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धर्मेश‌ सिंह की कविताएँ

8 hours ago
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अर्द्धनिद्रा में अर्द्धसत्य


पूरी रात 

बार-बार उचटती नींद के मध्य 

अर्द्धचेतना में ही

महसूस करता हूँ

अपनी धमनियों में दौड़ते 

ठंडे पड़ चुके रक्त को


अकड़ता जाता है शरीर

जैसे सैकड़ों साँप

लिपटते जा रहे हों

सिर से पाँव तक


निष्प्राण होती जा रही हथेलियों से

चेहरे को स्पर्श करने की कोशिश करता हूँ


लगता है जैसे

चेहरा किसी दोमुँहे साँप में बदलता जा रहा है


महसूस करता हूँ

स्वयं का दोमुँहा होते जाना

और गति करना

दो विपरीत दिशाओं में


अर्द्धनिद्रा में ही

एक दृश्य देखता हूँ

जिसमे मैं पोस्टर लिए खड़ा हूँ

पोस्टर में एक तस्वीर है 

तस्वीर में मैं हूँ

और ऊपर लिखा है–

गुमशुदा की तलाश


छटपटाकर 

अचानक नींद से उठता हूँ

महसूस करता हूँ

तेज़ी से धड़धड़ाते हृदय को

मन अजीब बेचैनी और भय से भर जाता है

सोचता हूँ कि

अभी जो देखा 

वह स्वप्न था या हक़ीक़त 

मन ही मन 

ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ

कि स्वप्न ही हो तो अच्छा है


यह जानते हुए भी कि

यह स्वप्न पूर्ण सत्य भले न हो

अर्द्धसत्य तो है ही 

स्वप्न के हक़ीक़त में बदलने से पहले

वरदान में

मृत्यु माँगता हूँ


पर सच कहूँ

मैं मरना नहीं चाहता 

हे मेरे ईश्वर! बचा लो मुझे 

मैं दोमुँहा साँप नहीं बनना चाहता 

मनुष्य रहना चाहता हूँ

मैं जीना चाहता हूँ

हे मेरे भगवन! बचा लो मुझे!


  

द ओल्ड गिटारिस्ट

 

रात का तीसरा पहर

दिन भर की भाग-दौड़ भरी यात्रा के बाद

अपने बिस्तर पर निढाल पड़ा हुआ मैं


साथ में तुम्हारे न होने का अकेलापन

जो भारी है मेरे मन के एकांत पर

देख रहा हूँ कमरे के उस हिस्से को

जो तुम्हारे होने से और भी ख़ूबसूरत हो सकता था


कमरे की बेजान पड़ी दीवार पर लगी 

पिकासो की ‘द ओल्ड गिटारिस्ट’

सूचक है

तुम्हारे न होने से उत्पन्न अवसाद का


खिड़कियों के काँच पर जमी हुई धूल

चौबीसों घण्टे कमरे में

अँधेरे की मौजूदगी बनाए रखने का 

पूरा ख़्याल रखती है


कमरे से आ रही बदबू

उस बदबू से बेफ़िक्र पड़ा हुआ मैं

बताता है कि सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा


जीवन का प्रत्येक क्रिया-कलाप

तुमको खोने-पाने की 

जद्दोजहद से उपजी टीस मात्र है 


रात भर की बेचैनी के बाद 

हर सुबह अपनी बालकनी से 

स्कूल ड्रेस में कोचिंग जाती हुई लडकियों,

नहाने के बाद तौलिए से

अपने गीले बालों को झिड़कती  

नवयुवतियों को देखकर,

साइकिल और उसकी घंटी की आवाज़ सुनकर चौंकता हुआ मैं

खोजता हूँ तुमको

और तुमको खोजते-खोजते

बन जाता हूँ वही लड़का

जो तुम्हारे साथ 

कुछ दूर चलने की ख़्वाहिश में

तेज़ी से अपनी साइकिल भगाता हुआ 

पहुँचता था तुम तक 


आज भी तुम्हारे बिना की गई प्रत्येक यात्रा

समाप्त हो जाने के बाद भी अधूरी-सी लगती है


समाप्त हो जाना

असमय अंत है 

कई सारी संभावनाओं का


समाप्त हो जाना

पूर्ण हो जाना नहीं होता।



सलोनी लड़कियाँ 


तुम सब कहते हो कि

संवेदनाहीन हो चुकी है दुनिया

किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

दूसरे के जीने या मरने से

हर कोई बस अपने दुख कह लेना चाहता है

दूसरे को सुनना किसी को नहीं पसंद

हर कोई बस साथ पाना चाहता है

साथ देना किसी को नहीं पसंद

सूख चुका है सबकी आँखों का पानी

सर्द हो चुका है सबका हृदय 

और जम गई है उसकी तरलता


नहीं! नहीं! नहीं!

