अपने-अपने नामवर (सात प्रसंग)
Updated: Jun 20

अपने-अपने नामवर (सात प्रसंग)
कुमार मुकुल
(1)
बचपन में अंग्रेजी के शिक्षक पिता की टेबल पर जिन किताबों से मेरा साबका पड़ता था, उनमें शेक्सपीयर के कम्पलीट वर्क्स के अलावे दिनकर की कविताओं का संकलन 'चक्रवाल', मुक्तिबोध की 'भूरी-भूरी खाक धूल' के अलावा नामवर सिंह की 'दूसरी परंपरा की खोज' और 'कविता के नये प्रतिमान' भी थीं। उस समय नामवर सिंह की किताब में जो कवितांश थे, बस उन्हें पढकर कुछ समझने की कोशिश करता। मुक्तिबोध तब तक कुछ खास समझ में आते नहीं थे। हाँ, दिनकर की कई रचनाएं कंठस्थ थीं। उस समय वे कवितांश कुछ अजीब लगते। खासकर रघुवीर सहाय की जिन पंक्तियों को नामवर जी ने उद्धृत किया था, मैं उन्हें बार-बार पन्ने पलट कर देखता -
“बिल्ली रास्ता काट जाया करती है
प्यारी-प्यारी औरतें हरदम बकबक करती रहती हैं
चाँदनी रात को मैदान में खुले मवेशी आ कर चरते रहते हैं
और प्रभु यह तुम्हारी दया नहीं तो और क्या है
कि इन में आपस में कोई सम्बन्ध नहीं।”
(2)
नामवर सिंह से मेरी अधिकांश मुलाकातें पटना की गोष्ठियों के दौरान हुईं जिसमें शामिल होने वे जब-तब आते थे। इस दौरान एकाध बार मुझे उन्हें किसी गंतव्य तक साथ ले जाने का मौका मिला। खगेन्द्र ठाकुर पटना में मेरे पड़ोसी हैं तो संभवतया उनके यहाँ से अरुण कमल के यहाँ या वहाँ से इनके यहाँ। ठीक से याद नहीं। रास्ते में यूँ ही से एकाध सवाल पूछे उन्होंने, बस।
उनकी जो कड़क छवि थी इस कारण शायद मैं अपनी ओर से उतना उत्साहित नहीं रहा होऊं कुछ पूछा-पेखी के बारे में। हालांकि बाद की कुछ मुलाकातों ने यह साफ कर दिया कि उनकी कठोरता केवल अनावश्यक घेराव से बचाव की एक मुद्रा थी, उनकी कविताएँ भी इसकी पुष्टि करती हैं-
“एक बार जो लगी आग, है वही तो हँसी
कभी आँसू, ललकार कभी, कभी बस चुप्पी।”
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उनसे अगली मुलाकात आलोचक, प्राध्यापक नंद किशोर नवल के आयोजन में हुई जो वे अपने रिश्तेदार व गीतकार रामगोपाल रूद्र की याद में करते थे। उस समय मैंने रघुवीर सहाय पर अपना आलोचनात्मक आलेख पूरा किया था और उसे मुजफ्फरपुर की एक पत्रिका को प्रकाशनार्थ भेजा था जिसके संपादक केदार जी से परिचित थे और पटना आने के पहले वे मेरा लेख देख चुके थे।
वह मुलाकात मेरे लिए प्रेरक रही। क्योंकि उस समय कार्यक्रम के पहले एक होटल में जहाँ नवल जी, नामवर जी, केदार जी, केदारनाथ कलाधर, अपूर्वानंद आदि दर्जन भर लोग उपस्थित थे, केदार जी ने उत्साहवर्धक ढंग से नामवर जी से मेरे लेख की चर्चा की थी। फिर उससे संबंधित तथ्य पर संवाद भी हुआ था। अंत में जब मैं वहाँ से निकलने लगा तो श्री कलाधर ने, जिनसे एक दशक पूर्व के एक अप्रिय प्रसंग के चलते मेरा कोई संवाद नहीं था, मेरी पीठ ठोकते बधाई दी, उस संवाद के लिए।
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एक रोचक वाकया और याद आ रहा। पटना के एक युवा कथाकार ने अपनी पहली पुस्तक के लोकापर्ण में नामवर की अध्यक्षता अरेंज कर ली थी। हम लोग सोच रहे थे कि उनकी कहानियों में जो है सो है पर भाषा में कई गडबडियाँ हैं। हम लोग गोष्ठी में गये और उनके अध्यक्षीय वक्तव्य का इंतजार करने लगे। अंत में जब वे बोले, तब हम आश्वस्त हुए कि नामवर में कुछ तो है, केवल उन्हें अरेंज कर लेने से कुछ नहीं होने का। किताब पर जो उन्होंने कहा उसका सार था कि बेटा कहानियाँ बाद बाद में लिखना, पहले कुछ भाषा सीख लो।
हालांकि काफी बाद के दिन में दिल्ली में जब अनाम से एक कवि के कविता संग्रह पर, जो अनाम ही रह गये, उनका ब्लर्ब देखा तो निराशा हुई क्योंकि वह बहुत सतही ढंग से लिखा था। मुझे लगा कि यह उनका लिखा नहीं बस उनकी सहमति मिल गयी होगी।
