दुःखी जीवन (कला समीक्षा)

दुःखी जीवन (कला समीक्षा)
चित्र : सोभा सिंह
समीक्षक : जगतारजीत सिंह

यह कलाकृति सोभा सिंह की है। चित्रकार के प्रशंसक और शागिर्द इस कृति को देखकर ताज्जुब कर सकते हैं क्योंकि हो सकता है अधिकतर लोगों ने इस चित्र को न देखा हो। उन्हें इस बात का अनुमान भी नहीं हो सकता कि उसने कभी ऐसे दृश्य को चित्रित किया होगा, जिसका संबंध हिंसा या घट रही हिंसा से रहा होगा।
सोभा सिंह का नाम विशेष प्रकार की कलाकृतियों से जुड़ा हुआ है। उन्हीं द्वारा उसने नाम और धन कमाया। उसके काम को दो विशेष वर्गों में रखा जा सकता है। पहले वर्ग में अलग-अलग धर्मों से जुड़ी हस्तियाँ रहीं। दूसरे वर्ग में पंजाबी किस्सा-काव्य के नायक-नायिकाओं को चित्रित किया गया। इसके अलावा उसने ऐसे कई विषयों को भी छुआ, जिनका अपना अलग महत्व रहा।
सोभा सिंह अक्सर कहा करता था कि उसे कैनवस पर मार-काट और खून-खराबा दिखाना अच्छा नहीं लगता। हिंसा का प्रदर्शन हिंसा को जन्म देता है। परन्तु ‘दुःखी जीवन’ में हिंसा व हिंसा के प्रभाव को दिखाया गया है। इसके बावजूद कहीं कोई घायल व्यक्ति या खून के निशान दिखाई नहीं देते। उसने जो कहा, उसे व्यवहार में भी उतारा। प्रत्येक कलाकार की अपनी मान्यता होती है, जिसको वह अक्सर निभाता है।
यह रचना कब रची गई, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। इस चित्र के लिए उसने पानी के रंगों का प्रयोग किया। चित्र का विषय देश का विभाजन है। जिसे चित्र के संदर्भ की जानकारी न हो, वह भी इसे आसानी से समझ सकता है कि यह चित्र किसी न किसी मानवीय पीड़ा को व्यक्त कर रहा है, जिसे किसी समय-स्थान में बाँधा नहीं जा सकता। यहाँ पर कोई व्यक्ति हथियार नहीं चला रहा और न ही कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार के हथियार का शिकार होकर घायल दिखाई दे रहा है। फिर भी दुःख से भरे, बेसहारा लोगों की पेशकारी वाला यह चित्र दर्शकों को झकझोर जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि लोग हिंसा का शिकार होने के बाद इस पीड़ादायी स्थिति में पहुँचे हैं।
चित्रकार का यह चित्र निरंतरता को उजागर करता है। जो हुआ, वह चित्र का अंग बन गया, भले यह वास्तविकता के कुछ ही अंशों को दर्शा रहा है। जो दिखाई दे रहा है, इसका फैलाव बिना किसी रोक-टोक, बिना समय-स्थान का अनुमान लगाए होता ही रहेगा। ऐसा कल हुआ, आज हो रहा है और कल होने की संभावना भी दिखाता है। प्रश्न पैदा होता है कि हिंसा किसी भी व्यक्ति के लिए इतनी आवश्यक क्यों हो रही है। वैसे इस चित्र को इसके बिना भी जाना जा सकता है।
दूसरा विश्व युद्ध होने पर सोभा सिंह को उसकी विभागीय नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। उस समय उसने चित्रकला को अपनी उपजीविका बनाने का निर्णय किया। इसके लिए उसने लाहौर में रहने का निश्चय किया क्योंकि लाहौर शुरू से ही साहित्य, कला व संस्कृति का केंद्र रहा है। परंतु जल्दी ही उसे इस शहर को छोड़कर आना पड़ा क्योंकि विभाजन के कारण देश में सांप्रदायिक दंगे आरंभ हो गए थे। अपने सपनों के शहर को अलविदा कहते समय वह पूरी तरह से खाली हाथ था। कलाकार के कथनानुसार, उसके सौ से अधिक पूर्ण और अनेक अधूरे चित्र हमेशा के लिए लाहौर में छूट गए।