मैं यह सब नहीं मानता

झूठ कहते हो तुम सब

तुम सबने नहीं देखा है उसे


मैंने देखा है उस लड़की के हृदय को

जो रो पड़ती है 

दूसरों के दुखों को महसूस करके

एक लड़की जो नहीं समझ रही

अपने आस-पास के लोगों के छल-प्रपंच 

और इर्द-गिर्द घट रहे राजनीति के दाँव पेंच को


धीरे-धीरे

उसके चारों ओर मँडरा रहे गिद्ध

नोचने लगे हैं उसके हृदय और कोमल मन को


एक लड़की जिसे देखकर लगता है कि

दुनिया अब भी बची हुई है

उसके कोमल, नर्म, नाज़ुक-से हृदय के भीतर


उसकी कोमलता और प्रेम ने

सहेज रखा है मुझे

और ऐसे ही न जाने कितने लोगों को


एक लड़की है

जो किसी अनजान-से लड़के को

प्यार से बाँध देती है राखी

और कहती है—

आज से हम दोनों भाई-बहन 


‘आज से हम दोनो भाई–बहन’

क्या इतना कह देना भर काफ़ी नहीं है

इस दुनिया को सुंदर बनाने के लिए?


जब तक ऐसी भोली और सलोनी लड़कियाँ

हिस्सा हैं इस दुनिया का

तब तक बची रहेगी इस दुनिया में

थोड़ी-सी तरलता

थोड़ा-सी कोमलता

और थोड़ा-सा प्रेम


जब तक बची रहेंगी ऐसी लड़कियाँ

मैं यक़ीन करता रहूँगा कि

ईश्वर भी इसी दुनिया का हिस्सा है

और हमारे आस-पास कहीं मौजूद है।



नियति का पसंदीदा आखेट


जब कभी तुम मुझे मिलना

गले लगाने से पहले 

मुझे तुम्हारे पैर छूने देना


तुम्हारे पैर छूने का विचार आते ही मैं

पाता हूँ ख़ुद को गंगा में डुबकी लगाते हुए 


कई ख़्वाहिशें जो तुम्हारे जाने के बाद जन्मीं

तुम्हारे पैर छूना उनमें से एक है 


तुम्हारे जाने के साथ

तुम्हारे साथ चला गया था मैं

जो बचा रह गया था 

वो तुम थीं


तुम्हारी अनुपस्थिति में मैंने 

सहेज रखा है तुम्हें 

और लोगों को लगता है 

कि ये मैं हूँ


भावुकता 

जो मनुष्य के संवेदनशील होने का प्रतीक है

उसे स्त्री की कमज़ोरी मान लिया गया

और पुरुष के लिए उसकी कायरता


तुमको जीते हुए मैं

जी रहा हूँ दोनों को


मेरे भीतर की स्त्री और उसका पुरुष 

कभी एक-दूसरे से लिपटकर रो नहीं पाए

कि कहीं उनके प्रेम को 

कमज़ोर या कायर न समझ लिया जाए

 

तुम्हारे जाने के बाद मैं 

वह विधवा हो गया हूँ 

सूनापन ही जिसकी नियति है

और शृंगार जिसके लिए अपराध 


भावुकता या प्रेम 

जो भी सुंदर है 

वह समाज के लिए वेध्य है 


सच है 

प्रेम करना मनुष्य की नियति है

और प्रेम नियति का पसंदीदा आखेट।



धर्मेश‌ सिंह की कविताएँ पहली बार किसी साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हो रही हैं। उनकी कविताओं से लगता है कि वह समाज को एक आदर्श वैचारिकी से देखने का संघर्ष करते हैं। उनकी कविता अपनी बुनावट में अभी उनके द्वारा पढ़े हुए कवियों के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाई है—यह धीरे-धीरे होगा। बहरहाल, उनकी कविता यात्रा की यहाँ से शुरुआत होती है। शुभकामनाएँ। ईमेल : dharmeshsingh521@gmail.com 



ਖੰਡ ਮਿਸ਼ਰੀ : ਪਰਿਚਯ ਵਾਲਾ ਪੇਜ




 




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