इस संदर्भ में मुझे अपना ही एक वाकया याद आ रहा जब एक प्रतिष्ठित, वरिष्ठ कथाकार मित्र ने एक कथा लेखिका के संकलन का ब्लर्ब लिखने को मुझे कहा था कि यार, कुछ लिख दो और मैंने लिख दिया था।
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एक रोचक प्रसंग नामवर के निमित्त प्रसंग का भी है। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी देश में जहाँ-तहाँ 'नामवर के निमित्त' कार्यक्रम आयोजित करवा रहे थे। पटना में भी कार्यक्रम होना था तो उन्होंने मेरे अग्रज, पत्रकार मित्र श्रीकांत को कार्यक्रम की कुछ व्यवस्था करने को कहा। प्रोग्राम कई सत्रों में होना था। श्रीकांत जी से जब उस दौरान भेंट हुई तो उस कार्यक्रम की चर्चा करते किसी ने कहा, “ ...प्रोग्राम तो होगा पर इसमें हम लोगों का (पत्रकारों का) भी कोई प्रतिनिधि होना चाहिए कि नहीं। कि मंच पर केवल साहित्यकार लोगों का ही कब्जा रहेगा।”
इस पर श्रीकांत ने कहा, “है न, अपनी ओर से मुकुल करेगा हिस्सेदारी।”
मैं हँसा। अरे, नामवर जी के कार्यक्रम में मैं कहाँ समाऊंगा। इस पर अपनी शैली में उन्होंने कहा, “...बोलो, तैयार हो बोलने को, फाइनल करो।”
मैंने कहा, ‘अरे इतना गंभीर कार्यक्रम है, विषय भी गंभीर होना चाहिए। मुझसे इतनी जल्दी कैसे होगा?”
उन्होंने कहा, “आलोचना की संस्कृति पर लिखो कुछ, पर लिखो ऐसा कि सबको जवाब मिले। बोलो कि लिखोगे, अभी तय करो।”
मैंने कहा, “ठीक है। अभी पंद्रह दिन हैं तो कुछ तैयारी कर लूंगा।”
फिर मैंने कुछ पढ़-लिखकर, नोट्स लेकर एक टिप्पणी तैयार की। जिसका शीर्षक था- ‘हिंदुस्तानी समाज और आलोचना की संस्कृति'। इस टिप्पणी की अंतिम पंक्तियां थीं - “... स्वांत: सुखाय वाली तुलसी की धारा नामवर सिंह के मंच लूटने वाले वक्तव्यों में भी दिखती है। इसे वे 'मेरी हिम्मत देखिए, मेरी तबीयत देखिए, सुलझे हुए मसलों को फिर से उलझाता हूँ मैं ... ' कहकर परिभाषित भी करते हैं। जबकि नामवर सिंह के ही पिछले लेखन का काल दूसरी धारा का परिचायक है। जिसे याद कर कभी शमशेर ने अकबर इलाहाबादी का शेर उद्धृत करते हुए नामवर सिंह के बारे में कहा था - 'हमारी बातें ही बातें हैं, सैयद काम करता था... न भूलो फर्क जो है, कहने वाले करनेवाले में ...।'”
टिप्पणी पढकर जब निकला तो अरुण कमल ने मेरी पीठ ठोक हौसला अफजाई की। अंत में नामवर सिंह ने अपने वक्तव्य में जब कहा कि लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि कहाँ बोेल रहे और क्या बोल रहे तो मैंने सोचा कि उनका निर्देश कहीं मेरे लिये तो नहीं। क्योंकि यह आयोजन उनके सम्मान में था। बाद में उपरोक्त टिप्पणी प्रभात खबर के 'दीपावली अंक' में और फिर अरसा बाद 'सब लाेग' पत्रिका में छपी।
फिर दिल्ली में गोष्ठियों में जब-तब मुलाकातें हुईं उनसे। दो-तीन बार उनके आवास पर भी जाकर मिला मित्रों के साथ सामयिक प्रसंगों में।
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उनसे अंतिम मुलाकात 2009 में हुई थी। पुष्पराज और रामजी यादव के साथ कनॉट प्लेस की एक संकरी गली में उदभ्रांत जी की कार में बैठ रसरंजन करते हुए रामजी यादव को कुछ ख्याल आया और वे बोले - “भईवा, कल नामवरी सिंह से मिला जाय।”
तय हुआ कि ठीक है मिला जाए। तब रामजी यादव ने अपना बनारसी परिचय देकर उनसे मुलाकात का समय लिया। सुबह नौ बजे हम लोग पहुँचे थे। दरवाजा खुलने पर रामजी भाई ने उनके पैर छुए फिर मैं झुका तो उन्होंने पैर खींचते कहा - “अरे आओ, आओ।” दरअसल इससे पहले की मुलाकातों में मैंने कभी यह उपक्रम किया नहीं था सो शायद उन्हें असहज लगा।
खैर हमलोग कुछ देर बैठे। इधर-उधर की बातें हुईं। मैंने उन्हें ‘मनोवेद’ की प्रति दी। उसे उलट-पलट कर उन्होंने पूछा - “क्या, मैं यह प्रति रख सकता हूँ?”