भारत आने पर उसे नए सिरे से जीवन-यापन आरंभ करने के लिए संघर्ष करना पड़ा। विभाजन के बाद उजड़ कर आने वाले लोगों को बसाने वाले पुनर्वास विभाग के मुखी डाॅ. महेन्द्र सिंह रंधावा थे। उसी ने इस विभाग के लिए सोभा सिंह को कलात्मक पोस्टर बनाने के लिए कहा। ‘दुःखी जीवन’ शीर्षक वाली कृति इसी के परिणामस्वरूप सामने आयी। यह बात 1948 के आस-पास की है।
चित्र के एकदम अग्र भाग की इमेज स्पष्ट है, यहाँ मध्यम उम्र की स्त्री बैठी है, जिसके पास थोड़े से सामान के अलावा उसके दो बच्चे हैं। इसके अलावा चित्र में प्रमुख इकाई वहाँ लगी हुई भयंकर आग है। लोग इधर-उधर बिखरे हुए हैं, जिनके कदम एक ही दिशा की ओर बढ़ रहे हैं।
‘दुःखी जीवन’ में लगी हुई आग अलग-अलग समुदायों के उजड़ जाने का साधन बनी। आग की लपटों से यह बात स्पष्टता से नज़र आती है। दूर जल रही आग की लपटें शून्य को ग्रास कर रही हैं। आग के सिर पर धुआँ ही धुआँ है। इससे ऊपर की स्पेस को बाएँ से दाएँ की ओर, अपने अंदर लपेट लिया है। जो शून्यता दिखाई दे रही है, उसकी जड़ें बस्तियों में हैं।
बस्तियाँ जहाँ विभिन्न प्रकार के लोग रहते आए थे, परंतु अब उनका स्थान आग ने ले लिया है। सामान्यतः व्यक्ति अपनी विविधता और विभिन्नता को कई प्रकार से प्रकट कर सकते हैं, जिसका विस्तार विचार से लेकर भौतिकता तक फैला होता है। परंतु आग के पास कोई विकल्प नहीं। उसे अपने वस्तु-रूप के लिए कच्चा माल चाहिए, जो बस्तियों के रूप में मौजूद था।
आग लगाने वाले फ्रेम में शामिल नहीं। बैठी हुई औरत के आगे-पीछे तीन गठरियाँ पड़ी हैं। गठरियों में क्या है, यह रहस्य है। बसे घरों से गठरियों में सिमटा हुआ सामान ही बाहर आ पाया है। सुरक्षित कहे जाने वाले घरों ने अपने मालिकों को ही बेघर कर दिया। चित्र में दिखाई दे रहा परिवार इसका गवाह है। यह उदाहरण केवल उस समय का ही नहीं, बल्कि हर उस दंगे का है, जो उस समय के बाद से लगातार होते ही रहे हैं। देश के अनेक शहरों को हिंसा का स्वाद दिया गया और आगे भी दिया जाता रहेगा। बिना किसी डर और संकोच के। आग ने घरों के अलावा मानवीय संबंधों, उनके सपनों को भी राख कर दिया।
क्या यह पूरा परिवार है? हो भी सकता है और नहीं भी। लगता है, कभी यह पूरा परिवार रहा होगा परंतु अब नहीं है। इस परिवार के साथ कोई पुरुष पात्र नहीं। सामने दिखाई दे रही स्थिति, इस विचार को और भी गंभीर बना देती है। माना जा सकता है, ये लोग घर छोड़कर एक साथ चले होंगे, परंतु रास्ते में किसी एक पड़ाव ने परिवार के पुरुष सदस्यों को निगल लिया या अपने परिवार की रक्षा करते हुए वह अपनी जान बैठा। कारण जो भी रहे हों, उस कारण यह परिवार बेसहारा और निर्बल अवश्य हो गया है। निआसरा तो वे तभी हो गए थे, जब घर को लूटने के बाद दंगाइयों ने उसे आग के हवाले कर दिया था। इस विचार को ध्यान से उन आकारों में देखा जा सकता है, जहाँ चित्र में बाईं ओर लड़की पीछे है। इस परिवार में पुरुष, बच्चा और गोदी में बच्चा लिए स्त्री है। परिवार पूरा है, परंतु इनके पास कोई सामान नहीं है। ये लोग अपनी जान तो बचा पाए, परंतु अपने साथ कोई सामान नहीं ला पाए। अर्थात् दोनों ही परिवार दुखी हैं, परंतु दोनों के बीच अंतर भी है। दूर कहीं कुछ प्रेत-छाया से आकार नजर आते हैं। ये सभी मिलकर चित्र के विषय को वास्तविक बनाते हैं और मजबूती देते हैं। इस भीड़ के अंदर कोई भी पहचान में आने वाला शख्स नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति और परिवार अपनी पहचान खोकर ‘दुःख का पुलिंदा’ बन, अनजाने रास्तों पर भटक रहा है।
