नहीं रहे 

मनुष्यों के नाम

न ही उनकी जड़ों की 

मिट्टी, सीलन और अँधेरा, लेकिन 


गर्म सड़क पर बनी झील में झलकती 

एक भूखी प्यास फिर भी है मेरे पास


कब-कब और कैसे-कैसे

नाम दिए जा सकते हैं इसे

जब मैं भी अपनी आवाज़ खाता हूँ


फिर बचता है वही परिचित सन्नाटा 

एक संकेत 

सामूहिक आवाज़ों का‌।



चेहरे


रात की काल्पनिक संभावना में 

अँधेरे का असीम विस्तार 

मुखौटों को चुनौती देता है 

और वे हवा में खड़खड़ा कर

चेहरे बदल लेते हैं


तुम्हारा अपना चेहरा अब तुम्हारा नहीं 

कोई दूर उसे छूता है 

अपने बेहद क़रीब और तुम 

रात के बाहर सिर उझका कर 

अपने दिन को धूप में जलते देखते हो


एक मूर्छित पार्क के किनारे 

रात खड़ी होती है दिन के बीचों-बीच 

जहाँ से भीड़ की ओट में

सभी की तरह हर कोई 

सिर झुकाए चुपचाप गुज़र जाता है 

लाचार या फिर शर्मिंदा।



कल


सफ़ेद पेन की काली स्याही से

दिन के चहरे पर दर्ज हैं

हमारी रातें


सुबह अपनी काया 

टटोलना शुरू करती है 

कल की यादों की उँगलियों से


दोपहर कुछ नहीं

सिर्फ़ सूर्य की परछाई भर है


और शाम एक जगह 

जहाँ सभी आकर मिलते हैं

अपने-अपने कल में 

सरकने से पहले।



सफ़ेद दर्पण


कमरे का सम्पूर्ण आयोजन अब एक अरण्य है। इसके दरवाज़े के भीतर विस्तृत दीवारें हैं और वस्तुओं  के बीच की दूरी संतुलन की संज्ञा जैसे बहुत ज़्यादा उम्मीद का होना वैसे ही है जैसे किसी उम्मीद का न होना। अपनी पहचान थोड़ी देर के लिए मकड़ियों के परित्यक्त घरों में स्थगित कर, मैं कमरे के कोनों से संवाद शुरू करता हूँ। लेकिन, क्योंकि मेरे पास अब पर्याप्त स्मृतियाँ नहीं हैं, मैं अवहेलना का आसान शिकार हो सकता हूँ। दीपक की लौ की तरह धीरे-धीरे लगातार काँपता मेरा सिर और चौकन्ना रहने का प्रयास करते मेरे फेफड़े... मैं गिनता हूँ

एक साँस...

फिर दूसरी साँस...

और फिर तीसरी और इसी तरह आगे।


मैं इस जंगल में या यह जंगल मेरे कमरे में क्यों भटकने जैसा कुछ कर रहा है? खिड़की के काँच से कीट-पतंगों के टकराने की आवाज़ें लगातार नीचे गिरती जा रही हैं। इन आवाज़ों की प्रतिछायाओं के बढ़ते ढेर और शब्दों पर बढ़ते दबाब में मेरी सनक भी उन मंत्रों के प्रति बढ़ती जा रही हैं जो केवल तभी सुनाई पड़ते रहे हैं जब-जब अन-उच्चारित रहे हैं।


लेकिन, यह मैं कौन रहा होगा? दीवार पर टँगा  यह फ़्रेम मेरी जिज्ञासा नहीं बढ़ाता है। म्यूज़ियम को और भी बहुत से रोचक फ़्रेमों से सजाया गया हैं जैसे एक दर्पण जिसे सफ़ेद रंग दिया गया है।


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जनमेजय युवा कवि हैं। उनकी कविताओं का दार्शनिक भाव आकर्षित करता है। पिछले दो वर्षों में उन्होंने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाना जारी रखा है। कृति बहुमत, जानकीपुल, सब लोग, पोएम्स इंडिया, गोल चक्कर, सेतु पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।


गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए ‌: जनमेजय







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