मैंने लज्जित होते कहा - “सर, आपके लिए ही है यह।”
उस समय वे कुछ अस्वस्थ से थे, अपनी असहायता दर्शाते वे बोले - “मैं तो इस लायक भी नहीं कि आपको चाय पिला सकूं। पानी आप उधर फ्रिज से लेकर पी सकते हैं।”
हम लोगों ने कहा - “सर, हम लोग ले लेंगे।”
उनकी धोती पीली-सी थी। मैंने सोचा - “क्या नामवर जी नील का प्रयोग नहीं करते। फिर मुझे वे पिता की तरह लगे, मन में सोचा कि कहूं कि लाइए आपके पाँव दबा दूँ।”
पर नहीं कह पाया, पिता को ही कहाँ कह पाता था। वे खुद अपने पाँवों में तेल लगाते दिखते थे जब-तब।
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नामवर सिंह के संपादन में तीन बार मेरी रचनाएँ छपीं। पहली बार पटना से निकलने वाले पाक्षिक 'न्यूज ब्रेक' के साहित्य विशेषांक में मेरी एक उपन्यासिका (जो अधूरी रह गयी) के अंश छपे। न्यूज ब्रेक में उप-संपादक के तौर पर मैं भी काम करता था। प्रेम भारद्वाज से पहली संगत उसी पत्रिका के समय हुई। वे भी वहीं थे। मधुकर सिंह पत्रिका के साहित्य संपादक थे और नामवर जी को उन्होंने ही अरेंज किया था। उस अंक में मेरे कुछ स्केच भी छपे थे। मेरी कोई कविता उसमें छपी थी या नहीं, यह याद नहीं आ रहा।
दूसरी बार एक अन्य साहित्य विशेषांक में मेरी एक कविता छपी। 'नवभारत' जैसा नाम था शायद उसका कुछ। उस समय अग्रज कवि मित्र रामकृष्ण पांडेय ने उसके लिए कविताएँ मांगी थीं। पत्रिका मिलने पर जाना कि इस अंक के संपादक नामवर जी हैं। 'इच्छाओं की कोई उम्र नहीं होती' शीर्षक कविता उसमें तीसरी बार छपी थी और उसके लिए 2000 रुपये भी मिले थे। पहली बार इस कविता को पटना के दैनिक जनशक्ति में खगेन्द्र ठाकुर ने छापा था बीस-बाईस साल पहले, यह पार्टी का अख़बार था जो पारिश्रमिक नहीं दे पाता था। दूसरी बार यह कविता कादंबिनी में छपी। तब इसके 500 रुपये मिले थे। चौथी बार यह कविता 'जसम' के एक पुस्तिकानुमा प्रकाशन में शामिल की गयी थी।
तीसरी बार मेरी एक लंबी कविता ‘तितलियाँ’ आलोचना में छपी। उस समय अरुण जी आलोचना देखते थे। दिल्ली में उसका सारा काम आर चेतनक्रांति देखते थे। वह कुछ आवारगी और बेरोजगारी से ग्रस्त दौर था, तब मैं चेतन के यहाँ ही रहता था। जब-तब उनके साथ उनके दफ्तर आकर बैठ जाता। इस बीच अरुण जी का फोन आता, जब-तब- “ ...कुछ नये लोगों से लिखवाओ।” तब मैं पास बैठा होता तो चेतन लगे हाथ बोलते, “हाँ, हैं न, कुमार मुकुल यहीं बैठे हैं उनसे लिखवा लेते हैं।” फिर फोन रख चेतन कहते - “कुछ लिख दो हमारे यहाँ भी।” अरुण जी कुछ समीक्षा टाइप चाहते थे। पर मैंने लंबी कविता (तितलियाँ) दी, जो छपी।
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कुमार मुकुल वरिष्ठ कवि-लेखक एवं पत्रकार हैं। गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : कुमार मुकुल
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'अपने अपने नामवर' का 6ठा प्रसंग - अपनी भाषा और संवेदना के साथ हमेशा याद रहेगा.