मुख्य आकारों के दाहिनी ओर जो दिखाई दे रहा है, वह एक अलग ही वास्तविकता को उजागर कर रहा है, हालांकि सारा कुछ स्पष्ट भी नहीं। घरों का त्याग करने के बाद लोग समूह बनाकर उस ओर से इस ओर आने लगे। इसे ही काफिला कहा गया।
कई दिनों की मेहनत, दंगाइयों के हमले सहन करते, प्राकृतिक आपदाओं को झेलते हुए, अपने परिवारों के सदस्यों से मिलते-बिछुड़ते, मरते देखने के बाद भी, अभी तक यह विभाजन की सीमा को पार नहीं कर पाए।
साँस लेने के लिए, रात काटने के लिए काफिलों को रुकना पड़ता था। आदमियों के साथ पशु भी आराम करते क्योंकि काफिले में शामिल लोगों का सामान गाड़ियों पर लदा हुआ था। गाड़ियों को बैल या साँड़ खींच रहे थे। यहाँ दो सिख गाड़ियों के साथ दो बैलों को जोड़ते दिखाई दे रहे हैं। इसके पीछे और भी कई गाड़ियाँ नजर आ रही हैं। इनके आस-पास और बहुत पीछे लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है। सभी अपने-अपने ठिकानों को त्यागकर, लगातार उनसे दूर होते जा रहे हैं, फिर कभी वापस न लौटने के लिए!
बैठी हुई औरत का एक हाथ गठरी पर है। दूसरे हाथ से वह आँखों में आए आँसुओं को पोंछ रही है। सिर पर लपेटे मैले सफेद कपड़े ने उसके चेहरे को धुंधला कर दिया है। गौर से देखने पर पता लगता है कि उसकी आँखों की सफेदी एकदम सीधे देख रही है। उसकी आँखें पथराई प्रतीत होती हैं। यहाँ पहुँचते हुए इस अधूरे परिवार ने रास्ते भर जो-जो दृश्य देखे, ये लोग वे सब बता नहीं सकते। हम तो केवल चित्रकार द्वारा उस समय के हालात को चित्रित करते चित्र को ही देख रहे हैं। परन्तु चित्र देखते हुए दर्शक के मन में उनकी हालत के प्रति खौफ अवश्य भर सकता है।
आग की खोज ने आदि मानव के जीवन-क्रम को बदला। यह सुख-आराम का साधन भी बनी। काल-क्रम में यह युद्धों का अंग बन तबाही भी करती आ रही है।
पास में खड़ी लड़की ने एक बच्चे को उठा रखा है। लड़की का चेहरा ज्यादा बारीकी से नहीं बनाया गया। चेहरे और शरीर की बजाय लड़की के कपड़े अधिक बोलते हैं। पहनी हुई कमीज और सलवार की हालत बहुत खस्ता है। कपड़े एकदम फटे हुए हैं और चिथड़े बनने की ओर अग्रसर हैं। गले में पड़ा दुपट्टा एक ही समय में कई कार्य करता प्रतीत हो रहा है। ये कपड़े यहाँ तक पहुँचने की दुश्वारियों को बयान कर रहे हैं। आगे क्या होगा, इस बारे में कुछ भी कहना असंभव है।
दंगे/कत्लेआम की भयानकता का परिचायक गोदी में लिया बच्चा भी कर रहा है। उसके तन पर पड़े कपड़े बेहद कम हैं। जो हैं, वे केवल गुजारे भर के हैं।
कपड़ों की ऐसी स्थिति कैसे हुई? वास्तव में यह समय के साथ-साथ वस्तु की उपलब्धता को भी प्रकट करता है। सोचा जा सकता है कि जब यह परिवार घर से चला होगा, हालात ने इन्हें संभलने का मौका नहीं दिया होगा। वे जिन वस्त्रों में थे, उसी हालत में घर से निकल पड़े। इसलिए ये वस्त्र उनके रास्ते की कहानी भी बयान करते हुए, चित्र में नजर आ रहे हैं। सुंदर-सजे हुए घरों में रहने वाले ये लोग अपना कुछ जरूरी सामान व आवश्यक पूँजी भी संभाल रहे हैं और उसकी सुरक्षा भी कर रहे हैं।
लड़की और बच्चे के पैर नंगे हैं। यकीनन, बैठी हुई इनकी माँ के पैर भी खाली होंगे। रास्ते के सफर ने पैरों के रक्षकों को खत्म कर दिया होगा।
अग्रभाग में दिखाई दे रहा परिवार है, पृष्ठभूमि में आग का मंज़र है। आग की लपटों या उसका सेक दर्शकों की आँखों तक पहुँचता है। इस अग्नि ने बस्ती को अंदर-बाहर से जला कर ही राख कर दिया होगा। चित्र ने रंगों का प्रयोग कुछ इसी प्रकार से ही किया है। विशाल पृष्ठभूमि आग के सुपुर्द है। दाईं ओर थोड़ा-सा नीला आसमान दिखाई देता है। आग की लपट काफी आगे तक पहुँचती प्रतीत होती है। जो भी दृश्य है, वह तबाही के अक्स को गाढ़ा करता है।
विचार आता है, यह कौन-सा समय होगा? यदि आगे की ओर देखें तो रात का समय लगता है। जिस प्रकार के रंगों का इस्तेमाल किया गया है, वे चाँदनी रात का समय प्रदर्शित करते हैं। चाँदनी रात का समय होने के कारण ही कपड़ों और वस्तुओं पर हल्की-सी चाँदनी की परत दिखाई देती है। नीला रंग दर्शक को शांत-एकांत वातावरण के साथ जोड़ता है, परन्तु जल रही अग्नि की लपटें इतनी प्रबल हैं कि वह दिन का भ्रम दे रही है। तेज आग द्वारा पैदा की गई प्रचंड लौ ने चाँदनी रात के शांत प्रभाव को दूर-दूर तक प्रभावहीन कर दिया है। इसके कारण धरती की रंगत ही बदल गयी है।
कुछ समय के बाद सभी वस्तुएँ राख में बदल जाएँगी। वास्तव में किसी संदेह के कारण बस्ती को उजाड़ना, आगजनी करना, निवासियों को खत्म कर देना आदि वर्तमान समय में भी नजर आते हैं। चित्र भले सत्तर वर्ष पहले का है, परन्तु जिस जहरीली फितरत की बात यह करता है, उससे कोई भी देश कैसे मुक्त हो सकता है जहाँ हर रोज बर्बादी के नए से नए तरीकों को विकसित कर अपनाया जा रहा है।
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सोभा सिंह (1901-1986) का जन्म श्री हरिगोबिंदपुर में हुआ। वह पंजाब के कला-जगत में एक अलग पहचान लेकर उभरा। उसके कार्य ने विशेषकर सिख मानसिकता को प्रभावित किया। पिता देवा सिंह अंग्रेजी मुलाजिम थे। बचपन में ही माँ की मृत्यु हो जाने के कारण सोभा सिंह का आरंभिक जीवन बहुत अस्थिर रहा।
सोभा सिंह के आरंभिक चित्र धरती संबंधी मिलते हैं, जिन्हें उसके अभ्यास के तौर पर देखा जा सकता है। इस दौर में उसने पानी के रंगों का इस्तेमाल किया। समय बीतने के साथ उसने कई विषयों को अपने ब्रश से छुआ। पंजाबी जन-जीवन, किस्सों के पात्रों के अलावा सिख गुरुओं, संतों और शूरवीरों पर उसका मोह अटूट था।
विभाजन को दृश्यमान करते चित्रों की छानबीन करते हुए जब मैंने ‘दुःखी जीवन’ चित्र को देखा तो एकबारगी यह यकीन न हुआ कि यह चित्र सोभा सिंह का है। यह कार्य, विषय, संरचना और अभिव्यक्ति के स्तर पर चित्रकार के काम से मेल नहीं खाता। आम तौर पर उसके काम में अधिक फैलाव देखने को नहीं मिलता और न ही एक ही स्थान पर इतने पात्र एक साथ दिखाई देते हैं। यह शायद उसका पहला और आखिरी चित्र है, जहाँ उसने समाज के विकृत स्वरूप को चित्रित किया।
सरकारी नौकरी से मुक्त होने के बाद सोभा सिंह ने लाहौर में रहने का निश्चय किया, परन्तु विभाजन की त्रासदी के कारण उसका सपना पूरा न हो पाया। जब उसने लाहौर छोड़ा तो पीछे रह गए सामान में ‘सोहणी-महींवाल’ वाली पहली पेंटिंग भी थी।
(कलाकार का यह परिचय समीक्षक जगतारजीत सिंह द्वारा लिखा गया है।)
वरिष्ठ पंजाबी कवि जगतारजीत सिंह के पाँच कविता संग्रह, बाल कहानियों की तीन पुस्तकें, कला निबंधों/समीक्षा की पंद्रह पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकीं हैं।
गोल चक्कर पर उनका अन्य प्रकाशित काम देखिए : जगतारजीत सिंह
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